सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

२७६ चरकसंहिता [ अ० ३
दाहव्यथापरीताश्च भ्रान्ता भूतगणा दिशः ॥ २१ ॥
अथेश्वरं देवगणः सह सप्तर्षिभिर्विभुम् ।
तमृग्भिरस्तुवद्यावच्छैवे भावे शिवः स्थितः ॥ २२ ॥
शिवं शिवाय भूताना स्थित ज्ञात्वा कृताञ्जलिः ।
भिया भस्मप्रहरणस्त्रिशिरा नवलोचनः ॥ २३ ॥
ज्वालामालाकुलो रौद्रो ह्रस्वजङ्घोदरः क्रमात् ।
क्रोधाग्निरुक्तवान् देवमह कि करवाणि ते ॥ २४ ॥
तमुवाचेश्वरः क्रोधं ज्वरो लोके भविष्यसि ।
जन्मादौ निधने च त्वमपचारान्तरेषु च ॥ २५ ॥
दूसरे युग ( त्रेता ) में क्रोध न करने का व्रत पालन करते हुए शर्व
(महादेव) के समय हज़ारों दिव्य वर्षों तक तप में विघ्नकारी असुर लोग
महात्माओं के तप में विघ्न करने के लिये अनेक उपद्रव करने लगे । परन्तु इस
समय समर्थशील होते हुए भी दक्ष प्रजापति ने इनकी उपेक्षा की । दक्ष ने
यज्ञ की रचना की । देवताओं के कहने पर भी दक्ष प्रजापति ने महादेव के
लिये यज्ञभाग ( रुद्र-भाग ) नहीं दिया । इतना ही नहीं, अपितु यज्ञ की
सफलता को देने वाली पशुपति सम्बन्धी ऋचाओं तथा शिव-सम्बन्धी आहुतियों
को छोड़ते हुए, उनसे रहित यज्ञ किया । इसके पश्चात् जब महादेव का व्रत
पूरा हुआ, तब दक्ष प्रजापति का व्यतिक्रम (नियम भग) हुआ जान कर आत्म-
ज्ञानी शिव ने अपना रौद्र रूप प्रकट किया । अपने माथे में स्थित तृतीय चक्षु
को खोल कर, असुरों को जला कर भस्म कर दिया । फिर रुद्र ने क्रोधाग्नि से
तपा बाण सत्र (यज्ञ) के नाश के लिये फेंका । इससे यज्ञ तो नष्ट हो गया परन्तु
देवता भी दुःखित हुए । समस्त प्राणी दाह और व्यथा से चिल्लाने लगे । वे
दिशाओं में भागने लगे, सब ओर तहलका मच गया । इसके पीछे सप्तर्षियों के
साथ देवताओं ने ऋचाओं द्वारा भगवान् महादेव की तब तक स्तुति की जब तक
कि वे अपने पुन. शिवरूप में नहीं आ गये । स्तुति से रुद्र प्रसन्न हो गये । वे रौद्र
रूप को त्याग शिव रूप में आ गये । जब महादेव ने प्राणियों के कल्याण की
इच्छा से शिवरूप धारण कर लिया, उस समय क्रोधाग्नि ने भयभीत होकर
कहा कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ, मुझको आदेश दीजिये । इस क्रोधाग्नि के
शस्त्र भस्म थे, तीन शिर, नौ आख, ज्वालाओं से व्याप्त, रुद्र, भयंकर, छोटी
जघाए, छोटा पेट था । महेश्वर ने क्रोध को कहा—ससार में प्राणियों के जन्म
और मृत्यु के समय, तथा अन्य अपचारों ( ज्वर-निदान के सेवन आदि ) से
तू लोक में 'ज्वर' होगा ॥ १५-२५ ॥

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७७

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७७

सन्तापः सारुचिस्तृष्णा चाङ्गमर्दो हृदि व्यथा।
ज्वरप्रभावो जन्मादौ निधने च महन्तमः ॥ २६ ॥
प्रकृतिश्च प्रवृत्तिश्च प्रभावश्च प्रदर्शितः ।
निदाने कारणान्यष्टौ पूर्वोक्तानि विभागशः ॥ २७ ॥
सन्ताप, अरुचि, तृष्णा, अगमर्द ( अंगों में पीड़ा अगड़ाई आदि ),
हृदय में पीड़ा का अनुभव होना यह ज्वर का प्रभाव है । ये लक्षण अपथ्य
सेवन से उत्पन्न ज्वर के हैं । जन्म तथा मृत्यु के समय होने वाला ज्वर महा-
तम होता है । इस प्रकार से प्रकृति, प्रवृत्ति और प्रभाव कह दिये हैं। निदान-
स्थान में ज्वर के आठ कारण विभाग रूप में प्रथम कहे जा चुके हैं ॥२६-२७॥
आलस्यं नयने सास्त्रे जृम्भग् गौरवं क्लमः ।
ज्वलनातपवाय्वम्बुभक्तिद्वेषावनिश्चितौ ॥ २८ ॥
अविपाकास्यवैरस्ये हानिश्च बलवर्णयो ।
शीलवैकृतमल्प च ज्वरलक्षणमग्रजम् ॥ २६ ॥
केवलं समनस्कं च ज्वराधिष्ठानमुच्यते ।
शरीरं, बलकालस्तु निदाने संप्रदर्शितः ॥ ३० ॥
ज्वर का पूर्वरूप—आलस्य, आंखों में आंसू, जम्भाई, शरीर में भारीपन,
क्लम, आग, धूप, वायु, पानी, भोजन में अनिश्चित रूप से इच्छा और द्वेष का
होना, अपचन, मुख की विरसता, बल और वर्ण की हानि, स्वभाव का परिवर्त्तन
ये ज्वर के सक्षिप्त पूर्वरूप है । सम्पूर्ण शरीर और मनोयुक्त शरीर ही ज्वर का
आश्रय-स्थान है । ज्वर का बल-काल निदान स्थान में दिखा दिया है ॥२८-३०॥
ज्वरप्रत्यात्मिकं लिङ्गं संतापो देहमानसः ।
ज्वरेणाविशता भूतं न हि किंचिन्न तप्यते ॥ ३१ ॥
ज्वर का अपना स्वरूप—देह और मन का सन्ताप ही ज्वर का अपना
स्वरूप है । ज्वर से आक्रान्त होने पर प्राणि का कोई भी ऐसा अंग नहीं होता,
जो कि तपता नहीं, गरम नहीं होता । अपितु सारा शरीर अन्दर और बाहर से
गरम हो जाता है ॥ ३१ ॥
द्विविधो विधिभेदेन ज्वरः शारीरमानसः ।
पुनश्च द्विविधो दृष्टः सौम्यश्चाग्नेय एव च ॥ ३२ ॥
अन्तर्वेगो बहिर्वेगो द्विविधः पुनरुच्यते ।
प्राकृतो वैकृतश्चैव साध्यश्चासाध्य एव च ॥ ३३ ॥
पुनः पञ्चविधो दृष्टो दोषकालबलाब्लात् ।

