चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३६
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३६
क्वाथ या इनके चूर्ण को वासा के क्वाथ मे शहद डालकर पीवे । ( ४ ) बोडे की
लोद के रस मे पुण्डरीक काष्ठ और मधु तथा मुलहठी मिलाकर देना चाहिये ।
( ५ ) गोबर के रस मे जवासा और भागरे की जड का चूर्ण मिलाकर चावलों
के धोवन के साथ पीवे । ( ६ ) खैर, प्रियंगु, कचनार और सिम्बल के फूलो
के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर चाटे, यह रक्तपित्त नाशक है । ( ७ )
सिंघाडा, खील, मौथा, खजूर और कमल का केशर इनको मधु के साथ चाटे ।
( ८ ) जागल पशु पक्षियों के रक्त का शहद के साथ मिलाकर पीवे । यदि
रक्त जमा हुआ (घट्ट) हो तो पारावत (कबूतर) की वीट को शहद
के साथ चाटे ॥ ६२-७२ ॥
उशीर-कालीय क-लोध्र-पद्मक-प्रियङ्गुका-कट्फल शङ्ख-गैरिकाः ।
पृथक्पृथक् चन्दनतुल्यभागिकाः सशर्करास्तण्डुलधावनाप्लुताः ॥७३॥
रक्तं सपित्तं तमकं पिपासां दाहं च पीताः शमयन्ति सद्यः ।
किराततिक्तं क्रमुकं समुस्तं प्रपुण्डरीकं कमलोत्पले च ॥ ७४॥
ह्रीवेरमूलानि पटोलपत्रं दुरालभा पर्पटको मृणालम् ।
धनञ्जयोदुम्बर-वेतसत्वङ्-न्यग्रोध-शालेय-यवासक-त्वक् ॥ ७५ ॥
तुगालतावेतसतण्डुलीयँ ससारिवं मोचरसः समङ्गा ।
पृथक् पृथक् चन्दनयोजितानि तेनैव कल्पेन हितानि तत्र ॥ ७६ ॥
निशि स्थिता वा स्वरसीकृता वा कल्कीकृता वा मृदिता शृता वा ।
एते समस्ता गणाः पृथग्वा रक्तं सपित्तं शमयन्ति योगाः ॥ ७७ ॥
( ६ ) खस, कालीयक (पीत काष्ठ), पठानी लोध, पद्माख, प्रियंगु,
कायफल, शंख और शोधित स्वर्ण गेरू इनको पृथक् पृथक् चन्दन के समान
मिलाकर खाड के समपरिमाण मे चावलों के धोवन के साथ देवे ।
( १० ) प्रत्येक वस्तु के समान भाग चन्दन मिला कर दोनों के बराबर
खाड मिलाकर इनको चावलों के धोवन के साथ देवे । इससे रक्तपित्त, तमक
श्वास, प्यास, दाह शीघ्र शान्त होते है ।
( ११ ) पुण्डरीक, कमल (श्वेत), नीला कमल, हीवेर (गन्धवाला)
इनके मूल, परवल के पत्ते, दुरालभा, पित्तपापडा, मृणाल (बिसनाल),
धनञ्जय (अर्जुन), गूलर, वेतस इनकी छाल, न्यग्रोध (बरगद), शालेय
(चावलो का भेद या जामुन), बासे की छाल, तुगा (वशलोचन), लता
(श्यामलता या प्रियंगु), नागकेशर, तण्डुलीय (चावल), सारिवा (अनन्त
मूल), मोचरस, समगा (लाजवन्ती) इनको पृथक् पृथक् लेकर, चन्दन के
३४० चरकसंहिता [ अ० ४
साथ मिलाकर, खाड का योग देकर चावलो के बावन के साथ दे । इन औष-
वियो को पृथक् पृथक् या सम्मिलित रूप मे मिलाकर शीत कषाय, क्वाथ,
चूर्ण, फाण्ट, स्वरस के रूप मे प्रयोग करे, ये योग रक्तपित्त का शमन
करते है ॥ ७३-७७ ॥
मुद्गाः सलाजाः सयवाः सकृष्णाः सोशीरमुस्ताः सह चन्दनेन ।
बलाजले पर्युषितः कषायो रक्त सपित्त शमयत्युदीर्णः ॥ ७८ ॥
वैडूर्यमुक्तामणिगैरिकाणा मृच्छङ्खहेमामलकोदकानाम् ।
मधूदकस्येक्षुरसस्य चैव पानाच्छम गच्छति रक्तपित्तम् ॥ ७९ ॥
उशीरपद्मोत्पलचन्दनाना पङ्कस्य लोष्ट्रस्य च यः प्रसादः ।
सशर्करः क्षौद्रयुतः सुशीतो रक्तातिर्यागप्रशमाय देयः ॥ ८० ॥
प्रियङ्गुकाचन्दनलोध्रसारिवामधूकमुस्ताभयधातकीजलम् ।
समृत्प्रसाद सह षष्टिकाम्बुना सशर्कर रक्तनिबर्हण परम् ॥ ८१ ॥
( १२ ) मूग, लाजा ( खील ), जौ, पिप्पली, खस, मोथा और चन्दन
इनको रात भर बला क्वाथ मे भिगो कर प्रात. पीना चाहिये । यह तीव्र रक्तपित्त
का शान्त करता है । बला-क्वाथ षडगपानीय विधि से बनाये । ( १३ ) वैडूर्य
( लहसनिया ), मोती, मणि, स्वर्ण गैरिक, मिट्टी सोरठी, शङ्ख, हेम (नागकेसर),
आवला, गन्धबाला इनके चूर्ण को पानी के साथ ( इसमे घोल कर ) लेना
चाहिये । अथवा शहद के शरबत को या गन्ने के रस को पीने से रक्तपित्त शान्त
होता है । (१४) खस, कमल, नील कमल, लाल चन्दन इनको कूट कर रात मे
पानी मे भिगो दे । प्रात. नितार कर इसमे शक्कर और मधु मिला कर दे,
इसी प्रकार पके हुए मिट्टी के ढेले को तोड कर पानी मे घोल दे । इस पानी
को भी मधु और शर्करा के साथ दे यह याग अति रक्त-स्राव मे उपयोगी है ।
[ कही २ 'लोध्र' भी पाठ है । परन्तु अष्टाग-सग्रह मे सुनी हुई मिट्टी का पाठ
है ] । (१५) प्रियगु, चन्दन, लोध, अनन्तमूल, महुआ, माथा, हरड़ और धाय
के फूल इनके जल को पकी हुई मिट्टी के जल के साथ मिला कर साठी चावलो
के साथ खाड डाल कर पिलावे, यह रक्तपित्त का नष्ट करता है ॥ ७८-८१ ॥
कषाययोगैर्विविधैर्यथोक्तैर्दीप्तेऽनले श्लेष्मणि निर्जिते च ।
यद्रक्तपित्तं प्रशमं न याति तत्रानिलः स्यादनु तत्र कार्यम् ॥ ८२ ॥
छाग पयः स्यात्प्रथम प्रयोगे गव्य शृतं पञ्चगुणे जले वा ।
सशर्करं माक्षिकसंप्रयुक्त विदारिगन्धादिगणैः शृतं वा ॥ ८३ ॥
द्राक्षाशृतं नागरकैः शृतं वा बलाथृतं गोक्षुरकैः शृत वा ।
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४१
सजीवक सर्षभक ससर्पिः पयः प्रयोज्यं सितया शृतं वा ॥ ८४ ॥
शतावरीगोक्षुरकैः शृतं वा शृत पयो वाऽप्यथ पर्णिनीभिः ।
रक्तं हिनस्त्याशु विशेषतस्तु यन्मूत्रमार्गात्सरुजं प्रयाति ॥ ८५ ॥
विशेषतो विट्पथसंग्रवृत्ते पयो हितं मोचरसेन सिद्धम् ।
वटावरोहैर्वटशुङ्गकैर्वा ह्रीवेरनीलोत्पलनागरैर्वा ॥ ८६ ॥
कषाययोगान्वयसा पुरा वा पीत्वा तु चाद्यात्पयसैव शालीन् ।
कषाययोगैरथवा विपक्वमेतैः पिबेत्सपिरतिस्रुते च१ ॥ ८७ ॥
उपरोक्त इन कषाय योगों से अग्नि के दीप्त होने पर और कफ के क्षीण
हो जाने पर भी जो रक्तपित्त शान्त नहीं होता, उसमें वायु की प्रबलता समझें ।
इसके लिये—( १६ ) प्रथम बकरी का दूध दे अथवा गाय के दूध को पाच
गुणे पानी मे पका कर अथवा स्वल्प पञ्चमूल ( विदारी गन्वादि गण ) से
साधित गाय का दूध शर्करा ओर मधु के साथ दे । ( १७ ) द्राक्षा, सोंठ, बला-
मूल और गोखरू इन मे से किसी एक से सिद्ध गाय के दूध का अथवा जीवक,
ऋषभक और घी इनका उबाले दूध मे प्रक्षेप डाल कर मधु मिला कर दे ।
( १८ ) शतावरी और गोखरू से साधित या मुद्गपर्णी, माषपर्णी, पृश्नि-
पर्णी और शालपर्णी इन चारों से सावित दूध को देने से रक्तपित्त नष्ट होता
है, खास कर मूत्र मार्ग से पीडा के साथ बहने वाला रक्तपित्त नष्ट होता है ।
(१६) गुदा मार्ग से बहने वाले रक्त के लिये—मोचरस द्वारा सिद्ध दूध देवे ।
( २० ) या बरगद अङ्कुर या वटजटा से अथवा गन्धबाला, नीला कमल और
सोंठ से सिद्ध दूध देना चाहिये । ( २१ ) पहिले कहे वासक आदि कषायों
को दूध के साथ पीकर पीछे से दूध चावल खावे । ( २२ ) अथवा इन क्वाथों
से घृत सिद्ध करके रक्त स्राव मे पीवे ॥ ८२-८७ ॥
वासा सशाखा सपलाशमूला कृत्वा कषायं कुसुमानि चास्य ।
प्रदाय कल्क विपचेद् घृत तत्सक्षौद्रमाश्वेव निहन्ति रक्तम् ॥ ८८ ॥
इति वासाघृतम् ।
पलाशवृन्तस्य रसेन सिद्धं तस्यैव कल्केन मधुद्रवं हि ।
लिह्याद् घृत वत्सककल्कसिद्ध तद्वत्समङ्गोत्पललोध्रसिद्धम् ॥ ८९ ॥
स्यात् त्रायमाणाविविरेष एव सोदुम्बरे चैव पटोलपत्रे ।
सर्पींषि पित्तज्वरनाशनानि सर्वाणि शस्तानि च रक्तपित्ते ॥ ९० ॥
घृतपाक—( १ ) वासा घृत—शाखा, मूल, फल और पत्तो समेत वासा
१ 'रतिस्रवेच्च' इति च पाठ ।
३४० चरकसंहिता [अ० ४
को लेकर उसका क्वाथ करे । इस क्वाथ मे इसी के फल का कल्क मिला कर
घृत पकावे । इस घृत को शहद के साथ मिला कर खाने से रक्तपित्त अच्छा
होता है । [कही २ 'सपलाशमूल' पाठ है । पाकविधि-गोधृत २ प्रस्थ, वासा
के क्वाथ भाग ४ प्रस्थ, पानी ३२ प्रस्थ, शेष ४ प्रस्थ, कल्क (वासा के फूल
का ) ४ पल यथाविधि पाक करना चाहिये । इसमें कल्क का परिमाण एक ग्रन्थ
मे चार पल है । अष्टाग-सग्रह मे भी यह प्रयोग है । वहा पर टीकाकार ने चतु-
र्थाश या छठा भाग कल्क डालना लिखा है ।]
(२) ढाक के वृन्तो (आगे लगे पत्ते) के स्वरस मे इन्ही के कल्क के
साथ घृत पाक करे । इस सिद्ध घृत को चतुर्थांश मधु के साथ चाटे ।
(३) इन्द्रजौ या कुडे के कल्क से घी सिद्ध करके, अथवा समगा
(लाजवन्ती), नीला कमल, लोध इनसे सिद्ध घी का उपयोग करना चाहिये ।
इसी प्रकार त्रायमाणा के साथ, गूलर और परवल के पत्तो के साथ घृत को
पकाना चाहिये । ये घृत तथा पित्त ज्वर को नाश करने वाले घृत रक्तपित्त
मे उत्तम है ॥ ८८-६० ॥
अभ्यङ्गयोगाः परिषेचनानि सेकावगाहाः शयनानि वेश्म ।
शीतो विधिर्बस्तिविधानमग्र्यं पित्तज्वरे यत्प्रशमाय दृष्टम् ॥ ६१ ॥
तद्रक्तपित्ते निखिलेन कार्यं काल च मात्रा च पुरा समीक्ष्य ।
सर्पिर्गुडा ये च हिताः क्षतेभ्यस्ते रक्तपित्तं शमयन्ति सद्यः ॥ ६२ ॥
(१) पित्त ज्वर को नाश करने के लिये जो दाह ज्वरनाशक अभ्यग
प्रयोग, परिषेक, अवगाहन, शमन घर तथा शीत विधि और बस्ति विधि कही
है, इन सब को काल और मात्रा के अनुसार रक्तपित्त मे प्रयोग करे । उरःक्षत
अध्याय मे जो सर्पिर्गुड कहे है वे सब रक्तपित्त को तुरन्त अच्छा कर देते है ।
सर्पिर्गुड उर क्षत के रोगियो के लिये हितकर है ॥ ६१-६२ ॥
कफानुबन्धे रुधिरे सपित्ते कण्ठागमे स्याद् ग्रथिते प्रयोगः ।
युक्तस्य युक्त्या मधुसर्पिषोश्च क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य ॥ ६३ ॥
(२) रक्तपित्त मे यदि कफ का अनुबन्ध हो, ग्रथित होने के कारण रक्त
गले मे आकर रुक जाये तब कमलनाल के क्षार को मधु और घी के साथ मिला
कर युक्तिपूर्वक प्रयोग करे ॥ ६३ ॥
मृणालपद्मोत्पलकेशराणां तथा पलाशस्य तथा प्रियङ्गोः ।
तथा मधूकस्य तथाऽसनस्य क्षाराः प्रयोज्या विधिनेव तेन ॥ ६४ ॥
(३) इसी प्रकार से कमलनाल, कमल का केसर, नीलोत्पल का केसर
अ० ४] चिकित्सितस्थानम् ३४३
अ० ४] चिकित्सितस्थानम् ३४३
इनके क्षार को, ढाक को, प्रियंगु के क्षार को, महुए के क्षार को, असन के क्षार
को मधु और घी के साथ चटावे ॥ ६४ ॥
शतावरीदाडिमतिन्तिडीकं काकोलिमेदो मधुकं विदारीम् ।
पिष्ट्वा च मूलं फलपूरकस्य घृतं पचेत्क्षीरचतुर्गुणेन ॥ ६५ ॥
कासज्वरानाहविबन्धशूलं तद्रक्तपित्तं च घृतं निहन्यात् ।
(४) शतावरी घृत—शतावर, अनार, इमली, काकोली, मेदा,
मुलहठी, विदारीकन्द और बिजौरे की जड इनके कल्क के साथ चतुर्गुण दूध में
घृत का पाक करे । यह घृत कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध, शूल और रक्तपित्त
को नष्ट करता है ॥ ६५- ॥
यत्पञ्चमूलैरथ पञ्चभिर्वा सिद्धं घृतं तच्च तदर्थकारि ॥६६ ॥
इति शतमूलादिघृतम् ।
(५) रसायन अध्याय में कहे पाच पञ्चमूलो में सिद्ध किया हुआ घी भी
कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध ओर रक्तपित्त को नष्ट करता हे । इस घृत को
कषाय और कल्क दोनो मे सिद्ध करे ॥ ६६ ॥
कषाययोगा य इहोपदिष्टास्ते चावपीडे भिषजा प्रयोज्याः ।
(६) जिस समय दूषित दाप नाक से बहने वाले रक्त के साथ निकल
चुके तब रक्तस्राव को रोकने के लिये उपराक्त कषायो को कूट कर इनसे रस
निकाल कर नासिका मे डालना चाहिये । प्रारम्भ मे रक्त का बन्द करना
अच्छा नहीं ।
घ्राणात्प्रवृत्तं रुधिरं सपित्तं यदा भवेन्निःस्रुतदुष्टदोषम् ॥ ६७ ॥
रक्ते प्रदुष्टे ह्यवपीडबन्धे दुष्टप्रतिश्यायशिरोविकाराः ।
रक्तं सपूंयं कुणपञ्च गन्धः स्याद् घ्राणनाशः कृमयश्च दुष्टाः ॥६८॥
नीलोत्पलं गैरिकशङ्खयुक्तं सचन्दनं स्यात्तु सिताजलेन ।
नस्यं तथाऽऽम्रास्थिरसः समङ्गा मधातकीमोचरसः सलोध्रः॥६६॥
(७) अवपीडन द्वारा यदि आरम्भ में ही रक्तावराव हा जाय तो दूषित
दाष के अन्दर रुक जाने से दूषित प्रतिश्याय (पुरातन या दारुण) और शिरो-
राग उत्पन्न हा जाते हे, तथा पूय मिश्रित रक्त, मुर्दे की गन्ध (रक्त मे,
