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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २७

अ० १ ] सूत्रस्थानम् २७
जानी हुई औषध या जाना हुई भी देश काल आ.दे का विचार न करके देने
से अनिष्ट के लिए होती है, वह भारी अनर्थ-उत्पन्न करती है ॥ १२४-१२५ ॥
योगादपि विषं तीक्ष्णमुत्तमं भेषजं भवेत् ।
भेषजं चापि दुर्युक्तं तीक्ष्णं संपद्यते विषम् ॥ १२६ ॥
तस्मान्न भिषजा युक्तं युक्तिबाह्येन भेषजम् ।
धीमता किञ्चिदादेयं जीबितारोग्यकाङ्क्षिणा ॥ १२७ ॥
तीक्ष्ण प्राणनाशक विष भी सम्यक् प्रकार से प्रयोग करने पर उत्तम औषध
का कार्य करता है। औषध भी अनुचित प्रकार से प्रयोग करने पर तीक्ष्ण-प्राण
नाशक विष-सा काम करती है।
इसलिये अनुचित रूप में प्रयोग की जाने वाली ओषधि के विष के समान
होने के कारण आयु एवं आरोग्य को चाहने वाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये
कि, देश काल-मात्रा आदि का विचार न करके देने वाले मूढ वैद्य से दी हुई
औषध को कभी ग्रहण न करे ॥ १२६-१२७ ॥
कुर्यान्निपतितो मूर्ध्नि सशेषं वासवाशनिः ।
सशेषमातुरं कुर्यान्न त्वज्ञमतमौषधम् ॥ १२८॥
इन्द्र के हाथ से छूटा हुआ वज्र यदि मनुष्य के सिर पर गिर पड़े तो
उससे बचना सम्भव हो सकता है, परन्तु मूर्ख वैद्य से दी हुई औषधि रोगी को
समाप्त ही कर डालती है, उससे बचना असम्भव है ॥ १२८ ॥
दुःखिताय शयानाय श्रद्दधानाय रोगिणे ।
यो भेषजमविज्ञाय प्राज्ञमानी प्रयच्छति ॥ १२९ ।
त्यक्तधर्मस्य पापस्य मृत्युभूतस्य दुर्मतेः ।
नरो नरकपाती स्यात्तस्य संभापणादपि ॥ १३० ॥
जो प्राज्ञमानी-अपने को बुद्धिमान् गिनने वाला वैद्य, औषध को न जान-
कर दुःखी, अचेत पड़े, वैद्य में श्रद्धा करने वाले रोगी को औषध देता है,
ऐसे धर्म को छोड़ देने वाले विश्वासघाती, मृत्यु के समान साक्षात् यम और
दुर्मति, अज्ञ, मूढ़ वैद्य के साथ बोलने से भी मनुष्य नरकगामी होता है, फिर
स्पर्श आदि से क्यों नहीं होगा ॥ १२६-१३० ॥
वरमाशीविषविषं कथितं ताम्रमेव वा ।
पीतमत्यग्निसंतप्ता भक्षिता वाऽप्ययोगुडाः ॥ १३१ ॥
न तु श्रुतवतां वेषं बिभ्रता शरणागतात् ।
गृहीतमन्नं पानं वा वित्तं वा रोगपीडितात् ॥ १३२ ॥

२८ चरकसंहिता [ अ० १
साँप का विष अथवा ताम्बे को उबाल कर पीना या आग में लाल किये हुए लोहे
के गोले खा लेना, कहीं अधिक अच्छा है, परन्तु वैद्य का वेष पहिनकर शरण में आये
हुए रोगी से, अन्न, पान अथवा धन ग्रहण करना अच्छा नहीं ॥ १३१-१३२ ॥
वैद्य को क्या करना चाहिये ?
भिषग्बुभूषुर्मतिमानतः स्वगुणसंपदि ।
परं प्रयत्नमातिष्ठेत् प्राणदः स्याद्यथा नृणाम् ॥ १३३ ॥
इसलिये वैद्य बनने की इच्छा करने वाले, बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये
कि, वैद्य के गुणों को प्राप्त करने में अत्यधिक प्रयत्न करे जिससे कि वह
मनुष्यों के रोगों को दूर करके प्राण देने वाला सिद्ध हो १ ॥ १३३ ॥
तदेव युक्तं भैषज्यं यदारोग्याय कल्पते ।
स चैव भिषजां श्रेष्ठो रोगेभ्यो यः प्रमोचयेत् ॥ १३४ ॥
जो औषध रोग को शान्त करने में समर्थ है; वही ठीक प्रकार से प्रयुक्त
की हुई औषध है और जो रोगों से रोगियों को मुक्त करे, वह ही वैद्यों में
श्रेष्ठ वैद्य है ॥ १३४ ॥
सम्यक्प्रयोगं सर्वेषां सिद्धिराख्याति कर्मणाम् ।
सिद्धिराख्याति सर्वैश्च गुणैर्युक्तं भिषक्तमम् ॥ १३५ ॥
सब प्रकार के कर्मों की सिद्धि, सफलता, उन कर्मों के सम्यक् प्रयोग को
बतलाती है। सफलता ही सब गुणों से युक्त वैद्य की श्रेष्ठता को भी बतलाती
है । अर्थात् सफलता से ही वैद्य का नाम चमकता है । ॥ १३५ ॥
अध्याय का संग्रह --
तत्र श्लोकाः ।
आयुर्वेदागमो हेतुरागमस्य प्रवर्तनम् ।
सूत्रणस्याभ्यनुज्ञानमायुर्वेदस्य निर्णयः ॥ १३६ ॥
सम्पूर्णं कारणं कार्यमायुर्वेदप्रयोजनम् ।
हेतवश्चैव दोषाश्च भेषजं संग्रहेण च ॥ १३७ ॥
रसाः संप्रत्ययद्रव्यास्त्रिविधो द्रव्यसंग्रहः ।
मूलिन्यश्च फलिन्यश्च स्नेहाश्च लवणानि च ॥ १३८ ॥
मूत्रं क्षीराणि वृक्षाश्च षड्ये क्षीरत्वगाश्रयाः ।
कर्माणि चैषां सर्वेषां योगायोगगुणागुणाः ॥ १३९ ॥
१. वैद्यगुण-सम्पत्—श्रुतेः पर्य्यवदातत्वं बहुशो दृष्टकर्मता ।
दाक्ष्यं शौचमिति ज्ञेयं वैद्ये गुणचतुष्टयम् ॥