चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १८ । सूत्रस्थानम् २२१
अ० १८ । सूत्रस्थानम् २२१
अष्टादशोऽध्यायः।
अथातस्त्रिशोथीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'त्रिशोथीय अध्याय' का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
त्रयः शोथा भवन्ति वात-पित्त-श्लेष्म-निमित्ताः । ते पुनर्द्विविधाः
निजागन्तुभेदेन। तत्राऽऽगन्तवश्छेदन-भेदन-क्षणन-भञ्जन-पिच्छनोत्पे-
षण-प्रहार-वध-बन्धन-वेष्टन-व्यधन-पीडनादिभिर्वा भल्लातक-पुष्प-फल-
रसात्मगुप्ता-शूक-कृमिशूकाहितपत्र-लता-गुल्म-संस्पर्शनैर्वा स्वेदन-परि-
सर्पणावमूत्रणैर्वा विषिणां, सविषाविष-प्राणि-दंष्ट्रा-दन्त-विषाण-नख-
निपातैर्वा सागर-विष-वात-हिम-दहन-संस्पर्शनैर्वा शोथाः समुपजायन्ते ।
ते पुनर्यथास्वं हेतुजैर्व्यञ्जनैरादावुपलभ्यन्ते निजव्यञ्जनैकदेशविपरीतैः,
बन्ध-मन्त्रागद-प्रलेप-प्रताप-निर्वापणादिभिश्चोपक्रमैरुपक्रम्यमाणाः प्रशा-
न्तिमापद्यन्ते ॥ ३ ॥
शोथ (सूजन) तीन प्रकार का है। १. वात से, २. पित्त से और ३. कफ
से। यह तीन प्रकार का शोथ फिर दो प्रकार का है। ( १ ) शरीर में उत्पन्न
होने वाला निज और ( २ ) बाहर कारण से उत्पन्न होने वाला आगन्तु ।
इन में आगन्तु शोथ छेदन ( दो खण्ड करना ), भेदन ( फाड़ना ), क्षणन
( चूर्ण करना ), भञ्जन ( तोड़ना, सर्जरी करना ), पिच्छन ( बहुत दबाना ),
उत्पेषण ( शिला पर पीसने की भांति पीसने ) से, वेष्टन ( रज्जु आदि से
लपेटना ), प्रहार ( चोट ), वध ( मारने ) से, बन्धन ( बांधना ), व्यधन
( बाँधना ),पीड़न और ( दबाने ) आदि से उत्पन्न होता है अथवा भिलावे
के पुष्प या फल अथवा रसके लाने से, आत्मगुप्ता ( कौंच की फली ), शूक,
कृमिशूक ( रोयें वाला कीड़ा ), अहितपत्र ( बिच्छू बूटी के पत्र ), लता (बेल)
गुल्म ( झंकार झाड़ी ) के स्पर्श से आगन्तु शोथ उत्पन्न होता है अथवा
विषयुक्त प्राणियों के पसीने से, शरीर पर चलने फिरने से, इन के मूत्रों से,
विषैले प्राणियों के जाढ़, दांत, सींग, नख आदि के प्रहार से, कृत्रिम विषयुक्त
वायु, बरफ या अग्नि के स्पर्श से आगन्तु शोथ उत्पन्न होता है। ये आगन्तु
शोथ प्रथम कारणों से उत्पन्न लक्षणों से प्रकट होते हैं। आगन्तु शोथ या रोग में
व्यथा प्रथम उत्पन्न होती है, और पीछे शरीर के दोषों से सम्बन्धित होते हैं।