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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८ सूत्रस्थानम् १११

अ० ८ सूत्रस्थानम् १११

स्यात्, क्रुद्धानामनुनेता, भीतानामाश्वासयिता, दीनानामभ्युपपत्ता,
सत्यसन्धः, सामप्रधानः, पर-पुरुष-वचन-सहिष्णुः, अमर्षघ्नः, प्रशम-
गुणदर्शी, राग-द्वेष-हेतूनां हन्ता च ॥ २० ॥

उत्तमवेश धारण करे, शिर के बाल संवार कर कंघी कर रक्खे, शिर,
कान त्वचा पर तैल का मर्दन करे, नित्य प्रति प्रायोगिक धूमपान करे, घर
आये हुए का या मिलने पर पहिले कुशल क्षेम पूछे, सुमुख, सुन्दर, प्रसन्न चेहरे
वाला कठिन अवसरों पर भी सोचकर काम करने वाला, होम करने वाला,
यज्ञ—देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और नृयज्ञ करने वाला, दान
देनेवाला, चौराहों को नमस्कार करने वाला, देवता के लिये उपहार भेंट देने
वाला, अभ्यागतों को पूजा करने वाला, पिता पितामह आदि को श्रद्धापूर्वक
अन्न वस्त्र देने वाला हो, समय पर हित परिमित और मधुर अर्थ से युक्त वाणी
बोले । जितेन्द्रिय संयमी, धर्मात्मा हो, दूसरे की उन्नति को देखकर उन्नति
करने में ईर्ष्या भाव रखे कि मैं भी ऐसा करूँ जिस से मेरी भी उन्नति हो,
परन्तु फल में ईर्ष्या न करे । चिन्ता रहित न डरने वाला, साहसी आहार और
व्यवहार को छोड़कर अन्यत्र लज्जाशील, महत्त्वाकांक्षी, उत्साही, कामों में निपुण,
प्राणियों पर क्षमा करनेवाला, अपकारी को भी क्षमा देने वाला धर्म में चित्त
रखने वाला, आस्तिक (वेदादि सत् शास्त्रों को मानने वाला), विनय बुद्धि,
विद्या, अभिजन (पवित्र कुलोत्पत्ति से), और आयु में जो बड़े हों, सिद्ध, तप से
जो बड़े हों ऐसे तपस्वी, और आचार्य्य (सावित्री का उपदेश देने वाले गुरु)
इनकी सेवा करे । छत्र और दण्ड धारण करे, व्यर्थ या अकाल में न बोले,
जूता पहिने, अपने चारों ओर कुछ दूर (चार हाथ) तक देखता हुआ चले ।
मंगलजनक क्रियाशील रहे, कुचैले (मैले वस्त्र), हाड़-मांस, कांटे युक्त, अमेध्य
अपवित्र (श्मशान आदि, ) बाल, धान्यों के तुष, रोड़े-कंकड़ आदि, राख,
घड़े आदि के ठीकरे, नहाने के स्थान, पूजा स्थान, इन स्थानों को छोड़ने
वाला हो । श्रम से पूर्व ही आधी (शक्ति से) व्यायाम को छोड़ दे, सब
प्राणियों में बन्धुभाव भ्रातृ भाव रखने वाला, क्रोधी पुरुषों को मनालेने वाला,
डरे हुए पुरुषों के लिये आश्वासन (सांत्वना), देने वाला, दीनों गरीबों
के लिये उपकार करने वाला, सत्य प्रतिज्ञा वाला, शान्ति को मुख्य गिनने वाला,
... कठोर बचनों को सहन करने वाला, अक्रोधी, क्रोधियों को शान्त
... शान्तिमान्, लड़ाईझगड़े के कारणों को नष्ट करने वाला हो ॥२०॥
... स्यात्, नान्यस्वमादद्यात्, नान्यस्त्रियमभिलषेन्नान्यश्रियम्,