२७८ चरकसंहिता [ अ० ३
संततः सततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ ॥ ३४ ॥
पुनराश्रयभेदेन धातूनां सप्तधा मतः ।
भिन्नः कारणभेदेन पुनरष्टविधो ज्वर ॥ ३५ ॥
विधि-भेद से ज्वर दो प्रकार का है । एक शारीर ज्वर और दूसरा मानस
ज्वर । फिर भी ज्वर दो प्रकार का देखा जाता है । जैसे-सौम्य और आग्नेय ।
वेग के अभिप्राय से भी दो प्रकार का है । अन्तर्वेग और बहिर्वेम । प्राकृत
और वैकृत । साध्य और असाध्य भेद से भी ज्वर दो प्रकार का है । दोष
और काल के बल-अबल के भेद से ज्वर पाच प्रकार का देखा गया है ।
जैसे-सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क, तृतीयक और चतुर्थक । रस आदि सात
धातुओं के भेद से ज्वर सात प्रकार का है । जैसे-रसज, रक्तज, मासज,
मेदज, अस्थिज, मज्जाज और शुक्रज । कारण भेद से ज्वर आठ प्रकार का है ।
जैसे-वातज, पित्तज, कफज, पित्त-कफज, वात-कफज, वात-पित्तज, और
सन्निपातज तथा आगन्तुज ॥३२-३५ ॥
शारीरो जायते पूर्वं देहे मनसि मानसः ।
वैचित्त्यमरतिर्ग्लानिर्मनसस्तापलक्षणम् ॥ ३६ ॥
इन्द्रियाणां च वैकृत्यं देहसन्तापलक्षणम् ।
वातपित्तात्मकः शीतमुष्णं वातकफात्मकः ॥ ३७ ॥
इच्छत्युभयमेतत्तु ज्वरो व्यामिश्रलक्षणः ।
योगवाही परं वायु संयोगादुभयार्थकृत् ॥ ३८ ॥
दाहकृत्तेजसा युक्तः शीतकृत्सोमसंश्रयात् ।
शारीरिक ज्वर वातादि दोष के कारण प्रथम शरीर में उत्पन्न हो जाता है ।
पीछे से मन आक्रान्त होता है । परन्तु मन में उत्पन्न होने वाला ज्वर प्रथम मन
में होता है, पीछे से शरीर में आता है । मानस ज्वर के लक्षण-चित्त का
विक्षिप्त होना, बेचैनी, ग्लानि का होना है । शारीरिक ज्वर में इन्द्रियों में विकृति
उत्पन्न हो जाती है (अभिलषित विषय भी तब अच्छे नहीं लगते) । वात-
पित्तजन्य ज्वर में उष्णता की चाह करता है । मिश्रित लक्षणों वाले ज्वर में
शीत और उष्ण दोनों की चाह करता है । वायु अतियोगवाही है—सयोग के
कारण दोनों कार्य करता है । पित्त के साथ मिलने से उष्णिमा, कफ के साथ
मिलने से शीतलता को उत्पन्न करता है ॥ ३६-३८ ॥
अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ॥ ३९ ॥
सन्धयस्थिशूलमस्वेदो दोषवच्र्चोविनिग्रहः ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७९
अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्यैतानि लक्षयेत् ॥ ४० ॥
अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण—शरीर के अन्दर दाह, प्यास का अधिक होना,
प्रलाप, श्वास का तेज़ी से चलना, चक्कर आना, सन्धियों और अस्थियों म शूल,
पसीने का आना, दोषों तथा वर्च (मल) का रुक जाना, बाहर न आना, ये
अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण हैं ॥ ३६-४० ॥
सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम् ।
बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ॥ ४१ ॥
बहिर्वेग ज्वर के लक्षण—ज्वर में बाह्य ताप अधिक रहता है, तृष्णा,
प्रलाप आदि लक्षण थोड़ी मात्रा में होते हैं, यह ज्वर सुखसाध्य है ॥४१॥
प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः ।
कालप्रकृतिमुद्दिश्य प्राच्यते प्राकृतो ज्वरः ॥ ४२ ॥
उष्णमुष्णन संवृद्ध पित्तं शरदि कुप्यति ।
चितः शीते कफश्चैव वसन्ते समुदीर्यते ॥ ४३ ॥
वसन्त और शरद् ऋतु में उत्पन्न होने वाला प्राकृत ज्वर सुखसाध्य है।
वसन्त में उत्पन्न होनेवाला कफज्वर, शरद् में उत्पन्न होने वाला पित्तज्वर है।
[ वर्षाऋतु में होनेवाला वातज्वर प्राकृत होते हुए भी सुखसाध्य नहीं है।]
यहाँ पर काल-स्वभाव को देखकर ही यह प्राकृत ज्वर कहा जाता है। सञ्चित
हुआ उष्ण गुणवाला पित्त धूप आदि की उष्णिमा के कारण शरद् ऋतु में
कुपित होता है। इसी प्रकार से शीतकाल में सञ्चित कफ वसन्त ऋतु में
कुपित होता है ॥ ४२-४३ ॥
वर्षास्वम्लविपाकाभिरोषधीभि १सवारिभिः ।
सञ्चितं पित्तमुद्रिक्तं२ शरद्यादित्यतेजसा ॥ ४४ ॥
ज्वरं संजनयत्याशु तस्य चानुबलः कफः ।
प्रकृत्यैव विसर्गाच्च तत्र नानशनाद्भयम् ॥ ४५ ॥
प्राकृत पैत्तिक ज्वर—वर्षाऋतु में ओषधियों और जलों के अम्लविपाकी
होने से सञ्चित पित्त शरद् ऋतु में सूर्य के तेज से प्रकुपित होकर शीघ्र ज्वर को
उत्पन्न करता है। काल के स्वभाव तथा विसर्ग के कारण इस ज्वर के साथ
कफ का अनुबन्ध हो जाता है। अतः प्रकृति स्वभाव तथा विसर्ग काल होने से
लंघन करने पर भी कोई नुकसान नहीं होता ॥ ४४-४५ ॥
१. 'रद्भिरोषधिभिस्तथा' इति च पाठः । २. 'पित्तमुत्क्लिष्टं' इति च ।

२८० चरकसंहिता [ अ० ३
अद्भिदोषधिभिश्चैव मधुराभिञ्चितः कफः ।
हेमन्ते सूर्यसन्तप्तः स वसन्ते प्रकुप्यति ॥ ४६ ॥
वसन्ते श्लेष्मणा तस्माज्ज्वरः समुपजायते ।
आदानमध्ये तस्यापि वातपित्तं भवेदनु ॥ ४७ ॥
आदावन्ते च मध्ये च बुद्ध्वा दोषबलाबलम् ।
शरदूसन्तयोर्विद्वाञ्ज्वरस्य प्रतिकारयेत् ॥ ४८ ॥
कालप्रकृतिमुद्दिश्य निर्दिष्टः प्राकृतो ज्वरः ।
मधुर रस, जल और ओषधियों द्वारा हेमन्त ऋतु में संचित कफ, वसन्त-
ऋतु में सूर्य की गरमी द्वारा कुपित होता है । इसलिये वसन्तऋतु में कफजन्य
ज्वर उत्पन्न होता है । जिससे यह आदान काल का मध्यवर्ती समय होता है,
इसलिये वायु और पित्त भी इस कफ के अनुबन्ध बन जाते हैं। इससे इस
समय भी थोड़ा लंघन करने से कोई भय नहीं रहता । कफ और पित्त दोनों द्रव
धातु हैं, अतः ये लंघन को सहन कर सकते हैं। इसलिये वैद्य को चाहिये कि
शरद् तथा वसन्त ऋतु में उत्पन्न प्राकृत ज्वर की चिकित्सा काल के आदि,
अन्त और मध्य में दोष के बलाबल को देखकर करे । वसन्त के प्रारम्भ में
कफ प्रबल, मध्य में मध्यबल, और अन्त में निर्बल, शरद् के प्रारम्भ में पित्त
प्रबल, मध्य में मध्यबल और अन्त में निर्बल होता है । इस प्रकार काल की
प्रकृति के उद्देश्य से प्राकृत ज्वर को कह दिया है ॥ ४६-४८ ॥
प्रायेणानिलजो दुःखः कालेष्वन्येषु वैकृतः ॥ ४६ ॥
वर्षाऋतु में होनेवाला वातजन्य ज्वर प्राकृत होते हुए भी प्रायः कष्टसाध्य
होता है । इसी प्रकार अन्य कालों मे ( शरद् ऋतु में कफजन्य या वसन्त में
पित्तजन्य ) उत्पन्न वैकृत ज्वर विरुद्ध चिकित्सा होने से कष्टसाध्य है ॥ ४६ ॥
हेतवो विविधास्तस्य निदाने संप्रदर्शिताः ।
बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वर. साध्योऽनुपद्रवः ॥ ५० ॥
इस वैकृत ज्वर के निदान कारणों को निदानस्थान में कह दिया है ।
बलवान् तथा अल्प दोषवाले पुरुषों मे उपद्रवों से रहित ज्वर साध्य है ॥ ५०॥
हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः ।
ज्वरः प्राणान्तकृद्धश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ५१ ॥
जो ज्वर बहुत प्रबल कारणों को लेकर उत्पन्न होता है, बहुत से लक्षणों से
युक्त हो शीघ्र इन्द्रिय-शक्तियों को नष्ट कर देता है, वह ज्वर प्राणनाशक
होता है ॥ ५१ ॥

