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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ११ ] १० सूत्रस्थानम् १४५

अ० ११ ] १० सूत्रस्थानम् १४५
पक्ष-वध-पहापतान कार्दिन-शोष-राजयक्ष्मास्थि-मन्धि-शूळ-गुद-भ्रं-
शादयः शिरो-हृद्वस्ति-रोगादयश्च मध्यम-मार्गानुसारिणो भवन्ति रोगाः ॥
ज्वरातीसार-च्छद्यलमक-विषूचिका-कास-श्वास-हिक्काऽऽनाहोदर-
प्लीहादयोऽन्तर्मार्गजाश्च वीसर्प-श्वयथु-गुल्मार्शो-विद्रध्यादयः काष्ठ-मा-
र्गानुसारिणो भवन्ति रोगाः ॥ ५० ॥
इन में गण्ड ( शोथ, गलगण्ड रोग नहीं ), फुन्सी, अलजी, अरबी, चर्म,
कील, अधिमांस, मशक ( मस्से ), कुष्ठ, व्यंग, और अजगल्लिका आदि रोग
'बहिर्मार्ग' में होते हैं । वीसर्प, सूजन, गुल्म, अर्श, विद्रधि आदि रोग शाखानु-
सारी अर्थात् रक्तादि मार्गों के अनुसारी होते हैं । पक्षाघात, मन्याग्रह, अपतानक
अर्दित, शोष, राजयक्ष्मा, अस्थि शूल, सन्धिश्लूल, गुदभ्रंश आदि, हिक्का आदि
एवं शिरो रोग, हृदय रोग तथा वस्ति रोग और अण्ड वृद्धि भी ये मध्यम, 'मार्गा-
नुसारी' रोग हैं । ज्वर, अतीसार, छर्दि, अलमक, विषूचिका, ( हैजा ) कास,
श्वास, हिक्का, आनाह, उदर, प्लीहा, आदि रोग 'अन्तर्मार्ग' से उत्पन्न होते हैं ।
वीसर्प, सूजन, गुल्म, अर्श, और विद्रधि जो शाखानुसारी रोग हैं, वे काष्ठानु-
सारी होते हैं, (रक्तानुसारी रोग काष्ठानुसारी नहीं होते और कोष्ठानुसारा रोग
शाखानुसारी रोग नहीं होते ) ॥ ४८-५० ॥
त्रिविधा भिषज इति-
भिषक्छद्मचराः सन्ति सन्त्येके सिद्धसाधिताः ।
सन्ति वैद्यगुणैर्युक्ताःस्वावधा भिषजा भुवि ॥ ५१ ॥
भिषक् भी तीन प्रकार के होते हैं, १. छद्मचर, २. सिद्धसाधित और ३.
वैद्य गुणों से युक्त ये तीन प्रकार के चिकित्सक इस पृथ्वी पर मिलते हैं ॥५१॥
वैद्यभाण्डौषधैः पुस्तैः पल्लवैरवलोकनैः ।
लभन्ते ये भिषक्शब्दमज्ञास्ते प्रतिरूपकाः ॥ ५२ ॥
छद्मचर वैद्य का लक्षण—वैद्यों या औषधियों के बर्तन, पुस्त अर्थात्
मिट्टी या लोहे के बने मनुष्य के ढाँचे, पुस्तकों, पत्तों को देखने से जो मनुष्य
'भिषक्' शब्द प्राप्त करते हैं, वे वैद्यों के नकलचा ढोंगी मूर्ख हैं, वे त्याज्य हैं ।५२।
श्री-यश-ज्ञान-सिद्धानां व्यपदेशादतांदृधाः ।
वैद्यशब्दं लभन्ते ये ज्ञेयास्ते सिद्धसाधिताः ॥ ५३ ॥
सिद्धसाधित वैद्य — अन्य स्थान पर चिकित्सा कर्म में यश, ज्ञान, और सफ-
लता प्राप्त किये हुए वैद्यों के नाम से धोखा करके जो वैद्य बन जाते हैं, उनको
'सिद्धसाधित' वैद्य समझना । इनको भी छोड़ देना चाहिये ॥ ५३ ॥