चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४६
अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४६
दोष निकालने के लिये वमन, विरेचन रूपी संशोधन, देश, काल, मात्रादि
की अपेक्षा से देना चाहिये ।
विधि—मदनफल, पिप्पली कषाय की आधी अंजलि, को त्रिवृत् (निशोथ)
के कल्क की एक अक्ष मात्रा में मिलाकर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये ।
इस प्रकार से रोगी के दोष दोनों मागों से भली प्रकार निकलते हैं । इस प्रकार
से कल्प-स्थान में कहे जाने वाले वमन, विरेचन योगों को परस्पर मिला कर
रोगी की सब बातों को देख कर बुद्धि से भली प्रकार विचार कर रोगी को पीने
के लिये देवे ॥ १६ ॥
अथैनं सम्यग्वि॒रिक्तं विज्ञायापराह्ने शैखरिककषायेण सुखोष्णेन
परिषेचयेत्, तेनैव च कषायेण बाह्याभ्यन्तरान् सर्वोदकार्थान् कार-
येच्छश्वत् । तदभावे वा कटुतिक्तकषायाणामौषधानां क्वाथैर्मूत्रक्षारैर्वा
परिषेचयेत् । परिषिक्तं चैनं निर्वातमागारमनुप्रवेश्य पिप्पली-पिप्पली-
मूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-सिद्धेन यवाग्वादिना क्रमेणोपक्रमयेत्।
बिलेप्याः क्रमागतं चैनमनुवासयेद्विडङ्गतैलेनैकान्तरं द्वित्रिर्वा ॥ २० ॥
इसके पश्चात्(दोनों भागों से संशोधन होने पर) भली प्रकार संशोधन
हुआ जान कर शैखरिक कषाय ( अपामार्ग के थोड़े गरम कषाय ) से परिषेचन
करे । इसी कषाय को पानी के स्थान पर पीने के लिये और बाह्य ( स्नान
आदि में ) निरन्तर बरतना चाहिये । इस अपामार्ग के कषाय के अभाव में
कटु, तिक्त, कषाय रसवाली औषधियों के क्वाथों से, मूत्रमिश्रित यवक्षार
( जवाखार ) आदि से परिषेचन करना चाहिये । परिषिक्त इस रोगी को वायु-
रहित घर में प्रविष्ट करके पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोंठ इस पंचकोल
द्वारा सिद्ध यवागू को उपकल्पनीय अध्याय में कहे पेयादि क्रम से देना चाहिये ।
विलेपी तक पहुंच जाने पर रोगी को विडंग-तैल द्वारा एक दिन के अन्तर से
दो बार तीन बार अनुवासन देना चाहिये । ( अनुवासन में पेया का निषेध है,
क्योंकि पेया अभिष्यन्दी है ) ॥ २० ॥
यदि पुनरस्यातिप्रवृद्धाञ्शीर्षादान्कृमीन्मन्येत शिरस्येवाभिसर्पतः
काँश्चित्, ततः स्नेहस्वेदाभ्यामस्य शिर उपपाद्य विरेचयेदपामार्गतण्डु-
लादिना शिरोविरेचनेन ॥ २१ ॥
शिरो-विरेचन—इस रोगी के शिर को खाने वाले कृमियों को बहुत बढ़ा
हुआ जाने और देखे कि कृमि शिर में फिरते हों, ऐसा वैद्य को अनुभव हो तो
रोगी के शिर को स्नेहन और स्वेदन देकर अपामार्ग के तण्डुलों (चावलों )
आदि शिरो-विरेचन योग्य द्रव्यों से शिरोविरेचन देवे ॥ २१ ॥
५५० चरकसंहिता [ अ० ७
यस्त्वभ्यवहार्यविधिः प्रकृतिविघातायोक्तः कृमीणां, सोऽनुव्या-
ख्यास्यते—मूषिकपर्णीं समूलामप्रतानामाहृत्य खण्डशश्छेदयित्वा,
उलूखले क्षोदयित्वा पाणिभ्यां पीडयित्वा रसं गृह्णीयात्, तेन रसेन
ऽोदितशालितण्डुलपिष्टं समालोड्य पूपलिकाः कृत्वा विधूमेष्वङ्गारेषु