नासिका मे), गन्ध की अनभिज्ञता ओर दूषित कृमि उत्पन्न हा जाते है। इसी
प्रकार से आम की गुठली (गीली या पानी में कूट कर) का स्वरस या नीला
कमल, स्वर्ण गैरिक ओर शख भस्म, श्वेत चन्दन इनके कल्क को शरबत के
साथ पीस कर अवपीड़न करे । लाजवन्ती या मजीठ को धाय के फूल के साथ
अथवा मोचरस और लोध को जल से पीसकर अवपीडन करे ॥ ६७-६६ ॥
३४४ चरकसंहिता [ अ०४
द्राक्षारसस्येक्षुरसस्य नस्य क्षीरस्य दूर्वास्वरसस्य चैव ।
यवासमूलानि पलाण्डुमूलं नस्यं तथा दाडिमपुष्पतोयम् ॥१००॥
प्रियालतैल मधुकं पयश्च सिद्ध घृतं माहिषमाजकं वा ।
आम्रास्थि पूर्णैः पयसा च नस्य ससारिदैः स्यात्कमलोत्पलैश्च ॥१०१॥
निम्न वस्तुओ का नस्य देवे—( १ ) अगूर का रस, गन्ने का रस, दूध, दूब
का स्वरस, जवासे की जड का स्वरस, प्याज का रस और अनार के फूल के
रस को नंस्य के लिये देवे । ( २ ) पियाल के तैल को मलहठी के कल्क और
दूध के साथ सिद्ध करके उसका नस्य देवे । ( ३ ) अथवा पियाल के तैल या
मुलहठी को दूध के साथ पीस कर उसका नस्य देवे । ( ४ ) भैस या बकरी के
घी को आम की गुटली के साथ, लाजवन्ती और धाय के फूल के साथ, मोच-
रस और लोध के साथ, अगूर के रस, गन्ने के रस, दूब, दूब का स्वरस, जबसे
की जड़का रस, प्याज का रस या अनार के फूल के रस के साथ सिद्ध करके
देवे । ( ५ ) अथवा भैस या बकरी के घी को अनन्तमूल, कमल और नीलो-
त्पल के फूलो के कल्क से पका कर नस्य देवे । पकाने मे सब द्रव्य घृत के
समान, कल्क घी से चतुर्थांश लेवे ॥ १००-१०१ ॥
भद्रश्रियं लोहितचन्दनं च प्रपोण्डरीकं कमलोत्पले च ।
उशीरवानीरजलं मृणालं सहस्रवीर्या मधुक पयस्या ॥ १०२ ॥
शालीक्षमूलानि यवासगुन्द्रामूल नलाना कुशकाशयोश्च ।
कुचन्दनं शैवलमप्यनन्ता कालानुसार्या तृणमूलमृद्धिः ॥ १०३ ॥
मूलानि पुष्पाणि च वारिजाना प्रलेपनं पुष्करिणीमृदश्च ।
उदुम्बराश्वत्थमधूकलोध्राः कषायवृक्षाः शिशिराश्च सर्वे ॥१०४॥
प्रदेहकल्पे परिषेचने च तथाऽवगाहे घृततैलसिद्धौ ।
रक्तस्य पित्तस्य च शान्तिमिच्छन् भद्रश्रियादीनि भिषक्प्रयुञ्ज्यात् ॥१०५॥
भद्रश्रिया ( श्वेत चन्दन ), लाल चन्दन, पोण्डरीक, श्वेत कमल, नीला
कमल, खस, बानीर ( जलवेतस ), जल ( गन्धवाला ), मृणाल ( कमल नाल )
सहस्रवीर्या (दूर्वा ), मुलहठी, क्षीरकाकोळी, शालि मूल, गन्ने की जड, जवासे
की जड, गुन्द्रा ( तृणविशेष ) की जड़, नड़ सर, कुश, कास की जड़े,
कुचन्दन ( लाल चन्दन ), सरवाल, सारिवा, कालानुसारी ( तगर ), गन्धतृण
की जड़, ऋद्धि, कमलों की जड और पुष्प, और पोखर ( तालाब ) की मिट्टी
का लेप, गूलर, पीपल, महुआ, लोध तथा कषाय रस वाले और शीतक वृक्ष ये
सब रक्तपित्त की शान्ति के लिये प्रदेह, परिषेचन, अवगाहन, घी, तैल पाक मे
प्रयोग करने चाहिये । इनसे घी आदि सिद्ध करके रक्तपित्त मे बरते ॥१०५॥
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४५
धारागृह भूमिगृहं च शीत वनं च रम्यं जलवातशीतम् ।
वैदूर्यमुक्तामणिभाजनाना स्पर्शाश्च दाहे शिशिराम्बुशीताः ॥१०६॥
दाह की शान्ति के लिये—धारागृह (फव्वार वाले घर), भूमिगृह
(तहखाने), जल और वायु से शीतल सुन्दर वन, लहसुनिया, मोती, मणि
आदि से बने तथा शीतल पानी से ठण्डे किये बर्तनों का स्पर्श करना चाहिये
इन पात्रा मे बर्फ का पानी या चन्दनोदक भर कर स्पर्श करे ॥ १०६ ॥
पत्राणि पुष्पाणि च वारिजाना क्षौम च शीत कदलीदलं च ।
प्रच्छादनार्थं शयनासनाना पद्मोत्पलाना च दलाः प्रशस्ताः ॥१०७॥
बिस्तर और आसन पर बिछाने के लिये जल म उत्पन्न कमल आदि के
पत्ते या फूल, शीतल क्षौम वस्त्र, केले के पत्ते, कमल या नीले कमल के पत्ते
बिछा कर उन पर सोवे ॥ १०७ ॥
प्रियङ्गुकाचन्दनरूपिताना स्पर्शा. प्रियाण च वराङ्गनानाम् ।
दाहे प्रशस्ताः सजलाः सुशीताः पद्मोत्पलाना च कलापवाताः ॥१०८॥
दाह मे प्रियगु, श्वेतचन्दन मे लिप्त अगो वाली प्रिय वारागनाओ (स्त्रियों)
का स्पर्श, कमल, नीले कमल का स्पर्श अथवा इनका और मोर के पखो से बने
पखों को शीतल पानी से भिगो कर हिलाना उत्तम है ॥ १०८ ॥
सरिद्ध्रदाना हिमवद्गरीणा चन्द्रोद्याना कमलाकराणाम् ।
मनोऽनुकूलाः शिशिराश्च सर्वाः कथाः सरक्त शमयन्ति पित्तम् ॥१०६॥
नदिया, तालाव, पर्वता की गुफाये, चन्द्रमा की किरणे, तालाबो का सेवन,
मन के अनुकूल शान्ति देने वाली सब कथाये रक्तपित्त को शान्त करती है॥१०६॥
तत्र श्लोकौ—हेतुं वृद्धि संज्ञा स्थानं लिङ्ग पृथक् प्रदुष्टस्य ।
मार्गौ साध्यमसाध्य याप्यं कार्यक्रम चैव ॥ ११० ॥
पानान्नमिष्टमेव च वर्ज्यं संशोधनं च शमनं च ।
गुरुरुक्तवान् यथावच्चिकित्सिते रक्तपित्तस्य ॥ १११ ॥
रक्तपित्त रोग के कारण, वृद्धि, सज्ञा, स्थान, लक्षण (पृथक् पृथक् ),
दानो मार्ग, साध्यता असाव्यता, याप्य, चिकित्सा क्रम, हितकर खान-पान,
त्याज्य पदार्थ, सशाधन, सशमन ये सब भगवान् आत्रेय ने इस रक्तपित्त
चिकित्सा मे कह दिये है ॥ ११०-१११ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
रक्तपित्तचिकित्सित नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अब हम गुल्म की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
३४६ चरकसंहिता [ अ० ५
पञ्चमोऽध्यायः
अथातो गुल्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम गुल्म की चिकित्सा का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सर्वप्रजानां पितृवच्छरण्यः पुनर्वसुर्भूतभविष्यदीशः ।
चिकित्सितं गुल्मनिबर्हणार्थं प्रोवाच सिद्धं वदतां वरिष्ठः ॥ ३ ॥
विट्श्लेष्मपित्तातिपरिस्रवाद्वा तैरैव वृद्धैरतिपीडनाद्वा ।
वेगैरुदीर्णैर्विहितैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ॥ ४ ॥
