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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८ ] सूत्रस्थानम १२५

अ० ८ ] सूत्रस्थानम १२५
बिना झुके छींक न ले, न खायें, न सोये । मल-मूत्र आदि के वेग उपस्थित
होने पर दूसरा काम न करे, पहला वेग का निराकरण करे। वायु, अग्नि,
जल, चन्द्रमा, सूर्य, ब्राह्मण, गुरु, पिता, माता, इनकी ओर मुख करके न थूके,
न अपान वायु और मल, मूत्र का त्याग करे । रास्ते में, मनुष्यों के बैठने के
स्थान में, भोजन के समय मूत्र त्याग न करे । जप, हवन, पठन, बलि, पवित्र
क्रियाओं के स्थान पर नाक का मल (सिंघाणक) नहीं फेंके ॥ २३ ॥
न स्त्रियमवजानीत, नातिविश्रम्भयेन्न गुह्यमनुश्रावयेन्नाधिकुर्यात् ।
न रजस्वलां नाऽऽतुरां नामेध्यां नाशस्तां नानिष्टरूपाचारोपचारां नादक्षां
नादक्षिणां नाकामां नान्यकामां नान्यस्त्रियं नान्ययोनिं नायोनौ न चैत्य-
चत्वर-चतुष्पथो पवन-श्मशान-घातन-सलिलौषधि-द्विज-गुरु-सुरालयेषु न
सन्ध्ययोर्नातिथिषु नाशुचिर्नाऽजग्धभेषजो नाप्रणीतसंकल्पो नानुपस्थित-
प्रहर्षो नामुक्तवान् नात्यशितो न विषमस्थो न मूत्रोच्चारपीडितो न
श्रम-व्यायामोपवास-क्लमाभिहतो नारहसि व्यवायं गच्छेत् ॥ २४ ॥
स्त्री का तिरस्कार न करे । स्त्री का अधिक विश्वास न करे । स्त्री को गुप्त
बात न कहे । स्त्री को अधिकारी न करे, अधिकार न देवे । रजस्वला, रोगिणी,
अपवित्र, चण्डाल आदि, कुष्ठ आदि निन्दित रोग से पीड़ित, इच्छित रूप
आचार-उपचार से रहित, अचतुर, जो स्वयं नहीं चाहती हो, दूसरे पुरुष को
चाहने वाली, परस्त्री, असमानजातीय, कामनारहित इन स्त्रियों के साथ, वा
योनि को छोड़कर अन्यत्र गुदा या मुख में, मैथुन नहीं करना चाहिये । चैत्य
( देवता का मन्दिर ), चौराहा, आंगन, उपवन, बाग, श्मशान, वध्य-भूमि में,
पानी, ओषधि, ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता और मन्दिर के पास, प्रातः सायं दोनों
सन्ध्याकालों में, अति अधिक मात्रा में, निषिद्ध तिथियों में ( पूर्णिमा, अष्टमी,
चतुर्दशी, संक्रान्ति, श्राद्ध दिनों में, अमावस्या में, प्रतिपदा में), अपवित्रित
अवस्था में, वाजीकरण औषध खाये बिना, मन में मैथुनेच्छा किये बिना,
शिश्न में उत्तेजना हुए बिना, खाये बिना, खाली पेट, अधिक खाये, पेट भर
के और विषम स्थान पर स्थित होकर, मूत्र वेग से पीड़ित, खुले अनावृत स्थान
में स्त्री के साथ मैथुन न करे ॥ २४ ॥
न सतो न गुरून् परिवदेत्, नाशुचिरभिचार-कर्म-चैत्य-पूज्य-पूजा-
ध्ययनमभिनिर्वर्त्तयेत् ॥ २५ ॥
---------------- सज्जन या गुरुजनों की निन्दा न करे । अपवित्र अवस्था में अभिचार
(हिंसा का प्रयोग, श्येनादि उपचार) कर्म, चैत्य पूजा, एवं देवता,
पूजा, अध्ययन, पठन आदि नहीं करे ॥ २५ ॥

११६ चरकसंहिता [ अ० ८
न विद्युतस्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे
न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न
सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं तान्तं न विस्वरं नानवस्थि-
तपंदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिकलीवं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरै-
रध्ययनमभ्यसेत् ॥ २६ ॥
निम्न अवस्थाओं में अध्ययन-पठन नहीं करना चाहिये—ऋतु के बिना
बिजली चमकने पर, दिशाओं के जलने पर, ग्राम नगर आदि में आग लगने
पर, भूकम्प आने पर, विवाहादि बड़े उत्सवों में, विजयादशमी, दीपमालिका
होली आदि में, उल्कापात होने पर, चन्द्रग्रहण, या सूर्यग्रहण होने पर, कृष्णपक्ष
की चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा को जिन तिथियों में चन्द्रमा नहीं
दीखता, सन्ध्या कालों में, गुरुके मुख से बिना पढ़े, अक्षर को छोड़ते हुए,
खाते हुए, अधिक मात्रा में, रूक्ष स्वर से, स्वर के बिना, पदों की व्यवस्था के
बिना, विराम आदि चिह्नों का ध्यान न रखकर, रुक रुक कर, अति निर्बल
(बलहीन), बहुत ऊँची आवाज से बहुत जोर से, बहुत धीमी आवाज से भी
नहीं पढ़ना चाहिये ॥ २६ ॥
नातिसमयं जह्यात् । न नियमं भिन्द्यात् । न नक्तं नादेशे चरेत् ।
न सन्ध्यास्वभ्यवहाराध्ययन-स्त्री-स्वप्न-सेवी स्यात् । न बाल-वृद्ध-लुब्ध-
मूर्ख-क्लिष्ट-क्लीबैः सह सख्यं कुर्यात् । न मद्य-द्यूत-वेश्या-प्रसङ्ग-रुचिः
स्यात्, न गुह्यं विवृणुयात् । न कञ्चिदवजानीयात् । नाहंमानी स्यान्नादक्षो
नादक्षिणा नासूयकः । न ब्राह्मणान् परिवदेत् । न गवां दण्डमुद्यच्छेत्,
न वृद्धान् न गुरून् न गणान् न नृपान् वाऽधिक्षिपेत् । न चातिब्रूयात् ।
न बान्धवानुरक्तकृच्छ्रद्वितीयगुह्यज्ञान् बहिः कुर्यात् ॥ २७ ॥
समय को न खोये । नियम का उल्लंघन न करे । रात्रि में न घूमे । जंगल
आदि बीयाबान स्थानों में न घूमे । सन्ध्या समयों में भोजन, अध्ययन, मैथुन,
नींद नहीं करनी चाहिये । बालक, वृद्ध, लालची, मूर्ख, कुष्ठ रोगी, नपुंसक अनु-
त्साही अल्पसत्त्व के साथ मित्रता न करे । मद्य शराब, जुआ, वेश्या इनमें मन
नहीं लगाये । गुप्त रहस्य को न कहे । किसी का भी अपमान न करे ।
अहंकार या घमण्ड न करे । कार्यों में मूढ़ न रहे । गुणों में दोषों को न देखे ।
निन्दक, चुगलखोर न बने । ब्राह्मणों की निन्दा न करे । गाय के प्रति हाथ
उठाये । जो अपने अनुकूल हों उनकी निन्दा न करे । गुरु, [..] और
आचार्य, सभा, वयोवृद्ध, जनसमूह, समाज और राजा की [...]