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८१

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८१
सप्ताहाद्वा दशाहाद्वा द्वादशाहात्तथैव च ।
सप्रलापभ्रमश्वासस्तीक्ष्णो हन्याज्ज्वरो नरम् ॥ ५२ ॥
प्रलाप, भ्रम ( चक्कर आना ), श्वास इन लक्षणों से युक्त तीक्ष्ण ज्वर सात
दिन में, वातजन्य दस दिन में, पित्तजन्य और बारह दिन में कफजन्य ज्वर
घातक होता है ॥ ५२ ॥
ज्वरः क्षीणस्य शूनस्य गम्भीरो दीर्घरात्रिकः ।
असाध्यो बलवान् यश्च केशसीमन्तकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥
क्षीण और शोष से युक्त व्यक्ति में गम्भीर और दीर्घकाल तक रहने वाला
ज्वर असाध्य होता है । बलवान् ज्वर तथा जिसके कारण बालों में सीमंत
( माग ) पड़ जाती है, वह ज्वर भी असाध्य है ॥ ५३ ॥
स्रोतोभिर्विस्तृता दोषा गुरवो रसवाहिभिः ।
सर्वगात्रानुगा स्तब्धा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ॥ ५४ ॥
प्रकुपित और आम सहित होने से गुरु वातादि दोष रसवाही स्रोतों द्वारा
फैलकर सम्पूर्ण अंगों ( शरीर ) में पहुंच कर जड हो जाते हैं, इससे सन्तत
ज्वर उत्पन्न होता है ॥ ५४ ॥
दशाहं द्वादशाहं वा सप्ताहं वा सुदुःसहः ।
स शीघ्रं शीघ्रकारित्वात्प्रशमं याति हन्ति वा ॥ ५५ ॥
कालदूष्यप्रकृतिभिर्दोषस्तुल्यो हि सन्ततम् ।
निष्प्रत्यनीकः कुरुते तस्माज्ज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ५६ ॥
यथा धातुं तथा मूत्रं पुरीषं चानिलादयः ।
युगपच्चानुपद्यन्ते नियमात् सन्तते ज्वरे ॥ ५७ ॥
स शुद्ध्या वाप्यशुद्ध्या वा रसादीनामशेषतः ।
सप्ताहादिषु कालेषु प्रशमं याति हन्ति वा ॥ ५८ ॥
यदा तु नातिशुध्यन्ति न वा शुध्यन्ति सर्वशः ।
द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याऽऽश्रय स्तदा ॥ ५६ ॥
विसर्गं द्वादशे कृत्वा दिवसेऽव्यक्तलक्षणम् ।
दुर्लभोपशमः काल दीर्घमप्यनुवर्तते ॥ ६० ॥
इति बुद्ध्वा ज्वरं वैद्य उपक्रामेत्त सन्ततम् ।
क्रियाक्रमविधौ युक्तः प्रायः प्रागपतर्पणै. ॥ ६१ ॥
यह दुःसह सन्तत ज्वर शीघ्रकारी होने के कारण दस दिन में (पित्तजन्य
होने से), बारह दिन में (कफजन्य होने से), अथवा सात दिन में (वातजन्य

२८२ चरकसंहिता [ अ० ३
होने से ) शीघ्र शान्त हो जाता है, अथवा रोगी को मार देता है । सन्तत
ज्वर के दुःसह होने का कारण—काल, दूष्य (रस आदि धातु) और प्रकृति के
वातादि दोषों के तुल्य होने से सन्तत ज्वर कष्टसाध्य होता है । सन्तत ज्वर में
वात आदि दोष जिस प्रकार से रस आदि धातुओं में पहुँचते हैं, उसी प्रकार से
युगपत् रूप में मूत्र तथा मल में भी पहुचते हैं। यह सन्तत ज्वर रस आदियो के
सर्वथा शुद्ध होने पर या अशुद्धावस्था में सप्ताह आदि काल के अन्दर या तो
स्वय शान्त हो जाता है, अथवा मार देता है। जिस समय सन्तत ज्वर के
बाहर आश्रय (तीन दोष, सात धातु और मल तथा मूत्र ) अत्यन्त शुद्ध नही
होते अथवा कुछ शुद्ध हो जाते हैं और कुछ अशुद्ध रहते हैं, तब बारहवें दिन
अस्पष्ट लक्षणों से ज्वर उतर जाता है, परन्तु कष्टसाध्य होकर दीर्घ काल तक
चलता रहता है । सन्तत ज्वर को इस प्रकार से समझ कर चिकित्सा आरम्भ
करनी चाहिये । चिकित्सा में भी प्रथम अपतर्पण (लङ्घन) आरम्भ
करना चाहिये ॥ ५७-६१ ॥
रक्तधात्वाश्रय प्रायो दोषः सततक ज्वरम् ।
सप्रत्यनीकः कुरुते कालवृद्धिक्षयात्मकम् ॥ ६२ ॥
अहोरात्र सततको द्वौ कालावर्तते ।
विरोधी दोष प्रायः करके रक्त-धातु में आश्रित होकर काल में बढ़ने वाले
और काल में घटने वाले (क्षीण होने वाले ) सतत ज्वर को उत्पन्न करते हैं।
यह ज्वर समय पर बढ़ता है और समय पर घटता है । काल प्रकृति और दूष्य
इनमे से किसी एक का बल प्राप्त करक सतत ज्वर दिन रात में (२४ घण्टे में)
दो बार आता है ॥ ६२-॥
कालप्रकृतिदूष्याणां प्राप्यवान्यतमद्बलम् ॥ ६३ ॥
दोषो मेदोवहा रुद्ध्वा नाडीरन्येद्युक ज्वरम् ।
सप्रत्यनीकः कुरुते एककालमहर्निशं ॥ ६४ ॥
दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थ कौ ।
काल प्रकृति और दूष्य इनमें से किसी एक के विरोधी होने पर दोष
मेदोवहा नाड़ियों को रोक कर अन्येद्युष्क ज्वर को उत्पन्न करते हैं। यह दिन
रात में एक बार आता है। अस्थि और मज्जा मे दोष पहुच कर तृतीयक और
चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ॥ ६३-६४-॥
गतिद्वये॑कान्तरान्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः ॥ ६५ ॥
रक्तमेवाभिसंसृज्य कुर्यादन्येद्युक ज्वरम् ।
मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् ॥ ६६ ॥