विपाच्य विडङ्गतैललवणोपहिताः कृमिकोष्ठाय भक्षयितुं प्रयच्छेत्;
अनन्तरं चाम्लकाञ्जिकमुदश्विद्वा पिप्पल्यादिपञ्चवर्गसंसृष्टं सलवण-
मनुपापयेत् ॥ २२ ॥
अनेन कल्पेन मार्कवार्क-सहचर-नीप-निर्गुण्डी-सुमुख-सुरस-कुठेरक-
गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-फणिज्जक-बकुल-कुटज-सुवर्णक्षीरी-
स्वरसा नामन्यतमस्मिन्कारयेत्पूपलिकाः, तथा किणिही-किरात-तिक्तक-
सुवहामलक-हरीतकी-बिभीतक-स्वरसेषु कारयेत्पूपलिकाः । स्वरसांश्चै-
तेषामेकैकशो द्वन्द्वशः सर्वशो वा मधुविलुलितान् प्रातरनन्नाय पातुं
प्रयच्छेत् ॥ २३ ॥
कृमियों के प्रकृति-विघात के लिये जो आहार-विधि कही है, उस को
व्याख्या करते हैं । जल और कोमल पत्तों के साथ मूषापर्णी को लाकर इसको
टुकड़े २ करके, ऊखल में कूटकर, हाथों से दबाकर रस निकाल ले । इस रस
में लाल धानों के चावलों की पिष्ठी को मिलाकर इससे पूरी ( पूप ) बनावे ।
इन पूरियों को धूम रहित अंगारों पर पकावे । फिर विडंग तैल और लवण के
. साथ मिलाकर कृमि कोष्ठवाले रोगी को खाने के लिये दे । पूरी खाने के
पीछे खट्टी कांजी ( धान्य-काञ्जिक ) में या उदश्वित् ( आधे विलोये मठे, या
छाछ ) में पिप्पली आदि पंचकोल को लवण के साथ मिला कर पीने के लिये
दे । इसी विधि से मार्कव ( भृंगराज ), अर्क (आंक ), सहचर (झण्टि ),
नीप ( कदम्ब ), निर्गुण्डी ( सिन्धुवार सम्हालू ), सुमुख, सुरस, कुठेरक,
गण्डीर, (सेहुण्ड ), कालमाल ( कुठेरक के भेद ), पर्णास, क्षवक, फणिजक
(तुलसी के भेद ), बकुल (मौलसरी ) कुटज, स्वर्णक्षीरी ( सत्यानाशी ) इन
में से किसी एक के रस के साथ पूरी तैयार करनी चाहिये। इसी प्रकार किणिही
( अपामार्ग ), किराततिक्त (चिरायता), आम की, हरड़, बिभीतक (बहेड़ा ),
सुवहा (शेफालिका ) इनके रसों में पूरियां बनानी चाहियें । इन ( मण्डूक-
पर्णी आदि ) में से एक एक को या दो दो को अथवा सब को मिलाकर स्वरस
निकाल कर इस स्वरस में मधु मिला कर प्रातःकाल खाली पेट पीने के
लिये दे ॥ २२-२३ ॥
अथापशराफूदाहृत्य महति किलिञ्चके प्रस्तीर्याऽऽतपे शोषयित्वोदूखले
क्षोदयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण
त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो वाऽऽतपे सुपरिभावितानि
भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समा-
वाप्यानुगुप्तं निधापयेत् । तेषां तु खलु चूर्णानां पाणितलं चूर्णं यावद्वा
साधु मन्येत, तत् क्षौद्रेण संसृज्य कृमिकोष्ठाय लेढुं यच्छेत् ॥ २४ ॥
इसके पीछे घोड़े की शकृत (लीद) को लाकर बड़ी चटाई पर फैलाकर
धूप में सुखा ले। फिर ऊखल में कूटकर शिला पर पीसकर बारीक बनाले
इस चूर्ण को विडंग के कषाय से या त्रिफला-कषाय से आठ बार अथवा दस
बार धूप में भावना देकर शुष्क कर ले। फिर इसको पत्थर पर पीसकर नये
घड़े में रखकर, वायु आदि न जा सके इस प्रकार से मुख को ढांप कर गुप्त
स्थान पर रख दे। इसमें से कर्ष परिमाण (चार माशा) अथवा रोग के
