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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८७

अ० ६ ] सूत्रस्थानम् ८७
सन्तापे जगति, अरूक्षा रसाः प्रवर्धन्तेऽम्ल-लवण-मधुराः, यथाक्रमं तत्र
बलमुपचीयते नृणामिति ॥ ७ ॥
वर्षा शरद् और हेमन्त ऋतु में जब सूर्य दक्षिणायन हो जाता है, काल
के स्वाभाविक मार्ग के कारण, बादल, वायु, वर्षा के कारण सूर्य का तेज घट
जाने से और सोम का बल कम न होने से, वर्षा जल के कारण गरमी के शान्त
हो जाने से संसार में अरूक्ष, स्निग्ध रस बढ़ते हैं । इससे अम्ल, लवण और
मधुर क्रमशः वर्षा, शरद् और हेमन्त में बढ़ते हैं । इन रसों के बढ़ने से मनुष्यों
का बल भी बढ़ जाता है ॥ ७ ॥
भवन्ति चात्र - आदावन्ते च दौर्बल्यं विसर्गादानयोर्नृणाम् ।
मध्ये मध्यबलं त्वन्ते श्रेष्ठमग्रं च निर्दिशेत् ॥ ८ ॥
शीते शीतानिल-स्पर्श-संरुद्धो बलिनां बली ।
विसर्ग और आदान काल के आदि और अन्त में पुरुषों के शरीर में दुर्ब-
लता आती है । यथा-विसर्ग के आदि काल वर्षा में और आदान के अन्त
समय ग्रीष्म ऋतु में मनुष्यों में दुर्बलता रहता है । दोनों कालों के मध्य में
(अर्थात् शरद् और वसन्त में) मध्यम बल रहता है । विसर्ग के अन्त समय
(हेमन्त में) और आदान काल के पहिले (शिशिर में) काल में मनुष्यों का
बल श्रेष्ठ अर्थात् बढ़ा रहता है ॥ ८ ॥
पक्ता भवति हेमन्ते नृणां द्रव्या-गुरु-क्षमः ॥ ९ ॥
स यदा नेन्धनं युक्तं लभते देहजं तदा ।
रसं हिनस्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रकुप्यति ॥ १० ॥
तस्मात्तूषार-समये स्निग्धानम्ल-लवणान् रसान् ।
औदकानूप-मांसानां मेध्यानामुपयोजयेत् ॥ ११ ॥
बिलेशयानां मांसानि प्रसहानां भृतानि च ।
भक्षयेन्मदिरां सीधुं मधु चानुपिबेन्नरः ॥ १२ ॥
गोरसानिक्षुविकृतीर्वसां तैलं नवौदनम् ।
हेमन्तेऽभ्यस्यतस्तोयमुष्णं चाऽऽयुर्न हीयते ॥ १३ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनं मूर्ध्नि तैलं जेन्ताकमातपम् ।
भजेद् भूमिगृहं चोष्णमुष्णं गर्भगृहं तथा ॥ १४ ॥
शीतेषु संवृतं सेव्यं यानं शयनमासनम् ।
हेमन्त काल की परिचर्या—हेमन्त रूपी शीत काल में ठण्डी वायु के
स्पर्श से जठराग्नि, शरीर से बाहर न निकल कर अन्दर ही रुक कर (जिस

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प्रकार कि कुम्हार बर्तन पकाते समय या ईंटों के भट्ठे में आग को अन्दर ही
बन्द कर देते हैं, और वहाँ पर अग्नि तीव्र हो जाती है, उसी प्रकार) प्रबल हो
उठती है। इसलिये मनुष्यों की जठराग्नि काल स्वभाव से ही हेमन्त में प्रबल
और अधिक मात्रा में भोजन को पचाने में समर्थ होती है। इस समय यदि
जाठराग्नि को अग्नि बल के अनुसार अन्न रूपी आहार न मिले, तो शरीर के
सौम्य (द्रव्य) भाग को नष्ट करने लगती है। इसलिये शीत काल में शीत
गुण के बढ़ने से वायु भी बढ़ती है।
इस वायु की वृद्धि को रोकने के लिये स्निग्ध (मधुर), अम्ल और नम-
कीन पदार्थ खाने चाहिये। चर्बी वाले जलचर प्राणियों का मांस रस, बिल में
रहने वाले (नकुल आदि) पशुओं का मांस, प्रसह (कुक्कुट आदि) पक्षियों
का मांस खाना चाहिये, मांस खाकर ऊपर से मदिरा सीधु (गुड़ की शराब)
और मधु पीना चाहिये। दूध, दही, मावा आदि एवं गन्ने के रस से बनी
खीर, राब, शर्करा आदि से बनी वस्तुएँ, वसा, तैल और नये चावल
खाने चाहिये। हेमन्त काल में स्नान आदि में गरम पानी का व्यवहार करने
वाले की आयु कम नहीं होती। तैलमर्दन, उबटन, शिर पर तैल लगाना,
जेन्ताक (स्वेद,) धूप का सेवन, भूमि के नीचे बने तहखानों में रहना, घर के
अन्दर घर बना उसे गरम करके रहना चाहिये, भली प्रकार घिरा हुआ घर
हो, आसन या सवारी आदि करते समय खूब लिपटकर बैठे जिससे शीत
न लगे ॥ ६-१४ ॥
प्रावाराजिन-कौशेय-प्रवेणी-कुथकास्तृतम् ॥ १५ ॥
गुरूष्णवासा दिग्धाङ्गो गुरुणाऽगुरुणा सदा ।
शयने प्रमदां पीनां विशालोपचितस्तनीम् ॥ १६॥
आलिङ्ग्याऽगुरुदिग्धाङ्गीं सुप्यात्ससदमन्मथः ।
प्रकामं च निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ॥ १७ ॥
वर्जयेदन्नपानानि लघूनि वातलानि च ।
प्रवातं प्रमिताहारमुदमन्थं हिमांगमे ॥ १८ ॥
भारी कम्बल, मृग छाल ( कौशेय ) रेशम, (प्रवेणी ) कम्बल, गद्दे इनको
फैलाकर भारी और गरम कपड़ों को पहिनकर मनुष्य अङ्गों पर अगर का
गाढ़ा लेप सदा करे। भरे शरीर वाली (दुबली-पतली नहीं), कामवती एवं
उन्नत स्तनों वाली, अङ्गों पर अगर का लेप की हुई स्त्री का आलिङ्गन करके
हर्ष और कामेच्छा के साथ सोये। शिशिर ऋतु में मैथुन यथेच्छ सेवन करे।