ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३२- वैकुण्ठमें श्रीहरिका देवताओंको समझाकर लक्ष्मीदेवीसे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करनेको स्वीकार करनेके लिये कहना
प्रकृतिखण्ड
२३१
निर्भय विचरता हूँ। जो तीनों लोकोंमें परम दुर्लभ
हरिभक्ति प्रदान करता है, वही जन्मदाता पिता
है, वही ज्ञानदाता गुरु है, वही बन्धु है और वही
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है* । जो श्रीकृष्ण-सेवाके सिवा
दूसरा कोई मार्ग दिखाता है, वह उस शिष्यका
विनाश ही करता है। निश्चय ही उस गुरुको
उसके वधके पापका भागी होना पड़ता है।
भगवान् श्रीकृष्णका नाम ही सदा समस्त लोकोंके
लिये मङ्गलकारक है। जो कृष्ण-नाम लेता है,
उसके मङ्गलकी सदा वृद्धि होती है। उसकी
आयुका अपव्यय नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तोंसे
काल, मृत्यु, रोग, संताप और शोक उसी तरह
दूर भागते हैं, जैसे गरुड़से सर्प । श्रीकृष्ण-मन्त्रका
उपासक ब्राह्मण हो या चाण्डाल, वह ब्रह्मलोकको
लाँघकर उत्तम गोलोकमें चला जाता है। ब्रह्माजी
मधुपर्क आदिके द्वारा उसकी पूजा करते हैं तथा
देवताओं और सिद्धोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता
हुआ वह परमानन्दका अनुभव करता है। भगवान्
शिवने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवाको ही
ज्ञान, तप, वेद तथा योगका सार बताया है। वही
परम कल्याणस्वरूप है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त
सारा जगत् स्वप्नके समान मिथ्या ही है। केवल
परब्रह्म परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्ण ही परम
सत्य हैं। वे प्रकृतिसे भी परे हैं। अतः तुम
उन्हींकी आराधना करो। भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त
सुखदायक, सारतत्त्वस्वरूप, भक्तिदाता, मोक्षदाता,
सिद्धिदाता, योगप्रदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके
दाता हैं। योगी, यती, सिद्ध और तपस्वी सबके
लिये कर्मोंका भोग अनिवार्य है, परंतु नारायणके
भक्तोंके लिये कर्मभोग नहीं है। जैसे प्रज्वलित
अग्निमें डाला गया सूखा ईंधन शीघ्र ही जल जाता
है, उसी प्रकार भगवद्भक्तोंके स्पर्शमात्रसे सारा
पाप तत्काल भस्म हो जाता है। श्रीकृष्ण-भक्तसे
रोग, पाप और भय सभी थर-थर काँपते हैं।
यमदूत भी उससे डरकर दूर भागते हैं। विधाताके
कारागाररूपी इस संसारमें मनुष्य तभीतक बँधा
रहता है, जबतक कि गुरुके मुखसे उसको
श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपदेश नहीं प्राप्त होता। श्रीकृष्णका
नाम किये हुए कर्मोंके भोगरूपी बेड़ीका उच्छेद
करनेवाला, मायाजालको छिन्न-भिन्न कर देनेवाला
तथा मायापाशका विनाशक है। गोलोकके मार्गका
सोपान, उद्धारका बीज तथा भक्तिका नित्य
बढ़नेवाला अविनाशी अङ्कुर है। पुरन्दर ! सम्पूर्ण
तप, योग, सिद्धि, वेदाध्ययन, व्रत, दान, तीर्थ-
स्नान, यज्ञ, पूजन और उपवास-इन सबका वही
सार है, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है।
श्रीकृष्णके मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य
जीवन्मुक्त हो जाता है। उसके स्पर्शसे तीर्थोंके
समुदाय तथा सारी पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती
है। अनेक जन्मोंतक जिसे कोई दीक्षा नहीं प्राप्त
हुई है, वह लेशमात्र पुण्यके प्रभावसे किसी अन्य
देवताका मन्त्र पाता है। अनेक जन्मोंतक अन्य
देवताओंकी सेवाके फलस्वरूप उसको समस्त
कर्मोंके साक्षी सूर्यदेवका मन्त्र प्राप्त होता है। तीन
जन्मोंतक सूर्यकी सेवासे शुद्ध हुआ मनुष्य गणेशजीके
सर्वविघ्नहारी मन्त्रका उपदेश पाता है। अनेक
जन्मोंतक उनकी सेवासे मनुष्यकी सारी विघ्न-
बाधाएँ दूर हो जाती हैं। फिर वह गणेशजीके
कृपा-प्रसादसे दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। उस
ज्ञानके प्रकाशमें भलीभाँति विचार करके
अज्ञानान्धकारका निवारण करनेके पश्चात् मनुष्य
विष्णुमायास्वरूपिणी प्रकृतिदेवी दुर्गतिनाशिनी
दुर्गाका भजन करता है। वे सिद्धिदायिनी,
सिद्धिरूपिणी तथा परमा सिद्धियोगिनी हैं। वाणी,
- स जन्मदाता स गुरुः स च बन्धुः सतां परः । यो ददाति हरेर्भक्तिं त्रैलोक्ये च सुदुर्लभाम् ॥
(प्रकृतिखण्ड ३६। ७६)
२३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
लक्ष्मी और श्रीकृष्णप्रिया राधा आदि उनके अनेक रूप हैं। अनेक जन्मोंतक उनकी उपासना करनेके पश्चात् उनकी कृपासे ज्ञानी होकर मनुष्य ज्ञानानन्दस्वरूप, श्रीकृष्णज्ञानके अधिदेवता सनातन महादेव कल्याणस्वरूप शिवका भजन करता है।
वे मङ्गलदायक, कल्याणकारक, परमानन्दरूप, परमानन्ददायी, सुखदायक, मोक्षदायक तथा समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं। अमरत्व, सुदीर्घ आयु, इन्द्रत्व तथा मनुत्वको भी वे अनायास ही देनेमें समर्थ हैं। राजेन्द्रपद, ज्ञान तथा हरिभक्तिके भी दाता हैं। तीन जन्मोंतक उनकी आराधना करके उन्हीं आशुतोष महात्मा शंकरके कृपा-प्रसादसे मनुष्य निश्चय ही हरिभक्ति प्राप्त कर लेता है। फिर श्रीकृष्ण-भक्तोंके संसर्गसे उसको कृष्णमन्त्रकी प्राप्ति होती है। तत्त्वज्ञ पुरुष निर्मल ज्ञान-दीपके प्रकाशित होनेसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को मिथ्या ही देखता है। वरदाता शंकरके वरसे जब निर्मल ज्ञान और भगवद्भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, तब मनुष्य परात्पर निवृत्तिभावको प्राप्त हो जाता है। जिस शरीरमें उसे श्रीकृष्ण-मन्त्रकी प्राप्ति होती है, वह शरीर जबतक टिका रहता है, तभीतक उसे भारतवर्षमें रहना पड़ता है। उस पाञ्चभौतिक शरीरको त्याग देनेके पश्चात् वह दिव्य रूप धारण कर लेता है और श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें उनका पार्षद बनकर उनकी सेवा किया करता है। वह परमानन्दसे सम्पन्न तथा मोह आदिसे रहित हो जाता है। इस प्राकृत जगत्में पुनः उसका आगमन नहीं होता। उसे पुनः माताका स्तन नहीं पीना पड़ता।
जो विष्णुमन्त्रके उपासक गङ्गा आदि तीर्थोंका सेवन करनेवाले तथा स्वधर्मपरायण भिक्षु हैं, उनका फिर जन्म नहीं होता। तीर्थमें पापका सर्वथा परित्याग करे और पुण्यकर्मका अनुष्ठान करते हुए श्रीहरिका भजन करे। विधाताने तीर्थसेवी पुरुषोंका यही धर्म बताया है। भगवान् विष्णुके नाम-मन्त्रका जप करे, उन्हींकी सेवा आदिमें तत्पर रहे तथा उन्हींके व्रत एवं उपवासमें संलग्न रहे। यह विष्णुसेवी पुरुषोंका धर्म बताया गया है।
