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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)

॥ श्रीहरिः ॥

631

संक्षिप्त

ब्रह्मवैवर्तपुराण

(सचित्र, मोटा टाइप) केवल हिन्दी


(चित्र: भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीराधाजी सिंहासन पर विराजमान)


गीताप्रेस गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923]

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631

॥ श्रीहरिः ॥

संक्षिप्त

ब्रह्मवैवर्तपुराण

( सचित्र, मोटा टाइप, केवल हिन्दी )


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥


गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० २०७५ अठारहवाँ पुनर्मुद्रण ४,०००
कुल मुद्रण ७०,०००

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❖ मूल्य— ₹ २३०
( दो सौ तीस रुपये )

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Printed & Published by :
Gita Press, Gorakhpur—273005 (INDIA)
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Phone : (0551) 2334721, 2331250, 2331251
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॥ श्रीहरिः ॥

निवेदन

पुराण भारतकी सर्वोत्कृष्ट निधि हैं। प्राचीन कालसे ही भारतवर्षमें पुराणोंका बड़े आदरके साथ पठन, श्रवण, मनन और अनुशीलन होता आया है। भारतीय जनताके हृदयमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार तथा धर्मपरायणताको दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित करनेका श्रेय पुराणोंको ही है। वेदादि शास्त्रोंके गूढ़तम तत्त्वों एवं रहस्योंको सरल, रोचक एवं मधुर आख्यान-शैलीमें सर्वसाधारणके लिये सुलभ (उपलब्ध) करा देना पुराणोंकी अपूर्व विशेषता है। इसीलिये पुराणोंको अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है।

पुराणोंकी ऐसी महत्ता और उपयोगिताको ध्यानमें रखते हुए गीताप्रेसद्वारा 'कल्याण' के विशेषाङ्कोंके रूपमें समय-समयपर अनेक पुराणोंके सरल तथा सरस हिन्दी-अनुवाद जनहितमें प्रकाशित किये जा चुके हैं। जिन्हें विद्वानों, विचारकोंसहित बहुसंख्यक ग्राहकों तथा प्रेमी पाठकोंद्वारा पर्याप्त समादर प्राप्त हुआ है।

'संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराणाङ्क' प्रथम बार 'कल्याण'-वर्ष ३७ (सन् १९६३ ई०)-के विशेषाङ्कके रूपमें प्रकाशित हुआ था। इसका (१,४१,००० का बृहत्) प्रथम संस्करण शीघ्र समाप्त हो जानेके पश्चात् इसके पुनर्मुद्रणके लिये प्रेमी पाठकोंद्वारा निरन्तर प्रेमाग्रह बना रहा। फलस्वरूप इसके कुछ पुनर्मुद्रित संस्करण भी बादमें प्रकाशित किये गये। इस निरन्तरताको बराबर बनाये रखनेके उद्देश्यसे अब यह 'संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण' ग्रन्थाकारमें आपकी सेवामें प्रस्तुत है।

'ब्रह्मवैवर्तपुराण' मुख्यतः वैष्णव पुराण है। इसके मुख्य प्रतिपाद्य देवता विष्णु—परमात्मा श्रीकृष्ण हैं। यह चार खण्डोंमें विभाजित है—ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, गणपतिखण्ड तथा श्रीकृष्णजन्मखण्ड। ब्रह्मखण्डमें सबके बीजरूप परब्रह्म परमात्मा (श्रीकृष्ण)-के तत्त्वका निरूपण है। प्रकृतिखण्डमें प्रकृतिस्वरूपा आद्याशक्ति (श्रीराधा) तथा उनके अंशसे उत्पन्न अन्यान्य देवियोंके शुभ चरित्रोंकी चर्चा है। गणपतिखण्डमें (परमात्मस्वरूप) श्रीगणेशजीके जन्म तथा चरित्र आदिसे सम्बन्धित कथाएँ हैं। श्रीकृष्णजन्मखण्डमें (परब्रह्म परमात्मारूप) श्रीकृष्णके अवतार तथा उनकी मनोरम लीलाओंका वर्णन है। सारांशतः इसमें भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी अभिन्नस्वरूपा प्रकृति-ईश्वरी श्रीराधाकी सर्वप्रधानताके साथ गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका विशद वर्णन है। इसके अतिरिक्त इसमें कुछ विशिष्ट ईश्वरकोटिके सर्वशक्तिमान् देवताओंकी एकरूपता, महिमा तथा उनकी साधना-उपासनाका भी सुन्दर प्रतिपादन है।

इसकी सभी कथाएँ अतीव रोचक, मधुर, ज्ञानप्रद और कल्याणकारी हैं। इसका अध्ययन साधनोपयोगी और सदैव कल्याणप्रद है। अतएव जिज्ञासुओं, साधकों एवं कल्याणकामी सभी महानुभावोंको इसके अध्ययन-अनुशीलनद्वारा अधिकाधिक रूपमें विशेष लाभ उठाना चाहिये।

—प्रकाशक

॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
( ब्रह्मखण्ड )
१- मङ्गलाचरण, नैमिषारण्यमें आये हुए सौतिसे
शौनकके प्रश्न तथा सौतिद्वारा ब्रह्मवैवर्तपुराणका
परिचय देते हुए इसके महत्त्वका निरूपण...... २१
२- परमात्माके महान् उज्ज्वल तेजःपुञ्ज, गोलोक,
वैकुण्ठलोक और शिवलोककी स्थितिका
वर्णन तथा गोलोकमें श्यामसुन्दर भगवान्
श्रीकृष्णके परात्पर स्वरूपका निरूपण....... २५
३- श्रीकृष्णसे सृष्टिका आरम्भ, नारायण, महादेव,
ब्रह्मा, धर्म, सरस्वती, महालक्ष्मी और प्रकृति
(दुर्गा)-का प्रादुर्भाव तथा इन सबके द्वारा
पृथक्-पृथक् श्रीकृष्णका स्तवन.................... २७
४- सावित्री, कामदेव, रति, अग्नि, अग्निदेव, जल,
वरुणदेव, स्वाहा, वारुणी, वायुदेव,
वायवीदेवी तथा मेदिनीके प्राकट्यका वर्णन ..... ३२
५- ब्राह्म आदि कल्पोंका परिचय, गोलोकमें
श्रीकृष्णका नारायण आदिके साथ रासमण्डलमें
निवास, श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे श्रीराधाका
प्रादुर्भाव, राधाके रोमकूपोंसे गोपाङ्गनाओंका
प्राकट्य तथा श्रीकृष्णसे गोपों, गौओं, बलीवदों,
हंसों, श्वेत घोड़ों और सिंहोंकी उत्पत्ति;
श्रीकृष्णद्वारा पाँच रथोंका निर्माण तथा
पार्षदोंका प्राकट्य; भैरव, ईशान और डाकिनी
आदिकी उत्पत्ति....................................... ३३
६- श्रीकृष्णका नारायण आदिको लक्ष्मी आदिका
पत्नीरूपमें दान, महादेवजीका दार-संयोगमें
अरुचि प्रकट करके निरन्तर भजनके लिये
वर माँगना तथा भगवान्का उन्हें वर देते
हुए उनके नाम आदिकी महिमा बताकर
उन्हें भविष्यमें शिवासे विवाहकी आज्ञा
देना तथा शिवा आदिको मन्त्रादिका
उपदेश करना........................................ ३७
७- सृष्टिका क्रम- ब्रह्माजीके द्वारा मेदिनी, पर्वत,
समुद्र, द्वीप, मर्यादापर्वत, पाताल, स्वर्ग
आदिका निर्माण; कृत्रिम जगत्की अनित्यता
विषय पृष्ठ-संख्या
तथा वैकुण्ठ, शिवलोक तथा गोलोककी
नित्यताका प्रतिपादन.................................... ४१
८- सावित्रीसे वेद आदिकी सृष्टि, ब्रह्माजीसे
सनकादिकी, सस्त्रीक स्वायम्भुव मनुकी,
रुद्रोंकी, पुलस्त्यादि मुनियोंकी तथा नारदकी
उत्पत्ति, नारदको ब्रह्माका और ब्रह्माजीको
नारदका शाप............................................ ४२
९- मरीचि आदि ब्रह्मकुमारों तथा दक्षकन्याओंकी
संततिका वर्णन, दक्षके शापसे पीड़ित
चन्द्रमाका भगवान् शिवकी शरणमें जाना,
अपनी कन्याओंके अनुरोधपर दक्षका
चन्द्रमाको लौटा लानेके लिये जाना,
शिवकी शरणागतवत्सलता तथा विष्णुकी
कृपासे दक्षको चन्द्रमाकी प्राप्ति .................... ४६
१०-जाति और सम्बन्धका निर्णय ......................... ४९
११- सूर्यके अनुरोधसे सुतपाका अश्विनीकुमारोंको
शापमुक्त करना तथा संध्यानिरत वैष्णव
ब्राह्मणकी प्रशंसा ........................................ ५१
१२- ब्रह्माजीकी अपूज्यतका कारण, गन्धर्वराजकी
तपस्यासे संतुष्ट हुए भगवान् शंकरका उन्हें
अभीष्ट वर देना तथा नारदजीका उनके
पुत्ररूपसे उत्पन्न हो उपबर्हण नामसे प्रसिद्ध
होना ........................................................ ५२
१३- ब्रह्माजीके शापसे उपबर्हणका योगधारणा-
द्वारा अपने शरीरको त्याग देना, मालावतीका
विलाप एवं प्रार्थना करना, देवताओंको शाप
देनेके लिये उद्यत होना, आकाशवाणीद्वारा
भगवान्का आश्वासन पाकर देवताओंका
कौशिकीके तटपर मालावतीके दर्शन करना ... ५५
१४- ब्राह्मण-बालकरूपधारी विष्णुका मालावतीके
साथ संवाद, ब्राह्मणके पूछनेपर मालावतीका
अपने दुःख और इच्छाको व्यक्त करना तथा
ब्राह्मणका कर्मफलके विवेचनपूर्वक विभिन्न
देवताओंकी आराधनासे प्राप्त होनेवाले
फलका वर्णन करना, श्रीकृष्ण एवं उनके
भजनकी महिमा बताना ............................. ५८