अनुसार जितनी मात्रा उचित समझे उतनी मात्रा को शहद में मिलाकर कृमि
रोगी को खाने के लिये दे ॥ २४ ॥
तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन संपोथ्य स्नेहभाविते
दृढ़े कलशे सूक्ष्मानेकच्छिद्रप्रध्ने शरीरमुपवेष्ट्य मृदावलिप्ते समावाप्यो-
ल्पेन पिधाय भूमावाकण्ठं निखातस्य स्नेहभावितस्यैवान्यस्य दृढस्य
कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद् गोमयैरुपचित्य दाहयेत्; स यदा
जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि गलितस्नेहानि भल्लातकास्थीनीति,
ततस्तं कुम्भमुद्घाटयेत् । अथ तस्माद् द्वितीयात्कुम्भात्तं स्नेहमादाय
विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहार्धमात्रैः प्रतिसंसृज्याऽऽतपे सर्वमहः स्थाप-
यित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते, विरिक्तस्य
चाऽऽनुपूर्वी यथोक्ता ॥ २५ ॥
दूसरा प्रयोग—घड़े में जितने भिलावे के फल आ सकें, उतने फलों को
कूट कर तैलादि स्नेह से चिकने, मजबूत एक घड़े में भरे। इस घड़े के
निचले भाग में अनेक सूक्ष्म छिद्र बना दे तथा घड़े पर मिट्टी का लेप कर
दे। इस घड़े में भिलावे भर कर ढक्कन से मुंह ढांप दे। फिर स्नेह से भावित
एक दूसरे घड़े को ले कर जमीन में गले तक गाड़ दे। इस गड़े हुए घड़े के
ऊपर भिलावे वाला घड़ा रख कर चारों ओर उपले रख कर जलावे। जब
उपले भली प्रकार जल जावें, तब ऊपर के घड़े को पृथक् करे। जब इस
दूसरे घड़े में से तेल (स्नेह) ले कर स्नेह से आधी मात्रा में विडंग-तण्डुल
चूर्ण को स्नेह में मिला कर धूप में चार प्रहर तक रखे। पीछे इस स्नेह को
५५२ चरकसंहिता [ अ० ७
कृमि-कोष्ठ रोगी को पीने के लिये दे । इससे भली प्रकार विरेचन होता है।
विरेचन के पीछे पूर्व की भांति पेया आदि देने का क्रम है ॥२५॥
एवमेव भद्रदारु-सरलकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत्। अनुवा-
सयेच्चैनमनुवासनकाले ॥ २६ ॥
इसी भल्लात के स्नेह-विधि से देवदारु, सरल (राल-सर्ज), वृक्षों से स्नेह
बना कर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये और अनुवासन के योग्य समय
में कहे हुए स्नेहों से अनुवासन देना चाहिये ॥ २६ ॥
अथ 'आहर' इति ब्रूयात् शारदान्नावांस्तिलान्संपदुपपेतान्। तानाहृत्य
सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषाये सुखोष्णे निर्वापयेदाश्लेष-
गमनात्, गतदोषानभिसमीक्ष्य सुप्रलूनान्प्रलुञ्च्य पुनरेव सुनिष्पूतान्
सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभा-
वितान्भावयित्वाऽऽतपे शोषयित्वोलूखले संक्षुद्य दृषदि पुनः श्लक्ष्णपिष्टा-
न्कारयित्वा द्रोण्यामभ्यवधाय विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुरवसिञ्चन् पाणि-
मर्दमेव मर्दयेत् । तस्मिन्खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत्पाणिभ्यां
पर्यादाय शुचौ दृढे कलशे समासिच्यानुगुप्तं निधापयेत् ।
