चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०५
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०५
सुमुखाः सर्वभूतानां प्रशान्ताः संशित-व्रताः ।
सेव्याः सन्मार्ग-वक्तारः पुण्य-श्रवण-दर्शनाः ॥५९॥
जो बुद्धि, विद्या, आयु, शील, स्वभाव, धैर्य्य साहस, स्मरण शक्ति, (समाधि)
मन का संयम आदि में अपने से बड़े हों, जो वृद्धों की सेवा करते हों, स्वभाव
को जानने वाले, अनुनयी, जिनको कि किसी प्रकार की चिन्ता नहीं, सुमुख-
सब प्राणियों के लिये प्रसन्नमुख, (प्रशान्त) इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त,
ब्रह्मचारी, सच्चे मार्ग का उपदेश करने वाले, पुण्य शब्दों को सुनाने वाले एवं
पुण्य दर्शनशील, जिनका शब्द और दर्शन पवित्र करता है, इस प्रकार के
आप्त पुरुषों का सेवन करना चाहिये, उनको गुरु मानना चाहिये, ये ज्ञान,
विज्ञान, धैर्य्य, स्मृति आदि की शिक्षा देकर मानस रोगों को नष्ट कर सकते हैं ॥
आहाराऽऽचारचेष्टासु सुखार्थी प्रेत्य चेह च ।
परं प्रयत्नमातिष्ठेद् बुद्धिमान् हितसेवने ॥ ६० ॥
न नक्तं दधि भुञ्जीत न चाप्यघृत-शर्करम् ।
नामुद्गसूपं नाक्षौद्रं नोष्णं नाऽऽमलकैर्विना ॥ ६१ ॥
( अलक्ष्मी-दोष-युक्तत्वान्नक्तं तु दधि वर्जितम् ।
श्लेष्मलं स्यात्ससर्पिष्कं दधि मारुत-सूदनम् ॥ ६२ ॥
न च सन्धुक्षयेत्पित्तमाहारं च विपाचयेन् ।
शर्करा-संयुक्तं दद्यात्तृष्णा-दाह-निवारणम् ॥ ६३ ॥
मुद्गसूपेन संयुक्तं दद्याद्वह्निकानिलापहम् ।
सुरसं चाल्पदोषं च क्षौद्रयुक्तं भवेद्दधि ।
उष्णं पित्तास्रकृद्दोषान् धात्रीयुक्तं तु निर्हरेत् ॥ ६४ ॥
ज्वरासृक्पित्त-वीसर्प-कुष्ठ-पाण्ड्वामय-श्रमान् ।
प्राप्नुयात्कामलां चोग्रां विधिं हित्वा दधिप्रियः ) ॥ ६५ ॥
इहलोक और परलोक में सुख चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि
हितकारी आहार, खान पान, आचार वर्त्तन और चेष्टा-क्रियाओ इन में विशेष
रूप से यत्नवान् रहे।
रात्रि में दही नहीं खाना चाहिये, और रात के सिवाय अन्य समय में जब
खाना हो तब भी घी या शकर के बिना, मूंग की दाल के बिना, शहद के बिना
किये बिना, अथवा आंवले के बिना नहीं खाना चाहिये। जब खाना हो
य, शहद, आंवला इन के साथ या गरम करके खाना चाहिये। रात
भी प्रकार से नहीं खाना चाहिये। रात्रि में दही खाने से शरीर की
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श्लेष्मा और स्वास्थ्य नष्ट हो जाते हैं और शरीर के दोष कुपित होते हैं। दही
में घी मिलाने से दही कफकारक हो जाता है, परन्तु वायु का नाश करता है।
शर्करा युक्त दही 'पित्त' ( जठराग्नि या पित्त को ) नहीं बढ़ाता, परन्तु आहार
भोजन को पचा देता है। इस लिये तृष्णा, प्यास और कलेजे की जलन
को मिटाता है। मूंग के साथ मिलाकर दही खाने से 'वातरक्त' रोग में लाभ
होता है। शहद के मिलाने से दही सुस्वाद और थोड़ा दोष वाला हो जाता है।
दही को गरम करके खाने से रक्तपित्त जन्य विकार नष्ट होते हैं, आंवले के
साथ खाने से भी रक्त पित्त रोग शान्त होता है। बहुत दही खाने वाला मनुष्य
जो इस उपरोक्त विधि को छोड़ कर दही खाता है, उसको ज्वर, रक्तपित्त,
वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डुरोग, भ्रम, और तीव्र कामला रोग हो जाते हैं ॥ ६०-६५ ॥
तत्र श्लोकाः-
वेगा वेगसमुत्थाश्च रोगास्तेषां च भेषजम् ।
येषां वेगा विधार्याश्च यदर्थं यद्धिताहितम् ॥ ६६ ॥
उचिते चाहिते वर्ज्ये सेव्ये चानुचिते क्रमः ।
यथाप्रकृति चाऽऽहारो मलायनगदौषधम् ॥ ६७ ॥
भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत् ।
वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्म-सुखार्थिना ॥ ६८ ॥
विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः ।
न वेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवाबदन्मुनिः ॥ ६६ ॥
मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक वेग, वेगों को रोकने से उत्पन्न
होने वाले रोग, इन रोगों की औषध, जिन उपस्थित वेगों को धारण करना चाहिये,
जिस के लिये जो लाभकारी है, उचित एवं अहितकारी, छोड़ने योग्य और
सेवनीय क्रम प्रकृत के अनुसार आहार, मलस्थान मल की वृद्धि, क्षय, औषध, भविष्य
में न होने वाले रोगों की औषध, सुख चाहने वाले बुद्धिमान् मनुष्य को जिन
पुरुषों को छोड़ना या जिनका सेवन करना उचित है, और दही को सेवन
करने की विधि यह सब आत्रेय मुनि ने 'न वेगान्धारणीय' नामक अध्याय में सम्पूर्ण
रूप से उपदेश किया है ॥ ६६-६९ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के
'न वेगान्धारणीयो' नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ और