सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ५ ] निदानस्थानम् ४६३

अ० ५ ] निदानस्थानम् ४६३
दशश्लेष्मकृता यस्मात्प्रमेहाः षट् च पित्तजाः ।
यथा करोति वायुश्च प्रमेहांश्चतुरो बली ॥ ४८ ॥
साध्यासाध्यविशेषाश्च पूर्वरूपाण्युपद्रवाः ।
प्रमेहाणां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ ४६ ॥
इस प्रमेह-अध्याय में हेतु, व्याधि, प्रमेहों के कारण, दोष एवं दूष्य का
वर्णन, इनके नाना रूप, दस प्रकार कफजन्य, छः प्रकार के पित्तजन्य और
चार प्रकार के वातजन्य प्रमेह, उनके साध्य-असाध्य भेद, प्रमेहों के पूर्वरूप,
उपद्रव और क्रियासूत्र ये सब विषय कह दिये हैं ॥ ४७-४१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने प्रमेह-
निदानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे कुष्ठनिदान का व्याख्यान करते हैं । जैसा कि भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥२।
सप्त द्रव्याणि कुष्ठानां प्रकृति-विकृतिमापन्नानि भवन्ति । तद्यथा—
त्रयो दोषा वातपित्तश्लेष्माणः प्रकोपणविकृताः । दूष्याश्च शरीरधात-
वस्त्वङ्-मांस-शोणित-लसीकाश्चतुर्धा दोषोपघातविकृताः; इत्येतत्सप्तानां
सप्तधातुकमेकंगत्वमाजननं कुष्ठानाम्, अतः प्रभावण्यभिनिर्वर्तमानानि
केवलं शरीरमुपतपन्ति ॥ ३ ॥
शरीर के अन्दर सात द्रव्य विकृत होकर कुष्ठ रोग के कारण बनते हैं ।
यथा—प्रकोपकारक पदार्थों के संयोग से वात, पित्त और कफ ये तीन दोष
विकृत होकर, त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चार दूष्य ( धातु तथा उप-
धातुओं ) को अपने संसर्ग से विकृत करते हैं । इस प्रकार से ये सात द्रव्य
विकृत होकर कुष्ठ रोग को उत्पन्न करते हैं । १ इन सातों धातुओं से उत्पन्न
१. वीसर्प और कुष्ठ रोग में दोष और दूष्य एक समान ही हैं ।' इस
समानता पर भी वीसर्प फैलाने वाला तथा रक्त का प्रधान दोष इसमें रहता है ।
अकेकी और सब चिकित्साओं के समान है। रक्तजन्य
कण्डू, पूय, त्वक्-शून्यता, पसीने का न आना होता है जो वीसर्प में