चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१
अ० ४ ] विमानस्थानम् ५२१
शब्दाः स्युस्तान् श्रोत्रेण परीक्षेत । वर्ण-संस्थान-प्रमाण-च्छायाः शरीरप्र-
कृतिविकारौ चक्षुर्वैषयिकाणि यानि चान्यानि तानि चक्षुषा परीक्षेत ।
प्रत्यक्ष द्वारा रोग जानने की इच्छा से वैद्य रोगी मनुष्य की इन्द्रियों के
द्वारा जानने योग्य सब बातों की वह अपनी इन्द्रियों से परीक्षा करे केवल रस
ज्ञान को छोड़कर । जैसे-आंतों के शब्द, अंगुली के पर्वों की सन्धियों का चट-
कन, रोगी शरीर के भिन्न भिन्न स्वरों को, इनके अतिरिक्त रोगी के जन्य जो
(हिचकी, श्वास आदि ) शब्द हों, उनकी श्रोत्र द्वारा परीक्षा करे । वर्ण, अंगों
की बनावट, शरीर और अवयवों का माप (छोटाई, बड़ाई, स्थूलता, कृशता ),
छाया (कान्ति ), शरीर के प्राकृतिक एवं वैकृतिक भावों (परिवर्तनों) को एवं
चक्षु इन्द्रिय के ग्राह्य और जो यहां पर न कही बातें हों (मल, मूत्र आदि ),
उनकी भी आंख से परीक्षा करनी चाहिये ।
रसं तु खल्वातुरशरीरगतमिन्द्रियवैषयिकमप्यनुमानादवगच्छेन्न, न
ह्यस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणमुपपद्यते, तस्मादातुरपरिप्रश्नेनैवाऽऽतुरमुखरसं
विद्यात्, यूकापसर्पणेन त्वस्य शरीरवैरस्यं, मक्षिकोपसर्पणेन शरीर-
माधुर्यं, लोहितपित्तसंदेहे तु किं धारिलोहितं लोहितपित्तं वेति श्वकाक-
भक्षणाद्धारिलोहितमभक्षणाल्लोहितपित्तमित्यनुमातव्यं, एवमन्यानप्या-
तुरशरीरगतान रसाननुमिमीत । गन्धांस्तु खलु सर्वशरीरगताना तुरस्य
प्रकृतिवैकारिकान् घ्राणेन परीक्षेत । स्पर्शं च पाणिना प्रकृतिविकृति-
युक्तम्-इति प्रत्यक्षतोऽनुमानैकदेशतश्च परीक्षणमुक्तम् ॥१०॥
रोगी के शरीर के रस को, इन्द्रिय का विषय होने पर भी, अनुमान द्वारा
ही जानना चाहिये । क्योंकि रोगी के शरीर के रस का प्रत्यक्ष द्वारा ग्रहण नहीं
हो सकता । बीमारी में मुख का स्वाद बदल जाता है, इसलिये रोगी से पूछकर
ही उसके मुख का रस जानना चाहिये । यथा-शरीर पर जूं आदि के चलने
से शरीर में विरसता, शरीर पर मक्खी आदि के पास भिनकने से शरीर में
मधुरता समझनी चाहिये । रक्तपित्त के सन्देह में यह रक्त शुद्ध (शरीर को
धारण करने वाला ) है या रक्तपित्त (पित्त से दूषित रक्त) का है तो यदि इस
रक्त को कुत्ते, कौवे खा लें तो शुद्ध रक्त समझना चाहिये और यदि न खायें तो
रक्तपित्त रोग से दूषित रक्त समझना चाहिये । इस प्रकार से रोगी के शरीर के
अन्य रसों को भी अनुमान से जानना चाहिये । रोगी के सम्पूर्ण शरीर की
प्राकृतिक एवं वैकृतिक गन्धों की परीक्षा घ्राणेन्द्रिय (नासिका) द्वारा करनी
चाहिये । स्पर्श, शीत, उष्ण, खर, चिकने आदि प्राकृतिक एवं वैकृतिक स्पर्शों
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को हाथ के स्पर्श से जानना चाहिये। यहाँ पर प्रत्यक्ष तथा अनुमान से एक
भाग से परीक्षा कह दी ॥१०॥
इमे तु खल्वन्येऽप्येवमेव भूयोऽनुमानज्ञेया भवन्ति भावाः।
तद्यथा, अग्निं जरणशक्त्या परीक्षेत, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रा-
दीन् शब्दादिग्रहणेन, मनोऽर्थाव्यभिचरणेन, विज्ञानं व्यवसायेन, रजः
सङ्गेन, मोहमविज्ञानेन, क्रोधमभिद्रोहेण, शोकं दैन्येन, हर्षमामोदेन,