जो सदन्न या कदन्नमें (उत्तम या निकृष्ट श्रेणीके अन्नमें), मिट्टीके ढेले अथवा सुवर्णमें सदा समभाव रखता है, वह संन्यासी कहा गया है। जो दण्ड, कमण्डलु तथा गेरुआ वस्त्रमात्र धारण करे, प्रतिदिन प्रवासमें रहे और एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे, उसे संन्यासी कहा गया है। जो लाभ आदिसे रहित होकर सदाचारी द्विजोंका दिया हुआ अन्न खाता है, किंतु किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो व्यापार न करे, आश्रम बनाकर न रहे, समस्त वैदिक कर्मोंसे विलग रहे तथा निरन्तर नारायणका ध्यान करे, उसे सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो सदा मौन रहे, ब्रह्मचर्यका पालन करे, दूसरोंसे बात न करे और सबको ब्रह्ममय देखे, उसे संन्यासी कहा गया है। जिसकी सर्वत्र समबुद्धि हो, जो हिंसा और माया आदिसे दूर रहता हो तथा क्रोध और अहंकारसे शून्य हो, वही सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो बिना माँगे प्रस्तुत हुए मीठे अथवा स्वादरहित अन्नको समभावसे भोजन करता है, किंतु खानेके लिये किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो स्त्रियोंका मुँह न देखे, उनके पास खड़ा न हो और काठकी बनी हुई नारीमूर्तिका भी स्पर्श न करे, वही सच्चा भिक्षु है। ब्रह्माजीने संन्यासियोंका यही धर्म बताया है। इसके विपरीत चलनेपर जन्म, मृत्यु और यमयातनाका भय सिरपर सवार रहता है अथवा पशु आदि क्षुद्र जन्तुओंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। गर्भवासके समय सभी प्राणी अपने सैकड़ों
प्रकृतिखण्ड
२३३
जन्मोंके कर्मोंका स्मरण करते हैं; किंतु गर्भसे निकलते ही जीव विष्णुकी मायासे मोहित हो सब कुछ भूल जाता है।
देवता हो या कीट सभी यत्नपूर्वक अपने शरीरकी रक्षा करते हैं। स्त्रीकी योनिके भीतर जब पुरुषका वीर्य पड़ता है तो वह तत्काल उसके रक्तमें मिल जाता है। रक्तकी मात्रा अधिक होनेपर संतान माताके समान होती है और वीर्यकी अधिकता होनेपर संतानकी आकृति पितासे अधिक मिलती-जुलती है। ऋतुकालके बाद यदि युग्म दिनोंमें गर्भाधान हो तो पुत्रका जन्म होता है और विषम दिनोंमें आधान होनेपर कन्याकी उत्पत्ति होती है। युग्म दिनोंमें तथा रवि, मङ्गल और गुरुका वार होनेपर आधान हो तो पुत्र होता है। अन्य वारों तथा विषम दिनोंमें आधानसे कन्याका जन्म होता है। जिसका जन्म पहले पहरमें होता है, वह अल्पायु होता है, दूसरे पहरमें जन्म लेनेवालेकी आयु मध्यम होती है तथा तीसरे पहरमें जिसका जन्म होता है, वह दीर्घायु होता है। चतुर्थ पहरमें जन्म लेनेवाला चिरंजीवी माना जाता है। जिस क्षण या लग्नमें बालकका जन्म होता है, उस समयकी ग्रहस्थितिके अनुरूप उसका भावी जीवन हुआ करता है। वह पूर्वकर्मोंके अनुसार सुखी या दुःखी होता है। जैसे क्षणमें जन्म होता है, वैसे ही संतान होती है। प्रसवके क्षणकी चर्चा विद्वान् पुरुष ही करते हैं। रज-वीर्य परस्पर संयुक्त हो एक रातमें कललका आकार धारण करते हैं। फिर वह कलल दिनों-दिन बढ़ने लगता है। सातवें दिन उसकी आकृति बेरके समान होती है और एक मासमें वह लट्टूके समान हो जाता है। तीन महीना बीतते-बीतते वह