अन्ययोग—वैद्य रोगी से कहे कि 'आगे कहे पदार्थ लाओ'। अच्छी
प्रकार पके, रस-वीर्य युक्त, शरद ऋतु में होने वाले नये तिलों को ला कर,
भली प्रकार मिट्टी आदि से साफ़ करके सुखा ले । फिर सुखोष्ण, कुछ गरम
बिडंग-कषाय में भिगो दे, जब तक कि छिलके में लगा मैल दूर न हो जाय तब
तक भिगो कर रखे । दोष निकलने पर इन तिलों को तुष रहित करके, सुखा
लेवे । फिर छाज से साफ़ करके धोले । फिर सूखने पर बिडंग कषाय में
इक्कीस बार भावना दे कर धूप में सुखा लेवे । इन तिलों को ऊखल में कूट
कर पत्थर की शिला पर रख बारीक पीस लेवे । अब इनको द्रोणी (थाली,
कड़ाही) में रखकर विडंग कषाय को थोड़ा थोड़ा डालते हुए हाथों से खूब
मले, इस प्रकार हाथों से मलने पर जो तैल निकलता है, हाथ पर लगे हुए
उस तैल को ले कर पवित्र, दृढ़ घड़े में रखकर गुप्त स्थान में सुरक्षित रख देवे ।
इस को खाने के लिये कहे ।
अथ 'आहार' इति ब्रूयात्-तिल्वकोदालकयोर्द्वौ बिल्वमात्रौ पिण्डौ
श्लक्ष्णपिष्टौ विडङ्गकषायेण, ततोऽर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतोस्ततोऽर्धमात्रौ
दन्तीद्रवन्त्योरतोऽर्धमात्रौ चव्यचित्रकयोरित्येतं सम्भारं विडङ्गकषा-
यस्याऽऽढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य ततस्तैलप्रस्थमावाप्य सर्वमालोड्य महति
पयोगे समासिच्याग्नावधिश्रित्य महत्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेह-
मवलोकयन्नजस्रं मृद्वग्निना साधयेद्दर्व्या सतत मवघट्टयन् । स यदा
जानीयाद्विरमति शब्दः, प्रशाम्यति च फेनः, प्रसादमापद्यते स्नेहो
यथास्वं गन्धवर्णरसोत्पत्तिः, संवर्तते च भेषजमंगुलिभ्यां मृद्यमानमति-
मृदुनतिदारुणमनंगुलिप्राद्दि चेति, स कालस्तस्यावतारणाय । ततस्तम-
वतीर्णशीतीभूत महतेन वाससा परिपूय शुचौ दृढे कलशे समासिच्य
पिधानेन पिधाय शुक्लेन बद्धपट्टेनावच्छाद्य सूत्रेण सुबद्धं सुनिगुप्तं
निधापयेत् । ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते,
सम्यगपहृतदोषस्य चास्याऽऽनुपूर्वी यथोक्ता । ततश्चैनमनुवासयेदनु-
वासनकाले ।
फिर वैद्य आगे कहे पदार्थ लाने को कहे—तिल्वक और उद्दालक
ये दो बिल्व भर (पल भर, ४ तोला) लेकर विडंग कषाय के साथ खूब बारीक
पीस ले । इनसे आधी मात्रा (२ तोला) श्यामा (काली निशोथ) और त्रिवृत्
(सफेद निशोथ), इन से आधी (१ तोला) दन्ती और द्रवन्ती, इनसे आधे (½
तोला) चव्य और चित्रक इन सबको अर्धाढक (दो प्रस्थ) विडंग कषाय, में तथा
एक प्रस्थ पूर्वोक्त तिलों से तैयार किये तैल के साथ मिलाकर एक बड़े कड़ाहे में
रख कर आग पर रख कर आराम से बैठ कर, चारों ओर स्नेह को देखते हुए
कि गिरे नहीं, निरन्तर मृदु अग्नि से पकावे । और पकाते समय कड़छी द्वारा
बराबर हिलाता रहे। जिस समय शब्द होना बन्द हो जाय, झाग उठना भी
रुक जाय, तथा स्नेह (तैल) भी स्वच्छ हो जावे, एवं तैल में उचित गन्ध,
वर्ण और रस की उत्पत्ति हो जाय तब समझे कि तैल बन गया । औषध
