सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १] निदानस्थानम् ४५१

अ० १] निदानस्थानम् ४५१
वाचक हैं। १ यह सम्प्राप्ति १. संख्या, २. प्राधान्य, ३. विधि, ४. विकल्प और
५. बलकाल भेद से पांच प्रकार की है।
(१) संख्यासम्प्राप्ति—प्रत्येक रोग के भेदों की गणना का नाम संख्या-
सम्प्राप्ति है। जैसे आठ प्रकार के ज्वर, पांच प्रकार के गुल्म, सात प्रकार के
कुष्ठ इत्यादि।
(२) प्राधान्य-सम्प्राप्ति दोषों के अधिकतर व अधिकतम (तारतम्य) से
रोगों की प्रधानता व अप्रधानता होती है। (वृद्ध पित्त, वृद्धतर वायु और वृद्ध-
तम कफ, यह एक प्रकार का सन्निपात है।) दो दोषों में एक दोष बढ़ा हो तो
अधिकतर, तीन दोषों में एक दोष बढ़ा हो तो 'अधिकतम' समझना चाहिये। २
(३) विधि-सम्प्राप्ति—व्याधि भेद से विधिरूप सम्प्राप्ति होती है। निज अर्थात्
शारीरिक और आगन्तुज भेद से व्याधि दो प्रकार का है। वात आदि दोष भेद
से तीन प्रकार का, और साध्य, असाध्य, मृदु और दारुण भेद से चार
प्रकार का है।
(४) विकल्प-सम्प्राप्ति—जिस समय वात आदि दोष दो या तीन मिलते हैं,
उस समय अंशांश बल की कल्पना (विवेचना) को विकल्प-सम्प्राप्ति कहते हैं।
यथा—वायु के प्रकुपित होने पर भी कभी तो वात का शीत अंश बलवान्
होता है, कभी लघु अंश और कभी रूक्ष अंश एवं कभी लघु और रूक्ष दोनों
अंश बलवान् होते हैं।
(५) बलकालसम्प्राप्ति—ऋतु, दिन, रात, आहार और काल भेद से रोग के
बलकाल में अन्तर पड़ जाता है। जैसे ऋतु और कफज्वर का वसन्त, अहोरात्र
कफज्वर का पूर्वाह्न और प्रदोष, आहार-कफज्वर का भुक्तमात्रकाल।
स्वस्थचित्त एवं बुद्धिमान् वैद्य (धैर्य एवं शान्ति तथा बुद्धि से) हेतु
पूर्वरूप आदि से रोगों की यथार्थ परीक्षा करे। यह निदानस्थान का संक्षेप में
वर्णन कर दिया, अब इसी का विस्तार से वर्णन करते हैं ॥६-७॥
तत्र प्रथमत एव तावदाज्ञाँक्षोभाभिद्रोह-कोप-प्रभवानष्टौ व्याधी-
न्निदानपूर्वेण क्रमेणानुव्याख्यास्यामः, तथा सूत्रसंग्रहमात्रं चिकि-
१. कुछ लोग रोगोत्पत्ति के अन्तिम कारण से उत्पन्न कर्म को सम्प्राप्ति
कहते हैं। यथा-'स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयम्' यहां से लेकर 'तदा ज्वर-
मभिनिर्वर्तयति' तक ज्वर की सम्प्राप्ति कही है।
२. माधव-निदान में स्वतन्त्रता और परतन्त्रता को लक्ष्य में रखकर रोग
की प्रधानता या अप्रधानता की परीक्षा की है।

४१२ चरकसंहिता [अ० १
त्सायाः। चिकित्सितेषु चोत्तरकालं यथोद्दिष्टं यथोपचितविकाराननुव्या-
ख्यास्यामः ॥८॥
इनमें प्रथम निदान क्रम से क्षोभ, अभिद्रोह, कोप आदि से उत्पन्न आठ
रोगों का वर्णन निदान स्थान में करेंगे, इसके पीछे संक्षेप से चिकित्सासूत्र
कहेंगे। इसके अनन्तर सब रोगों का सविस्तर वर्णन चिकित्सास्थान में किया
जायगा ॥ ८ ॥
इह तु ज्वर एवाऽऽदौ विकाराणामुपदिश्यते, तत्प्रथमत्वाच्छारी-
राणाम् । अथ खल्वष्टाभ्यो ज्वरः संजायते मनुष्याणाम् । तद्यथा वातात्
पित्तात् कफात् वातपित्ताभ्यां, वातकफाभ्यां, पित्तश्लेष्मभ्यां, वात-
पित्तश्लेष्मभ्यः, आगन्तोरष्टमात्कारणात् । तस्य निदान-पूर्वरूप-लिङ्गो-
पशय-संप्राप्ति-विशेषांनुपदेक्ष्यामः ॥ ९ ॥
ज्वर निदान—सब रोगों में प्रथम ज्वर का ही वर्णन करते हैं। क्योकि
शारीरिक रोगों में सब से मुख्य ज्वर है ।
मनुष्यों को ज्वर आठ कारणों से होता है । १. वात से, २. पित्त से, ३.
कफ से, ४. वात-पित्त से, ५. पित्त-कफ से, ६. वात-कफ से, ७. वात-कफ और
पित्त ( सन्निपात ) से और ८. आगन्तुज कारण से ।
अब ज्वर के निदान, पूर्वरूप, लिंग, उपशय और सम्प्राप्ति का विस्तार से
वर्णन करते हैं ॥ ९ ॥
तद्यथा--रूक्ष-लघु-शीत-व्यायाम-वमन-विरेचनाऽऽस्थापन-शिरोविरे-
चनातिंयोग-वेगसंधारणानशनाभिघात-व्यवायोद्वेग-शोक-शोणिताभिषेक-
जागरण-विषम-शरीर-न्यासेभ्योऽतिसेवितेभ्यो वायुः प्रकोपमापद्यते ।
वात प्रकोप के कारण—रूक्ष, लघु, शीत, व्यायाम, वमन, विरेचन,
आस्थापन इनके अतियोग से, मल-मूत्र आदि के उपस्थित वेग को रोकने से,
उपवास से, चोट लगने से, स्त्रीसंग, उद्वेग, शोक, और रक्त के अधिक निकलने
से, रात्रि-जागरण से, विषम रीति से शरीर के अवयवों को रखने से, इन कारणों
के अतिसेवन से वायु प्रकुपित होती है ।
स यदा प्रकुपितः प्रविश्याऽऽमाशयमूष्मणः स्थानमूष्मणा सह मिश्री-
भूत आद्यमाहारपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि च
स्रोतांसि च पिधायाग्निमुपहत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य केवलं
शरीरमनुप्रपद्यते, तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति । तस्येमानि लिङ्गानि
भवन्ति ॥