प्रीतिं तोषेण, भयं विषादेन, धैर्यमविषादेन, वीर्यमुत्थानेन, अवस्थान-
मविभ्रमेण, श्रद्धामभिप्रायेण, मेधां ग्रहणेन, संज्ञां नामग्रहणेन, स्मृतिं
स्मरणेन, हियमपत्रापणेन, शीलमनुशीलनेन, द्वेषं प्रतिषेधेन, उपधिमनु-
बन्धेन,धृतिमलौल्येन,वश्यतां विधेयतया, वयो-भक्ति-सात्म्य-व्याधि-स-
मुत्थानानि काल-देशोपशय-वेदना-विशेषेण, गूढलिङ्गं व्याधिमुपशयानु-
पशयाभ्यां, दोषप्रमाणविशेषमपचारविशेषेण, आयुषः क्षयमरिष्टैः,
उपस्थितश्रेयस्त्वं कल्याणाभिनिवेशेन, अमलं सत्त्वमविकारेणेति। ग्रह-
ण्यास्तु मृदुदारुणत्वं स्वप्नदर्शनमभिप्रायं दृष्टेष्टसुखदुःखानि चाऽऽतुरप-
रिप्रश्नेनैव विद्याद्—इति ॥ ११॥
इसके अतिरिक्त ये निम्नलिखित बातें भी अनुमान द्वारा ही जानी जाती हैं।
जैसे—रोगी की परिपाक शक्ति को देखकर अग्नि ( जाठराग्नि ) को जाने।
व्यायाम शक्ति से रोगी का बल, शब्द आदि विषयों के ग्रहण से कान आदि
इन्द्रियों को, मन को अवधारण शक्ति से, विज्ञान को उद्योग से, संग
( आसक्ति ) से रज को, अज्ञान से मोह को, हिंसा प्रवृत्ति से क्रोध को,
रोदन आदि से शोक को, गीत, वादित्र आदि से आनन्दको मुख की
प्रसन्नता आदि लक्षणों से मन की प्रीति को, मुख की मलिनता आदि से
भय को, अविषाद से धैर्य ( विपत्ति में भी मन की स्थिरता ) को, उत्साह से
वीर्य ( कार्य करने की शक्ति ) को, अभ्रान्ति से स्थिरता को, अभिप्राय
( प्रार्थना ) से श्रद्धा को, श्लोक आदि को कण्ठ करने से मेधा को, नाम लेकर
चेतना को, स्मरण शक्ति से स्मृति को, लज्जा दिलाकर लज्जा को, निरन्तर शीलन
से स्वभाव को, वस्तु के प्रतिषेध से उस वस्तु में द्वेष को, आगे के परिणामसे
छल व्यवहार को, मन की अचपलता से संतोष को, वैद्य की आज्ञा मानने
से रोगी की वश्यता को, काल विशेष से आयु, देश से भक्ति
( इच्छा ) को, ( जैसे-यह पंजाब का रहने वाला है इसलिये इसे गेहूं में इच्छा
होगी, यह बंगाल का है इसकी चावलों में रुचि होगी इत्यादि ), उपशय अर्थात्
अनुकूलता से सात्म्य को, वेदना-विशेष से व्याधि के समुत्थान को, उपशय
(शान्ति) और अनुपशय (निदान) द्वारा गूढ़लिंग वाले रोग को, जिस रोगके
लक्षण छिपे हों (जैसे विद्रधि और गुल्म के भेद), उपचार विशेष (प्रकोपनके
न्यूनाधिक होने से) दोषों के प्रमाण विशेष (न्यूनाधिक) को अरिष्ट लक्षणोंसे,
आयु के क्षय को हितोपसेवन से, निकटवर्त्ती आरोग्यता के लक्षणों को अविकार
(काम, क्रोधादि से रहित मानसिक विकारों) से निर्मल चित्त को जाने ।
ग्रहणी (अग्नि का स्थान, जठर) के मृदु दारुण भेद को रोगी के हित-
अहित स्वप्न दर्शन से, भोजनादि में अभिप्राय (इच्छा) को, द्विष्ट, अप्रिय
और इष्ट, प्रिय इनमें सुख और दुःख को रोगी के प्रश्नों से ही जान ले ॥ ११ ॥
भवन्ति चात्र—आप्तोपदेशेन प्रत्यक्षकरणेन च ।
अनुमानेन च व्याधीन् सम्यग्विद्याद्विचक्षणः ॥ १२ ॥
सर्वथा सर्वमालोच्य यथासंभवमर्थवित् ।
अथाध्यवस्येत्तत्त्वे च कार्ये च तदनन्तरम् ॥ १३ ॥
कार्यतत्त्वविशेषज्ञः प्रतिपत्तौ न मुह्यति ।
अमूढः फलमाप्नोति यदमोहनिमित्तजम् ॥ १४ ॥
ज्ञानबुद्धिप्रदीपेन यो नाऽऽविशति तत्त्ववित् ।
आतुरस्यान्तरात्मानं न स रोगांश्चिकित्सति ॥ १५ ॥
चतुर व्यक्ति आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष और अनुमान द्वारा रोगों की परीक्षा करे।
