चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 293, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २७९
अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्यैतानि लक्षयेत् ॥ ४० ॥
अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण—शरीर के अन्दर दाह, प्यास का अधिक होना,
प्रलाप, श्वास का तेज़ी से चलना, चक्कर आना, सन्धियों और अस्थियों म शूल,
पसीने का आना, दोषों तथा वर्च (मल) का रुक जाना, बाहर न आना, ये
अन्तर्वेग ज्वर के लक्षण हैं ॥ ३६-४० ॥
सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम् ।
बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ॥ ४१ ॥
बहिर्वेग ज्वर के लक्षण—ज्वर में बाह्य ताप अधिक रहता है, तृष्णा,
प्रलाप आदि लक्षण थोड़ी मात्रा में होते हैं, यह ज्वर सुखसाध्य है ॥४१॥
प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः ।
कालप्रकृतिमुद्दिश्य प्राच्यते प्राकृतो ज्वरः ॥ ४२ ॥
उष्णमुष्णन संवृद्ध पित्तं शरदि कुप्यति ।
चितः शीते कफश्चैव वसन्ते समुदीर्यते ॥ ४३ ॥
वसन्त और शरद् ऋतु में उत्पन्न होने वाला प्राकृत ज्वर सुखसाध्य है।
वसन्त में उत्पन्न होनेवाला कफज्वर, शरद् में उत्पन्न होने वाला पित्तज्वर है।
[ वर्षाऋतु में होनेवाला वातज्वर प्राकृत होते हुए भी सुखसाध्य नहीं है।]
यहाँ पर काल-स्वभाव को देखकर ही यह प्राकृत ज्वर कहा जाता है। सञ्चित
हुआ उष्ण गुणवाला पित्त धूप आदि की उष्णिमा के कारण शरद् ऋतु में
कुपित होता है। इसी प्रकार से शीतकाल में सञ्चित कफ वसन्त ऋतु में
कुपित होता है ॥ ४२-४३ ॥
वर्षास्वम्लविपाकाभिरोषधीभि १सवारिभिः ।
सञ्चितं पित्तमुद्रिक्तं२ शरद्यादित्यतेजसा ॥ ४४ ॥
ज्वरं संजनयत्याशु तस्य चानुबलः कफः ।
प्रकृत्यैव विसर्गाच्च तत्र नानशनाद्भयम् ॥ ४५ ॥
प्राकृत पैत्तिक ज्वर—वर्षाऋतु में ओषधियों और जलों के अम्लविपाकी
होने से सञ्चित पित्त शरद् ऋतु में सूर्य के तेज से प्रकुपित होकर शीघ्र ज्वर को
उत्पन्न करता है। काल के स्वभाव तथा विसर्ग के कारण इस ज्वर के साथ
कफ का अनुबन्ध हो जाता है। अतः प्रकृति स्वभाव तथा विसर्ग काल होने से
लंघन करने पर भी कोई नुकसान नहीं होता ॥ ४४-४५ ॥
१. 'रद्भिरोषधिभिस्तथा' इति च पाठः । २. 'पित्तमुत्क्लिष्टं' इति च ।