ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६१- धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगणद्वारा देवकीके गर्भमें स्थित परमेश्वरकी स्तुति
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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स्फटिकमणिके समान गौरवर्णवाले संकर्षण नामक
पुरुष पधारे। वे बड़ी उतावलीमें थे। उनके सहस्रों
मस्तक थे तथा वे सौ सूर्योंके समान देदीप्यमान
हो रहे थे। उनको आया देख सबने उन
विष्णुस्वरूप संकर्षणका स्तवन किया। नारद!
उन्होंने भी वहाँ आकर मस्तक झुकाकर राधिकेश्वरकी
स्तुति की तथा सहस्रों मस्तकोंद्वारा भक्तिभावसे
उनको प्रणाम किया। तत्पश्चात् धर्मके पुत्र-स्वरूप
हम दोनों भाई नर और नारायण वहाँ गये। मैं तो
श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें लीन हो गया। किंतु नर
अर्जुनके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। फिर ब्रह्मा,
शिव, शेष और धर्म—ये चारों वहाँ एक स्थानपर
खड़े हो गये।
इस बीचमें देवताओंने वहाँ दूसरा उत्तम रथ
देखा, जो सुवर्णके सारतत्त्वका बना हुआ था और
नाना प्रकारके रत्ननिर्मित उपकरणोंसे अलंकृत था।
वह श्रेष्ठ मणियोंके सारतत्त्वसे संयुक्त, अग्निशुद्ध
दिव्य वस्त्रसे सुसज्जित, श्वेत चँवर तथा दर्पणोंसे
अलंकृत, सद्रत्न-सारनिर्मित कलश-समूहसे
विराजमान, पारिजात-पुष्पोंके मालाजालसे सुशोभित,
सहस्र पहियोंसे युक्त, मनके समान तीव्रगामी और
मनोहर था। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक मार्तण्डकी
प्रभाको तिरस्कृत करनेवाला वह श्रेष्ठ विमान
मोती, माणिक्य और हीरोंके समूहसे जाज्वल्यमान
जान पड़ता था। उसमें विचित्र पुतलियों, पुष्प,
सरोवरों और काननोंसे उसकी अद्भुत शोभा हो
रही थी। मुने! वह देवताओं और दानवोंके रथोंसे
बहुत बड़ा था। भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके
लिये विश्वकर्माने यत्नपूर्वक उस दिव्य रथका
निर्माण किया था। वह पचास योजन ऊँचा और
चार योजन विस्तृत था। रतिशय्यासे युक्त सैकड़ों
प्रासाद उसकी शोभा बढ़ाते थे। उस विमानमें
बैठी हुई मूलप्रकृति ईश्वरी देवी दुर्गाको भी
देवताओंने देखा, जो रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित
थीं और अपनी दिव्य दीप्तिसे तपाये हुए सुवर्णके
सारभागकी प्रभाका अपहरण कर रही थीं। उन
अनुपम तेजःस्वरूपा देवीके सहस्रों भुजाएँ थीं
और उनमें भाँति-भाँतिके आयुध शोभा पा रहे
थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हासकी छटा छा
रही थी। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर
दिखायी देती थीं। उनके गण्डस्थल और कपोल
उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे।
रत्नेन्द्रसाररचित तथा मधुर झनकारसे युक्त मञ्जीरोंके
कारण उनके चरणोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी।
श्रेष्ठ मणिनिर्मित मेखलासे मण्डित मध्यदेश अत्यन्त
मनोहर दिखायी देता था। हाथोंमें श्रेष्ठ रत्नसारके
बने हुए केयूर और कङ्कण शोभा दे रहे थे।
मन्दार-पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत वक्षःस्थल
अत्यन्त उज्ज्वल जान पड़ता था। शरत्कालके
सुधाकरकी आभाको तिरस्कृत करनेवाले सुन्दर
मुखसे उनकी मनोहरता और बढ़ गयी थी।
काजलकी काली रेखासे युक्त नेत्र शरत्कालके
प्रफुल्ल नील कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे
थे। चन्दन, अगुरु तथा कस्तूरीद्वारा रचित चित्रपत्रक
उनके भाल और कपोलको विभूषित कर रहे थे।
नूतन बन्धुजीव-पुष्पके समान आभावाले लाल-
लाल ओठके कारण उनके मुखकी शोभा और
भी बढ़ गयी थी। उनकी दन्तावली मोतियोंकी
पाँतकी प्रभाको लूटे लेती थी। प्रफुल्ल मालतीकी
मालासे अलंकृत वेणी धारण करनेवाली वे देवी
बड़ी ही सुन्दर थीं। गरुड़की चोंचके समान
नुकीली नासिकाके अग्रभागमें लटकती हुई
गजमुक्ताकी बुलाक अपूर्व छटा बिखेर रही थी।
अग्निशुद्ध एवं अत्यन्त दीप्तिमान् वस्त्रसे वे उद्भासित
हो रही थीं और दोनों पुत्रोंके साथ सिंहकी