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् २८३

अ० ३ ] चिकित्सास्थानम् २८३
ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदो मार्गं चतुर्थकम् ।
अन्येद्युष्कः प्रतिदिनं दिनं क्षिप्त्वा तृतीयकः ॥ ६७ ॥
दिनद्वयं यो विश्राम्य प्रत्येति स चतुर्थकः ।
अधिशेते यथा भूमि बीजं काले च रोहति ॥ ६८ ॥
अधिशेते तथा धातु दोषः काले च कुप्यति ।
स वृद्धि बलकाल च प्राप्य दोषस्तृतीयकम् ॥ ६९ ॥
चतुर्थकं च कुरुते प्रत्यनीकबलक्षयात ।
कृत्वा वेगं गतबलाः स्वे स्वे स्थाने व्यवस्थिताः ॥ ७० ॥
पुनर्विवृद्धाः काले ज्वरयन्ति नर मलाः ।
दोषों की गति—प्रति दिन, एक दिन के अन्तर से और दो दिन के अन्तर
से कही गई है । जब प्रति दिन ज्वर आता है उसे अन्येद्युष्क कहते है, एक
दिन के अन्तर से आवे तो 'तृतीयक' और दो दिन अंतर से आवे ता 'चतुर्थक'
कहते हैं । अन्येद्युष्क ज्वर प्रति दिन लौट कर आता है, तृतीयक ज्वर एक दिन
छोड़ कर आता है, चतुर्थक ज्वर दो दिन पीछे लौट कर आता है । जिस प्रकार
कि बीज भूमि में पड़ा रहता है और अपने समय पर उगता है, इसी प्रकार से
वातादि दोष रस, रक्तादि धातुओं में पड़े रहते हैं और समय पाकर प्रकुपित
होते हैं । दोष, बल और काल की सहायता पाकर विरोधी बल के क्षीण होने पर
तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को उत्पन्न करते हैं । ज्वर वेग को उत्पन्न करके
निर्बल हुए दोष अपने अपने स्थानों में पहुच जाते हैं । अपने अनुकूल
परिस्थिति ( काल ) में ज्वर को पुन: उत्पन्न कर देते हैं ॥ ६५-७०- ॥
कफपित्तात् त्रिकग्राही पृष्ठाद् वातकफात्मकः ॥ ७१ ॥
वातपित्ताच्छिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ।
तृतीयक ज्वर तीन प्रकार का है । जिस तृतीयक ज्वर मे प्रथम त्रिक स्थान
( कूल्हे ) में वेदना होती है, वह कफ-पित्त के कारण होता है । जिस तृतीयक
ज्वर में पीठ में वेदना प्रथम होती है वह वात-कफजन्य है । जिस तृतीयक ज्वर
मे शिर में वेदना प्रथम होती है, वह वात-पित्तजन्य है । इस प्रकार से यह
तृतीयक ज्वर तीन प्रकार है ॥ ७१- ॥
चतुर्थको दर्शयति प्रभावं विविध ज्वरः ॥ ७२ ॥
जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्व शिरस्तोऽनिलसंभवः ।
विषमज्वर एवान्यश्चतुर्थकविपर्ययः ॥ ७३ ॥
त्रिविधो धातुरेकैको द्विधातुस्थः करोत्ययम् !

२८४ चरकसंहिता [ अ० ३
चतुर्थक ज्वर दो प्रकार से अपना प्रभाव दिखाता है, अतः वह दो प्रकार
का है। जिस ज्वर में आक्रमण जंघाओं की ओर से या पाव से होता है वह
कफजन्य है और जिसमें शिर पर सबसे प्रथम आक्रमण होता है वह वायुजन्य
है। ^१चातुर्थक ज्वर का ही एक विपर्यय (भेद) विषम ज्वर है। यह तीन
धातु-वात, पित्त, कफ में से किसी एक धातु के दो धातुओं में स्थिति होने से
होता है। इस ज्वर मे एक दिन आक्रमण नहीं होता, फिर अगले दो दिन होता
है और फिर एक दिन नहीं होता ॥ ७२-७३- ॥
प्रायशः संनिपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः ॥ ७४ ॥
सन्निपाते तु यो भूयान् स दोषः परकीर्तितः ।
प्रायः करके ( कहीं कहीं अपवाद भी होता है), सन्तत, सतत, अन्येद्युष्क,
तृतीयक, चतुर्थक और सनिपात (त्रिदोष) से उत्पन्न यह पाच प्रकार का ज्वर
होता है। संनिपात के समय जो भी दोष प्रबल होता है, उसी के नाम से उस
ज्वर को कहते हैं दूसरे दोषों का भी अनुबन्ध थोड़ा बहुत रहता है ॥७४-॥
ऋत्वहोरात्रदोषाणां मनसश्च बलाबलात् ॥ ७५ ॥
कालमर्थवशाच्चैव ज्वरस्तं तं प्रपद्यते ।
ऋतु, दिन, रात, दोष और मन के बल-अबल के कारण तथा अर्थवश
(प्राक्तन कर्म) के कारण उस उस समय में ज्वर होता है। [जैसे-ऋतु के
बलाबल से वर्षाकाल से वर्षाकाल में उत्पन्न वातप्रधान सतत ज्वर विरोधी शरद्
ऋतु में अन्येद्युष्क रूप में आ जाता है। अहोरात्र वसन्त काल के मध्य दिवसों
मे उत्पन्न वातिक चतुर्थक ज्वर पिछले दिनों में बलवान् होकर तृतीयक हो जाता
है। मन के बल से ज्वर अन्य रूप में आ जाता है। कहा भी है “विषाद का
करना भी रोग को बढ़ाने वाला है”।] ॥ ७५ ॥
गुरुत्वं^२ दैन्यमुद्वेगः सदनं छर्द्यरोचकौ ॥ ७६ ॥
रसस्थिते बहिस्तापः साङ्गमर्दो विजृम्भणम् ।
रक्तोत्था^३ पिडकास्तृष्णा सरक्तं ष्ठीवनं मुहुः ॥ ७७ ॥
दाहरागभ्रम^४ मदाः प्रलापो रक्तसंस्थिते ।
अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा ग्लानिः संसृष्टविट्कता^५ ॥ ७८ ॥
१. हारीत संहिता में पित्तजन्य चतुर्थक ज्वर भी माना है। २. ‘शैत्यमु’
इति च पाठः । ३ 'रक्तोष्ठः' इति च पाठः । ४ 'श्रम' इति पाठ. । ५. 'अन्त-
र्दाहः सतृण्मोहः सग्लानिः सृष्टविट्कता' इति वा पाठ. ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८५

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८५
दौर्गन्ध्य गात्रविक्षेपो१ ज्वरे मांसस्थिते भवेत् ।
स्वेदस्तीव्रा पिपासा च प्रलापो वम्य२ भीक्ष्णशः ॥ ७६ ॥
स्वगन्धस्यासहत्वं च मेदःस्थे ग्लान्यरोचकौ ।
विरेकवमने चोभे सास्थिभेद३ प्रकूजनम्४ ॥ ८० ॥
विक्षेपणं च गात्राणा श्वासश्चास्थिगते ज्वरे ।
हिक्का५ श्वासस्तथा कासस्तमश्चातिदर्शनम् ॥ ८१ ॥
मर्मच्छेदो बहिः शैत्य दाहोऽन्तश्चैव मज्जगे ।
शुक्रस्थानगते शुक्रमोक्ष कृत्वा विनाशय च ॥ ८२ ॥
प्राणवात्वग्निसोमैश्च सार्धं गच्छत्यसो विभुः ।
रसरक्ताश्रितः साध्यो मेदोमासगतश्च यः ॥ ८३ ॥
अस्थिमज्जगत कृच्छ्रः शुक्रस्थो नैव सिध्यति ।
सातो धातुओ मे आश्रित ज्वर के लक्षण—(१) रस मे ज्वर के आश्रित
होने पर भारीपन, दीनता, बेचैनी, शिथिलता, वमन, अरुचि, बाहर ताप, अंगों
में पीड़ा और जमाई आती है । (२) रक्त-धातु में आश्रित होने पर रक्तजन्य
पिड़काये, प्यास, रक्त मिश्रित थूक का बार बार आना, दाह, राग (लालिमा)
चक्कर आना, मद, (मूर्च्छा) और प्रलाप होता है । (३) मास में आश्रित
होने पर शरीर के अन्तर जलन, प्यास, ग्लानि, अतिसार, दुर्गन्ध, हाथ पाव का
फेकना होता है । (४) मेद में आश्रित हाने पर बहुत पसीना आना, प्यास,
प्रलाप, बार बार वमन, अपने ही शरीर की गन्ध का सहन न होना, ग्लानि
और अरुचि होती है । (५) अस्थिगत ज्वर में अतीसार, वमन, अस्थियों में
पीड़ा, कराहना, हाथ पाव का फेंकना, ज़ोर या तेज़ी से श्वास का चलना होता
है । (६) मज्जा धातु में ज्वर के आश्रित होने पर हिचकी, श्वास, कास आँखों
के सामने अन्धकार का दिखाई देना, मर्मान्तक पीड़ा, शरीर का ऊपर से
ठण्डा परन्तु अन्दर जलन होता है । (७) शुक्र (वीर्य) में आश्रित
होने पर शुक्र का स्राव होता है, इस अवस्था में विभु (आत्मा), प्राण, वायु,
अग्नि और सोम के साथ चला जाता है, रोगी मर जाता है । इनमे से रस,
रक्त, मास और मेद में आश्रित ज्वर साध्य है, अस्थि और मज्जा में आश्रित
ज्वर कष्टसाध्य है, शुक्रस्थ ज्वर असाध्य है ॥ ७६-८३ ॥
१. 'ऊष्मान्तर्दाहविक्षेपौ' इति च । २. 'ऽरत्यभी' इति च । ३ 'सास्थि-
मेदान्तृक्' इति च । ४. 'कुञ्जनम्' इति च । ५. 'मेह.' इति च पाठः ।

