चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६७
अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६७
स्वलक्षणं च द्रव्याणां पृथिव्यादीनां । सन्ति तु सर्वदा गुणाश्च नित्या-
नित्याः। न ह्यायुर्वेदस्याभूत्वोत्पत्तिरुपलभ्यते, अन्यत्रावबोधोपदे-
शाभ्याम् । एतद्द्वयमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके। स्वाभाविकं चास्य
लक्षणमकृतकं, यदुक्तमिह चाऽऽष्टेऽध्याये-यथाऽग्नेरौष्ण्यमपां द्रवत्वम्।
भावस्वभावनित्यत्वमपि चास्य यथोक्तं गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरूणा-
मुपचयो भवत्यपचयो लघूनामित्येवमादि ॥ २६ ॥
यह आयुर्वेद नित्य है, ऐसा माना जाता है। उसके तीन हेतु हैं, १.
अनादि होने से, २. स्वभाव सिद्ध होने से, ३. पदार्थों के गुण, धर्म नित्य होने
से। इसका विस्तार से वर्णन करते हैं। आयुर्वेद में आयुष्य का प्रतिपादन
किया है और सर्वदा ही आयु की परम्परा सन्तान-न्याय से चली आ रही है
(बिना आयु के कोई नहीं हुआ)। इसी प्रकार बुद्धि की परम्परा भी अनादि
काल से चली आ रही है। (एक मरता है, दूसरा जीवित रहता है इस प्रकार
से आयु की परम्परा चलीआरही है) इसलिये आयुष्यादि प्रतिपाद्य विषय अनादि
है। इसको प्रतिपादन करने वाला आयुर्वेद भी अनादि है। आयुर्वेद उपकरण
और आयुष्य उपकार्य है। विना उपकरण के कार्य नहीं रह सकता। इसी
प्रकार बुद्धि के भी अनादि होने से आयुर्वेद का ज्ञान भी अनादि है और
इस ज्ञान को जानने वाले भी अनादि हैं। दूसरा आरोग्यता या रोग को उत्पन्न
करने वाले, अथवा रोग के लक्षण, कारण, चिकित्सा आयुर्वेद में प्रतिपादन
किये हैं और वे अनादि है। क्योंकि सुख-दुःख अनादि काल से चला आ रहा
है, इसलिये इनको प्राप्त तथा नाश करने के भी उपाय अनादि होने चाहिये।
तीसरी गुरु, हलका, ठण्ठा, गरम, स्निग्ध, रूक्ष पदार्थों के ये गुण धर्म भी
नित्य हैं, इसलिये इन गुण धर्मों को बताने वाला आयुर्वेद भी नित्य है। पृथि-
व्यादि पंच महाभूतों के गुण धर्म नित्य हैं, परन्तु इनसे बने पदार्थ अनित्य हैं।
इसी प्रकार मिट्टी नित्य और मिट्टी से बना घड़ा अनित्य है। इस प्रकार से
मनुष्य-शरीर को बनाने वाले परिणाम नित्य हैं। और इस परिणाम रूप निर्माण
क्रिया को बतलाने वाला आयुर्वेद भी नित्य है। आयुर्वेद का एक समय
अस्तित्व नहीं था, उत्पन्न हुआ है ऐसा कहीं पर सुनने में नहीं आता। जहां
पर भी आयुर्वेद का प्रादुर्भाव लिखा है, वहां पर इसका अबोध या उपदेश
रूप से प्रतिपादन किया है कि इन्द्र के उपदेश से भरद्वाज मुनि मृत्यु लोक में
आयुर्वेद को लाये, यह उपदेश और ब्रह्मा के अन्दर जो ज्ञान का उदय हुआ
वही इसकी उत्पत्ति है। आयुर्वेद स्वाभाविक एवं अकृतक है। जैसा कि
पहले अध्याय में कहा है (हिताहितं सुखदुःखं०) । अग्नि में उष्णिमा
और पानी में तरलता स्वाभाविक है, बनाई हुई नहीं है इसी प्रकार आयुर्वेद
भी स्वाभाविक है । भाव, अर्थात् स्वभाव के अकृत अर्थात् स्वाभाविक होने
से भी आयुर्वेद नित्य है । यथा-गुरु पदार्थों के उपसेवन से गुरुता बढ़ती है ।
और लघु पदार्थों के उपसेवन से शरीर में लघुता बढ़ती है । इसलिये आयुर्वेद
भी नित्य है ॥ २६ ॥
तस्याऽऽयुर्वेदस्याङ्गान्यष्टौ । तद्यथा-कायचिकित्सा, शालाक्यं