न वैरं रोचयेत् , न कुर्यात्पापम् , न पापेऽपि पापी स्यात्, नान्यदोषान्
ब्रूयात् , नान्यरहस्यमागमयेत् , नाधार्मिकैर्न नरेन्द्रद्विष्टैः सहाऽऽसीत,
नोन्मत्तैर्न पतितैर्न भ्रूणहन्तृभिर्न क्षुद्रैर्न दुष्टैः, न दुष्टयानान्यारोहेत् , न
जानुसमं कठिनमासनमध्यासीत, नानास्तीर्णमनुपहितमविशालमसमं
वा शयनं प्रपद्येत, न गिरि-विषम-मस्तकेष्वनुचरेत् , न द्रुममारो-
हेत् , न जलोप्रवेगमवगाहेत, कूलच्छायां नोपासीत, नाम्बुत्यानमभि-
तश्चरेत् , नार्धंहसेत, न शब्दवन्तं मारुतं मुञ्चेत्, नासंवृतमुखो
जृम्भां क्षवथुं हास्यं वा प्रवर्तयेत्, न नासिकां कुष्णीयात्, न
दन्तान् विघट्टयेत्, न नखान् वादयेत्, नास्थीन्यभिहन्यात्, ने भूमिं
विलिखेत्, न छिन्द्यात्तृणम्, न लोष्टं मृद्गीयात्, न विगुणमङ्गैश्चेष्टेत,
ज्योतींष्यग्निममेध्यमशस्तञ्च नाभिर्वीक्षेत, न हुङ्कुर्याच्छवम्, न चैत्य-
ध्वज-गुरु-पूज्याशस्त-च्छायामाक्रामेत्, न क्षपास्वनर-सदन-चैत्य-चत्वर-
चतुष्पथो पवन-श्मशानाघातनान्यासेवेत, नैकः शून्यगृहं न चाटवीमनु-
प्रविशेत्, न पापवृत्तान् स्त्री-मित्र-भृत्यान् भजेत, नोत्तमैर्विरुध्येत, नाव-
रानुपासीत, न जिह्मं रोचयेत्, नानार्यमाश्रयेत्, न भयमुत्पादयेत् ,
न साहसातिस्वप्न-प्रजागर-स्नान-पानाशानान्यभ्यसेत्, नोर्ध्वजानुश्चिरं
तिष्ठेत्, न व्यालानुपसर्पेत्र दंष्ट्रिणो न विषाणिनः पुरोवात-तपावश्या-
यातिप्रवातान् जह्यात्, कलिं नाऽऽरभेत, नाग्नुपहतोऽग्निमुपासीत,
नोच्छिष्टो नाधःकृत्वा प्रतापयेत् , नाविगतक्लमो नाप्लुत्वेया न नग्न
उपस्पृशेद्, न स्नानशाट्या स्पृष्टमुत्तमाङ्गम्, न केशाग्राण्यभिहन्यात्,
नोपस्पृश्य त एव वाससी विधूयात्, नास्पृष्ट्वा रत्नाश्व-पूज्य-मङ्गल-सुम-
सोऽभिनिष्क्रामेत्, न पूज्य-मङ्गलान्यपसव्यं गच्छेत्, नेतरान्यनुदक्षिणम्॥

झूठ न बोले, दूसरे के धन को न लेवे, दूसरे की स्त्री को न चाहे, दूसरे
की सम्पत्ति की चाहना न करे, वैर न करे, पाप न करे, पाप में मन न लगाये
अथवा पापी पुरुष पर भी पाप न करे, दूसरों के दोषों को न कहे, दूसरों की
गुप्त बातों को न जाने अधार्मिक, एवं राजा से द्वेष करने वाले (राजशत्रुओं)
के साथ न बैठे, पागल, पतित, नीच कर्म करने वाले, चाण्डाल आदि, भ्रूण-
घाती (गर्भपात करने वाले ) क्षुद्र, (छोटे पुरुष ) दुष्ट (चोर डाकू आदि)
के साथ न बैठे । दुष्टयान ( अनभ्यस्त घोड़े आदि ) पर न बैठे, घुटने ऊंचे
कर ( उत्कट आसन से ) भी देर तक न बैठे, बिना नीचे बिछाये, तकिया और
इाने रखे बिना, संकुचित स्थान पर, ऊंची नीची जगह पर न सोवे, मौन