रूक्षान्नपानैरतिरोचितैर्वा शोकेन मिथ्याप्रतिकर्मणा वा ।
विचेष्टितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोपं समुपैति वायुः ॥ ५ ॥
कफं च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धूय मार्गान्विनिबद्ध्य ताभ्याम् ।
हृन्नाभिपार्श्वोदरबस्तिशूलं करोत्यधो याति न बद्धमार्गः ॥ ६ ॥
सब प्राणियों के लिये पिता के समान मंगलकारी भूत और भविष्य के
स्वामी, वाग्मियों में श्रेष्ठ, पुनर्वसु ने गुल्म के नाश के लिये खूब सुपरीक्षित
चिकित्सा का उपदेश किया ।
कोष्ठ मे वायु के कुपित होने के कारण—( १ ) पुरीष, कफ और पित्त
इनके अतिस्राव से, अथवा ( २ ) इनके अधिक बढ़कर रुकावट पैदा करने
से, ( ३ ) मलमूत्र के उपस्थित वेगों को रोकने से, ( ४ ) चोट लगने से,
( ५ ) अति दबाव पड़ने से, ( ६ ) रूक्ष, खान-पान के अति सेवन से, ( ७ )
शोक से, ( ८ ) वमन-विरेचन के मिथ्याचरण से और ( ९ ) विषम चेष्टाओ
से कोष्ठ में वायु प्रकुपित हो जाता है। यह कुपित वायु कफ और पित्त को
दूषित और अपने स्थान से विचलित करके मागों को रोक लेता है। इससे
हृदय, नाभि, पार्श्व, उदर तथा बस्ति में शूल उत्पन्न होता है। मार्ग के रुकने
से वायु नीचे गुदा की ओर नही जा सकता ॥ ३-६ ॥
पक्वाशये पित्तकफाशये वा स्थितः स्वतन्त्रः परसंश्रयो वा ।
स्पर्शोपलभ्यः परिपिण्डितत्वाद् गुल्मो यथादोषमुपैति नाम ॥ ७ ॥
पक्वाशय में, पित्ताशय में, कफाशय में स्वतन्त्र या परतन्त्र रूप से जब वायु
स्पर्श से जानने योग्य पिण्डाकार रूप मे हो जाता है तब दोषानुसार इसके
वात-गुल्म आदि नाम होते हैं।
३४६ चरकसंहिता [ अ० ५
पञ्चमोऽध्यायः
❖❖❖
अथातो गुल्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'गुल्म की चिकित्सा' का उपदेश करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सर्वप्रजानां पितृवच्छरण्यः पुनर्वसुर्भूतभविष्यदीक्षः ।
चिकित्सितं गुल्मनिबर्हणार्थं प्रोवाच सिद्धं वदतां वरिष्ठः ॥ ३ ॥
विट्श्लेष्मपित्तातिपरिस्रवाद्वा तैरैव वृद्धैरतिपीडनाद्वा ।
वेगैरुदीर्णैर्विहतैरधो वा बाह्याभिघातैरतिपीडनैर्वा ॥ ४ ॥
रूक्षान्नपानैरतिसेवितैर्वा शोकेन मिथ्याप्रतिकर्मणा वा ।
विचेष्टितैर्वा विषमातिमात्रैः कोष्ठे प्रकोपं समुपैति वायुः ॥ ५ ॥
कफं च पित्तं च स दूषयित्वा प्रोद्धूय मार्गान्विनिबद्धय ताभ्याम् ।
हृन्नाभिपार्श्वोदरबस्तिशूलं करोत्यधो याति न बद्धमार्गः ॥ ६ ॥
सब प्राणियों के लिये पिता के समान मगलकारी, भूत और भविष्य के
स्वामी, वाग्मियों में श्रेष्ठ, पुनर्वसु ने गुल्म के नाश के लिये खूब सुपरिक्षित
चिकित्सा का उपदेश किया ।
कोष्ठ में वायु के कुपित होने के कारण—( १ ) पुरीष, कफ और पित्त
इनके अतिस्राव से, अथवा ( २ ) इनके अधिक बढ़कर रुकावट पैदा करने
से, ( ३ ) मल-मूत्र के उपस्थित वेगा का रोकने से, ( ४ ) चोट लगने से,
( ५ ) अति दबाव पड़ने से, ( ६ ) रूक्ष, खान-पान के अति सेवन से, ( ७ )
शोक से, ( ८ ) वमन-विरेचन के मिथ्याचरण से ओर ( ६ ) विषम चेष्टाओ
से कोष्ठ में वायु प्रकुपित हा जाता है । यह कुपित वायु कफ ओर पित्त को
दूषित और अपने स्थान से विचलित करके मार्गों को रोक लेता है । इससे
हृदय, नाभि, पार्श्व, उदर तथा बस्ति में शूल उत्पन्न होता है । मार्ग के रुकने
से वायु नीचे गुदा की ओर नही जा सकता ॥ ३-६ ॥
पक्वाशये पित्तकफाशये वा स्थितः स्वतन्त्रः परसंश्रयो वा ।
स्पर्शोपलभ्यः परिपिण्डितत्वाद् गुल्मो यथादोषमुपैति नाम ॥ ७ ॥
पक्वाशय में, पित्ताशय में, कफाशय में स्वतन्त्र या परतन्त्र रूप से जब वायु
स्पर्श से जानने योग्य पिण्डाकार रूप में हो जाता है तब दोषानुसार इसके
वात-गुल्म आदि नाम होते हैं।
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३४७
मे परतन्त्र रहता है। यही वायु जब पित्ताशय मे पित्ताश्रित होकर रहे तब
पित्त-गुल्म होता है। पक्वाशय मे स्वतन्त्र रूप से रहने पर वात-गुल्म, कफाशय
मे कफ के आश्रित रहने पर कफ-गुल्म होता है ] ॥ ७ ॥
बस्तौ हि नाभ्या हृदि पार्श्वयोर्वा स्थानानि गुल्मस्य भवन्ति पञ्च ।
पञ्चात्मकस्य प्रभव तु तस्य वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च ॥ ८ ॥
पाँच प्रकार के (वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य सन्निपातिक और रक्त-
जन्य) गुल्मों के पाँच स्थान हैं। जैसे—बस्ति, नाभि, हृदय और दोनों
पार्श्व । इन पाँचों प्रकार के गुल्मों का निदान, लक्षण और चिकित्सा आगे
कहेंगे ॥ ८ ॥
रूक्षान्नपानं विषमातिमात्रं विचेष्टितं वेगविनिग्रहश्च ।
शोकोऽभिघातोऽतिबलक्षयश्च १ निरन्नता चानिलगुल्महेतुः ॥ ९ ॥
यः स्थानसंस्थानरुजा विकल्पं विड्वातसङ्गं गळवक्त्रशोषम् ।
श्यावारुणत्वं शिशिरज्वरं च हृत्कुक्षिपार्श्वांसशिरोरुजं च ॥ १० ॥
करोति जीर्णेऽभ्यधिकं प्रकोपं भुक्ते मृदुत्वं समुपैति यश्च ।
वातात्स गुल्मो न च तत्र रूक्षं कषायतिक्तं कटु चोपशेते ॥ ११ ॥
वात-गुल्म के कारण—रूखा खानपान, अति अधिक विषम चेष्टाओं का
करना, मल मूत्र के उपस्थित वेगो का रोकना, शोक, चिन्ता, मल का अतिशय
क्षीण होना, भोजन का न करना (उपवास), वात-गुल्म का कारण है।
वात-गुल्म के लक्षण—वात-गुल्म का कोई स्थान निश्चित नहीं रहता, कभी
ऊपर, कभी उधर, न इसका कोई आकार निश्चित होता है, कभी छोटा और
कभी बड़ा, न इसमें वेदना ही निश्चित रहती है, कभी अधिक वेदना होती है
और कभी नहीं होती। मल और वायु का अवरोध रहता है, गला और मुख
शुष्क हो जाता है। शरीर का रंग काला-लाल हो जाता है, शीत-ज्वर सा प्रतीत
होता है। हृदय, कुक्षि, पार्श्व और कन्धा मे दर्द रहती है, भोजन के जीर्ण
होने पर बहुत अधिक बढता है, परन्तु भोजन करने पर कम हो जाता है, ये