शल्यापहर्तृकं, विष-गर-वैरोधिक-प्रशमनं, भूतविद्या, कौमारभृत्यकं,
रसायनानि, वाजीकरणमिति ॥ २७ ॥
इस आयुर्वेद के आठ अंग हैं । (१) काय चिकित्सा, (२) शालाक्य,
(३) शल्यापहर्तृक, (४) विष-गर-वैरोधिक-प्रशमन, (५) भूतविद्या, (६)
कौमार-भृत्यक, (७) रसायन और (८) वीजीकरण ये आठ अंग हैं ॥२७॥
स चाध्येतव्यो ब्राह्मण-राजन्य-वैश्यैः । तत्रानुग्रहार्थं प्राणिनां ब्राह्म-
णैरात्मरक्षार्थं राजन्यैर्वृत्त्यर्थं वैश्यैः, सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्र-
हार्धं सर्वैः । तत्र च यदध्यात्मविदां धर्मपथस्थापकानां धर्मप्रकाशकानां
वा मातृ-पितृ-बन्धु-गुरु-जनस्य वा विकारप्रशमने प्रयत्नवान् भवति
यच्चाऽऽयुर्वेदोक्तमध्यात्ममनुध्यायति वेदयत्यनुविधीयते वा सोऽप्यस्य
परो धर्मः । या पुनरीश्वराणां वसुमतां वा सकाशात्सुखोपहारनिमित्ता
भवत्यर्थावाप्तिरात्मरक्षणं च याच स्वपरिगृहीतानां प्राणिनामातुर्यादारक्षा-
सोऽस्यार्थः । यत्पुनरस्य विद्वद्बहुग्रहणयशःशरण्यत्वं च, या च
संमानशुश्रूषा, यच्चेष्टानां विषयाणामारोग्यमाधत्ते, सोऽस्य काम इति
यथाप्रशनमुक्तमशेषेण ॥ २८ ॥
यह आयुर्वेद ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों को पढ़ना
चाहिये । ब्राह्मणों को प्राणियों का भला करने के लिये, क्षत्रियों को अपनी रक्षा
के लिये, वैश्यों को वृत्ति अर्थात्, जीविकोपार्जन के लिये पढ़ना चाहिये । अथवा
धर्म, अर्थ, काम रूपी पुरुषार्थों के उद्देश्य से ही सब को पढ़ना चाहिये । इनमें
जो तत्त्वज्ञान को जानने वाले, धर्मसंस्थापक, धर्मोपदेशक, माता, पिता, भाई
बन्धु, पुरजनों के रोगों को दूर करने में प्रयत्नशील होता है और जो पढ़े हुये
आयुर्वेद को दूसरों को पढ़ाता है, बतलाता है, वैसा करता है, वह इस का सर्वोत्तम
धर्म है । राजाओं या रईसों, सेठों से आरोग्यता प्रदान करने पर जो धन की
प्राप्ति होती है, आत्मरक्षा होती है, इसी प्रकार अपने आश्रयजीवी नौकर चाकर
आदि को रोग मुक्त करता है वह इसका सर्वोत्तम अर्थ है । विद्वान् लोगों द्वारा
प्राप्त यश, कीर्ति, सब लोगों का शरण में आना, अभयप्रदाता होना, आदर
सत्कार लोगों से प्राप्त होना, प्रिय विषयों में आरोग्यता का प्राप्त होना यह इसका
सर्वोत्तम काम है । इस प्रकार से सब प्रश्नों का पूरा २ उत्तर देदिया ॥२८॥
अथ भिषगादित एव भिषजा प्रष्टव्योऽष्टविधं भवति । तद्यथा-तन्त्रं
तन्त्रार्थं स्थानानि स्थानार्थानध्यायानध्यायर्थान् प्रश्नार्थं श्चेति । पृष्टेन
चैतद्वक्तव्यमशेषेण वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेति ॥ २९ ॥
वैद्य परीक्षा के लिये वैद्य से आठ प्रश्न पूछे । यथा तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान
स्थानों के अर्थ, अध्याय और अध्याय के अर्थ, प्रश्न और प्रश्नार्थ । पूछे जाने
पर वैद्य को सम्पूर्ण रूप से वाक्य, वाक्यार्थ, अर्थावयव रूप से पूर्णतया
कहना चाहिये ॥ २९ ॥
तत्राऽऽयुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्य-
नर्थान्तरम् ॥ ३० ॥
तन्त्रार्थः पुनः स्वलक्षणैरुपदिष्टः, स चार्थः प्रकरणैर्विभाव्यमानो
भूय एव शरीर-वृत्ति-हेतु-व्याधि-कर्म-कार्य-काल-कर्तृ-करण-विधि-विनि-
श्चयाइशप्रकरणः, तानि च प्रकरणानि केवलेनोपदेक्ष्यन्ते तन्त्रेण ॥३१॥
