चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अध्याय १० में) ॥ ४२ ॥
औपम्य ( उपमा ) — सादृश्य को देखकर एक प्रसिद्ध वस्तु का प्रकाशन
करना 'उपमा' है। जैसे दण्डे से दण्डक नाम (वातव्याधि) रोग बतलाया
है। धनुष द्वारा धनुस्तम्भ (जिसमें धनुष के समान शरीर मुड़ जाता है, ऐसा
धनुर्वात रोग बतलाया है) और धानुष्क (तीर चलाने वाले) का उदाहरण
देकर आरोग्यता देने वाले वैद्य का प्रयोजन बतलाया है (खुड्डाक चतुष्पाद
अध्याय १० में) ॥ ४२ ॥
अथ संशयः — संशयो नाम संदेह लक्षणानुसंदिग्धेष्वर्थेष्वनिश्चयः ।
यथा-दृष्टा ह्यायुष्यलक्षणोपेताश्चानुपैताश्च तथा सक्रियाश्चाक्रियाश्च
पुरुषाः शीघ्रभङ्गाश्चिरजीविनश्च, एतदुभयदृष्टत्वात्संशयः-किन्नु खल्व-
कालमृत्युरस्त्युत नास्तीति ॥ ४३ ॥
संशय - संदिग्ध अर्थों में निश्चय का न होना संशय' है। जैसे क्या
अकाल मृत्यु है, अथवा नहीं है ! आयुष्मान् पुरुषों के लक्षणों से युक्त एवं इन
लक्षणों से रहित किंवा चिकित्सा क्रिया के बिना और चिकित्सा करने पर भी
शीघ्र मरने वाले तथा देर तक जीने वाले दोनो प्रकार के पुरुष देखे जाते हैं।
दोनों प्रकार की अवस्थाओं के देखने से संशय होता है कि क्या अकाल मृत्यु
है, अथवा नहीं है ॥४३॥
अथ प्रयोजनं — प्रयोजनं नाम यदर्थमारभ्यन्त आरम्भाः । यथा-
यद्यकालमृत्युरस्ति ततोऽहमात्मानमायुष्यैरुपचरिष्याम्यनायुष्याणि च
परिहरिष्यामि, कथं मामकालमृत्युः प्रसहेतेति ॥४४॥
प्रयोजन -- जिसके लिये कर्मों का आरम्भ किया जाता है वह 'प्रयोजन'
है। जैसे यदि अकाल मृत्यु है, तो मैं आयु के लिये हितकारी पथ्यों द्वारा अपने
शरीर की रक्षा करूंगा। आयु का नाश करने वाली अपथ्य वस्तु का परित्याग
करूंगा। फिर किस प्रकार से मुझपर अकाल मृत्यु आक्रमण कर सकती है?॥४४॥
अथ सव्यभिचारं - सव्यभिचारं नाम यद्व्यभिचरणं; यथा-
भवेदिदमौषधं तस्मिन् व्याधौ यौगिकमथवा नेति ॥४५॥
सव्यभिचार - व्यभिचार एकत्र अव्यवस्था, अनिश्चितता, अनेकों में
प्रवृत्त होना ही सव्यभिचार है। यथा - इस रोग में इस औषध का यौगिक
१ समानानेकधर्मोपपत्तेः विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषा-
पेक्षो विमर्शः संशयः ॥ न्याय० १ । १ । ४१ ॥
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अर्थात् योग के अनुकूल होना वा विपरीत भी होना सम्भव है, इस प्रकार
एकान्त निश्चय न होना 'सव्यभिचार'* है ॥ ४५ ॥
अथ जिज्ञासा—जिज्ञासा नाम परीक्षा; यथा भेषजपरीक्षोत्तर-
कालमुपदेक्ष्यते ॥ ४६ ॥
जिज्ञासा—प्रमाणों द्वारा अर्थ की परीक्षा करना 'जिज्ञासा' है। यथा भेषज
परीक्षा जो आगे कहेंगे ॥ ४६ ॥
अथ व्यवसायः—व्यवसायो नाम निश्चयः, यथा वातिक एवायं
व्याधिः, इदमेवास्य भेषजमिति ॥ ४७ ॥
व्यवसाय—निश्चय का नाम 'व्यवसाय' है। यथा—यह रोग वातजन्य
ही है, और इस रोग की यही औषध है ॥ ४७ ॥
अथार्थप्राप्तिः-अर्थप्राप्तिर्नाम यत्रैकेनार्थेनोक्तेनापरस्यार्थस्यानुक्तस्य
सिद्धिः; यथा-नायं संतर्पणसाध्यो व्याधिरित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः—अप-
तर्पणसाध्योऽयमिति, नानेन दिवा भोक्तव्यमित्युक्ते भवत्यर्थप्राप्तिः—
निशि भोक्तव्यमिति ॥ ४८ ॥
अर्थप्राप्ति—एक कहे हुए अर्थ से दूसरे न कहे हुए अर्थ का जिससे ज्ञान
होजाय उसका नाम अर्थप्राप्ति है। यथा यह रोग संतर्पणसाध्य नहीं है, यह
कहने पर पता लग जाता है कि यह रोग अपतर्पण साध्य है। इसको दिन में
भोजन नहीं देना चाहिये, ऐसा कहने पर ज्ञात हो जाता है कि रात्रि में
भोजन देना चाहिये ॥ ४८ ॥
अथ संभवः—संभवो नाम यो यतः संभवति स तस्य संभवः;
यथा-षड् धातवो गर्भस्य, व्याधेरहितं हितमारोग्यस्येति ॥ ४९ ॥
संभव—जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसका संभव अर्थात् कारण है।
जैसे छः धातु (पृथिवी, अप, तेज, वायु, आकाश और चेतना) गर्भ की
उत्पत्ति में कारण हैं। इसी प्रकार अहित-सेवन रोगों की उत्पत्ति में, हित-सेवन
आरोग्यता की उत्पत्ति में कारण हैं ॥ ४९ ॥
अथानुयोज्यं—अनुयोज्यं नाम यद्वाक्यं वाक्यदोषयुक्तं तदनुयो-
ज्यमुच्यते,सामान्येनाहृतेष्वर्थेषु वा विशेषग्रहणार्थं यद्वाक्यं तदनुयोज्यं;
ॐ न्यायदर्शन में सव्यभिचार को हेत्वाभास माना है। यह हेतु नहीं,
परन्तु हेतु के समान दीखता है। यथा—'सव्यभिचार-विरुद्ध-प्रकरणसम-साध्यस-
मातीतकाला हेत्वाभासाः' । न्याय० १ । २ । ४५ ॥