२८६ चरकसंहिता [ अ० ३
हेतुभिर्लक्षणैश्चोक्तः पूर्वमष्टविधो ज्वरः ॥ ८४ ॥
समासेनोपदिष्टस्य व्यासतः शृणु लक्षणम् ।
शिरोरुक् पर्वाणां भेदो दाहो रोम्णां प्रहर्षणम् ॥ ८५ ॥
कण्ठास्यशोषो वमथुस्तृष्णा मूर्च्छा भ्रमोऽरुचिः १ ।
स्वप्ननाशोऽतिवाग्जृम्भा वातपित्तज्वराकृतिः ॥ ८६ ॥
शीतको गौरव तन्द्रा स्तैमित्यं पर्वणा च रुक् ।
शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदाप्रवर्तनम् ॥ ८७ ॥
संतापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृति ।
मुहुर्दाहो मुहुः शीतं स्वेदस्तम्भो मुहुर्मुहुः ॥ ८८ ॥
मोहः कासोऽरुचिस्तृष्णा श्लेष्मपित्तप्रवर्तनम् ।
लिप्ततिक्तास्यता तन्द्रा श्लेष्मपित्तज्वराकृतिः ॥ ८९ ॥
इत्येते द्वन्द्वजाः प्रोक्ताः सन्निपातज उच्यते ।
प्रथम निदानस्थान में हेतु और लक्षणों सहित आठ प्रकार ज्वर कहा है ।
वहाँ पर संक्षेप मे कहा था, अब उसको विस्तार मे कहते हैं—
( १ ) वात पित्त ज्वर के लक्षण—सिर में दर्द, पोरुओं में फूटने की सी
पीड़ा, जलन, लोमहर्ष, गले और मुख का शुष्क होना, वमन, पिपासा, मूर्च्छा,
भ्रम, अरुचि, निद्रानाश, अधिक बोलना और जभाई का आना ये वातपित्त
ज्वर के लक्षण हैं । [ यहाँ पर द्वन्द्वज ज्वरों के ही लक्षण कहे हैं । वात, पित्त,
कफजन्य ज्वरों के लक्षणों को विस्तार से निदानस्थान में कह दिया है ] ।
( २ ) वात कफ ज्वर के लक्षण—शीतक (शीत लगना या शीत पित्त),
भारीपन, तन्द्रा, स्तिमितता (गीले वस्त्र से आच्छादित के समान अनुभव),
पोरुओं में दर्द, शिर का जकड़ा होना, प्रतिश्याय, कास पसीने का न आना,
सन्ताप और ज्वर का मध्यम वेग होना ये वात कफ ज्वर के लक्षण हैं ।
( ३ ) कफ-पित्त ज्वर के लक्षण—बार बार दाह (गरमी), बार बार
शीत (सर्दी) लगना, बार बार पसीना आना वा न आना, मोह (मूर्च्छा),
कास, अरुचि, प्यास, वमन या मल के द्वारा कफ और पित्त की प्रवृत्ति, मुख
का कफ से भरा होना तथा कडुवा होना और तन्द्रा ये कफ-पित्त ज्वर के
लक्षण हैं । अब सन्निपातजन्य ज्वरों को कहा जाता है ॥ ८४-८६ ॥
सन्निपातज्वरस्योर्ध्वं त्रयोदशविधस्य हि ॥ ६० ॥
प्राक्सूत्रितस्य वक्ष्यामि लक्षणं वै पृथक् पृथक् ।
१ 'ऽरति' इति च पाठः ।

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २८७

अ० ३ ] चिकित्सतस्थानम् २८७
भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् ॥ ९१ ॥
वातपित्तोल्बणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ।
शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासा दाहरुग्व्यथाः ॥ ९२ ॥
वातश्लेष्मोल्बणे व्याधौ लिङ्गं पित्तावरे विदुः ।
छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना ॥ ९३ ॥
मन्दवाते व्यवस्यन्ते लिङ्गं पित्तकफोल्बणे ।
सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः ॥ ९४ ॥
वातोल्बणे स्याद्द्व्यनुगे तृष्णा कण्ठास्यशोषता ।
रक्तविण्मूत्रता दाहः स्वेदस्तृड्बलसंक्षयः ॥ ९५ ॥
मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्ते गरीयसि ।
आलस्यारुचिहृल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः ॥ ९६ ॥
कफोल्बणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ।
प्रतिश्या छर्दिरालस्यं तन्द्राऽरुच्यग्निमार्दवम् ॥ ९७ ॥
हीनवाते पित्तमध्ये चिह्नं श्लेष्माधिके मतम् ।
हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाहस्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः ॥ ९८ ॥
हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके मतम् ।
शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापश्च्छर्द्यरोचकौ ॥ ९९ ॥
हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ।
शीतको गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोतिरुक् ॥ १०० ॥
हीनपित्ते वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके विदुः ।
श्वासकासप्रतिश्याया मुखशोषोऽतिपार्श्वरुकू ॥ १०१ ॥
कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ।
पर्वभेदोऽग्निमान्द्य च तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०२ ॥
कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके विदुः ।
प्रथम सूत्ररूप में कहे तेरह प्रकार के सन्निपात ज्वर के लक्षण पृथक् पृथक् कहूँगा।
(१) वात-पित्त प्रधान और मन्दकफ ज्वर के लक्षण—भ्रम, प्यास, दाह,
भारीपन, शिर में अधिक वेदना होती है । ( २ ) वात-कफ प्रधान और हीनपित्त
ज्वर में—शीत लगना, खासी, अरुचि, तन्द्रा, प्यास, दाह, पीड़ा, व्यथा होती,
१. 'वमिदाहतृषाभ्रमैः' इति च पाठः ।
२. 'ऽग्निदौर्बल्यं' इति च पाठः ।

