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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 6

॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
( ब्रह्मखण्ड )
१- मङ्गलाचरण, नैमिषारण्यमें आये हुए सौतिसे
शौनकके प्रश्न तथा सौतिद्वारा ब्रह्मवैवर्तपुराणका
परिचय देते हुए इसके महत्त्वका निरूपण...... २१
२- परमात्माके महान् उज्ज्वल तेजःपुञ्ज, गोलोक,
वैकुण्ठलोक और शिवलोककी स्थितिका
वर्णन तथा गोलोकमें श्यामसुन्दर भगवान्
श्रीकृष्णके परात्पर स्वरूपका निरूपण....... २५
३- श्रीकृष्णसे सृष्टिका आरम्भ, नारायण, महादेव,
ब्रह्मा, धर्म, सरस्वती, महालक्ष्मी और प्रकृति
(दुर्गा)-का प्रादुर्भाव तथा इन सबके द्वारा
पृथक्-पृथक् श्रीकृष्णका स्तवन.................... २७
४- सावित्री, कामदेव, रति, अग्नि, अग्निदेव, जल,
वरुणदेव, स्वाहा, वारुणी, वायुदेव,
वायवीदेवी तथा मेदिनीके प्राकट्यका वर्णन ..... ३२
५- ब्राह्म आदि कल्पोंका परिचय, गोलोकमें
श्रीकृष्णका नारायण आदिके साथ रासमण्डलमें
निवास, श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे श्रीराधाका
प्रादुर्भाव, राधाके रोमकूपोंसे गोपाङ्गनाओंका
प्राकट्य तथा श्रीकृष्णसे गोपों, गौओं, बलीवदों,
हंसों, श्वेत घोड़ों और सिंहोंकी उत्पत्ति;
श्रीकृष्णद्वारा पाँच रथोंका निर्माण तथा
पार्षदोंका प्राकट्य; भैरव, ईशान और डाकिनी
आदिकी उत्पत्ति....................................... ३३
६- श्रीकृष्णका नारायण आदिको लक्ष्मी आदिका
पत्नीरूपमें दान, महादेवजीका दार-संयोगमें
अरुचि प्रकट करके निरन्तर भजनके लिये
वर माँगना तथा भगवान्का उन्हें वर देते
हुए उनके नाम आदिकी महिमा बताकर
उन्हें भविष्यमें शिवासे विवाहकी आज्ञा
देना तथा शिवा आदिको मन्त्रादिका
उपदेश करना........................................ ३७
७- सृष्टिका क्रम- ब्रह्माजीके द्वारा मेदिनी, पर्वत,
समुद्र, द्वीप, मर्यादापर्वत, पाताल, स्वर्ग
आदिका निर्माण; कृत्रिम जगत्की अनित्यता
विषय पृष्ठ-संख्या
तथा वैकुण्ठ, शिवलोक तथा गोलोककी
नित्यताका प्रतिपादन.................................... ४१
८- सावित्रीसे वेद आदिकी सृष्टि, ब्रह्माजीसे
सनकादिकी, सस्त्रीक स्वायम्भुव मनुकी,
रुद्रोंकी, पुलस्त्यादि मुनियोंकी तथा नारदकी
उत्पत्ति, नारदको ब्रह्माका और ब्रह्माजीको
नारदका शाप............................................ ४२
९- मरीचि आदि ब्रह्मकुमारों तथा दक्षकन्याओंकी
संततिका वर्णन, दक्षके शापसे पीड़ित
चन्द्रमाका भगवान् शिवकी शरणमें जाना,
अपनी कन्याओंके अनुरोधपर दक्षका
चन्द्रमाको लौटा लानेके लिये जाना,
शिवकी शरणागतवत्सलता तथा विष्णुकी
कृपासे दक्षको चन्द्रमाकी प्राप्ति .................... ४६
१०-जाति और सम्बन्धका निर्णय ......................... ४९
११- सूर्यके अनुरोधसे सुतपाका अश्विनीकुमारोंको
शापमुक्त करना तथा संध्यानिरत वैष्णव
ब्राह्मणकी प्रशंसा ........................................ ५१
१२- ब्रह्माजीकी अपूज्यतका कारण, गन्धर्वराजकी
तपस्यासे संतुष्ट हुए भगवान् शंकरका उन्हें
अभीष्ट वर देना तथा नारदजीका उनके
पुत्ररूपसे उत्पन्न हो उपबर्हण नामसे प्रसिद्ध
होना ........................................................ ५२
१३- ब्रह्माजीके शापसे उपबर्हणका योगधारणा-
द्वारा अपने शरीरको त्याग देना, मालावतीका
विलाप एवं प्रार्थना करना, देवताओंको शाप
देनेके लिये उद्यत होना, आकाशवाणीद्वारा
भगवान्का आश्वासन पाकर देवताओंका
कौशिकीके तटपर मालावतीके दर्शन करना ... ५५
१४- ब्राह्मण-बालकरूपधारी विष्णुका मालावतीके
साथ संवाद, ब्राह्मणके पूछनेपर मालावतीका
अपने दुःख और इच्छाको व्यक्त करना तथा
ब्राह्मणका कर्मफलके विवेचनपूर्वक विभिन्न
देवताओंकी आराधनासे प्राप्त होनेवाले
फलका वर्णन करना, श्रीकृष्ण एवं उनके
भजनकी महिमा बताना ............................. ५८