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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ४ ] निदानस्थानम् ४५३

अ० ४ ] निदानस्थानम् ४५३
हरिद्रोदकसंकाशं कटुकं यः प्रमेहति ।
पित्तस्य परिकोपात्तु विद्याद्वारिद्रमेहितम् ॥ ३१ ॥
इत्येते षट्प्रमेहाः पित्तप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३२ ॥
(१) क्षारमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण क्षार के समान गन्ध, वर्ण
रस और स्पर्शवाला मूत्र करता है वह क्षारमेह का रोगी होता है ।
(२) कालमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण स्याही के समान काला
एवं गरम मूत्र बार-बार करता हो उसको कालमेह का रोगी जानना चाहिये ।
(३) नीलमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण चाष (नीलकण्ठ) पक्षी
के पंख के समान नीले रंग का एवं अम्ल मूत्र त्याग करता है, उसे 'नीलमेह'
का रोगी समझना चाहिये ।
(४) रक्तमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण दुर्गन्धयुक्त, नमकीन, गरम
एवं लाल रंग का मूत्र त्याग करता है, उसको रक्तमेह का रोगी समझना चाहिये ।
(५) मंजिष्ठामेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण मंजीठ के समान या ताम्बे
के रंगवाला, दुर्गन्धयुक्त, मात्रा में बहुत, बार-बार मूत्र त्याग करता है,
उसको मंजिष्ठामेह का रोगी समझना चाहिये ।
(६) हारिद्रमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण हल्दी के पानी के
समान पीला, एवं कडुवा मूत्र त्याग करता है, उसको हारिद्रमेह का रोगी समझना
चाहिये । इस प्रकार से पित्तप्रकोप के कारण होनेवाले छः प्रमेहों का वर्णन-
कर दिया ॥२६-३२॥
रूक्ष-कटु-कषाय-तिक्त-लघु-शीत-व्यवाय-व्यायाम-वमन-विरेचना-
स्थापनशिरोविरेचनातियोग-संधारणानशनाभिघातातपोद्वेग-शोक-शोणि-
तातिसेक-जागरण-विषम-शरीरन्यासानुपसेवमानस्य तथात्मकशरीरस्यव
क्षिप्रं वायुः प्रकोपमापद्यते । स प्रकुपितस्तथात्मके शरीरे विसर्पन् यदा
वसामादाय मूत्रवहानि स्रोतांसि प्रतिपद्यते, तदा वसामेहमभिनिर्वर्तयति
यदा पुनर्मज्जानं मूत्रबस्तावार्कर्षति, तदा मज्जमेहमभिनिर्वर्तयति; यदा
लसीकां मूत्राशयेऽभिवहन्मूत्रमनुबन्धं च्योतयति लसीकाविबहुत्वाद्वि-
क्षेपणाच्च वायोः खल्वस्यातिमूत्रप्रवृत्तिसङ्गं करोति, तदा स मत्त इव
गजः क्षरत्यजस्रं मूत्रमवेगं, तं हस्तिमेहिनमाचक्षते; ओजः पुनर्मधुर-
स्वभावं, तद्यदा रौक्ष्याद्वायोः कषायत्वेनाभिसंसृज्य मूत्राशयेऽभिवहति
। मधुमेहं करोति ॥ ३३ ॥
तानिमांश्चतुरः प्रमेहान् वातजानसाध्यानाचक्षते भिषजः, महात्य-
यत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्च । तेषामपि च पूर्ववद् गुणविशेषेण नामवि-

४४४ चरकसंहिता [ अ० ४
शेषा भवन्ति । तद्यथा—वसामेहश्च, मज्जमेहश्च, हस्तिमेहश्च, मधुमे-
हश्चेति ॥ ३४ ॥
वातजमेह के कारण—रूक्ष, कटु, कषाय, तिक्त, लघु,शीत पदार्थों के उप-
योग से स्त्रीसंग, व्यायाम, वमन, विरेचन, बस्तिकर्म और शिरोविरेचन इनके
अतियोग से, वेगों को रोकना, अनशन ( उपवास ), चोट लगने से, धूप, शोक,
उद्वेग, रक्त के अधिक निकलनेसे, जागने मे, शरीर को विषम अवस्था
में रखने से, वातप्रकृतिवाले पुरुष में वायु तत्काल प्रकुपित हो जाता है ।
( १ ) वसाप्रमेह की सम्प्राप्ति—इन कारणों से कुपित वायु, वात प्रकृति
वाले मनुष्य के शरीर में फैलता हुआ जब वसा के साथ मिलकर मूत्रवह स्रोतों-
में पहुंच जाता है, तब वसामेह को उत्पन्न करता है ।
( २ ) मजमेह—और जब वायु मज्जा को मूत्रबस्ति में खींचकर ले जाताहै
उस समय 'मज्जमेह' उत्पन्न होता है ।
( ३ ) हस्तिमेह—जिस समय वायु लसीका १ से मिल कर मूत्राशय में
जाकर मूत्र रूप से बाहर निकलता है, उस समय लसीका की अधिकता एवं
वायु की विक्षेपण शक्ति के कारण मूत्र बहुत अधिक मात्रा में आता है । तब
पुरुष मस्त हाथी के समान निरन्तर वेग से रहित मूत्र बहाया करता है, इसको
'हस्तिमेह' कहते हैं ।
( ४ ) मधुमेह—शरीर में स्थित ओज का स्वभाव मधुर है । इस के साथ
वायु का रूक्ष एवं कषाय गुण ( वायु अपनी शक्ति से ओज को कषाय में
बदल देता है ) मिलकर जब मूत्राशय में जाता है, तब 'मधुमेह' रोग उत्पन्न
होता है ।
सब वातजमेह असाध्य—वैद्य लोग इन चार वातजन्य प्रमेहों को असाध्य
मानते हैं। क्योंकि मज्जा आदि सार रूप धातुओं का क्षय हो जाता है और
चिकित्सा विपरीत पड़ती है, क्योंकि वायु के लिये स्निग्ध आदि पदार्थ पथ्य हैं,
यही मेद के लिये अपथ्य और जो रूक्ष आदि मेद के लिये पथ्य हैं वह वायु के
लिये अपथ्य हैं । इनके भी नाम पूर्व की भाँति गुणविशेष को लेकर हैं ।
यथा—१. वसामेह, २. मज्जमेह, ३. हस्तिमेह और ४. मधुमेह ॥ ३१-३४ ॥
तत्र श्लोका वातप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति—
वातप्रमेहों को विशेष रूप से कहने के लिये ये निम्नलिखित श्लोक हैं—
१ लसीका का अर्थ मांस की त्वचा के अन्दर रहने वाले जलीय भाग
जैसा कहेंगे—'षण्मांसत्वगन्तरे उदकं तल्लसीकाशब्दं लभते ।'