अर्थवित् यथासम्भव सब रोगों की सब प्रकार से (तीनों प्रकार से) परीक्षा
कर के निश्चय करे, इसके पीछे चिकित्सा कार्य करे । कार्यतत्त्व को जाननेवाला
भिषक् रोग के चिकित्सा-कार्य में कभी भी मोह को प्राप्त नहीं होता ।
प्रमादरहित होकर ही मोह रहित होकर किये अनुष्ठान से उत्पन्न फल को प्राप्त
करता है। जो योगवित् (प्रयोगों को जानने वाला) भिषक् (वैद्य) ज्ञान,
बुद्धि रूपी प्रदीप की सहायता से रोगी के अन्दर तक नहीं पहुंचता (रोगी की
सम्पूर्ण बातों को नहीं जानता), वह रोगोंकी चिकित्सा नहीं कर सकता ॥१२-१५॥
तत्र श्लोकौ—सर्वरोगविशेषाणां त्रिविधं ज्ञानसंग्रहम् ।
यथा चोपविशन्त्याप्ताः प्रत्यक्षं गृह्यते यथा ॥ १६ ॥
ये यथा चानुमानेन ज्ञेयास्तांश्चाप्युदारधीः ।
भावांश्चिरोगविज्ञाने विमानं मुनिरुक्तवान् ॥ १७ ॥
उपसंहार—सब रोगों का तीन प्रमाणों में संक्षेप, आप्तोपदेश द्वारा जो जो
बातें जानी जाती हैं, प्रत्यक्ष द्वारा जो ग्रहण किया जाता है और जो बातें अनु-
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मान द्वारा जानी जाती हैं इन सब बातों का उदार बुद्धि भगवान् आत्रेय ने
इस 'त्रिरोग विज्ञानीय' अध्याय में व्याख्यान कर दिया ॥ १६-१७ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने त्रिविधरोग-
विशेषविज्ञानीयविमानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः।
अथातः स्रोतोविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
जीवन के आधारभूत प्राणवह आदि स्रोतों के ज्ञान के लिये 'स्रोतोविमान' नाम
अध्याय की व्याख्या करते हैं। ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥
यावन्तः पुरुषे मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्त एवास्मिन् स्रोतसां
प्रकारविशेषाः, सर्वभावा हि पुरुषे नान्तरेण स्रोतांस्यभिनिर्वर्तन्ते क्षयं
वाऽप्यधिगच्छन्ति । स्रोतांसि खलु परिणाममापद्यमानानां धातूनाम-
भिवाहीनि भवन्त्ययनार्थेन ॥ ३ ॥
इस पुरुष के शरीर में जितने प्रकार के मूर्तरूप ( स्थूल ) भाव विशेष
( पदार्थ विशेष ) हैं, उतने ही इस शरीर में स्रोतों के प्रकार ( विशेष भेद )
हैं। पुरुष में सब भाव स्रोतों के बिना नहीं बढ़ते और न स्रोतों के बिना क्षय
को प्राप्त होते हैं। ये स्रोत परिपाक हुए धातुओं को ( मल और प्रसाद रूप में )
ले जाने के लिये होते हैं ॥ ३ ॥
अपि चैके स्रोतसामेव समुदयं पुरुषमिच्छन्ति, सर्वगतत्वात्सर्व-
सरत्वाच्च दोषप्रकोपणप्रशमनानाम्, न त्वेतदेवम्। यस्य च हि स्रोतांसि
यच्च वहन्ति यच्चावहन्ति यत्र चावस्थितानि, सर्वं तदन्यत्तेभ्यः ॥ ४ ॥
कुछ आचार्य स्रोतों के समुदाय को ही 'पुरुष' नाम देते हैं। क्योंकि स्रोत
सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हैं। दोषों के जो प्रकोपक ( अपथ्य ) हैं और जो शमन
( पथ्य ) हैं, वे सब स्रोतों द्वारा ही सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होते हैं। परन्तु ऐसा
मानना ठीक नहीं है। क्योंकि जिसके स्रोत जिस वस्तु का वहन करते हैं, जिस
प्रकार से अवहन करते हैं, शरीर के जिस प्रदेश में ये स्रोत स्थित हैं, यह सब
इन स्रोतों से पृथक् हैं, वे स्रोत नहीं हैं। इस लिये पुरुष स्रोतों का समुदाय
रूप नहीं है ॥ ४ ॥