वात गुल्म के लक्षण हैं, इस गुल्म में कषाय, तिक्त और कटु रस लाभ नहीं
करते ॥ ९-११ ॥
कट्वम्लतीक्ष्णोष्णविदाहिरूक्षक्रोधातिमद्यार्कहुताशसेवा ।
आमाभिघातो रुधिरं च दुष्टं पैत्तस्य गुल्मस्य निमित्तमुक्तम् ॥ १२ ॥
ज्वरः पिपासा वदनाङ्गरागः शूलं महज्जीर्यति भोजने च ।
१ 'ऽतिबलक्षयश्च' इति च पाठः ।
३४८ चरकसंहिता [ अ० ५
स्वेदो विदाहो व्रणवच्च गुल्मः स्पर्शासहः पैत्तिकगुल्मरूपम् ॥ १३ ॥
पित्त-गुल्म का कारण—कटु, अम्ल, तीक्ष्ण, उष्ण, विदाहि, रूक्ष भोजनो
से, क्रोध, अति मद्य, सूर्य और अग्नि के सेवन से, आमाभिघात (विदग्धाजीर्ण)
से और दूषित रक्त से पित्त-गुल्म उत्पन्न होता है।
पित्त-गुल्म के लक्षण—ज्वर, प्यास का लगना, शरीर का लाल वर्ण, भोजन
के जीर्ण होने के समय तीव्र शूल, पसीना, विदाह, व्रण के समान गुल्म मे हाथ
के स्पर्श का सहन न करना ये पैत्तिक गुल्म के लक्षण हैं ॥ १२-१३ ॥
शीत गुरु स्निग्धमचेष्टनं च सम्पूरणं प्रस्वपनं दिवा च ।
गुल्मस्य हेतुः कफसंभवस्य, सर्वैस्तु दुष्टै र्निचयात्मकस्य ॥ १४ ॥
स्तैमित्यशीतज्वरगात्रसाद्धल्लासकासारुचिगौरवाणि ।
शैत्यं रुगल्पा कठिनोन्नतत्वं गुल्मस्य रूपाणि कफात्मकस्य ॥ १५ ॥
कफ-गुल्म का कारण—शीतल, गुरु, स्निग्ध खानपान, चेष्टा या श्रम न
करना, तृप्तिपूर्वक आहार, दिन मे सोना कफ गुल्म के कारण है। तीनो दोषों
को दूषित करने वाले आहार विहार सान्निपातिक गुल्म को उत्पन्न करते है ।
कफ-गुल्म के लक्षण—स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित की भांति
अनुभव ), शीत ज्वर, अंगो मे पीडा या भारीपन, वमन की इच्छा, जी मच-
लना, कास, अरुचि, भारीपन, शीत प्रतीति, थोडा थोडा दर्द, गुल्म का कठिन
तथा ऊपर को उठा होना ये कफजन्य गुल्म के लक्षण हैं ॥१४-१५॥
निमित्तलिङ्गान्युपलभ्य गुल्मे द्विदोषजे दोषबलाबलं च ।
व्यामिश्रलिङ्गानपरांस्तु गुल्मांस्त्रीनादिशेदौषधकल्पनार्थम् ॥ १६ ॥
द्विदोषजन्य गुल्म मे निदान, लक्षण ओर दोषों के बलाबल को देख कर
शेष तीन द्विदोषजन्य ( वातपित्तज, पित्तकफज, वातकफज ) गुल्मों को औषध-
क्रिया (चिकित्सा कार्य) मे जानना चाहिये ॥ १६ ॥
महारुजं दाहपरीतमुश्मवद्घनोन्नतं शीघ्रविदाहि दारुणम् ।
मनःशरीराग्निबलापहारिणं त्रिदोषजं गुल्ममसाध्यमादिशेत् ॥ १७ ॥
सन्निपातजन्य गुल्म के लक्षण—अतिशय वेदनायुक्त, दाह से युक्त,
पत्थर की भांति कठोर और उठा हुआ, शीघ्र विदाह को प्राप्त होने वाला
(शीघ्रपाकी ), मन, शरीर और अग्नि के बल को हरने वाला त्रिदोषजन्य गुल्म
है, यह असाध्य है ॥१७॥
ऋतावुनाहारतया भयेन विरूक्षणैर्वेगविनिग्रहैश्च ।
संस्तम्भनोल्लेखनयोनिदोषैर्गुल्मः स्त्रियं रक्तभवोऽभ्युपैति ॥ १८ ॥
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३४६
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३४६
यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्चिरात्सशूलः समग्रगर्भलिङ्गः ।
स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः ॥ १६ ॥
रक्त-गुल्म का निदान—ऋतुकाल मे आहार न करने से, भय से (गर्भ-
स्थिति के भयमात्र से ), रूक्ष आहार-विहार से, उपस्थित वेगो के रोकने से,
रक्त-स्तम्भक ओषधियो से, वमन के प्रयोग से, योनि-दोष के कारण स्त्रियो मे
रक्तजन्य गुल्म होता है ।
रक्तगुल्म के लक्षण—हाथ-पाव से रहित, पिण्डित मात्र, देर मे स्पन्द
करता हे, गर्भ के समान (स्तन का भारी होना आदि) लक्षणो से युक्त रक्त-
जन्य गुल्म स्त्रियो मे ही होता है ! इसकी चिकित्सा दसवे मास के पीछे करनी
चाहिये । उस समय वह सुखसाध्य होता है। [ रक्तगुल्म आर्तव दर्शन के
समय मे ही होता है । वृद्धा और कुमारियो मे जिनमे आर्तव नही होता, रक्त-
गुल्म नही होता । रक्तगुल्म पुराना होने पर ही सुख साध्य होता है। वह
पुराना होने पर पर्याप्त प्रमाण मे बडा हो जाता है और साथ ही स्वाभाविक
गर्भाशय के आकुंचन इसको बाहर करने मे मदद करते है। दसवे मास मे ही
प्रसव क्या प्रारम्भ होता हे, इसका सिवाय शरीर-धर्म के और कोई उत्तर
नहीं ह ] ॥१८-१६॥
क्रियाक्रममतः सिद्धं गुल्मिनां गुल्मनाशनम् ।
प्रवक्ष्याम्यत ऊर्ध्वं च योगान् गुल्मनिबर्हणान् ॥ २० ॥
रूक्षव्यायामजं गुल्मं वातिकं तीव्रवेदनम् ।
बद्धविण्म मारुतं स्नेहैरादितः समुपाचरेत् ॥ २१ ॥
भोजनाभ्यञ्जनैः पानैर्निरूहैः सानुवासनैः ।
स्निग्धस्य भिषजा स्वेदः कर्तव्यो गुल्मशान्तये ॥ २२ ॥
स्रोतसा मार्दवं कृत्वा जित्वा मारुतमुल्बणम् ।
भित्त्वा विबन्धं स्निग्धस्य स्वेदो गुल्ममपोहति ॥ २३ ॥
स्नेहपानं हितं गुल्मे विशेषेणोर्ध्वनाभिजे ।
पक्वाशयगते बस्तिरुभयं जठराश्रये ॥ २४ ॥
गुल्म-रोगियो के लिये गुल्म को नष्ट करने वाला सिद्ध (अनुभूत) चिकित्सा-
क्रम कहते है, उसके पीछे गुल्मनाशक योग कहेगे ।
वात-गुल्म की चिकित्सा—रूक्ष आहार और व्यायाम से उत्पन्न, तीव्र
वेदना वाले, वायु और मल का अवरोध करने वाले वात-गुल्म की प्रथम स्नेहों
द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । स्नेह के भोजन, अभ्यग, पान, निरूह बस्ति
और अनुवासनो द्वारा रोगी को स्निग्ध बना कर गुल्म की शान्ति के लिये रोगी
३५० चरकसंहिता [ अ० ५
को स्वेद देना चाहिये । स्नेहन के पीछे दिया स्वेद स्रोतो को नरम बना कर,
तीव्र वायु को शान्त करके मल, वायु की रुकावट को तोड कर गुल्म को शान्त
करता है । विशेषकर नाभि से ऊपर के गुल्म मे स्नेहपान हितकारी है । पक्वाशय
के गुल्म मे बस्ति उत्तम है, जठराश्रित गुल्म मे स्नेहपान और बस्ति दाना
उत्तम है ॥ २०-२४ ॥
दीप्तेऽग्नौ वातिके गुल्मे विबन्धेऽनिलवर्चसोः ।
बृंहणान्यन्नपानानि स्निग्धोष्णानि प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥
पुनः पुनः स्नेहपानं निरूहाः सानुवासनाः ।
प्रयोज्या वातगुल्मेषु कफपित्तानुरक्षिणा ॥ २६ ॥
वातिक गुल्म मे यदि अग्नि दीप्त हो और मल और वायु का विबन्ध हो तो
पुष्टिदायक स्निग्ध और उष्ण खानपान प्रयोग करने चाहिये । वात-गुल्म मे
कफ और पित्त की रक्षा करते हुए बार बार स्नेहपान और निरूह तथा अनु-
वासन देना चाहिये ॥ २५-२६ ॥
कफे वाते जितप्राये पित्तं शोणितमेव वा ।
यदि कुप्यति वा तस्य क्रियमाणे चिकित्सिते ॥ २७ ॥
यथोलबणस्य दोषस्य तत्र कार्ये भिषग्जितम् ।
आदावन्ते च मध्ये च मारुतं परिरक्षता ॥ २८ ॥
कफ-वात के प्राय जीत चुकने पर चिकित्सा करते हुए यदि कदाचित्
पित्त या रक्त कुपित हो जाये, तो प्रवृद्ध दोष के अनुसार चिकित्सा करनी
चाहिये, परन्तु आदि, अन्त और मध्य सब समयो मे वायु की रक्षा करनी
चाहिये ॥ २७-२८ ॥
वातगुल्मे कफो वृद्धो हत्वाऽग्निमरुचि यदि ।
हृल्लास गौरवं तन्द्रां जनयेदुल्लिखेत्तु तम् ॥ २९ ॥
वात-गुल्म मे यदि कफ बढ़ कर अग्नि को नष्ट करके अरुचि, जी मचलाना,
भारीपन, तन्द्रा आदि को उत्पन्न कर दे तो वमन द्वारा कफ को बाहर निकाल
देना चाहिये ॥ २९ ॥
शूलानाहविबन्धेषु गुल्मे वातकफोल्बणे ।
वर्त्तयो गुलिकाश्चूर्णं कफवातहरं हितम् ॥ ३० ॥
वात-कफ गुल्म मे शूल, आनाह और विबन्ध होने पर कफ-वात नाशक
वर्त्तियो, गोलियो और चूर्णो का प्रयोग करे । वे बडी हितकारी हैं ॥ ३० ॥
पित्तं वा यदि संवृद्धं संतापं वातगुल्मिनः ।
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५१
कुर्याद्विरेच्यः स भवेत्स्नेहैरेवानुलोमिकैः ॥ ३१ ॥
गुल्मो यद्यनिलादीनां कृते सम्यग्भिषग्जिते ।
न प्रशाम्यति रक्तस्य सोऽवसेकात् प्रशाम्यति¹ ॥ ३२ ॥
वातगुल्म रोगी म यदि पित्त बढ़कर सन्ताप को उत्पन्न कर दे, तो
अनुलोमन प्रभाव वाले स्नेहो द्वारा विरेचन करना चाहिये । [ इसके लिये
एरण्ड का तेल देना चाहिये । ] । वात आदि दोषो की चिकित्सा भली प्रकार
करने पर भी यदि गुल्म शान्त न हो तो यह समझ कर कि रक्त दूषित है,
रक्त अथात् रक्तमोक्षण करे उससे वह शान्त हो जाता है ॥ ३१-३२ ॥
स्निग्धोष्णेनोदिते गुल्मे पैत्तिके स्रंसनं हितम् ।
रूक्षोष्णेन तु संभूते सर्पिः प्रशमनं परम् ॥ ३३ ॥
पित्ते वा पित्तगुल्मे वा ज्ञात्वा पक्वाशयस्थितम् ।
कालविन्निर्हरेत्सद्यः सतिक्तैः क्षीरबस्तिभिः ॥ ३४ ॥
पयसा वा सुखोष्णेन सतिक्तेन विरेचयेत् ।
भिषगग्निवलापेक्षी सर्पिषा तैल्वकेन वा ॥ ३५ ॥
स्निग्ध, उष्ण कारणो से उत्पन्न पैत्तिक गुल्म मे स्रंसन ( मृदु विरेचन )
हितकारी है । रूक्ष और उष्ण कारणो से उत्पन्न गुल्म मे घी का पान औषध
उत्तम है । [ स्रंसन के लिये—कमीले के चूर्ण को मधु के साथ, अगूर का रस
और हरड़ का गुड के साथ पीना चाहिये । रूक्ष-उष्ण से उत्पन्न गुल्म के
लिये—तिक्तक घृत, वासा घृत, पञ्चतृण मूल से साधित घृत या दूध देना
चाहिये । ] पित्त गुल्म या पित्त यदि पक्वाशय मे स्थित हो तो समय का जानने
वाला वैद्य तिक्त द्रव्यो से साधित दूध की बस्तियो से इसको शान्त करे
अथवा अग्नि के बल को देखकर तिक्त द्रव्यो से युक्त गरम दूध पिलाकर
अथवा तैल्वक घृत से विरेचन देवे । [ तैल्वक घृत का वर्णन उदर-रोग मे
करेंगे । ] ॥ ३३-३५ ॥
तृष्णाज्वरपरीदाहशूलस्वेदाग्निमार्दवे ।
गुल्मिनामरुचौ चापि रक्तमेवावसेचयेत् ॥ ३६ ॥
छिन्नमूला विदह्यन्ते न गुल्मा यान्ति च क्षयम् ।
रक्तं हि व्यम्लतां याति तच्च नास्ति न चास्ति रुक् ॥ ३७ ॥
हृतदोषं परिम्लानं जाङ्गलैस्तर्पितं रसैः ।
समाश्वस्तं सशेषार्ति सर्पिरभ्यासयेत् पुनः² ॥ ३८ ॥
१ 'रक्तेन संस्रुतेनोपशाम्यति' इति च पाठ. । २ 'सर्पिषा पुनराचरेत्' इति च पाठः ।
३५२ चरकसंहिता [ अ० ५
रक्तपित्तातिवृद्धत्वात् क्रियामनुपलभ्य च ।
यदि गुल्मो विदह्येत शस्त्र तत्र भिषग्जितम् ॥ ३९ ॥
तृष्णा, अरुचि, ज्वर, दाह, स्वेद और अग्निमन्दता होनेपर गुल्म-रोगियो
मे ( विदाह के पूर्वरूप होने पर ही ) रक्तमोक्षण करे । रक्तमोक्षण से जड के
कट जाने पर विदाह नही होता, गुल्म नष्ट हो जाते है । चूंकि रक्त ही विदग्ध
होता हे, जब कारण ( रक्त ) ही नही रहेगा तो रोग भी नही रहेगा । रक्त
मोक्षण के कारण सुरझाये रोगी को जागल पशु-पक्षियो के मास-रस से तर्पण
करे । इसको सान्त्वना दे । शेष रोग की शान्ति के लिये बार-बार घी का सेवन
करावे । रक्त ओर पित्त अति प्रवृत्ति होने से अथवा चिकित्सा के न करने से
यदि गुल्म मे विदाह हो जाय तो शस्त्र-कर्म करे, यही औषध है ॥ ३६-३६ ॥
गुरुः कठिनसंस्थानो गूढमासोत्तराश्रयः ।
अविवर्णः स्थिरः स्निग्धो ह्यपक्को गुल्म उच्यते ॥ ४० ॥
अपक्व गुल्म के लक्षण—गुरु, कठोर आकृति वाला, गम्भीर, मास मे
छिपा, त्वचा के समान वर्ण का स्थिर, स्निग्ध ( चिकना ) होता है ॥ ४० ॥
दाहशूलार्ति १संक्षोभस्वप्ननाशारतिज्वरैः ।
विदह्यमान जानीयाद् गुल्म तमुपनाहयेत् २ ॥ ४१ ॥
विदह्यमान गुल्म के लक्षण—दाह, शूल, पीड़ा, सक्षोभ ( कीड़ियो के
चलने का सा अनुभव ), नीद का न आना, बेचैनी, ज्वर का होना, ये गुल्म
के पकते समय के लक्षण है । इस अवस्था मे उपनाह पुल्टिस आदि बाधनी
चाहिये ॥ ४१ ॥
विदाहलक्षणे गुल्मे बहिस्त्वङ्गे समुन्नते ।
श्यावे सरक्तपर्यन्ते सस्पर्शे बस्तिसन्निभे ॥ ४२ ॥
निपीड़ितोन्नते स्तब्धे सुप्ते तत्पार्श्वपीड़नात् ।
तत्रैव पिण्डिते शूने संपक गुल्ममादिशेत् ॥ ४३ ॥
तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ ।
वैद्याना कृतयोगानां व्यधशोधनरोपणे ॥ ४४ ॥
पक्व गुल्म के लक्षण—गुल्म मे पक्वव्रण के लक्षण, दर्द का न होना,
झुर्रियो का आ जाना, खाज आदि, गुल्म मास को छोड़कर त्वचा मे पृष्ठवर्ती
