चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६६
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५६६
बने, जैसा अभिप्राय हो, वह वैसा वाद, और वैसी वाद-मर्यादा को स्थापित
करेगी,—ऐसा कह कर चुप हो जाये ॥ २५ ॥
तत्रे॒दं वादमर्यादालक्षणं भवति—इदं भवति वाच्यमिदमवाच्य-
मेवं सति पराजितो भवतीति ॥ २६ ॥
वाद की मर्यादा—यह कहना, यह नहीं कहना, इस प्रकार से पराजय
होता है, यह तीन वाद-मर्यादा के लक्षण कहाते हैं ॥२६॥
इमानि तु खलु पदानि वादमार्गज्ञानार्थमधिगम्यानि भवन्ति ।
तद्यथा—वादः, द्रव्यं, गुणाः, कर्म, सामान्यं, विशेषः, समवायः, प्रतिज्ञा,
स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतुः, दृष्टान्तः, निगमनं, उत्तरं, सिद्धान्तः,
उपनयः, शब्दः, प्रत्यक्षं, अनुमानमैतिह्यमौपम्यं, संशयः, प्रयोजनं,
सव्यभिचारं, जिज्ञासा, व्यवसायः, अर्थप्राप्तिः, संभवः, अनुयोज्यं,
अननुयोज्यं, अनुयोगः, प्रत्यनुयोगः, वाक्यदोषः, वाक्यप्रशंसा,
छलम्हेतुरतीतकालमुपालम्भः, परिहारः, प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञा,
हेत्वन्तरमर्थान्तरं, निग्रहस्थानमिति ॥ २७ ॥
वाद के मार्ग को समझने के लिये वैद्यों को निम्न चवालीस बातें समझ
लेनी चाहियें । यथा—वाद, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय,
प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतु, दृष्टान्त, उपनय, निगमन, उत्तर, सिद्धान्त,
शब्द, प्रत्यक्ष, अनुमान, ऐतिह्य, औपम्य, संशय, प्रयोजन, सव्यभिचार,
जिज्ञासा, व्यवसाय, अर्थप्राप्ति, संभव, अनुयोज्य, अननुयोज्य, अनुयोग, प्रत्य-
नुयोग, वाक्यदोष, वाक्यप्रशंसा, छल, हेतु, अतीतकाल, उपालम्भ, परिहार,
प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तर, अर्थान्तर और निग्रहस्थान ॥ २७ ॥
तत्र वादो नाम—यत् परः परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति ।
स वादो द्विविधः संग्रहेण—जल्पो वितण्डा च । तत्र पक्षाश्रितयोर्वचनं
जल्पः, विपर्ययो वितण्डा । यथा—एकस्य पक्षः—पुनर्भवोऽस्तीति,
नास्तीत्यपरस्य । तौ च हेतुभिः स्वस्वपक्षं स्थापयतः, परपक्षमुद्भावयतः,
एष जल्पः । जल्पविपर्ययो वितण्डा, वितण्डा नाम—परपक्षे दोष-
वचनमात्रमेव ॥ २८ ॥
वाद का लक्षण—शास्त्र के अनुसार जो परस्पर विगृह्य भाषण है वह वाद ॐ
कहाता है । यह संक्षेप से दो प्रकार का है । जल्प और वितण्डा । इनमें
ॐ वाद का लक्षण—'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चा-
वयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । न्यायदर्शन १ । २ । ४२ ।
५७० चरकसंहिता [ अ० ८
पक्ष और प्रतिपक्ष का आश्रय करके जो वाद किया जाता है, उसका नाम
‘जल्प’ है। इससे विपरीत ‘वितण्डा’ है। जैसे एक व्यक्ति का पक्ष है कि
पुनर्जन्म होता है, और दूसरे का पक्ष है कि पुनर्जन्म नहीं होता है। ये दोनों
नाना हेतुओं से अपने अपने पक्ष की स्थापना करते हैं और प्रतिबाधक प्रमाणों
से दूसरे के पक्ष का निराकरण करते हैं। इसका नाम ‘जल्प’ है। जल्प से
विपरीत वितण्डा है, परपक्ष में केवल दोष दिखाना ‘वितण्डा’ होता है † ॥२८॥
द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाः स्वलक्षणैः श्लोकस्थाने
पूर्वमुक्ताः ॥ २६ ॥
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय इनमें से प्रत्येक का लक्षण
सूत्रस्थान में कह आये हैं ॥ २६ ॥
अथ प्रतिज्ञा । प्रतिज्ञा नाम साध्यवचनम् । यथा नित्यः पुरुष
इति ॥ ३० ॥
प्रतिज्ञा—साध्य वचन का नाम ‘प्रतिज्ञा’ ✤ है। जैसे पुरुष नित्य है ॥३०॥
अथ स्थापना । स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतुदृष्टान्तो-
पनयनिगमनैः स्थापना । पूर्वं हि प्रतिज्ञा पश्चात्स्थापना, किं ह्यप्रतिज्ञातं
स्थापयिष्यति । यथा नित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः—अकृतकत्वा-
दिति । दृष्टान्तः-अकृतकमाकाशं तच्च नित्यम् । उपनयो यथा-चाकृत-
कमाकाशं तथा पुरुषः । निगमनं-तस्मान्नित्य इति ॥ ३१ ॥
स्थापना—इसी प्रतिज्ञा के हेतु, दृष्टान्त, उपनय, और निगमन द्वारा सिद्ध
करने का नाम ‘स्थापना’ है। प्रथम प्रतिज्ञा होती है, फिर उसकी स्थापना
की जाती है। बिना प्रतिज्ञा के किस वस्तु को स्थापना करेगा। जैसे पुरुष
नित्य है यह प्रतिज्ञा है। इसमें हेतु—उत्पत्ति न होने से। दृष्टान्त-आकाश, जिसे
किसीने उत्पन्न नहीं किया और वह नित्य है। उपनय—जिस प्रकार अनुत्पन्न
आकाश है इसी प्रकार पुरुष है। निगमन-इसलिये पुरुष भी नित्य है ॥३१॥
अथ प्रतिष्ठापना—प्रतिष्ठापना नाम या परप्रतिज्ञाया विपरीतार्थ-
स्थापना, यथा—अनित्यः पुरुष इति प्रतिज्ञा । हेतुः-ऐन्द्रियकत्वात्,
दृष्टान्तः—घट ऐन्द्रियकः, स चानित्यः, उपनयो-यथा घटस्तथा पुरुषः ।
निगमनं—तस्मादनित्य इति ॥ ३२ ॥
† ‘यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः । स प्रतिपक्ष-
स्थापनाहीनो वितण्डा । न्याय द० १ । २ । ४१ । ४४ ।
✤ साध्यस्य वचनं प्रतिज्ञा । न्याय द० १ । १ । ३२ ।