इसमें आयुर्वेद, शाखा, सूत्र, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण व तन्त्र ये सब एकार्थ-
वाची शब्द हैं । तन्त्र का अर्थ "आयुर्वेदयतीत्यायुर्वेदः” आयु-जिससे जानी जाती
है वह आयुर्वेद-इस प्रकार अपने लक्षणों से कह दिया । हित अहित आयुरूप
लक्षण है और यह अर्थ प्रकरण भेद से बहुत प्रकार का है । यथा शरीर (पञ्च
महाभूतों का समुदायरूप होने से अवयवादि भेद से बहुत प्रकार का है ),
हेतु ( असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग , प्रज्ञापराध, परिणाम ), व्याधि ( धातुवैषम्य ),
कर्म ( चिकित्सा ), कार्य ( आरोग्यता ), काल (ऋतु आदि), कर्त्ता ( भिषक् ),
करण ( भेषज ), विधि ( उपकल्पना विधान जिसे काल, द्रव्य और व्याधि
की अपेक्षा से समझना चाहिये ) । इन प्रकरणों से ग्रन्थ सम्पूर्ण रूप से भली
प्रकार सुगठित होता है । ये प्रकरण तन्त्र में सम्पूर्ण रूप से कहे जावेंगे ३०-३१
तन्त्रस्यास्याष्टौ स्थानानि । तद्यथा-श्लोक-निदान-विमान-शारीरे-
न्द्रिय-चिकित्सित-कल्पसिद्धि-स्थानानि । तत्र त्रिंशदध्यायकं श्लोकस्थानं
अष्टाध्यायकानि निदान-विमान-शारीरस्थानानि, द्वादशकमिन्द्रियाणां,
त्रिंशकं चिकित्सितानां द्वादशके कल्पसिद्धिस्थाने इति ॥ ३२ ॥
इस तन्त्र के आठ स्थान हैं यथा-१. सूत्र ( श्लोक ) स्थान, २. निदान-
स्थान, ३. विमानस्थान, ४. शारीरस्थान, ५. इन्द्रियस्थान, ६. चिकित्सास्थान,
४०० चरकसंहिता [ अ० ३०
७. कल्पस्थान और ८. सिद्धिस्थान। इनमें श्लोकस्थान ३० अध्यायों का,
निदान, विमान और शारीरस्थान, आठ २ अध्यायों के इन्द्रियस्थान बारह का
चिकित्सास्थान तीस का, कल्प और सिद्धिस्थान बारह२ अध्यायों के हैं ॥३२॥
भवन्ति चात्र—
द्वे त्रिंशके द्वादशकत्रयं च त्रीण्यष्टकान्येषु समाप्तिरुक्ता ।
श्लोकौषधारिष्ट-विकल्प-सिद्धि-निदान-मानाश्रय-संज्ञकेषु ॥३३॥
स्वे स्वे स्थाने यथास्वे च स्थानार्थ उपदेक्ष्यते ।
सविंशमध्यायशतं शृणु नामक्रमागतम् ॥ ३४ ॥
दीर्घञ्जीवोऽप्यपामार्गतण्डुलारग्वधादिकौ ।
षड्विरेकाश्रयश्चेति चतुष्को भेषजाश्रयः ॥ ३५ ॥
मात्रातस्याशितीयौ च न वेगान्धारणे तथा ।
इन्द्रियोपक्रमश्चेति चत्वारः स्वास्थ्यवृत्तिकाः ॥ ३६ ॥
खुड्डाकश्च चतुष्पादो महास्तिस्रैषणस्तथा ।
सह वातकलाक्येन विद्यान्निर्देशिकान् बुधः ॥ ३७ ॥
स्नेहनस्वेदमाध्यायौ युभौ यश्चापकल्पनः ।
चिकित्साप्राभृतश्चैव सर्व्वा एवापकल्पनाः ॥ ३८ ॥
कियन्तः शिरसीयंश्च त्रिशोफाष्टोदरादिकौ ।
रोगाध्याया महांश्चैव रोगाध्यायचतुष्टयम् ॥ ३६ ॥
अष्टौनिन्दितसंख्यातस्तथा लंबनतर्पणौ ।
विधिशोणितकश्चेति व्याख्यातास्तत्र योजनाः ॥ ४० ॥
यज्जःपुरुषसंख्यातो भद्रकाप्यान्नपानिकौ ।
विविधाशितपीतीयश्चत्वारोऽन्नविनिश्चये ॥ ४१ ॥
दशप्राणायतनिकस्तथाऽथैर्दशमूलिकः ।
द्वावेतौ प्राणदेहार्थौ प्रोक्तौ वैद्यगुणाश्रयौ ॥ ४२ ॥
औषधस्वस्थनिर्देशकल्पनारोगयोजनाः
चतुष्काः षट् क्रमेणोक्ताः सप्तमश्चान्नपानिकः ॥ ४३ ॥
द्वौ चान्त्यौ संग्रहस्यायाविति त्रिंशत्कमर्थवत् ।
श्लोकस्थानं समुद्दिष्टं तन्त्रस्यास्य शिरः शुभम् ॥ ४४ ॥
चतुष्काणां महार्थानां स्थानेऽस्मिन् संग्रहः कृतः ।
श्लोकार्थः संग्रहार्थश्च श्लोकस्थानमतः स्मृतम् ॥ ४५ ॥
इस ग्रन्थ में तीस तीस अध्याय के सूत्र और चिकित्सास्थान हैं। बारह २