२८८ चरकसंहिता [अ० ३
है। (३) पित्त कफ प्रधान हीनवात ज्वर में—वमन, शीत लगना, बार बार
दाह, प्यास, मूर्च्छा, अस्थियों में वेदना होती है। (४) वातप्रधान, हीनपित्त-
कफ ज्वर में—सन्धियों में तथा अस्थियों में और शिर में वेदना, प्रलाप, भारी
होना, भ्रम, प्यास, कण्ठ और मुख का सूखना होता है। (५) पित्तप्रधान हीन
कफ-वात ज्वर मे--मल और मूत्र में रक्तिमा (रक्त का सा लाल वर्ण ), जलन,
पसीना, प्यास, निर्बलता, मूर्च्छा होती है। (६) कफ प्रधान हीन पित्तवात में—
आलस्य, अरुचि, हृल्लास (जी मचलाना), जलन, वमन, बेचैनी, चक्कर आना,
तन्द्रा और कास होता है। (७) कफप्रधान पित्त मध्य, वात हीन सन्निपात मे—
प्रतिश्याय, वमन, आलस्य, तन्द्रा, अरुचि मन्दाग्नि होती है। (८) पित्तप्रधान,
मध्य कफ और हीन वात में—मूत्र और आख का हल्दी के समान पीला वर्ण,
जलन, प्यास, भ्रम, अरुचि होती है। (६) वात प्रधान, मध्य कफ और हीन
पित्त में—शिर में वेदना, कम्पन, श्वास का तेज चलना, प्रलाप, वमन और
अरुचि होती है। (१०) कफप्रधान, वात मध्य और हीन पित्त में—शीत का
लगना, भारीपन, तन्द्रा, प्रलाप, अस्थियों और शिर में अति वेदना होती है।
(११) वात प्रधान, पित्त मध्य और कफ हीन सन्निपात मे—श्वास, कास,
प्रतिश्याय, (जुकाम), मुख का सूखना और पसलियों में अति वेदना होती है।
(१२) पित्त प्रधान, वात मध्य हीन कफ मे—जोड़ों में फूटन की सी पीड़ा,
मन्दाग्नि, प्यास, दाह, अरुचि और चक्कर आता है। [ भालूकि तंत्र से सन्नि-
पात ज्वरों के लक्षण तथा नाम भिन्न २ दिये हैं। जैसे—वात पित्ताधिक सन्नि-
पात 'विभु' पित्त श्लेष्माधिक सन्निपात फल्गु, कफवाताधिक सन्निपात मकरी,
वाताधिक सन्निपात 'विस्फारक', पित्ताधिक सन्निपात 'शीघ्रकारी और कफाधिक
सन्निपात 'उल्बण' कहाता है ।
कुछ आचार्य इन लक्षण। क प्रकृतिसम अवाय के लक्षण होने से इस
पाठ को अनाषे मानते हैं। अन्य स्थानों मे यह पाठ नहीं है ]॥ ६०-१०२॥
सन्निपातज्वरस्योर्ध्वमतो वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १०३ ॥
क्षणे दाहः क्षणे शीत मस्थिसन्धिशिरोरुजा ।
सास्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दर्शने ॥ १०४ ॥
सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः शूकरिवावृत ।
तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ॥ १०५ ॥
परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् ।
ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ॥ १०६ ॥

अ० ३ ] १६ चिकित्सितस्थानम्‌ २८६

अ० ३ ] १६ चिकित्सितस्थानम्‌ २८६
शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा।
स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शनमल्पशः ॥ १०७॥
कृशत्वं नातिगात्राणां प्रततं कण्ठकूजनम्‌।
कोठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम्‌ ॥ १०८ ॥
मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च।
चिरात्पाकश्च दोषाणां सन्निपातज्वराकृतिः ॥ १०९॥
इसके आगे सन्निपात ज्वर के लक्षण कहते है। जैसे—( १३) क्षण मे
दाह, क्षण मे शीत, अस्थि, सन्धि और शिर मे वेदना, नेत्रो से पानी आना,
आखो का मैला या लाल वर्ण और कुटिल¹ होना, कानो मे आवाज होना,
कानों मे पीडा होना, गला शूक (गेहूँ आदि की बाल) की भाति काटो से घिरा
रहता है, तन्द्रा, मोह, प्रलाप, कास, श्वास, अरुचि, भ्रम, जिह्वा का जले हुए
के समान काला, पीला, स्पर्श मे खुरदरा, शरीर का अति शिथिल होना, कफ
मिश्रित रक्त पित्त का थूकना, शिर का लोठन (इधर उधर चलाना, हिलाना
डुलाना), प्यास, निद्रा का न आना, हृदय मे तीव्र पीडा, पसीना मूत्र तथा
मल का देर मे आना और थोडा आना (प्राय. अवरोध रहना), शरीर मे
अधिक निर्बलता का न आना, निरन्तर गले से कराहने का स्वर, कोठ तथा
श्याम-रक्त वर्ण के मण्डलो का देह पर दिखाई देना, मूकता, स्रोतो का (मुख
आदि का) पक जाना, उदर का भारी प्रतीत होना तथा दोषो का देर मे परि-
पक्व होना ये सन्निपात ज्वर के लक्षण² है ॥ १०४–१०६ ॥
१ निर्भुग्न का ‘कुटिल, विस्तारित तथा अन्दर को घुसा रहना’ यह अर्थ
आचार्यों ने किया है।
२ सुश्रुत मे अभिन्यास-ज्वर के लक्षण इस प्रकार दिये है। जैसे—
नात्युष्णशीतोऽल्पसञ्ज्ञो भ्रान्तप्रेक्षी हतप्रभ ।
खरजिह्व शुष्ककण्ठ स्वेदविण्मूत्रवर्जित ॥
साश्रुनिर्भुग्ननयनो भक्तद्वेषी हतस्वरः।
श्वसन्निपतित शेते प्रलापापद्रवान्वित ॥
अभिन्यास तु त प्राहुर्हंतौजसमथापरे।
सन्निपातज्वर कृच्छ्रमसाध्यमथवा परे ॥
न बहुत उष्ण, न बहुत शीत, थोड़ी चेतना हो, भौंचका सा देखे, कान्ति
नष्ट हो, जिह्वा खरदरी हो, गला सूखा, पसीना, पाखाना और मूत्र न होता हो,
आँसू आवे, आँखे टेढी हों जांय, भाजन से द्वेष हो, स्वर मारा जाय, सांस

२६० चरकसंहिता [ अ० ३
दोषे विबद्धे नष्टेऽग्नौ सर्वसम्पूर्णलक्षणः ।
सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्त्वतोऽन्यथा ॥ ११०॥
सन्निपात ज्वर की साध्य-असाध्यता—यदि दोष (वातादि और मल)
शरीर के अन्दर ही रुक जाये, अग्नि मन्द हो, सन्निपात ज्वर के सम्पूर्ण लक्षण
दिखाई देते हो तो सन्निपात ज्वर असाध्य है । यदि सम्पूर्ण लक्षण दिखाई न
दे, दोष बाहर आते हो, अग्नि भी प्रबल हो तो रोग कष्टसाध्य होता है ॥११०॥
निदाने त्रिविधा प्रोक्ता या पृथग्ज्वराकृतिः ।
संसर्गसन्निपाताना तथा चोक्तं स्वलक्षणम् ॥ १११ ॥
ज्वरनिदान-स्थान मे वर्णित पृथक् पृथक् दोषो से उत्पन्न होने वाले
ज्वरो के तीन प्रकार के लक्षण, द्वन्द्वज ज्वरो तथा सन्निपातज ज्वरो के लक्षण
मिला कर सात प्रकार के ज्वर कह दिये है ॥ १११ ॥
आगन्तुरष्टमो यस्तु स निर्दिष्टश्चतुर्विधः ।
अभिघाताभिषङ्गाभ्यामभिचाराभिशापतः ॥ ११२ ॥
आठवाँ आगन्तुज ज्वर चार प्रकार का है । जैसे—अभिघातजन्य, अभि-
षग्जन्य, अभिचारजन्य और अभिशापजन्य ॥ ११२ ॥
शस्त्रलोष्टकशाकाष्ठमुष्ट्यरत्नितलद्विजैः ।
तद्विधैश्च हते गात्रे ज्वरः स्यादभिघातजः ॥ ११३ ॥
तत्राभिघातजे वायुः प्रायो रक्तं प्रदूषयन् ।
सव्यथाशोफवैवर्ण्यं करोति सरुजं ज्वरम् ॥ ११४ ॥
इनमे अभिघातजन्य ज्वर—शस्त्र, ढेला, कशा, लकडी, मुक्का, अरत्नि,
हाथ पैर के तले, दाँत तथा अन्य इसी प्रकार के कारणो से देह या अगो पर
चोट लगने से उत्पन्न होता है । अभिघातजन्य ज्वर मे प्रायः करके वायु रक्त
को दूषित कर पीडा, सूजन, विवर्णता (रग परिवर्त्तन), वेदना तथा ज्वर
उत्पन्न करता है ॥ ११३-११४ ॥
कामशोकभयक्रोधैरभिषक्तस्य यो ज्वरः ।
सोऽभिषङ्गज्वरो ज्ञेयो यश्च भूताभिषङ्गजः ॥ ११५ ॥
कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं त्रयो मलाः ।
भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति भूतसामान्यलक्षणाः ॥ ११६ ॥
भूताधिकारे व्याख्यातं तदष्टविधलक्षणम् ।
धौंकनी के तुल्य हो, गिर पडे, सो जाय, बके, उसे अभिन्यास ज्वर कहते है ।
यह सन्निपात-ज्वर असाध्य है ।