(कल्क) अंगुली से मलने पर न तो बहुत कोमल और न बहुत कठोर हो
तथा अंगुली पर चिपटे नहीं, (कल्क की बत्ती बन जावे)। तब समझ ले कि
तैल सिद्ध हो गया यह समय है, तैल उतारने का; अब इसको उतार कर ठण्डा
होने पर बड़े भारी वस्त्र से छान कर एक शुद्ध, मजबूत पात्र में डाल कर,
ढक्कन से टांप कर, सफेद वस्त्र से बांध कर तागे से कस कर, गुप्त (सुरक्षित)
स्थान पर रख देवे । इस तैल की मात्रा को रोग के अनुसार पीने के लिये
(कृमि-रोगी को) देवे। इससे भली प्रकार विरेचन होता है। दोषों के भली
प्रकार निकल जाने पर पहिले कही विधि करनी चाहिये। अनुवासन योग्य समय
में उस तैल से अनुवासन देना चाहिये ।
एतेनैव च पाकविधिना सर्षपातसी-करञ्ज-कोषातकी-स्नेहानुपकल्प्य
पाययेत्सर्वविशेषानवेक्ष्यमाणः। तेनागदो भवतीति ॥ २७ ॥
५५४ चरकसंहिता [ अ० ७
इसी पूर्वोक्त विधि से सरसो, अलसी, करञ्ज, कोषातकी ( तुरई ) का तैल
बना कर सब परीक्षणीय वस्तुओं को देख कर कृमि-रोगी को तैल पिलावे। इस
से रोगी नीरोग हो जाता है ॥ २७ ॥
इत्येतत् द्वयानां श्लेष्मपुरीषसंभवानां कृमीणां समुत्थान-संस्थान-
स्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषा व्याख्याताः सामान्यतः ॥२८॥
इस प्रकार से कफजन्य और पुरीषजन्य कृमियों के निदान, संस्थान,
स्थान, वर्ण, प्रभाव और चिकित्सा सामान्य रूप में कह दी है ॥ २८ ॥
विशेषतस्त्वल्पमात्रमास्थापनानुवासनानुलोमहरणभूयिष्ठं तेष्वौष-
धेषु पुरीषजानां कृमीणां चिकित्सितं कार्यमिति । मात्राधिकं पुनः
शिरोविरेचन-वमनोपशमन-भूयिष्ठं तेष्वेवौषधेषु श्लेष्मजानां कृमीणां
चिकित्सितं कार्यमिति । एष कृमिघ्नो भेषजविधिरनुव्याख्यातो
भवतीति ॥ २९ ॥
विशेष रूप से पुरीषजन्य कृमियों के लिये कही हुई वमन, विरेचन, आस्था-
पन, अनुवासन, शिरोविरेचन, ओषधियों में अल्पमात्रा में आस्थापन, अनुवा-
सन और अनुलोम-हरण, विरेचन बरतना चाहिये। मलजन्य कृमियों में बस्ति,
विरेचन अधिक बरतना चाहिये। कफजन्य कृमियों में शिरोविरेचन, वमन
और शमन अधिक देना चाहिये ॥ २९ ॥
तमनुतिष्ठता यथास्वहेतुवर्जने प्रयत्नितव्यम् ॥ ३० ॥
यथोद्देशमेवमिदं कृमिकोष्ठचिकित्सितं यथावदनुव्याख्यातं
भवतीति ॥ ३१ ॥
इस विधि को बरतते हुए वैद्य को चाहिये कि रोगी को कृमि निदान से भी
बचाये। इस प्रकार से पूर्व कथितानुसार कृमि-कोष्ठ चिकित्सा ( शोधन-शमन
रूप ) को यथावत् पूर्ण रूप से कह दिया है ॥ ३०-३१ ॥
भवन्ति चात्र—अपकर्षणमेवाऽऽदौ कृमीणां भेषजं स्मृतम्।
ततो विघातः प्रकृतेर्निदानस्य च वर्जनम् ॥ ३२ ॥
अयमेव विकाराणां सर्वेषामपि निग्रहे।
विधिर्दृष्टस्त्रिधा योऽयं कृमीनूद्दिश्य कीर्तितः ॥ ३३ ॥
संशोधनं संशमनं निदानस्य च वर्जनम्।
एतावद्भिषजा कार्यं रोगे रोगे यथाविधि ॥ ३४ ॥
कृमियों को प्रथम खींच कर निकालना ही औषध है। फिर प्रकृति
का नाश, निदान का छोड़ना है यह विधि सब प्रकार के कृमियों के लिये है।
इतना ही नहीं, अपितु सब रोगों के लिये है। इसलिये वैद्य को चाहिये कि