बिना हाथ-पैरके मांसपिण्डके रूपमें परिणत हो जाता है। पाँचवें मासमें देहधारी जीवके सारे अवयव प्रकट हो जाते हैं। छठे महीनेमें जीवका संचार होता है। फिर वह सब तत्त्वोंको समझने लगता है। थोड़ी-सी जगहमें उसे रहना और सोना पड़ता है, इस बातको समझकर वह पिंजड़ेमें बँधे हुए पक्षीके समान दुःखी हो जाता है। अपवित्र स्थानमें रहकर वह माताके खाये हुए अन्न-पानका ही आहार करता है और 'हाय! हाय!' करके परमेश्वरका चिन्तन करने लगता है। इस तरह चार मासतक बड़ी भारी यातना भोगकर यथासमय वायुसे प्रेरित हो वह गर्भसे बाहर निकलता है। उस समय उसे दिशा, देश और कालका भान नहीं होता। विष्णुमायासे मोहित हो वह सब कुछ भूल जाता है। शैशवकालकी सीमातक वह शिशु सदा मल-मूत्रसे लिपटा रहता है। दूसरेके अधीन होता है। उसमें मच्छर आदिको हटानेकी भी शक्ति नहीं रहती। जब उसे कीड़े आदि काट खाते हैं, तब वह दुःखी होकर बारंबार रोता है। स्तन-पान करनेमें भी असमर्थ ही रहता है। अभीष्ट वस्तुकी याचना करनेके लिये उसकी वाणी नहीं निकलती। पौगण्डावस्थातक वह स्पष्ट बोल नहीं पाता। पौगण्डावस्थामें भी अनेक प्रकारकी यातना भोगकर जवान होता है। उस समय मायासे मोहित देहधारी जीव गर्भादिकी यातनाको भूल जाता है। आहार और मैथुनकी चिन्तासे पीड़ित तथा नाना प्रकारके मोह आदिसे वेष्टित होकर वह पुत्र, पत्नी तथा अनुचरोंका यत्नपूर्वक पालन करता है। जबतक वह उनके पालनमें समर्थ रहता है, तभीतक घरमें उसकी पूजा होती है—आदर-सत्कार होता है। असमर्थ हो जानेपर तो भाई-बन्धु उसे बूढ़े बैलकी भाँति व्यर्थका भार समझने लगते हैं। जब अत्यन्त जरा-जर्जर, जड एवं बधिर हो जाता है, खाँसी और दमा आदि रोग सताने लगते हैं तथा वह अत्यन्त मूढवत् हो सर्वथा दूसरोंके अधीन हो जाता है, तब सदा बारंबार पश्चात्ताप करने लगता है। वह कहता है—'अहो! मैंने श्रीहरिके तीर्थका तथा
२३४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
सत्संगका भी स्वेच्छापूर्वक कभी सेवन नहीं किया। यदि पुनः भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाऊँगा, तब तीर्थोंमें जाऊँगा और भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा करूँगा।' देवेन्द्र! इस तरह संकल्प करते हुए उस जडको यथासमय आकर अत्यन्त भयंकर यमदूत पकड़ लेता है। वह उस दूतको देखता है। उसके हाथोंमें पाश और दण्ड होते हैं। उसकी आँखें अत्यन्त क्रोधसे लाल होती हैं, आकृति विकराल एवं भयंकर होती है। उसे किन्हीं भी उपायोंद्वारा रोक पाना कठिन होता है। वह बलिष्ठ, भयानक, दुर्दर्श, सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञाता तथा अन्य सबकी दृष्टिसे ओझल होता है। सामने खड़े हुए उस दूतपर दृष्टि पड़ते ही वह अत्यन्त भयभीत हो मल-मूत्रका त्याग करने लग जाता है। फिर तत्काल ही प्राणों तथा पाञ्चभौतिक देहको भी त्याग देता है।
