सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 451

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
४४१
स्फटिकमणिके समान गौरवर्णवाले संकर्षण नामक
पुरुष पधारे। वे बड़ी उतावलीमें थे। उनके सहस्रों
मस्तक थे तथा वे सौ सूर्योंके समान देदीप्यमान
हो रहे थे। उनको आया देख सबने उन
विष्णुस्वरूप संकर्षणका स्तवन किया। नारद!
उन्होंने भी वहाँ आकर मस्तक झुकाकर राधिकेश्वरकी
स्तुति की तथा सहस्रों मस्तकोंद्वारा भक्तिभावसे
उनको प्रणाम किया। तत्पश्चात् धर्मके पुत्र-स्वरूप
हम दोनों भाई नर और नारायण वहाँ गये। मैं तो
श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें लीन हो गया। किंतु नर
अर्जुनके रूपमें दृष्टिगोचर हुआ। फिर ब्रह्मा,
शिव, शेष और धर्म—ये चारों वहाँ एक स्थानपर
खड़े हो गये।
इस बीचमें देवताओंने वहाँ दूसरा उत्तम रथ
देखा, जो सुवर्णके सारतत्त्वका बना हुआ था और
नाना प्रकारके रत्ननिर्मित उपकरणोंसे अलंकृत था।
वह श्रेष्ठ मणियोंके सारतत्त्वसे संयुक्त, अग्निशुद्ध
दिव्य वस्त्रसे सुसज्जित, श्वेत चँवर तथा दर्पणोंसे
अलंकृत, सद्रत्न-सारनिर्मित कलश-समूहसे
विराजमान, पारिजात-पुष्पोंके मालाजालसे सुशोभित,
सहस्र पहियोंसे युक्त, मनके समान तीव्रगामी और
मनोहर था। ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक मार्तण्डकी
प्रभाको तिरस्कृत करनेवाला वह श्रेष्ठ विमान
मोती, माणिक्य और हीरोंके समूहसे जाज्वल्यमान
जान पड़ता था। उसमें विचित्र पुतलियों, पुष्प,
सरोवरों और काननोंसे उसकी अद्भुत शोभा हो
रही थी। मुने! वह देवताओं और दानवोंके रथोंसे
बहुत बड़ा था। भगवान् शंकरकी प्रसन्नताके
लिये विश्वकर्माने यत्नपूर्वक उस दिव्य रथका
निर्माण किया था। वह पचास योजन ऊँचा और
चार योजन विस्तृत था। रतिशय्यासे युक्त सैकड़ों
प्रासाद उसकी शोभा बढ़ाते थे। उस विमानमें
बैठी हुई मूलप्रकृति ईश्वरी देवी दुर्गाको भी
देवताओंने देखा, जो रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित
थीं और अपनी दिव्य दीप्तिसे तपाये हुए सुवर्णके
सारभागकी प्रभाका अपहरण कर रही थीं। उन
अनुपम तेजःस्वरूपा देवीके सहस्रों भुजाएँ थीं
और उनमें भाँति-भाँतिके आयुध शोभा पा रहे
थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हासकी छटा छा
रही थी। वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर
दिखायी देती थीं। उनके गण्डस्थल और कपोल
उत्तम रत्नमय कुण्डलोंसे उद्भासित हो रहे थे।
रत्नेन्द्रसाररचित तथा मधुर झनकारसे युक्त मञ्जीरोंके
कारण उनके चरणोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी।
श्रेष्ठ मणिनिर्मित मेखलासे मण्डित मध्यदेश अत्यन्त
मनोहर दिखायी देता था। हाथोंमें श्रेष्ठ रत्नसारके
बने हुए केयूर और कङ्कण शोभा दे रहे थे।
मन्दार-पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत वक्षःस्थल
अत्यन्त उज्ज्वल जान पड़ता था। शरत्कालके
सुधाकरकी आभाको तिरस्कृत करनेवाले सुन्दर
मुखसे उनकी मनोहरता और बढ़ गयी थी।
काजलकी काली रेखासे युक्त नेत्र शरत्कालके
प्रफुल्ल नील कमलोंकी शोभाको लज्जित कर रहे
थे। चन्दन, अगुरु तथा कस्तूरीद्वारा रचित चित्रपत्रक
उनके भाल और कपोलको विभूषित कर रहे थे।
नूतन बन्धुजीव-पुष्पके समान आभावाले लाल-
लाल ओठके कारण उनके मुखकी शोभा और
भी बढ़ गयी थी। उनकी दन्तावली मोतियोंकी
पाँतकी प्रभाको लूटे लेती थी। प्रफुल्ल मालतीकी
मालासे अलंकृत वेणी धारण करनेवाली वे देवी
बड़ी ही सुन्दर थीं। गरुड़की चोंचके समान
नुकीली नासिकाके अग्रभागमें लटकती हुई
गजमुक्ताकी बुलाक अपूर्व छटा बिखेर रही थी।
अग्निशुद्ध एवं अत्यन्त दीप्तिमान् वस्त्रसे वे उद्भासित
हो रही थीं और दोनों पुत्रोंके साथ सिंहकी
पीठपर बैठी थीं। उस रथसे उतरकर पुत्रोंसहित
देवीने शीघ्रतापूर्वक श्रीकृष्णको प्रणाम किया।
फिर वे एक श्रेष्ठ आसनपर बैठ गयीं। इसके बाद
गणेश और कार्तिकेयने परात्पर श्रीकृष्ण, शंकर,
धर्म, संकर्षण तथा ब्रह्माजीको नमस्कार किया।