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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 241

प्रकृतिखण्ड
२३१
निर्भय विचरता हूँ। जो तीनों लोकोंमें परम दुर्लभ
हरिभक्ति प्रदान करता है, वही जन्मदाता पिता
है, वही ज्ञानदाता गुरु है, वही बन्धु है और वही
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है* । जो श्रीकृष्ण-सेवाके सिवा
दूसरा कोई मार्ग दिखाता है, वह उस शिष्यका
विनाश ही करता है। निश्चय ही उस गुरुको
उसके वधके पापका भागी होना पड़ता है।
भगवान् श्रीकृष्णका नाम ही सदा समस्त लोकोंके
लिये मङ्गलकारक है। जो कृष्ण-नाम लेता है,
उसके मङ्गलकी सदा वृद्धि होती है। उसकी
आयुका अपव्यय नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तोंसे
काल, मृत्यु, रोग, संताप और शोक उसी तरह
दूर भागते हैं, जैसे गरुड़से सर्प । श्रीकृष्ण-मन्त्रका
उपासक ब्राह्मण हो या चाण्डाल, वह ब्रह्मलोकको
लाँघकर उत्तम गोलोकमें चला जाता है। ब्रह्माजी
मधुपर्क आदिके द्वारा उसकी पूजा करते हैं तथा
देवताओं और सिद्धोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता
हुआ वह परमानन्दका अनुभव करता है। भगवान्
शिवने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवाको ही
ज्ञान, तप, वेद तथा योगका सार बताया है। वही
परम कल्याणस्वरूप है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त
सारा जगत् स्वप्नके समान मिथ्या ही है। केवल
परब्रह्म परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्ण ही परम
सत्य हैं। वे प्रकृतिसे भी परे हैं। अतः तुम
उन्हींकी आराधना करो। भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त
सुखदायक, सारतत्त्वस्वरूप, भक्तिदाता, मोक्षदाता,
सिद्धिदाता, योगप्रदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके
दाता हैं। योगी, यती, सिद्ध और तपस्वी सबके
लिये कर्मोंका भोग अनिवार्य है, परंतु नारायणके
भक्तोंके लिये कर्मभोग नहीं है। जैसे प्रज्वलित
अग्निमें डाला गया सूखा ईंधन शीघ्र ही जल जाता
है, उसी प्रकार भगवद्भक्तोंके स्पर्शमात्रसे सारा
पाप तत्काल भस्म हो जाता है। श्रीकृष्ण-भक्तसे
रोग, पाप और भय सभी थर-थर काँपते हैं।
यमदूत भी उससे डरकर दूर भागते हैं। विधाताके
कारागाररूपी इस संसारमें मनुष्य तभीतक बँधा
रहता है, जबतक कि गुरुके मुखसे उसको
श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपदेश नहीं प्राप्त होता। श्रीकृष्णका
नाम किये हुए कर्मोंके भोगरूपी बेड़ीका उच्छेद
करनेवाला, मायाजालको छिन्न-भिन्न कर देनेवाला
तथा मायापाशका विनाशक है। गोलोकके मार्गका
सोपान, उद्धारका बीज तथा भक्तिका नित्य
बढ़नेवाला अविनाशी अङ्कुर है। पुरन्दर ! सम्पूर्ण
तप, योग, सिद्धि, वेदाध्ययन, व्रत, दान, तीर्थ-
स्नान, यज्ञ, पूजन और उपवास-इन सबका वही
सार है, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है।
श्रीकृष्णके मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य
जीवन्मुक्त हो जाता है। उसके स्पर्शसे तीर्थोंके
समुदाय तथा सारी पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती
है। अनेक जन्मोंतक जिसे कोई दीक्षा नहीं प्राप्त
हुई है, वह लेशमात्र पुण्यके प्रभावसे किसी अन्य
देवताका मन्त्र पाता है। अनेक जन्मोंतक अन्य
देवताओंकी सेवाके फलस्वरूप उसको समस्त
कर्मोंके साक्षी सूर्यदेवका मन्त्र प्राप्त होता है। तीन
जन्मोंतक सूर्यकी सेवासे शुद्ध हुआ मनुष्य गणेशजीके
सर्वविघ्नहारी मन्त्रका उपदेश पाता है। अनेक
जन्मोंतक उनकी सेवासे मनुष्यकी सारी विघ्न-
बाधाएँ दूर हो जाती हैं। फिर वह गणेशजीके
कृपा-प्रसादसे दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। उस
ज्ञानके प्रकाशमें भलीभाँति विचार करके
अज्ञानान्धकारका निवारण करनेके पश्चात् मनुष्य
विष्णुमायास्वरूपिणी प्रकृतिदेवी दुर्गतिनाशिनी
दुर्गाका भजन करता है। वे सिद्धिदायिनी,
सिद्धिरूपिणी तथा परमा सिद्धियोगिनी हैं। वाणी,

  • स जन्मदाता स गुरुः स च बन्धुः सतां परः । यो ददाति हरेर्भक्तिं त्रैलोक्ये च सुदुर्लभाम् ॥
    (प्रकृतिखण्ड ३६। ७६)