हो जाये, उभरा हो, बीच मे से श्यामवर्ण, किनारो से लाल, स्पर्श मे बस्ति के
समान ( एक ओर से दबाने पर तरंग दूसरी ओर अनुभव होती हो ), दबाने
से दब जाये, परन्तु दबाव हटाने पर फिर उठ जाये, सुप्त ( बढे नही ), पार्श्व
१ 'शूलानि' इति च पाठः । २ 'समुपना-' इति च पाठः ।
करे । यही इसकी चिकित्सा है ॥ ४२-४४ ॥
अ० ५ ] २३ चिकित्सितस्थानम् ३५३
के दबाने पर भी स्तब्ध रहे, गुल्मस्थान मे ही सम्पूर्ण शूल एकत्र हो जाये तब
गुल्म को पका समझना चाहिये । गुल्म के पक जाने पर जिन वैद्यो ने व्यधन,
शोधन और रोपण काया मे अभ्यास किया हो, वे ही धन्वन्तरिय वैद्य शस्त्र-कर्म
करे । यही इसकी चिकित्सा है ॥ ४२-४४ ॥
अन्तर्भागस्य चाप्येतत्पच्यमानस्य लक्षणम् ।
हृत्क्रोडशूनताऽन्तःस्थे बहिःस्थे पार्श्वनिर्गतिः ॥ ४५ ॥
पक्वः स्रोतांसि संक्लेद्य व्रजत्यूर्ध्वमधोऽपि वा ।
स्वयं प्रवृत्तं त दोषमुपेक्षेत हिताशनैः ॥ ४६ ॥
दशाहं द्वादशाहं वा रक्षन्भिषगुपद्रवान् ।
गुल्म क दो मार्ग हैं । यदि गुल्म पक कर अन्दर को मुख करता है तो
'अन्तःस्थ' और बाहर की ओर मुख करता है, तो 'बहिःस्थ' होता है अन्त.स्थ
भाग वाले गुल्म के पकने पर भी उपरोक्त लक्षण होते हैं, साथ ही हृदय और
क्रोड़ ( कुक्षि और उदर ) मे शूनता ( सूजन ) आती है । बहिःस्थिति मे सूजन
पार्श्वो की ओर आ जाती है । गुल्म पक कर स्रोतों का क्लिन्न बना कर ऊपर
वमन द्वारा अथवा नीचे की ओर मल के साथ प्रवृत्त होता है । अपने आप
प्रवृत्त हुए दोष की पथ्याहार द्वारा दस या बारह दिनो तक उपद्रवो से रक्षा
करते हुए उपेक्षा करनी चाहिये, दोषो को बहने देना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥
अत ऊर्ध्वं हितं पानं सर्पिषः सविशोधनम् ॥ ४७ ॥
शुद्धस्य १ तिक्तं सक्षौद्रं प्रयोगे सर्पिरिष्यते ।
अन्तर्विद्रधिवच्चास्य कार्यं शोधनरोपणे २ ॥ ४८ ॥
इसके पश्चात् विशोधनयुक्त द्रव्यो से साधित घृत का पान करावे । पूय
आदि का शोधन हो जाने पर तिक्त द्रव्यो से साधित घृत को मधु के साथ देवे
पीछे से अन्तर्विद्रधि के समान शोधन और रोपण कार्य करे ॥ ४७-४८ ॥
शीतलैर्गुरुभिः स्निग्धैर्गुल्मे जाते कफात्मके ।
अवम्यस्याल्पकायाग्नेः कुर्याल्लङ्घनमादितः ॥ ४६ ॥
मन्दोऽग्निर्वेदना मन्दा गुरुस्तिमितकोष्ठता ।
सात्क्लेशा चारुचिर्यस्य स गुल्मी वमनोपगः ॥ ५० ॥
उष्णैरेवोपचर्यश्च कृते वमनलङ्घने ।
योज्याश्चाहारसंसर्गा भेषजैः कटुतिक्तकैः ॥ ५१ ॥
सानाहं सबिबन्धं च गुल्मं कठिनमुन्नतम् ।
१ ' शुद्ध सतिक्त' इति च पाठः । २ इद श्लोकार्धं क्वचिन्नास्ति ।
३५४ चरकसंहिता [ अ० ५
दृष्ट्वाऽऽदौ स्वेदयेद्युक्त्या स्विन्नं च विलये१ द्भिषक् ॥ ५२ ॥
कफजन्य गुल्म यदि शीतल, गुरु, स्निग्ध आहारों के कारण उत्पन्न हुआ हो
और रोगी वमन के अयोग्य तथा मन्दाग्निवाला हो तो प्रथम लङ्घन करावे ।
वमन योग्य—जिसकी अग्नि मन्द हो, वेदना भी कम हो, कोष्ठ भारी
और जकडा हो, वमन की अभिरुचि (प्रवृत्ति) होती हो अरुचि रहती हो तो
गुल्म रोगी को वमन के योग्य समझे । वमन और लङ्घन हो चुकने पर रोगी की
उष्ण परिचर्य्या करे । कटु और तिक्त ओषधियो से सिद्ध आहार करावे । यदि
गुल्म मे आनाह, मल, वायु का विबन्ध हो और गुल्म कठिन तथा ऊपर को
उठा हुआ हो तो प्रथम स्वेदन दे शून्य होनेपर अगुली आदि से दबा कर या
मर्दन कर इसको विलीन करे ॥ ४६-५२ ॥
लङ्घनोल्लेखने स्वेदे कृतेऽग्नौ संप्रधुक्षिते ।
कफगुल्मे पिबेत्काले सक्षारकटुकं घृतम् ॥ ५३ ॥
स्थानादपसृतं ज्ञात्वा कफगुल्मं विरेचनैः ।
सस्नेहैर्बस्तिभिर्वाऽपि शोधयेद्दशमूलकैः ॥ ५४ ॥
वृद्धेऽग्नावानिलेऽमूढे२ ज्ञात्वा सस्नेहमाशयम् ।
गुटिकाश्चूर्णनिर्यूहाः प्रयोज्याः कफगुल्मिनाम् ॥ ५५ ॥
कफ गुल्म मे—लङ्घन से, वमन से, स्वेदन से अग्नि को प्रदीप्त करने पर
भोजन-काल मे क्षार और कटु-द्रव्य से युक्त घृत पिलावे । यदि कफ-गुल्म
अपने स्थान से चलायमान हो जाये तो विरेचन द्वारा अथवा स्नेह युक्त दश-
मूल की बस्तियो से सशोधन कर । अग्नि के प्रवृद्ध होने पर, वायु के अनुलोम
होने पर, आमाशय (कोष्ठ) को स्निग्ध हुआ समझ कर, कफ-गुल्म रोगी को
गुटिका, चूर्ण और क्वाथो का सेवन करावे ॥ ५३-५५ ॥
कृतमूलं महावास्तुं कठिनं स्तिमितं गुरुम् ।
जयेत्कफकृतं गुल्मं क्षारारिष्टाग्निकर्मभिः ॥ ५६ ॥
दोषः प्रकृतिगुल्मं तु योगं बुद्ध्वा कफोल्बणे ।
बलदोषप्रमाणज्ञः क्षार गुल्मे प्रयोजयेत् ॥ ५७ ॥
एकान्तरं द्वयन्तरं वा त्र्यहं विश्रम्य वा पुनः ।
शरीरबलदोषाणां वृद्धिक्षपणकोविदः ॥ ५८ ॥
श्लेष्माणं मधुरं स्निग्धं मासक्षीरघृताशिनः ।
भित्त्वा भित्त्वाऽऽशयात्क्षारः३ क्षरत्वात्क्षारयत्यधः ॥ ५९ ॥
१ 'विनयेद्' इति । २ 'मन्दाग्नावानिले मूढे' इति च ।
३. 'ऽऽशयान् क्षार' इति च पाठः ।
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३५५
अ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३५५
कफजन्य गुल्म यदि जड़ बनाले, बहुत अधिक फैला हो, कठिन हो, जड़
हो और गुरु हो तो क्षार, अरिष्ट-पान और अग्नि-कर्म द्वारा शान्त करे । कफजन्य
गुल्म मे दोष ( कफ दोष ), प्रकृति ( रोगी की कफ प्रकृति ), गुल्म ( स्थिर,
महावास्तु आदि लक्षणो से युक्त ), ऋतु ( वसन्त या हेमन्त ) के अनुसार
रोगी के बल, दोष के प्रमाण को समझने वाला वैद्य क्षार का प्रयोग करे ।
शरीर के बल, दोषो की वृद्धि तथा क्षय को समझने वाला वैद्य एक दिन, दो
दिन या तीन दिन की बाधा देकर पुन. दूसरी बार क्षार का प्रयोग करे ।
मास, दूध, घी को खानेवाले पुरुष के मधुर और स्निग्ध कफ को कोष्ठ से तोड़-
तोड़ कर क्षार नीचे की ओर क्षरित करते है । क्योकि क्षार की प्रकृति ही क्षरण
करने की है ॥ ५६-५६ ॥
