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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६७

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६७
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः ।
अथातो विधिशोणितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब विधिशोणितीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने
कहा था ॥ १-२ ॥
विधिना शोणितं जातं शुद्धं भवति देहिनाम् ।
देश-कालोक-सात्म्यानां विधिर्यः संप्रकाशितः ॥ ३ ॥
तद्विशुद्धं हि रुधिरं बल-वर्ण-सुखायुषा ।
युनक्ति प्राणिनं प्राणः शोणितं ह्यनुवर्तते ॥ ४ ॥
देशसात्म्य, कालसात्म्य और अभ्याससात्म्य की जो विधि कही है उस विधि
से मनुष्यों का जो रक्त उत्पन्न होता है, वह यदि विशुद्ध हो तो पुरुष को बल,
वर्ण, सुख, आयु से युक्त करता है । क्योंकि प्राणियों के प्राण रक्त का अनुसरण
करते रहते हैं ॥ ३-४ ॥
प्रदुष्टबहुतीक्ष्णोष्णमद्यैरन्यैश्च तद्विधैः ।
तथाऽतितिलवणक्षारैरम्लैः कटुभिरेव च ॥ ५ ॥
कुलत्थ-माष-निष्पाव-तिल-तैल-निषेवणैः ।
पिण्डालुमूलकादीनां हरितानां च सर्वशः ॥ ६ ॥
जलजानूपशैलानां प्रसहानां च सेवनात् ।
दध्यम्ल-मस्तु-शुक्तानां सुरासौवीरकस्य च ॥ ७ ॥
विरुद्धानामुपक्लिन्नपूतीनां भक्षणेन च ।
भुक्त्वा दिवा प्रस्वपतां द्रवस्निग्धगुरूणि च ॥ ८ ॥
अत्यादानं तथा क्रोधं भजतां चाऽऽतपानलौ ।
छर्दि-वेग-प्रतीघातात्काले चानवसेचनातू ॥ ६ ॥
श्रमाभिघातसंतापैरजीर्णाध्यशनैस्तथा ।
शरत्कालस्वभावाच्च शोणितं संप्रदुष्यति ॥ १० ॥
ततः शोणितजा रोगाः प्रजायन्ते पृथग्विधाः ।
रक्त दूषित होने के कारण—अपनी प्रकृति से विपरीत, बहुत तीक्ष्ण, बहुत
गरम मद्य अथवा इसी प्रकार के पानकादि ( या अन्न से ), बहुत नमक, क्षार
या खटाई से, कडुवे रस से, कुलथी, उड़द, राजशिम्बी, तिल, तैल के खाने से,
पिण्डालू ( कंद ग्रन्थि, पांढरी रतालू, अरवी, घुईयां ), मूली, और हरे शाक

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सब्जियों के खाने से, पानी में रहने वाले तथा जलीय प्रदेश में रहने वाले,
तथा पर्वत पर रहने वाले और मांस खाने वाले पक्षियों ( बाज़, चील ) का
मांस खाने से, खट्टी दही, मस्तु, शुक्त ( कांजीभेद ), सुरा, सौवीरक ( कांजी
भेद ) के खाने से, विरुद्ध, सड़े, गले, दुर्गन्ध युक्त भोजनों के खाने से, भोजन
करके दिन में सोने से, तरल, स्निग्ध और भारी पदार्थों के सेवन से, बहुत
अधिक खाने से, क्रोध, धूप, और अग्नि के अधिक सेवन से, वमन के वेग को
रोकने से, रक्त के दूषित होने के समय ( शरत्काल ) में रक्त का मोक्षण न
करने से, परिश्रम से, चोट से, सन्ताप से, अजीर्ण ( बिना भोजन के पचे पुनः
खाने ) से, अध्यशन अर्थात् भोजन के जीर्ण हुए बिना फिर भोजन करनें से
तथा शरत्काल में स्वभाव से ही रक्त दूषित हो जाता है । रक्त के दूषित होने
से नाना प्रकार के रक्तजन्य रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ५-१० ॥
मुखपाकोऽक्षिरागश्च पूतिघ्राणास्यगन्धता ॥ ११ ॥
गुल्मोपकुश-वीसर्प-रक्तपित्त-प्रमीलकाः ।
विद्रधी रक्तमेहश्च प्रदरो वातशोणितम् ॥ १२ ॥
वैवर्ण्यमग्निनाशश्च पिपासा गुरुगात्रता ।
सन्तापश्चातिदौर्बल्यमरुचिः शिरसश्च रुक् ॥ १३ ॥
विदाहश्चान्नपानस्य तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः ।
क्रोधप्रचुरता बुद्धेः संमोहो लवणास्यता ॥ १४ ॥
स्वेदः शरीरदौर्गन्ध्यं मदः कम्पः स्वरक्षयः ।
तन्द्रा निद्रातियोगश्च तमसश्चातिदर्शनम् ॥ १५ ॥
कण्डूरुकोष्ठपिडकाः कुष्ठचर्मदलादयः ।
विकाराः सर्व एवैते विज्ञेयाः शोणिताश्रयाः ॥ १६ ॥
शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैरुपक्रान्ताश्च ये गदाः ।
सम्यक् साध्या न सिध्यन्ति रक्तजांस्तानविभावयेत् ॥ १७ ॥
यथा मुखपाक, आंख की सूजन ( आंख की लालिमा ), नाक से बदबू,
मुख का दुर्गन्ध, गुल्म, उपकुश, वीसर्प, रक्त पित्त, प्रमीलक, विद्रधि, रक्त
प्रमेह, प्रदर, वातरक्त, विवर्णता, जाठराग्नि का नष्ट होना, प्यास, शरीर का
भारीपन, सन्ताप, अतिनिर्बलता, अरुचि, शिर की दर्द, खान-पान का विदाह
( अपचन ), कडुवी या खट्टी डकार आना, निष्क्रियता, क्रोध की अधिकता,
बुद्धिभ्रंश, मुख का नमकीनपन, पसीना आना, शरीर की दुर्गन्धता, मद,
कम्पन, स्वरनाश, तन्द्रा, निद्रा का अधिक आना और आंखों के सामने