चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२५
अ० २ ] निदानस्थानम् ४२५
रक्तपित्तप्रकोषस्तु खलु पुरा दक्षयज्ञोद्ध्वंसे रुद्रकोपप्रभवाग्निना १
प्राणिनां परिगतशरीरप्राणानामनु ज्वरमभवत् २ ॥ ६ ॥
तस्याऽऽशुकारिणो दावाग्नेरिवाऽऽपतितस्यात्ययिकस्याऽऽशु प्रशान्तौ
यतितव्यं मात्रां देशं कालं चाभिसमीक्ष्य संतर्पणेन वा मृदु-मधुर-
शिशिर-तिक्त-कषायैरभ्यवहार्यैः प्रदेह-परिषेकावगाह-संस्पर्शनैर्वमना-
द्यैर्वा तत्रावहितेनेति ॥ १० ॥
रक्तपित्त का इतिहास— प्राचीन काल में जिस समय रुद्र के गणों ने दक्ष
के यज्ञ ३ का विध्वंस किया था । उस समय रुद्र के कोप से, सम्पूर्ण देहधारी
प्राणियों को कष्ट देने वाले ज्वर के पीछे, अग्नि के समान उष्णशक्ति (रक्तपित्त)
उत्पन्न हुआ । यह रक्तपित्त शीघ्र कार्य करने वाला, प्राणहारक एवं अग्नि के
समान नाश करने वाला है। इसको शान्त करने का शीघ्र उपाय करना
चाहिये । मात्रा, देश, काल आदि का विचार करके संतर्पण या अपतर्पण क्रिया
द्वारा अथवा मृदु, मधुर, शीत, कटु, कषाय, रसयुक्त-भोजनों से, लेप, परिषेक,
अवगाहन, संस्पर्शन, वमन आदि द्वारा सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१०॥
भवन्ति चात्र— साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ।
विरेचनस्य योगित्वाद् बहुत्वाद्भेषजस्य च ॥११॥
विरेचनं तु पित्तस्य जयार्थे परमौषधम् ।
यश्च तत्रान्वयः श्लेष्मा तस्य चानघमं स्मृतम् ॥१२॥
भवेद्योगावहं तत्र मधुरं चैव भेषजम् ।
तस्मात्साध्यं मतं रक्तं यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥
ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य— जो रक्तपित्त ऊर्ध्वमार्गगामी हो, वह साध्य
है, क्योकि इसमें विरेचन द्वारा चिकित्सा की जाती है और विरेचन की
ओषधियां बहुत हैं। ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में पित्तदोष प्रधान होता है, और
कफ दोष गौण होता है। पित्तदोष को शान्त करने के लिये विरेचन परम
श्रेष्ठ क्रिया है। और जो कफ इसमें अनुबन्ध रूप में रहता है, इसके लिये
विरेचन मध्यम उपाय है। कषाय और तिक्त रसों के सिवाय मधुर रस भी अन्य
१. 'दक्षयज्ञध्वंसे रुद्रकोषामर्षाग्निना' इति पाठः ।
२. 'मभवज्ज्वरमनु' इति वा पाठः ।
३. यह इतिहास आलंकारिक है । दक्ष का यज्ञ इस देह में ही है। रुद्र
शिव जाठराग्नि है। उसके विकृत होने से ही रोग उत्पन्न होते हैं।
४२६ चरकसंहिता [ अ० २
औषधियो के साथ मिलकर योगवाही हो जाता है । इसलिये ऊर्ध्वगामी रक्त-
पित्त साध्य हैं ॥११-१३॥
रक्तं तु यदधोभागं तद्याप्यमिति निश्चयः ।
वमनस्याल्पयोगित्वादल्पत्वाद्भेषजस्य च ॥ १४ ॥
वमनं हि न पित्तस्य हरणे श्रेष्ठमुच्यते ।
यश्च तत्रानुगो वायुस्तच्छान्तौ चावरं मतम् ॥१५॥
तच्चायोगवहं तत्र कषायं तिक्तकानि च ।
तस्माद्याप्यं समाख्यातं यदुक्तमनुलोमगम् ॥ १६ ॥
अधोगामी रक्तपित्त याप्य—जो रक्तपित्त अधोमार्गगामी है वह याप्य है ।
क्योंकि पित्त को जीतने के लिये 'वमन' पूर्णरूप से पर्याप्त क्रिया नहीं है और
वमन की औषधियां भी कम हैं । कफ दोष के साथ मिश्रित पित्त को निकालने
में वमन पर्याप्त है । परन्तु रक्तपित्त के मूलरूप पित्त को निकालने में वमन श्रेष्ठ
नहीं है । इसमें अनुबन्ध रूप से रहने वाले वायु को शमन करने के लिये वमन
क्रिया निरुपयोगी है । इसी प्रकार कषाय और कटु रस जो रक्तपित्त के नाशक
हैं, वे रस वायु को बढ़ाने वाले हैं इसलिये योगों में इनका उपयोग नहीं किया
जा सकता इसलिये अधोगामी रक्तपित्त याप्य हो जाता है ॥ १४-१६ ॥
रक्तपित्तं तु यन्मार्गौ द्वावपि प्रतिपद्यते ।
असाध्यमिति तज्ज्ञेयं पूर्वोक्तादपि कारणात् ॥१७॥
न हि संशोधनं किंचिदस्त्यस्य प्रतिमार्गगम् ।
प्रतिमार्गं च हरणं रक्तपित्ते विधीयते ॥ १८ ॥
एवमेवोपशमनं सर्वशो नास्य विद्यते ।
उभयमार्गगामी असाध्य रक्तपित्त—दोनों मार्गों से जाने वाला रक्तपित्त,
उपरोक्त कारणों से असाध्य हो जाता है । क्योंकि ( १ ) इसके प्रति-
कूल मार्ग के लिये संशोधन-चिकित्सा किसी प्रकार की भी नहीं है ।
और ( २ ) रक्तपित्त में विरुद्ध मार्ग से संशोधन कार्य गुणकारी होता है ।
इसलिये सब प्रकार की शान्ति करने वाले कोई भी औषध नहीं है ॥ १७-१८ ॥
संसृष्टेषु च दोषेषु सर्वजिच्छमनं मतम् ॥ १६ ॥
इत्युक्तं त्रिविधोदर्कं रक्तं मार्गविशेषतः ।
द्वि-दोषों से व त्रि-दोषज रक्तपित्त की चिकित्सा—संसृष्ट दो दोषों या तीनों
दोषों से मिश्रित रक्तपित्त में सब दोषों को शमन करने वाली औषधि देनी