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१

अभिषङ्गजन्य ज्वर—काम शोक, भय क्रोध तथा भूतो के संसर्ग से
आक्रान्त होने पर जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसको अभिषङ्गज ज्वर कहते हैं।
काम शोक और भय से वायु, क्रोध से पित्त, और भूता के आक्रमण से तीनो
दोष कुपित होते है। भूतजन्य ज्वर मे भूता के सामान्य लक्षण रहते है। आठ
प्रकार के भूतो के लक्षण भूताधिकार (उन्माद चिकित्सा) मे कहेगे ॥११५-११६॥
विषवृक्षानिलस्पर्शात्तथाऽन्यैर्विषसंभवै ॥ ११७ ॥
अभिषक्तस्य चाप्याहुर्ज्वरमेकेऽभिषङ्गजम् ।
चिकित्सया विषघ्न्यैव प्रशमं लभते नरः ॥ ११८ ॥
कुछ आचार्यो का कहना है कि विषैले वृक्षो की वायु का स्पर्श तथा
अन्य इसी प्रकार विषयुक्त कारणो से उत्पन्न ज्वर अभिषङ्गजन्य ज्वर है।
इस प्रकार का ज्वर विषनाशक चिकित्सा से शान्त होता है। [विष से उत्पन्न
ज्वर मे मुख पर काली झांई, दाह, अतीसार और दिल का रुकना, भोजन मे
अनिच्छा, कपकपी, मूर्छा ओर बल की हानि होती है सु०।] ॥ ११७-११८ ॥
अभिचाराभिशापाभ्यां सिद्धानां यः प्रवर्तते ।
सन्निपातज्वरो घोरः स विज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ११९ ॥
सन्निपातज्वरस्योक्तं लिङ्गं यत्तस्य तत्स्मृतम् ।
चित्तेन्द्रियशरीराणामार्तयोऽन्याश्च नैकशः ॥ १२० ॥
सिद्ध पुरुषो के अभिचार (हिंसा के लिये किये होम आदि से) या अनि-
शाप द्वारा जो सन्निपात ज्वर उत्पन्न होता है, वह अतिशय कष्टसाध्य होता है।
सन्निपात ज्वर के लक्षण ही इस ज्वर के लक्षण होते है। चित्त, इन्द्रिय और
शरीर की अन्य पीडाये रोगी को दुःख देती हैं १ ॥ ११९-१२० ॥
प्रयोगं त्वभिचारस्य दृष्ट्वा शापस्य चैव हि ।
स्वयं श्रुत्वाऽनुमानेन लक्ष्यते प्रशमेन वा ॥ १२१ ॥
१ वृद्ध वाग्भट मे निम्न लक्षण कहे ह—
तत्राभिचारिकैर्मन्त्रैर्हूयमानस्य तप्यते ।
पूर्वं चेतस्ततो देह. ततो विस्फोटतृड्भ्रमे ।
सदाहमूर्च्छाग्रस्तस्य प्रत्यहं वर्धते ज्वर ॥
आभिचारिक मन्त्रो से हवन करने से पहले, चित्त और फिर देह तपता हे।
अनन्तर देह पर फुसिये, प्यास और भ्रम होता है, दाह और मूर्छा ग्रसती है
और दिनों दिन ज्वर बढता है।

२८२
चरकसंहिता
[ अ० ३
विविद्यादभिचारस्य शापस्य च तदात्मके।
यथाक्रमप्रयोगेण लक्षणं स्यात्पृथग्विधम् ॥ १२२ ॥
अन्य अनेक ज्वरों के लक्षण-अभिचार और अभिशाप ज्वर की परीक्षा स्वयं
अभिचार के प्रयोग को देखकर, अथवा अभिशाप को सुनकर ( रोगी के मुख से
या स्वयं ), अनुमान द्वारा अथवा इनकी चिकित्सा से शमन होने पर करनी
चाहिये। अभिचार और अभिशाप के नाना रूप होने से कर्मों के प्रयोग के
अनुसार ही इनके लक्षण भी नाना प्रकार के हो जाते हैं ॥ १२१-१२२ ॥
ध्याननिःश्वासबहुलं लिङ्गं कामज्वरे स्मृतम् ।
शोकजे बाष्पबहुलं त्रासप्रायं भयज्वरे ॥ १२३ ॥
क्रोधजे बहुसंरम्भं भूतावेशे त्वमानुषम् ।
मूर्च्छामोहमदग्लानिभूयिष्ठं विषसम्भवे ॥ १२४ ॥
केषाञ्चिदेषां लिङ्गानां सन्तापो जायते पुरः ।
पश्चात्तुल्यं तु केषांचिदेषु कामज्वरादिषु ॥ १२५ ॥
कामादिजानामुद्दिष्टं ज्वराणां यद्विशेषणम् ।
कामादिजानां रोगाणामन्येषामपि तत्स्मृतम् ॥ १२६ ॥
ते पूर्वं केवलाः पश्चान्निजैर्व्यामिश्रलक्षणाः ।
हेत्वौषधविशिष्टाश्च भवन्त्यागन्तवो ज्वराः ॥ १२७ ॥
कामजन्य ज्वर में—ध्यान ( एक ही चिन्ता ) निःश्वास का जोर २ से
बाहर आना । शोकजन्य ज्वर में—आंखों में आँसू आना, [ और बकना, सु० ]
भयजन्य ज्वर में डर लगना ( और बकना, सु० ) होता है । [ चित्त का गिरना
आलस्य, अर्धनिद्रा, दिल में दर्द शरीर का दुखना । सु० ] क्रोधजन्य ज्वर में
ज्वर की तीव्रता तथा अन्य लक्षण प्रबल रहते हैं, ( रोगी कांपता भी है ) । भूता-
विष्ट ज्वर में अमानुषीय ( मनुष्य की शक्ति से बाहर के ) कार्य करता है ।
विषजन्य ज्वर में मूर्च्छा, मोह, मद और ग्लानि होती है । कामजन्य आदि ज्वरों
में कभी कभी सन्ताप इन लक्षणों से पूर्व हो जाता है, कभी पीछे और कभी
साथ साथ में होता है । यहां पर कामादि से उत्पन्न ज्वरों के जो विशेष लक्षण
कहे हैं, वे लक्षण कामादि से उत्पन्न अन्य रोगों ( उन्माद आदि ) में भी होते हैं ।
आगन्तुज ज्वर प्रथम स्वतन्त्र रहता है, पीछे से वातादि दोषों के साथ सम्ब-
न्धित हो जाता है । इन ज्वरों में कारण तथा चिकित्सा अन्य ज्वरों से भिन्न
रहती है ॥ १२३-१२७ ॥