मन्देऽग्नावरुचौ सात्म्ये मद्ये सस्नेहमश्नताम् ।
प्रयोज्या मार्गशुद्ध्यर्थमरिष्टाः कफगुल्मिनाम् ॥ ६० ॥
लङ्घनोल्लेखनैः स्वेदैः सर्पिष्पानैर्विरेचनैः ।
बस्तिभिर्गुटिकाचूर्णक्षारारिष्टगणैरपि ॥ ६१ ॥
श्लैष्मिकः कृतमूलत्वायस्य गुल्मो न शाम्यति ।
तस्य दाहो हृते रक्ते शरलोहादिभिर्हितः ॥ ६२ ॥
औष्ण्यात्तैक्ष्ण्याच्च शमयेदग्निगुल्मे कफानिलौ ।
तयोः शमाच्च सघातो गुल्मस्य विनिवर्तते ॥ ६३ ॥
दाहे धान्वन्तरीयाणामत्रापि भिषजां बलम् ।
क्षारप्रयोगे भिषजा क्षारतन्त्रविदा बलम् ॥ ६४ ॥
व्यामिश्रदोषैर्व्यामित्र एष एव क्रियाक्रमः ।
अरिष्ट प्रयोग के काल—जो रोगी स्निग्ध आहार करते हों, अग्नि मन्द हो,
अरुचि हो और उनको मद्य का सात्म्य हो तो मार्ग की शुद्धि के लिये अरिष्टो
का प्रयोग करे । लङ्घन से, वमन से, स्वेदन से, घृतपान से, विरेचन से,
बस्तियो से, गुटिका, चूर्ण, क्षार और अरिष्ट के प्रयोगो से भी कफजन्य गुल्म,
जड़ पकड़ लेने के कारण शान्त नही होता, उस गुल्म को रक्त-मोक्षण करने
पर शरलोह ( बाण का लोह ) आदि से दाह करे । गुल्म मे अग्नि उष्ण होने
से, तीक्ष्ण गुण होने से कफ और वायु दोनो को शान्त कर देती है । इन
दोनो के शान्त होने पर गुल्म का सघात ( एकत्र होना ) भी टूट जाता है ।
इस दाह-कर्म के प्रयोग मे भी धान्वन्तरीय शस्त्र-चिकित्सको का ही अधिकार
है, क्षार-प्रयोग मे क्षार-तन्त्र को जानने वालो से कर्म करावे । मिश्रित दोषो मे
दोषों की मिश्रित चिकित्सा करे ॥ ६०-६४ ॥
३५६ चरकसंहिता [ अ० ५
सिद्धानतः प्रवक्ष्यामि योगान् गुल्मनिबर्हणान् ॥ ६५ ॥
त्र्यूषणत्रिफलाधान्यबिडङ्गचव्यचित्रकैः ।
कल्कीकृतैर्घृतं सिद्धं सक्षीरं वातगुल्मनुत् ॥ ६६ ॥
इति त्र्यूषणादिघृतम् ।
इसके आगे गुल्मनाशक सिद्ध प्रयोगो का वर्णन करते है।
( १ ) त्र्यूषणादि घृत—सोंठ, कालीमिर्च, पिप्पली, हरड, बहेड़ा, आंवला,
धनिया, वायविडंग, चविका, चीतामूल इनके कल्क से और दूध द्वारा साधित
घृत वात-गुल्म को नष्ट करता है । [ मात्रा आधा तोला ] ॥ ६५-६६ ॥
एत एव च कल्काः स्युः कषायः पाञ्चमूलिकः ।
द्विपञ्चमूलिको वाऽपि तद् घृत गुल्मनुत्परम् ॥ ६७ ॥
इति त्र्यूषणादिघृतमपरम् ।
( २ ) त्र्यूषणादि घृत—काली मरिच आदि वस्तुओ के कल्क के साथ
बृहत्पञ्चमूल क्वाथ मे घृत सिद्ध करे । अथवा पञ्चमूल के स्थान पर दशमूल का
क्वाथ लेकर इन्ही कल्को से ( त्र्यूषणादि ) घृत सिद्ध करे । [ घृत २ प्रस्थ,
क्वाथ ८ प्रस्थ, कल्क १ शराव हो ] यह घृत गुल्मनाशक है ॥ ६७ ॥
षट्पलं वा पिबेत्सर्पिर्यदुक्तं राजयक्ष्मणि ।
प्रसन्नया वा क्षीरोत्थ सुरया दाडिमेन वा ॥ ६८ ॥
दध्नः सरेण वा कार्य घृत मारुतगुल्मनुत् १।
इति गुल्मषट्पलघृतम् ॥
( ३ ) गुल्मषट्पल घृत—राजयक्ष्मा मे कहे ‘षट्-पल’ घृत का पान करावे ।
दूध से निकले घी को प्रसन्ना ( सुरा के ऊपर के स्वच्छ भाग ) के साथ, सुरा
से, अनार के रस से, दही की मलाई के साथ ले । यह घृत वात-गुल्म को नष्ट
करता है । [ प्रसन्ना आदि को दूध के साथ मिला कर मथने से घृत को पृथक्
करके बरते यह श्री गगाधरसेन का मत है । ] ॥६८॥
हिङ्गुसौवर्चलाजाजीबिडदाडिमदीप्यकैः ॥ ६६ ॥
पुष्करव्योषधान्याम्ल २वेतसक्षारचित्रकैः ।
शटीवचाजगन्धैलासुरसैश्च विपाचितम् ॥ ७० ॥
शूलानाहहरं सर्पिर्दध्ना चानिलगुल्मिनाम् ।
इति हिङ्गुसौवर्चलाद्यं घृतम् ।
( ४ ) हिङ्गुसौवर्चलादि घृत—हींग, सौचर नमक, अजाजी ( जीरा ),
विडनमक ( काला नमक ), अनारदाना, अजवायन, पोहकरमूल, त्रिकटु,
१ 'मारुतगुल्मिनाम्' इति वा पाठः । २ 'धान्याक' इति च पाठः ।
अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३५७
धनिया, अम्लवेतस, यवक्षार, चीता, कचूर, वचा, अजगन्धा, छोटी इलायची,
तुलसी, इनका कल्क मिलित १ शराव, दही ८ प्रस्थ और घृत २ प्रस्थ लेकर
यथाविधि पाक करना चाहिये । यह घृत वात-गुल्म रोगियो के शूल और आनाह
को नष्ट करता है ॥ ६६-७० ॥
हबुषाव्योषपृथ्वीकाचव्यचित्रकसन्धवैः ॥ ७१ ॥
साजाजीपिप्पलीमूलदीप्यकैर्विपचेद् घृतम् ।
मातुलुङ्गदधिक्षीरकोलमूलकदाडिमैः ॥ ७२ ॥
रसैस्तद्वातगुल्मघ्न शूलानाहविमोक्षणम् ।
योन्यर्शोग्रहणीदोषश्वासकासारुचिज्वरान् ॥ ७३ ॥
बस्ति-हृत्पार्श्वशूल च घृतमेतद् व्यपोहति ।
इति हबुषाद्य घृतम् ॥
( ५ ) हबुषाद्य घृत—हबुषा ( हाऊबेर ), त्रिकटु ( सोंठ, काली
मिर्च, पिप्पली ), पृथ्वीका ( हिंगुपत्री या मोटा जीरा ), चविका, चीता,
सैन्धव नमक, अजाजी ( जीरा ), पिप्पली मूल, अजवायन मिलित इनका
कल्क १ शराव, बिजोरे का रस, दधि, दूध, बेर का क्वाथ, मूली का क्वाथ
और अनार का रस प्रत्येक २ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ इन से घृत सिद्ध करना
चाहिये । यह घृत वात-गुल्म को नष्ट करता है, शूल, आनाह को मिटाता है ।
योनिरोग, अर्श, ग्रहणी, श्वास, कास, अरुचि, ज्वर, बस्तिशूल, हृदयशूल,
पार्श्वशूल को यह घृत नष्ट करता है ॥ ७१-७३-॥
पिप्पल्याः१ पिचुरध्यक्षो दाडिमाद् द्विपलं पलम् ॥ ७४ ॥
धान्यात्पञ्च२ घृताच्छुण्ठ्याः कर्षः क्षीरं चतुर्गुणम् ।
सिद्धमेतैर्धृतं सद्यो वातगुल्म चिकित्सति ॥ ७५ ॥
योनिशूलं शिरःशूलमर्शसि विषमज्वरम् ।
इति पिप्पल्याद्यं घृतम् ।
घृतानामौषधगणा य एते परिकीर्तिताः ॥ ७४ ॥
ते चूर्णयोगा वर्त्त्यस्ताः कषायास्ते च गुल्मिनाम् ।
( ६ ) पिप्पल्याद्य घृत—घी ५ पल, गाय का दूध २० पल, पिप्पली
१॥ पिच्चु, अनारदाना २ पल, धनिया १ पल, सोंठ १ कर्ष इनसे सिद्ध घृत
वात-गुल्म, योनिशूल, शिरोवेदना, अर्श और विषम ज्वर को नष्ट करता है ।
[ चक्रदत्त मे इस घृत का नाम 'पञ्चपल घृत' दिया है । अष्टागसग्रह मे—
१ 'पिप्पल्यः पिचु' इति च । २ गगाधर सेन ने 'प्रस्थ घृतात्' पाठ माना है ।