यमदूत अंगूठेके बराबर आकारवाले जीवको लेकर भोगदेह (या यातना-शरीर)-में स्थापित कर देता है; तब उसे तीव्रगतिसे अपने स्थानपर ले जाता है। जीव वहाँ पहुँचकर सब धर्मोंके ज्ञाता यमराजको देखता है। वे रत्नसिंहासनपर सुस्थिरभावसे बैठकर मन्द-मन्द मुस्कराते दिखायी देते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, धर्माधर्मके विचारको जानते हैं तथा सब ओर उनका मुख है। विधाताने पूर्वकालसे ही यमको सम्पूर्ण विश्वके नियमनका एकमात्र अधिकार दे रखा है। वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करते हैं। रत्नमय आभूषणोंसे भूषित हैं, तीन करोड़ दूत और पार्षदगण उन्हें सदा घेरे रहते हैं। वे शुद्ध स्फटिकमणिकी माला लेकर उसके द्वारा श्रीकृष्णके नामोंका जप करते रहते हैं तथा रोमाञ्चित शरीरसे मन-ही-मन उनके युगल चरणारविन्दोंका ध्यान किया करते हैं। उस समय उनकी वाणी गद्गद होती है, नेत्रोंसे अश्रुधारा बहती रहती है। भगवान् यम सबपर समान दृष्टि रखते हैं। उनका रूप बहुत ही सुन्दर एवं कमनीय है। उनका शरीर सदा सुस्थिर यौवनसे सुशोभित होता है। वे अपने तेजसे उद्भासित होते रहते हैं। उनकी कान्ति शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी शोभाको लज्जित कर देती है। उनकी ओर सुखपूर्वक देखा जा सकता है। वे बड़े बुद्धिमान् हैं और चित्रगुप्तके सामने विराजमान रहते हैं। पुण्यात्माओंके समक्ष उनका रूप उपर्युक्त रूपसे शान्त ही रहता है, परंतु पापियोंको वे बड़े भयानक दिखायी देते हैं। उन्हें देखकर देहधारी जीव प्रणाम करता है और अत्यन्त भयभीत होकर खड़ा हो जाता है। सूर्यनन्दन यम चित्रगुप्तके साथ विचार करके जिनके लिये जो उचित होता है, वैसा ही शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार उन जीवोंको आवागमनके चक्करसे कभी छुटकारा नहीं मिलता। श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका सेवन ही जीवको उससे छुटकारा दिला सकता है।
देवराज! ये सब बातें मैंने आनुषङ्गिकरूपसे तुम्हें बतायी हैं, अब मनोवाञ्छित वर माँगो। वत्स! मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा। मेरे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है।
महेन्द्रने कहा— याचकोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप मुनिश्रेष्ठ! मेरा इन्द्रत्व तो चला ही गया। अब ऐश्वर्यसे क्या प्रयोजन है? आप मुझे परमपद प्रदान कीजिये।
महेन्द्रकी यह बात सुनकर मुनिवर दुर्वासा हँसे और वेदोक्त सारतत्त्वस्वरूप सत्य वचन बोले।
मुनिने कहा— महेन्द्र! विषयी पुरुषोंके लिये परमपद अत्यन्त दुर्लभ है। तुम-जैसे लोगोंको तो प्राकृत प्रलय-कालमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती। सृष्टिकालमें जीवोंका आविर्भाव तथा प्रलयकालमें तिरोभावमात्र होता है। ठीक उसी तरह, जैसे प्रातःकाल प्राणियोंका जागरण और रात्रिकालमें शयन हुआ करता है। जैसे काल-चक्र भ्रमण करता रहता है, उसी प्रकार
प्रकृतिखण्ड २३५
विषयी जीव भी ईश्वरकी इच्छासे गाड़ीके पहियेकी तरह सदा ही आवागमनका चक्कर काटते रहते हैं। साठ विपलोंका एक पल, साठ पलोंका एक दण्ड, दो दण्डोंका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात, पंद्रह दिन-रातोंका एक पक्ष, शुक्ल और कृष्ण नामक दो पक्षोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुओंका एक अयन, दो अयनोंका एक वर्ष, तैंतालीस लाख बीस हजार मानववर्षोंके चार युग तथा मनुष्योंके पचीस हजार पाँच सौ साठ चतुर्युगोंकी एक इन्द्रकी आयु होती है। यही