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २९३
१मनस्यभिहते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् ।
ज्वरः प्राप्नोति वाताद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ १२८ ॥
काम आदि द्वारा मन के आक्रान्त होने पर उत्पन्न ज्वर प्रथम अधिक
बलवान् नहीं होता । परन्तु जब शरीर के वातादि दोषों में मिल जाता है, तब
अधिक बलवान् हो जाता है ॥ १२८ ॥
संसृष्टाः सन्निपतिताः पृथग्वा कुपिता मलाः ।
रसाख्यं धातुमन्वेत्य पक्ति स्थानान्निरस्य च ॥ १२९ ॥
स्वेन तेनोष्मणा चैव कृत्वा देहोष्मणो बलम् ।
स्रोतांसि रुद्ध्वा सम्प्राप्ताः केवलं देहमुल्बणाः ॥ १३० ॥
सन्तापमधिकं देहे जनयन्ति नरस्तदा ।
भवत्यत्युष्णसर्वाङ्गो ज्वरितस्तेन चोच्यते ॥ १३१ ॥
स्रोतसां संनिरुद्धत्वात्स्वेदं ना नाधिगच्छति ।
स्वस्थानात्प्रच्युते चाग्नौ प्रायस्तरुणे ज्वरे ॥ १३२ ॥
ज्वर—पृथक् पृथक्, द्वन्द्व रूप में या सन्निपात रूप में कुपित वातादि
दोष रस नामक धातु का सहारा लेकर अग्नि को उसके असली स्थान से (आमा-
शय से) निकाल कर, अपनी गरमी से देह की गरमी को बढ़ाकर, स्रोतों को
बन्द करके, देह में फैलकर शरीर में अधिक (मात्रा से अधिक) सन्ताप उत्पन्न
कर देते हैं । उससे मनुष्य का ज्वर उत्पन्न हो जाता है । उसके सब अंग गरम
हो जाते हैं, इस अवस्था का 'ज्वर' कहते हैं । स्रोतों के रुक जाने से और
अग्नि के अपना स्थान छोड़ देने के कारण तरुण (नूतन) ज्वर में पसीना
नहीं आता ॥ १२९-१३२ ॥
अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च।
हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चाऽऽलस्यमेव च ॥ १३३ ॥
ज्वरोऽविसर्गी बलवान दोषाणामप्रवर्तनम् ।
लालाप्रसेको हृल्लासो क्षुन्नाशो विरस मुखम् ॥ १३४ ॥
स्तब्धमुग्रगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता ।
न निङ्गीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्याऽऽमस्य लक्षणम् ॥ १३५ ॥
आमज्वर के लक्षण—अरुचि, अविपाक, पेट में भारीपन, हृदय (आमा-
शय) का साफ न होना, तन्द्रा, आलस्य, निरन्तर ज्वर का बना रहना, ज्वर
१ मनस्यभिद्रुते पूर्वं कामाद्यैर्न तथा बलम् ।
ज्वर प्राप्नोति कामाद्यैर्मनो यावन्न दुष्यति ॥ इति गंगाधरसम्मतः पाठः ।

२६४ चरकसंहिता [अ० ३
का बलवान् होना, मल वा दोषों का बाहर न निकलना, मुख से लार बहना,
जी मचलाना, भूख का न लगना, मुख का स्वाद बदल जाना (विरसता),
गात्रो मे जडता, सुप्तता और भारीपन, बार बार थोडा २ मूत्र का आना, कच्चे
मल का आना और ग्लानि ये आमज्वर के लक्षण है ॥ १३३-१३५ ॥
ज्वरवेगोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः ।
मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ १३६ ॥
पच्यमान ज्वर के लक्षण—ज्वर का अधिक बढना, प्यास, प्रलाप, सास
का जोर से चलना, चक्कर आना, मल की प्रवृत्ति, उत्क्लेश (वमन की अभिरुचि),
ये पच्यमान ज्वर के लक्षण है ॥ १३६ ॥
क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् ।
दोषप्रवृत्तिरष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ १३७॥
निराम ज्वर—भूख का लगना, शरीर मे हल्कापन, ज्वर का घट जाना,
मल-मूत्र स्वेद का बाहर निकलना, तथा आठवे दिन तक दोष का रहना ये
निराम ज्वर के लक्षण है । [ साधारणत आठवे दिन मे दोषो का परिपाक हो
जाता है। परन्तु कई बार दोष आठ दिन से पूर्व भी पच जाते है और कई
बार इससे भी अधिक देर मे पचते है । इसलिये लक्षणा को देख कर पक्व दोष
की परीक्षा करे । जब ज्वर आप से आप कम हो जावे, देह हलका हो, मल
विचलित हो, तब दोषो का पाक हुआ जाने ] ॥ १३७ ॥
नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गान्नमैथुनम् ।
क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥ १३८ ॥
नवज्वर मे अपथ्य—दिन मे साना, स्नान करना, मालिश, मैथुन, क्रोध,
प्रवात (वायु का सीधा आना ), व्यायाम और कषाय रसवाले (कषाय
स्तम्भक होने से) सेवन नही करने चाहिये । [ कषाय शब्द से कपाय रस
वाले क्वाथ तथा अन्य कषाय कल्पना का भी निषेध है । परन्तु इस अवस्था
मे साधन कषाय न देकर, पाचक, मधुर कषाय दे सकते है। सोल्ह गुण जल
मे चतुर्थ भाग शेष करने से 'कषाय' बनता है। यह कषाय तरुण ज्वर मे न
देना चाहिये ] ॥ १३८ ॥
ज्वरे लङ्घनमेवादावुपदिष्टमृते ज्वरात् ।
क्षयानिलभयक्रोधकामशोकश्रमोद्भवात् ॥ १३६ ॥
लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले ।
विज्वरत्वं लघुत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते ॥ १४० ॥

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६५

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६५
प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत् ।
बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः ॥ १४१ ॥
ज्वर मे लङ्घन—आम से मिलकर दोष अग्नि को मन्द कर देते है, इसलिये
ज्वर मे लङ्घन ( उपवास या लघु-भोजन ) करना चाहिये । सब अवस्थाओ मे
अग्नि को बढाना चाहिये । इस समय का लङ्घन अमृत के समान गुणकारी होता
है । परन्तु क्षयजन्य, वातजन्य, भयजन्य, क्रोधजन्य, कामजन्य, शोकजन्य,
श्रमजन्य ज्वरो मे लङ्घन नहीं कराना चाहिये¹ । लङ्घन ( उपवास ) से दोषों
का क्षय होने पर जाठराग्नि प्रबल हो जाती है, बुखार उतर जाता है,
शरीर हल्का हो जाता है, भूख लगने लगती है² । लङ्घन तब
तक ही कराना चाहिये जिससे कि प्राण या बल ( शक्ति ) का ह्रास न होने
पाये । क्योकि आरोग्य बल पर ही निर्भर करता है और यह सब चिकित्सा
आरोग्य के लिये ही हैं ॥ १३६–१४१ ॥
लङ्घनं स्वेदनं कालो यवाग्वस्तिक्तको रसः ।
पाचनान्यविपक्कानां दोषाणां तरुणे ज्वरे ॥ १४२ ॥
तृष्यते सलिलं चोष्णं दद्याद्वातकफज्वरे ।
मद्योत्थे पैत्तिके वाऽथ शीतलं तिक्तकैः शृतम् ॥ १४३ ॥
दीपनं पाचनं चैव ज्वरघ्नमुभयं हि तत् ।
स्रोतसां शोधनं बल्यं रुचिस्वेदकरं शिवम् ॥ १४४ ॥
दोषो के पाचन—लङ्घन, स्वेदन ( पसीना लाना ), समय पर यवागू,
तिक्त रस ये वस्तुएँ तरुण ज्वर मे आम दोषो को पकाती हे । वात-कफजन्य
ज्वर मे प्यास लगने पर उष्ण जल देना चाहिये । मद्यपान से उत्पन्न ज्वर मे
तिक्त वस्तुओ से साधित शीतल जल देना चाहिये । यह दोनो प्रकार का पानी
अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, स्रोतो का शोधक, बलकारक, रुचिकारक,
पसीना लाने वाला और कल्याणकारक है ॥ १४२–१४४ ॥
१ लङ्घन से अभिप्राय शरीर का हल्का करने वाले कर्म और द्रव्यो से है ।
जब दोष आमाशय मे हो और उत्क्लेश ( उवकाई ) हो तो वमन करना उत्तम
है । जब तक रोगी के दोष घनीभूत बने रहे तब तक रोगी अनशन करे, उसके
बाद भोजन करे !
२ लङ्घन की पहिचान —वात, मूत्र, मल हो, गात्र हल्का हो, डकार हो,
हृदय और कण्ठ शुद्ध हो, आलस्य न हो, पसीना हो, भूख, प्यास एक साथ
लगे, चित्त प्रसन्न हो तो जाने लङ्घन ठीक हुआ है ।