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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२३

अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२३

इव सूचीभिरिव तुद्यते पिपीलिकाभिरिव संसृप्यते सर्षप-कल्कावलिप्त
इव चिमिचिमायते संकुच्यते आयम्यत इति वातशोथः ॥ ५ ॥
उष्ण-तीक्ष्ण-कटुक-क्षार-लवणाम्लाजीर्ण-भोजनैरग्न्यातप-प्रतापैश्च
पित्तं प्रकुपितं त्वङ्मांसशोणितान्यभिभूय शोथं जनयति। स क्षिप्रो-
त्थानप्रशमो भवति कृष्ण-पीत-नील-ताम्रावभास उष्णो मृदुः कपिल-
ताम्र-लोमा उष्यते दूयते दह्यते धूप्यते ऊष्मायते स्विद्यति क्लियते न च
स्पर्शमुष्णं वा सुषूयत इति पित्तशोथः ॥ ६ ॥
गुरु-मधुर-शीत-स्निग्धैरतिस्वप्न-व्यायामादिभिश्च श्लेष्मा प्रकुपितः
त्वङ्-मांस-शोणितादीन्यभिभूय शोथं जनयति । स कृच्छ्रोत्थानप्रशमो
भवति, पाण्डुः श्वेतावभासः स्निग्धः श्लक्ष्णो गुरुः स्थिरः स्त्यानः
शुक्लाग्ररोमा स्पर्शोष्णसहश्चेति श्लेष्मशोथः ॥ ७ ॥
यथास्वकारणकृतिसंसर्गाद् द्विदोषजास्त्रयः शोथा भवन्ति ॥८॥
यथास्वकारणकृतिसन्निपातात्सान्निपातिक एकः ॥ ६ ॥
एवं भेदप्रकृतिभिस्ताभिर्भिद्यमानो द्विविधस्त्रिविधश्चतुर्विधः सप्त-
विधश्च शोथ उपलभ्यते, पुनश्चैक एव, उत्सेधसामान्यादिति ॥ १० ॥
इनमें इतना विशेष है कि—शीत, रूक्ष, लघु, विशद अन्न, खानपान,
परिश्रम, उपवास, वमन विरेचनादि कर्मों के बहुत करने और उपवास आदि
से वायु कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त और मेद आदि, धातुओं पर अधिकार
कर शोथ को उत्पन्न करता है। यह वातजन्य शोथ जल्दी ही उत्पन्न होता
और जल्दी ही शान्त हो जाता है। इस का रंग काला सा या लाल-काला
अथवा स्वाभाविक रंग का रहता है। यह शोथ गतिशील, धड़कन युक्त, कर्कश,
कठोर, त्वचा फटती सी जाती है, और बाल टूट जाते हैं। रोगी को ऐसा
प्रतीत होता है कि कोई चीरखा रहा हो, भेदन कर रहा हो, दबा रहा हो, सुई
चुभाने का सा दर्द होता है, चिउंटियां सी चलती हैं, सरसों पीसकर लेप करने
जैसी चिरमराइट लगती है, सिकुड़ता और फैलता है, यह वातजन्य शोथ के लक्षण हैं ।
गरम, तीक्ष्ण, कडुवे, क्षार, नमकीन और खट्टे पदार्थों के खाने से, अजीर्ण
अवस्था में भोजन करने से, आग और धूप के ताप के बहुत सेवन से, पित्त
कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त पर प्रबल होकर शोथ उत्पन्न करता है। यह
शोथ जल्दी ही उत्पन्न होता और जल्दी शान्त हो जाता है। इसका रंग
काला, पीला, नीला ताम्बे के समान, स्पर्श गरम और कोमल बाल भूरे या
ताम्बे के रंग के हो जाते हैं। यह शोथ गरम होता, जलता सा है, पीड़ा देता

२३४ चरकसंहिता [अ० १८
है, तपाता है, गरम सा लगता है, पसीना आता है, नरमा जाता है, न तो
स्पर्श और न गरमी को सहन करता है। यह पित्तजन्य शोथ है।
भारी, मधुर, शीत, स्निग्ध भोजनों से, बहुत सोने से, व्यायाम न करने से,
श्लेष्मा कुपित होकर त्वचा, मांस, रक्त पर अधिकार करके शोथ उत्पन्न करता
है। यह शोथ देर में उत्पन्न होता और देर में ही शान्त होता है। इसका रंग
धूसर (धुमैला) या श्वेत, चिकना, स्नेहयुक्त, भारी, स्थिर (न हिलने वाला),
गाढ़ा, बालों का अग्र भाग श्वेत हो जाता है, स्पर्श को और गरमी को सहन
कर लेता है, यह कफशोथ है।
अपने अपने कारणों से दो दोष कुपित होकर दो दोषों के लक्षणों वाले शोथ
को उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार से संसर्ग जन्य शोथ ३ प्रकार के हैं।
तीनों दोषों के कारणों के मिलने से उत्पन्न सान्निपातिक शोथ एक प्रकार
का है, इस में तीनों दोषों के लक्षण होते हैं।
इस प्रकार प्रकृति भेद से शोथ दो प्रकार के (निज और आगन्तु),
तीन प्रकार के (वातज, पित्तज, कफज), चार प्रकार के (वातजन्य,
पित्तजन्य, कफजन्य, सन्निपातजन्य), सात प्रकार के (वातज, पित्तज, कफज,
वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक और सान्निपातिक) होते हैं।
परन्तु सूजन की दृष्टि से शोथ एक ही प्रकार का है, सूजन का होना सब शोथों
में सामान्य है ॥५-१०॥
भवन्ति चात्र—शूयन्ते यस्य गात्राणि स्वपन्तीव रुजन्ति च ।
पीडितान्युन्नमन्त्याशु वातशोथं तमादिशेत् ॥ ११ ॥
यश्चाप्यरुणवर्णाभः शोथो नक्तं प्रणश्यति ।
स्नेहोष्णमर्दनाभ्यां च प्रणश्येत्स च वातिकः ॥ १२ ॥
यः पिपासाज्वरार्त्तस्य दूयतेऽथ विदह्यते ।
खिद्यते क्लिद्यते गन्धी स पैत्तः श्वयथुः स्मृतः ॥१३॥
यः पीत-नेत्र-वक्त्रत्वक् पूर्वं मध्यात् प्रशूयते ।
तनुत्वक् चातिसारी च पित्तशोथः स उच्यते ॥ १४ ॥
यः शीतळः सक्तगतिः कण्डूमान् पाण्डुरेव च ।
निपीडिता नोन्नमति श्वयथुः स कफात्मकः ॥ १५ ॥
यस्य शस्त्रकुशच्छेदाच्छोणितं न प्रवर्तते ।
कृच्छ्रेण पिच्छलान् स्रवति स चापि कफसंभवः ॥ १६ ॥
निदानाकृतिसंसर्गाच्छ्वयथुः स्याद् द्विदोषजः ।
सर्वाकृतिः सन्निपाताच्छोथो व्यामिश्रहेतुजः ॥ १७॥