एक मनुकी भी आयु कही गयी है। दस लाख आठ हजार इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। तभी 'प्राकृतिक लय' होता है। वत्स ! प्राकृतिक प्रलयके समय परमात्मा श्रीकृष्णकी पलकें गिरती हैं। जब फिर उनकी पलकें उठती या आँख खुलती है, तब पुनः नयी सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रुतिमें ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयोंको असंख्य बताया गया है। जैसे पृथ्वीके धूलिकणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह सृष्टि और प्रलयोंकी भी कोई गिनती नहीं है। यह चन्द्रशेखर शिवका कथन है। उपर्युक्त इन्द्रोंका मोक्ष नहीं होता। अतः देवराज ! तुम कोई दूसरा वर माँगो, जो सृष्टिसूत्रके अनुरूप हो।
मुने ! मुनीश्वर दुर्वासाकी यह बात सुनकर देवराजको बड़ा विस्मय हुआ। तब उन्होंने वहाँ अपने पूर्व-ऐश्वर्यका ही वरण किया। 'तुम अपने पूर्व ऐश्वर्यको शीघ्र ही प्राप्त कर लोगे'—ऐसा कहकर मुनि दुर्वासा अपने घरको चले गये।
नारदजीने पूछा—भगवान् श्रीहरिका गुणगान सुनकर इन्द्रको जब ज्ञान प्राप्त हो गया, तब उन्होंने घर जाकर क्या किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण बोले—ब्रह्मन्! श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर इन्द्र संसारके ऐश्वर्य-भोगसे विरक्त हो गये। वे दिनोंदिन अपने वैराग्यभावको बढ़ाने लगे। मुनिवर दुर्वासाके पाससे घर जाकर उन्होंने अपनी अमरावतीपुरीकी दशा देखी। वह दैत्यों तथा असुर-समूहोंसे भरी होनेके कारण भयसे व्याकुल जान पड़ती थी। उस पुरीमें कहीं तो उनके बन्धु-बान्धव विषादमें डूबे थे और कहीं-कहींके बन्धुजन पुरी छोड़कर बाहर चले गये थे। अपनी पुरीको पिता-माता-पत्नी आदिसे रहित, अत्यन्त हलचलसे पूर्ण तथा शत्रुओंसे आक्रान्त देखकर इन्द्रदेव गुरु बृहस्पतिके पास गये। उस समय शक्तिशाली बृहस्पतिजी मन्दाकिनीके तटपर विराजमान हो परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते हुए देवराज इन्द्रको दृष्टिगोचर हुए। फिर देखा तो वे गङ्गाके जलमें पूर्वाभिमुख खड़े होकर सूर्यका अभिवादन कर रहे थे। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे। उनका शरीर पुलकित था। वे अत्यन्त आनन्दित थे। वे परम श्रेष्ठ, गाम्भीर्य-सम्पन्न, धर्मात्मा, श्रेष्ठ पुरुषोंसे सेवित, बन्धुवर्गमें आदरणीय, भ्रातृ-समुदायमें ज्येष्ठ तथा देव-शत्रुओंके लिये अनिष्टकारी गुरुवर बृहस्पतिजी मन्त्रका जप कर रहे थे। देवराज एक पहरतक उन्हें देखते रह गये। तत्पश्चात् उन्हें ध्यानसे उपरत देखकर प्रणाम किया। फिर वे गुरुदेवके चरणकमलोंमें मस्तक झुकाकर उच्चस्वरसे रोने लगे। तदनन्तर दुर्वासाजीके द्वारा दिये गये शापके सम्बन्धकी सारी बातें इन्द्रने बृहस्पतिजीको बतायीं। इन्द्रकी सारी बातें सुनकर परम बुद्धिमान् एवं वक्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा।
बृहस्पति बोले—सुरश्रेष्ठ ! मैं सब कुछ सुन चुका हूँ। तुम विषाद मत करो; मेरी बात सुनो। नीतिज्ञ पुरुष विपत्तिके अवसरपर कभी भी घबराता नहीं है; क्योंकि यह विपत्ति और सम्पत्ति स्वस्वरूपिणी है। इसे नश्वर कहा जाता है। यह सम्पत्ति और विपत्ति अपने ही