सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०५

अ० ८ ] विमानस्थानम् ६०५
केवलेष्वौषधग्रामेषु तोयतोयदानुगतमारुतसंसर्गाद् गुरुप्रवृत्तीनि वम-
नादीनि भवन्ति, गुरुसमुत्थानानि च शरीराणि । तस्माद्वमनादीनां
निवृत्तिर्विधीयते वर्षाभागान्तेष्वृतुषु न चेदात्ययिकं कर्म, आत्ययिके
पुनः कर्मणि कायमृतुं विकल्प्य कृत्रिमगुणोपधानेन यथर्तुगुणविपरीतेन
भैषज्यं संयोग-संस्कार-प्रमाण-विकल्पेनोपपाद्यं प्रमाणवीर्यसमं कृत्वा
ततः प्रयोजयेदुत्तमेन यत्नेनावहितः ॥ १२७ ॥
वर्षा ऋतु में आकाश बादलों से भरा रहता है, सूर्य, चन्द्रमा और तारे
छिपे रहते हैं। इस समय आकाश से पानी बरसता है, भूमि कीचड़से भरी होती
है। प्राणियों का शरीर अत्यन्त क्लिन्न (आर्द्र) होता है। इसलिये स्वाभाविक
गुण घट जाता है। सम्पूर्ण ओषधियों में जल, बादल और इनसे मिली वायु
का संसर्ग होने से रस, वीर्य आदि का नाश हो जाता है। इसलिये वमन आदि
गुरु कार्यों को ये ओषधियाँ नहीं कर सकती। इस ऋतु में जो रोग शरीर में
होते हैं, उनका निदान महान् होता है। इसलिये हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा में
वमन आदि कार्यों का निषेध किया जाता है।
यदि वमन आदि कार्य करना आवश्यक (अनिवार्य) ही हो तो हेमन्त
आदि ऋतुओं में भी ऋतु के विपरीत कृत्रिम ऋतु (हेमन्त में गर्भगृह आदि,
ग्रीष्म में धारागृह आदि) बनाकर, भेषज को संयोग संस्कार के अनुसार तीक्ष्ण
या मृदु वीर्य करके पूर्ण सावधानी के साथ प्रयोग करे जिससे हेमन्त में अयोग
और ग्रीष्म में अतियोग न हो ॥ १२७ ॥
आतुरभावस्थास्वपि तु कार्याकार्यं प्रति कालाकालसंज्ञा । तद्यथा-
अस्यामवस्थायामस्य भेषजस्याकालः कालः पुनरन्यस्येति एतदपि हि
भवत्यवस्थाविशेषेण, तस्मादातुरभावस्थास्वपि हि कालाकालसंज्ञा । तस्य
परीक्षा मुहुर्मुहुरातुरस्य सर्वावस्थाविशेषावेक्षणं यथावद्भेषजप्रयोगार्थं,
नह्यतिपतितकालमप्राप्तकालं वा भेषजमुपयुज्यमानं यौगिकं भवति ।
कालो हि भेषजप्रयोगपर्याप्तिमभिनिर्वर्तयति ॥ १२८ ॥
रोगी की अवस्था में भी कार्य एवं अकार्य को देखकर काल और अकाल
कहा जाता है। जैसे--इस अवस्था में इस औषध का काल नहीं है और इस
अन्य औषध का समय है। (यथा-ज्वर के छः दिन बीतने पर औषध देनी
चाहिये यह औषध का काल है)। यह औषध देने का समय नहीं है (जैसे
नव ज्वर में कषाय का देना अकाल है।) यह भी अवस्था भेद से ऐसा होता
है। इसलिये रोगी की अवस्था में भी 'काल-अकाल' होता है। इसकी परीक्षा

६०६ चरकसंहिता [ अ० ८
रोगी की सब अवस्थाओं को बार-बार देखकर उचित रीति से औषध देने के
लिये करनी चाहिये । क्योकि समय के बीतने पर अथवा समय से पूर्व दी हुई
औषध फलदायक नहीं होती । उचित काल ही औषध प्रयोग को सफल
करता है ॥ १२८ ॥
प्रवृत्तिस्तु प्रतिकर्मसमारम्भः । तस्य लक्षणं-भिषगातुरौषधपरिचा-
रकाणां क्रियासमायोगः ॥ १२९ ॥
प्रवृत्ति—चिकित्सा कर्म का प्रारम्भ 'प्रवृत्ति' है। भिषग्, औषध रोगी और
परिचारक इन चारों का मिलकर क्रिया आरम्भ करना इसका लक्षण है ॥१२९॥
उपायः पुनभिषगादीनां सौष्ठवमभिविधानं च सम्यक् । तस्य
लक्षणं—भिषगादीनां यथोक्तगुण-संपद्देश-काल-प्रमाण-सात्म्य-क्रियादि-
भिश्च सिद्धिकारणैः सम्यगुपपादितस्यौषधस्यावचारणमिति ॥ १३० ॥
एवमेते दश परीक्ष्यविशेषाः पृथक्पृथक् परीक्ष्यितव्या भवन्ति ॥
उपाय—भिषग्, औषध, रोगी और परिचारक इन चारों का यथोक्त
उत्तम गुण वाला होना एवं देश काल की अपेक्षा से इनका एकत्र होना है ।
खुड्डाक-चतुष्पाद अध्याय में कहे अपने-अपने गुणों से युक्त होकर, देश, काल,
प्रमाण, सात्म्य और क्रिया आदि सफलता देने वाले कारणों से विचार कर भली
प्रकार दी हुई औषध का प्रयोग ही उपाय का लक्षण है ।
इस विधि से कारण आदि दस परीक्ष्य विषयों की पृथक् पृथक् परीक्षा
करनी चाहिये ॥ १३० ॥
परीक्षायास्तु खलु प्रयोजनं प्रतिपत्तिज्ञानं । प्रतिपत्तिर्नाम—यो
विकारो यथा प्रतिपत्तव्यस्तस्य तथाऽनुष्ठानज्ञानम् ॥ १३१ ॥
परीक्षा का प्रयोजन—परीक्षा का प्रयोजन 'प्रतिपत्ति' है अर्थात् जो विकार
जिस प्रकार से जानना चाहिये और जिस उपाय से चिकित्सा करना चाहिये,
उस रोग की वैसी चिकित्सा का ज्ञान करना 'प्रतिपत्ति' है ॥ १३१ ॥
यत्र तु खलु वमनादीनां प्रवृत्तिर्यत्र च निवृत्तिस्तद् व्यासतः सिद्धि-
षूत्तरकालमुपदेक्ष्यते सर्वम् । प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणसंयोगे तु खलु गुरु-
लाघवं संप्रधार्य सम्यगध्यवस्येदन्यतरनिष्ठायाम् । सन्ति हि व्याधयः
शास्त्रेषूत्सर्गापवादैरुपक्रमं प्रति निर्दिष्टाः । तस्माद् गुरुलाघवं संप्रधार्य
सम्यगध्यवस्येदित्युक्तम् ॥ १३२ ॥
जिन रोगियों को वमन देना चाहिये और जिनको वमन आदि नहीं देना
चाहिये, इन सबको पृथक् पृथक् आगे सिद्धिस्यान में कहेंगे ।