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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८] सूत्रस्थानम् ११७

अ० ८] सूत्रस्थानम् ११७
भाई बन्धु आदि, अनुरक्त, स्नेही, मित्र आदि, आपत्ति में सहायक इनको कभी
बाहर न निकाले, कष्ट न दे ॥ २७ ॥
नाधीरो नात्युच्छ्रितसत्त्वः स्यात् । नाभृतभृत्यो, नाविश्रब्धस्वजनो,
नैकः सुखी, न दुःखशीलाचारोपचारो, न सर्वविश्रम्भी, न सर्वाभिशङ्की,
न सर्वकालविचारी । न कार्यकारलमतिपातयेत् । नापरीक्षितमभिनिवि-
शेत् । नेन्द्रियवशगः स्यात् । न चञ्चलं मनोऽनुभ्रामयेत् । न बुद्धीन्द्रि-
याणामतिभारमादध्यात् । न चातिदीर्घसूत्री स्यात् । न क्रोधहर्षायनु-
विदध्यात् । न शोकमनुवसेन् । न सिद्धावौत्सुक्यं गच्छेन्नासिद्धौ दैन्यम् ।
प्रकृतिमभीक्ष्णं स्मरेत् । हेतुप्रभाववििश्चितः स्यात् हेत्वारम्भनित्यश्च । न
कृतमित्याश्वसेत्, न वीर्यं जह्यात् । नापवादमनुस्मरेत् ॥ २८ ॥
बहुत अधीर, उतावला जल्दबाज़ न हो, बहुत उच्छ्रङ्खल उद्धत न बने ।
नौकरों का पोषण अवश्य करे । अपने मनुष्यों में, घर के आदमियों में अवि-
श्वास न करे । अकेला सुख का अनुभव न करे । अकेला मधुर पदार्थ न खाये
शील (स्वाभाविक व्यवहार), आचार, (शास्त्रानुकूल व्यवहार), उपचार,
(वस्त्र धारण करने और रहन सहन) में दुःखी व्यक्तियों की भाँति (गरीबों की
तरह) न रहे; सभ्य बनकर रहे । सब जगह सब का विश्वास न करे । सब
स्थानों पर सब का अविश्वास भी न करे, सन्देह भी न करे । सब समय सोचता
विचारता भी न रहे । काम के समय का उल्लंघन न करे । अपरीक्षित (अज्ञात)
स्थान आदि पर न बैठे न जाये । इन्द्रियों के वश में न हो । चंचल मन को
इधर उधर न घुमावे । बुद्धि, और ज्ञानेन्द्रियों का अतियोग न करे, उन पर
अधिक बोझ न डाले, अधिक विषय सेवन न करे । दीर्घ-सूत्री अर्थात् विलम्ब
से काम करने वाला न बने । जितना क्रोध आये उतना उग्र कर्म न करे और
जितनी खुशी हो उतनी अधिक खुशी न मनाये । शोक चिन्ता के वश में न
हो । कार्य में सफलता मिलने पर बहुत प्रसन्न न हो और कार्य में असफलता
मिलने पर दीन, (उदास चेहरा) न बनाये मुंह न लटकाये । बार बार प्रकृति
अर्थात् जन्म मरण के स्वभाव को ध्यान में रखे । शुभ कारण से कार्य का
आरम्भ करे । इतना कर लिया बस है, यह समझकर बैठ न जाये । वीर्य (परा-
क्रम) का त्याग न करे । निन्दा का स्मरण न करे ॥ २८ ॥
रूत्तमाभ्याक्षत-तिल-कुश-सर्षपैरग्निं जुहुयादात्मानमाशीर्भिराम-
न्त्रये नर्में नापगच्छेच्छरीरादु, वायुर्मे प्राणानादधातु, विष्णुर्मे
न्द्रो मे वीर्यं शिवा मां प्रविशन्त्वाप आपोहिष्ठेत्यपः

११८ चरकसंहिता [ अ० ८
स्पृशेत्, द्विः परिमृज्यौष्ठौ पादौ चाभ्युक्ष्य मूर्धनि खानि चोपस्पृशेदद्भि-
रात्मानं हृदयं शिरश्च, ब्रह्मचर्य-ज्ञान-दान-मैत्री-कारुण्य-हर्षोपेक्षा-प्रशम-
परश्च स्यादिति ॥ २६ ॥
अपवित्र अवस्था में उत्तम गौ का घी, अक्षत, तिल, कुशा और सरसों
द्वारा अग्नि में वेदमन्त्रों से हवन न करे और प्रार्थना करे कि अग्नि मेरे शरीर
से बाहर न जाये। वायु मेरे अन्दर प्राणों को धारण करे। विष्णु मेरे अन्दर
बल का संचार करें। इन्द्र मुझ में बल बढ़ावे। कल्याणकारी जल मुझ में प्रविष्ट
हों। ‘आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन०’ इस मन्त्र से जल का स्पर्श
स्नान आचमन करना चाहिये। दोनों समय भोजन करने के उप्रान्त ओष्ठ
और पांव को धोकर शुष्क कर लेना चाहिये शिर और आंख, कान, नाक
इन्द्रियों को जल से स्पर्श करे। फिर अपने हृदय, शिर को जल से स्पर्श करे।
ब्रह्मचर्य (काय और मन वाणि से मैथुन को छोड़ना ब्रह्मचर्याश्रम में, गृहस्था-
श्रम में भी अपनी पत्नी में ऋतुकाल को छोड़कर) तथा अन्यों को ज्ञान-दान,
‘मैत्री’ सब प्राणियों में आत्मवत् प्रवृत्ति, सब प्राणियों में दयाभाव, हर्ष, प्रसन्नता
सब प्राणियों में, उपेक्षा अर्थात् अप्रतिग्रह बुद्धि, प्रशम अर्थात् शान्त इन्द्रिय
एवं चित्तवाला बने ॥ २६ ॥
तत्र श्लोकाः--
पञ्चपञ्चकमुद्दिष्टं मनो हेतुचतुष्टयम् ।
इन्द्रियोपक्रमेऽध्याये सद्वृत्तमखिलेन च ॥ ३० ॥
स्वस्थवृत्तं यथोद्दिष्टं यः सम्यगनुतिष्ठति ।
स समाः शतमव्याधिरायुषा न वियुज्यते ॥ ३१ ॥
नृलोकमापूरयते यशसा साधुसंमतः ।
धर्मार्थावेति भूतानां बन्धुतामुपगच्छति ॥ ३२ ॥
परान् सुकृतिनो लोकान् पुण्यकर्मा प्रपद्यते ।
तस्माद् वृत्तममुष्ठेयमिदं सर्वेण सर्वदा ॥ ३३ ॥
यच्चान्यदपि किंचित्स्यादनुक्तमिह पूजितम् ।
वृत्तं तदपि चाऽऽत्रेयः सदैवाभ्यनुमन्यते ॥ ३४ ॥
पंचेन्द्रिय और इनके पांच प्रकार, मन एवं चार कारण (समयोग, मिथ्या-
योग, हीनयोग, और अतियोग) और सम्पूर्ण सद्वृत्त को 'इन्द्रियोप...'
अध्याय में कह दिया है। जो मनुष्य कहे हुए स्वस्थवृत्त का सम्यक्
रूप से पालन करता है वह सौ वर्षों तक नीरोग रहता और...