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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 616 में से

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पृष्ठ 295

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २८१
सप्ताहाद्वा दशाहाद्वा द्वादशाहात्तथैव च ।
सप्रलापभ्रमश्वासस्तीक्ष्णो हन्याज्ज्वरो नरम् ॥ ५२ ॥
प्रलाप, भ्रम ( चक्कर आना ), श्वास इन लक्षणों से युक्त तीक्ष्ण ज्वर सात
दिन में, वातजन्य दस दिन में, पित्तजन्य और बारह दिन में कफजन्य ज्वर
घातक होता है ॥ ५२ ॥
ज्वरः क्षीणस्य शूनस्य गम्भीरो दीर्घरात्रिकः ।
असाध्यो बलवान् यश्च केशसीमन्तकृज्ज्वरः ॥ ५३ ॥
क्षीण और शोष से युक्त व्यक्ति में गम्भीर और दीर्घकाल तक रहने वाला
ज्वर असाध्य होता है । बलवान् ज्वर तथा जिसके कारण बालों में सीमंत
( माग ) पड़ जाती है, वह ज्वर भी असाध्य है ॥ ५३ ॥
स्रोतोभिर्विस्तृता दोषा गुरवो रसवाहिभिः ।
सर्वगात्रानुगा स्तब्धा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ॥ ५४ ॥
प्रकुपित और आम सहित होने से गुरु वातादि दोष रसवाही स्रोतों द्वारा
फैलकर सम्पूर्ण अंगों ( शरीर ) में पहुंच कर जड हो जाते हैं, इससे सन्तत
ज्वर उत्पन्न होता है ॥ ५४ ॥
दशाहं द्वादशाहं वा सप्ताहं वा सुदुःसहः ।
स शीघ्रं शीघ्रकारित्वात्प्रशमं याति हन्ति वा ॥ ५५ ॥
कालदूष्यप्रकृतिभिर्दोषस्तुल्यो हि सन्ततम् ।
निष्प्रत्यनीकः कुरुते तस्माज्ज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ५६ ॥
यथा धातुं तथा मूत्रं पुरीषं चानिलादयः ।
युगपच्चानुपद्यन्ते नियमात् सन्तते ज्वरे ॥ ५७ ॥
स शुद्ध्या वाप्यशुद्ध्या वा रसादीनामशेषतः ।
सप्ताहादिषु कालेषु प्रशमं याति हन्ति वा ॥ ५८ ॥
यदा तु नातिशुध्यन्ति न वा शुध्यन्ति सर्वशः ।
द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याऽऽश्रय स्तदा ॥ ५६ ॥
विसर्गं द्वादशे कृत्वा दिवसेऽव्यक्तलक्षणम् ।
दुर्लभोपशमः काल दीर्घमप्यनुवर्तते ॥ ६० ॥
इति बुद्ध्वा ज्वरं वैद्य उपक्रामेत्त सन्ततम् ।
क्रियाक्रमविधौ युक्तः प्रायः प्रागपतर्पणै. ॥ ६१ ॥
यह दुःसह सन्तत ज्वर शीघ्रकारी होने के कारण दस दिन में (पित्तजन्य
होने से), बारह दिन में (कफजन्य होने से), अथवा सात दिन में (वातजन्य