पीठपर बैठी थीं। उस रथसे उतरकर पुत्रोंसहित
देवीने शीघ्रतापूर्वक श्रीकृष्णको प्रणाम किया।
फिर वे एक श्रेष्ठ आसनपर बैठ गयीं। इसके बाद
गणेश और कार्तिकेयने परात्पर श्रीकृष्ण, शंकर,
धर्म, संकर्षण तथा ब्रह्माजीको नमस्कार किया।
४४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
उन दोनों देवेश्वरोंको निकट आया देख वे सब देवता उठकर खड़े हो गये। उन्होंने आशीर्वाद दिया और दोनोंको अपने पास बिठा लिया। देवता बड़ी प्रसन्नताके साथ गणेश और कार्तिकेयके साथ उत्तम वार्तालाप करने लगे। उस समय देवता और देवी उस सभामें श्रीहरिके सामने बैठ गये। उन्हें देख बहुसंख्यक गोप और गोपियाँ आश्चर्यसे चकित हो रही थीं। तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मुस्कराहट खेलने लगी। वे लक्ष्मीसे बोले—'सनातनी देवि! तुम नाना रत्नोंसे सम्पन्न भीष्मकके राजभवनमें जाओ और वहाँ विदर्भदेशकी महारानीके उदरसे जन्म धारण करो। साध्वी देवि! मैं स्वयं कुण्डिनपुरमें जाकर तुम्हारा पाणिग्रहण करूँगा।'
वे रमा आदि देवियाँ पार्वतीको देखकर शीघ्र ही उठकर खड़ी हो गयीं। उन्होंने ईश्वरीको रमणीय रत्न-सिंहासनपर बिठाया। विप्रवर नारद! पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती—ये तीनों देवियाँ परस्पर यथोचित कुशल-प्रश्न करके वहाँ एक आसनपर बैठीं। वे प्रेमपूर्वक गोप-कन्याओंसे वार्तालाप करने लगीं। कुछ गोपियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके निकट बैठ गयीं। इसी समय जगदीश्वर श्रीकृष्णने वहाँ पार्वतीसे कहा—'सृष्टि और संहार करनेवाली कल्याणमयी महामायास्वरूपिणी देवि! शुभे! तुम अंशरूपसे नन्दके ब्रजमें जाओ और वहाँ नन्दके घर यशोदाके गर्भमें जन्म धारण करो। मैं भूतलपर गाँव-गाँवमें तुम्हारी पूजा करवाऊँगा। समस्त भूमण्डलमें, नगरों और वनोंमें मनुष्य वहाँकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें भक्तिभावसे तुम्हारी पूजा करेंगे और आनन्दपूर्वक नाना प्रकारके द्रव्य तथा दिव्य उपहार तुम्हें अर्पित करेंगे। शिवे! तुम ज्यों ही भूतलका स्पर्श करोगी, त्यों ही मेरे पिता वसुदेव यशोदाके सूतिकागारमें जाकर मुझे वहाँ स्थापित कर देंगे और तुम्हें लेकर चले जायेंगे। कंसका साक्षात्कार होनेमात्रसे तुम पुनः शिवके समीप चली आओगी और मैं भूतलका भार उतारकर अपने धाममें आ जाऊँगा।'
[ऐसा कहकर तुरंत ही छः मुखवाले स्कन्दसे श्रीकृष्ण बोले]—वत्स सुरेश्वर! तुम अंशरूपसे भूतलपर जाओ और जाम्बवतीके गर्भसे जन्म ग्रहण करो। सब देवता अपने अंशसे पृथ्वीपर जायँ और जन्म लें। मैं निश्चय ही पृथ्वीका भार हरण करूँगा।
नारद! ऐसा कहकर राधिकानाथ श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठे। फिर देवता, देवियाँ, गोप और गोपियाँ भी बैठ गयीं। इसी बीचमें ब्रह्माजी श्रीहरिके सामने उठकर खड़े हो गये और हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उन जगदीश्वरसे बोले।
**ब्रह्माजीने कहा—**प्रभो! इस सेवकके निवेदनपर ध्यान दीजिये। महाभाग! आज्ञा कीजिये कि भूतलपर किसके लिये कहाँ स्थान होगा। स्वामी ही सदा सेवकोंका भरण-पोषण और उद्धार करनेवाला है। सेवक वही है जो सदा भक्तिभावसे प्रभुकी आज्ञाका पालन करता है। कौन देवता किस रूपसे अवतार लेंगे? देवियाँ भी किस कलासे अवतीर्ण होंगी? भूतलपर कहाँ किसका निवास-स्थान होगा? और वह किस नामसे ख्याति प्राप्त करेगा?
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर जगदीश्वर श्रीकृष्णने इस प्रकार उत्तर दिया।
**श्रीकृष्ण बोले—**ब्रह्मन्! जिसके लिये जहाँ स्थान होगा, वह विधिवत् बता रहा हूँ, सुनो। कामदेव रुक्मिणीके पुत्र होंगे तथा शम्बरासुरके घरमें जो छायारूपसे स्थित है, वह सती मायावतीके नामसे प्रसिद्ध रति उनकी पत्नी होगी। तुम उन्हीं रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्नके पुत्र होओगे और तुम्हारा नाम अनिरुद्ध होगा। भारती शोणितपुरमें जाकर बाणासुरकी पुत्री होगी। जगदीश्वर अनन्त देवकीके गर्भसे आकृष्ट हो