चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५६
अ० ४ ] सूत्रस्थानम् ५६
( पीतसाल ), अरिमेद (१विट्खदिर इरिमेद), ये दस 'उदर्द' अर्थात् शीतपित्त
रोग को शान्त करते हैं ॥
विदारीगन्धा-पृश्निपर्णी-बृहती-कण्टकारिकैरण्ड-काकोली-चन्दनो-
शीरैला-मधुकानीति दशेमान्यङ्गमर्दप्रशमनानि भवन्ति ॥ (४४) ॥
विदारीगन्धा ( शालपर्णी ), पृश्निपर्णी ( पिठवन ), बृहती ( बड़ी कटेरी )
कण्टकारिका ( छोटी कटेरी ) एरण्ड, काकोली, चन्दन ( लाल चन्दन ), उशीर
( खस ), एला, ( छोटी इलायची ), मधुक ( मुलहटी ), ये दस 'अंगमर्द-प्रश-
मन' अर्थात् अंगों के टूटने की बेचैनी को मिटाते हैं ॥
पिप्पली-पिप्पलीमूल-चव्य-चित्रक-शृङ्गवेर-मरिचाजमोदाजगन्धाजा-
जी-गण्डीराणीति दशेमानि शूलप्रशमनानि भवन्ति ॥ (४५) ॥
इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ ६ ] ॥
पिप्पली, पिप्पली-मूल, चव्य ( चविका ), चित्रक ( चातामूल ), शृङ्गवेर
(सांठ), मरिच, अजमोदा (अजवायन), अजगन्धा (हूल्हू), अजाजी ( जीरा ),
गंडीर ये दस 'शूलप्रशमन' अर्थात् तीव्र पीड़ा के नाशक हैं ॥ यह पांच का एक
'कषाय वर्ग' होता है ।
मधु-मधुक-रुधिर-मोचरस-मृत्कपाल-लोध्र-गैरिक-प्रियङ्गु-शर्करा-लाजा
इति दशेमानि शोणित-स्थापनानि भवन्ति ॥ (४६) ॥
मधु ( शहद ), मधुक ( मुलैहटी ), रुधिर ( केशर ), मोचरस ( सिम्बल
का गोंद ), मृत्कपाल ( मिट्टी का ठींकरा ), लोध्र ( पठानी लोध), गैरिक (गेरू),
प्रियंगु (फूल प्रियंगु), शर्करा (मिश्री), लाजा ( खीलें ) ये दश 'शोणित-स्थापन'
अर्थात् रक्ताधिक वा बहते खून को रोकने वाले हैं ॥
शाल-कट्फल-कदम्ब -पद्मक-तुङ्ग-मोचरस-शिरीष-वञ्जुलैलवालुका-
शोका इति दशेमानि वेदनास्थापनानि भवन्ति ॥ (४७) ॥
शाल ( साल ), कट्फल (कायफल), कदम्ब, पद्मक (पद्माख), तुंग२ (नाग
केशर ) मोचरस ( सिम्बल का गोंद ), शिरीष ( सिरस ), वंजुल ( जलवेतस ),
एलवालुक, अशोक ये दस 'वेदनास्थापन' अर्थात् तीव्र वेदना को कम करते हैं ॥
हिङ्गु-कैडर्यारिमेद-वचा-चोरक-वयःस्था-गोलोमी-जटिला-पलङ्कषाशो-
करोहिण्य इति दशेमानि संज्ञास्थापनानि भवन्ति ॥ (४८) ॥
हिंगु ( हींग ), कैडर्य ( नीम ). अरिमेद ( रेवां ), वच, चोरक, वयस्था
१. विट्खदिर—इस खैर से बदबू आती है ।
२ तुङ्ग के स्थान पर तुम्ब पाठ होने पर तेजवल लेना चाहिये !
६० चरकसंहिता [ अ० ४
( ब्राह्मी ), गोलोमी ( वच या दूर्वा ), जटिला (जटामांसी), पलंकषा (गुग्गुलु),
अशोकरोहिणी (कुटकी) ये दस 'संज्ञा-स्थापन' अर्थात् संज्ञा उत्पन्न करते हैं ॥
ऐन्द्री-ब्राह्मी-शतवीर्या-सहस्रवीर्यामोघाव्यथा-शिवारिष्टा-वाट्यपुष्पी-
विष्वक्सेनकान्ता इति दशेमानि प्रजास्थापनानि भवन्ति ॥(४६)॥
ऐन्द्री, ब्राह्मी, शतवीर्या ( शतावरी ), सहस्रवीर्या ( महाशतावरी ),अमोघा
( आंवला ), अव्यथा ( गिलोय ), शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कुटकी ),
वाट्यपुष्पी ( खरैंटी ), विष्वक्सेनकान्ता ( प्रियंगु ) ये दस 'प्रजास्थापन' अर्थात्
संतति जनक हैं ॥
अमृताभया-धात्री-मुक्ता-श्वेता-जीवन्त्यतिरसामण्डूकपर्णी-स्थिरा-
पुनर्नवा इति दशेमानि वयःस्थापनानि भवन्ति ॥ (५०) ॥
इति पञ्चकः कषायवर्गः ॥ [ १० ] ॥
अमृता ( गिलोय ), अभया ( हरड़ ), धात्री ( आंवला ), मुक्ता ( रास्ना ),
श्वेता ( अपराजिता ), जीवन्ती, अतिरसा ( शतावरी ), मण्डूकपर्णी स्थिरा
( शालपर्णी ), और पुनर्नवा ये दस औषधि 'वयःस्थापन' अर्थात् वय को
टिकाती है ॥ यह पाँच से बना हुआ कषाय वर्ग है ।
इति पञ्चकषायशतान्यभिसमस्य पञ्चाशन्महाकषायाः, महतां च
कषायाणां लक्षणोदाहरणार्थं व्याख्याता भवन्ति ॥१४॥
इस प्रकार से ( प्रत्येक द्रव्य के गिनने से ) पाँच सौ ( ५०० ) कषाय पूर्ण
हो जाते हैं, एवं पचास ( ५० ) 'महाकषाय' भी हो जाते हैं। इन कषायों के
लक्षण उदाहरण भी कह दिये गये हैं ॥१४॥
न हि विस्तरस्य प्रमाणमस्ति, न चाप्यतिसंक्षेपोऽल्पबुद्धीनां साम-
र्थ्यायोपकल्पते,तस्मादनतिसंक्षेपेणानतिविस्तरेण चोपदिष्टाः। एतावन्तो
ह्यलमल्पबुद्धीनां व्यवहाराय बुद्धिमतां च स्वालक्षण्यानुमानयुक्तिकुश-
लानामनुक्तार्थज्ञानायेति ॥ १५ ॥
फैलाव की सीमा नहीं है और बहुत थोड़े में कहे हुए अर्थ को थोड़ी बुद्धि
वाले नहीं समझ सकते । इसलिये न तो बहुत संक्षेप में और न बहुत विस्तार
से यहाँ कहा है । यहां पर जितना भी कहा है वह थोड़ी बुद्धिवालों के व्यवहार
चलाने के लिये है ओर जो लक्षण अनुमान, युक्ति में निपुण हैं, उन बुद्धिमानों
के लिये न कहे हुए अर्थ को जानने के लिये सहायक होगा ॥१५॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—नैतानि भगवन् !