( ५ )

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
१५- ब्राह्मणद्वारा अपनी शक्तिका परिचय, मृतकको जीवित करनेका आश्वासन, मालावतीका पतिके महत्त्वको बताना और काल, यम, मृत्युकन्या आदिको ब्राह्मणद्वारा बुलवाकर उनसे बात करना, यम आदिका अपनेको ईश्वरकी आज्ञाका पालक बताना और उसे ‘श्रीकृष्णचिन्तन’के लिये प्रेरित करना ........६१नारदका पिताकी आज्ञा ले शिवलोकको जाना................................................८९
१६- मालावतीके पूछनेपर ब्राह्मणद्वारा वैद्यक-संहिताका वर्णन, आयुर्वेदकी आचार्यपरम्परा, उसके सोलह प्रमुख विद्वानों तथा उनके द्वारा रचित तन्त्रोंका नाम-निर्देश, ज्वर आदि चौंसठ रोग, उनके हेतुभूत वात, पित्त, कफकी उत्पत्तिके कारण और उनके निवारणके उपायोंका विवेचन ................६३२४- नारदजीको भगवान् शिवका दर्शन, शिवद्वारा नारदजीका सत्कार तथा उनकी मनोवाञ्छापूर्तिके लिये आश्वासन ............९१
१७- ब्राह्मण-बालकके साथ क्रमशः ब्रह्मा, महादेवजी तथा धर्मकी बातचीत, देवताओं-द्वारा श्रीविष्णुकी तथा ब्राह्मणद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी उत्कृष्ट महत्ताका प्रतिपादन ........६८२५- ब्राह्मणोंके आह्निक आचार तथा भगवान्‌के पूजनकी विधिका वर्णन.........................९२
१८- ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा उपबर्हणको जीवित करनेकी चेष्टा, मालावतीद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन, शक्तिसहित भगवान्‌का गन्धर्वके शरीरमें प्रवेश तथा गन्धर्वका जी उठना, मालावतीद्वारा दान एवं मङ्गलाचार तथा पूर्वोक्त स्तोत्रके पाठकी महिमा .........७२२६- ब्राह्मणोंके लिये भक्ष्याभक्ष्य तथा कर्तव्या-कर्तव्यका निरूपण ............................९७
१९- ब्रह्माण्डपावन नामक कृष्णकवच, संसारपावन नामक शिवकवच और शिवस्तवराजका वर्णन तथा इन सबकी महिमा ................७५२७- परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका निरूपण .......९९
२०- गोपपत्नी कलावतीके गर्भसे एक शिशुके रूपमें उपबर्हणका जन्म, शूद्रयोनिमें उत्पन्न बालक नारदकी जीवनचर्या, नामकी व्युत्पत्ति, उसके द्वारा संतोंकी सेवा, सनत्कुमारद्वारा उसे उपदेशकी प्राप्ति, उसके द्वारा श्रीहरिके स्वरूपका ध्यान, आकाशवाणी तथा उस बालकके देह-त्यागका वर्णन ................८१२८- बदरिकाश्रममें नारायणके प्रति नारदजीका प्रश्न ..............................................१०२
२१- ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति ...........८५२९- नारायणके द्वारा परमपुरुष परमात्मा श्रीकृष्ण तथा प्रकृतिदेवीकी महिमाका प्रतिपादन .......................................१०३
२२- ब्रह्माजीसे सृष्टिके लिये दारपरिग्रहकी प्रेरणा पाकर डरे हुए नारदका स्त्री-संग्रहके दोष बताकर तपके लिये जानेकी आज्ञा माँगना ....................................८८( प्रकृतिखण्ड )<br><br>१- पञ्चदेवीरूपा प्रकृतिका तथा उनके अंश, कला एवं कलांशका विशद वर्णन ...........१०५
२३- ब्रह्माजीका नारदको गृहस्थधर्मका महत्त्व बताते हुए विवाहके लिये राजी करना और२- परब्रह्म श्रीकृष्ण और श्रीराधासे प्रकट चिन्मय देवी और देवताओंके चरित्र ........११२
३- परिपूर्णतम श्रीकृष्ण और चिन्मयी श्रीराधासे प्रकट विराट्स्वरूप बालकका वर्णन ........११७
४- सरस्वतीकी पूजाका विधान तथा कवच ......१२१
५- याज्ञवल्क्यद्वारा भगवती सरस्वतीकी स्तुति .....१२६
६- विष्णुपत्नी लक्ष्मी, सरस्वती एवं गङ्गाका परस्पर शापवश भारतवर्षमें पधारना .........१२९
७- कलियुगके भावी चरित्रका, कालमानका तथा गोलोककी श्रीकृष्ण-लीलाका वर्णन ......१३४
८- पृथिवीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, ध्यान और पूजनका प्रकार तथा स्तुति एवं पृथिवीके प्रति शास्त्रविपरीत व्यवहार करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन ...................................१३८
९- गङ्गाकी उत्पत्तिका विस्तृत प्रसङ्ग ............१४२
१०- श्रीराधाजीका गङ्गापर रोष, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, श्रीराधाके भयसे गङ्गाका श्रीकृष्णके चरणोंमें छिप जाना, जलाभावसे पीड़ित देवताओंका गोलोकमें जाना, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गङ्गाका प्रकट होना, देवताओंके प्रति श्रीकृष्णका आदेश तथा गङ्गाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसङ्ग .......................१४९