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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

११४ चरकसंहिता [ अ० ८
आसन, विषम शयन, विषम स्थान, पीड़न या चोट आदि से, क्रोध, शोक, भय,
ईर्षा, त्रास आदि से अथवा अन्य साहसिक कार्यों के कारण गर्भ गर्भाशय के
भीतर ही मर जाता है, उसमें इसके कारण पेट, चमडे मे ढपा, जैसा निश्चल,
फैला, शीतल हो जाता है । उदर में पत्थर सा पडा हुआ प्रतीत होता है ।
गर्भ में स्पन्दन नहीं होता, दर्द बहुत बढ़ जाती है । प्रसवकालिक दर्दें उत्पन्न
नहीं होतीं । योनि से किसी प्रकार का स्राव नहीं आता । आखे अपने आप
बाहर निकलती है, स्त्री भय से कातर हो जाती है । अन्धकार सा दीखता है,
पीड़ा होती है, चक्कर आते हैं, श्वास बहुत जोर से चलता है । ठीक प्रकार से
वेगों की उत्पत्ति नहीं होती । इन लक्षणों से समझ लेना चाहिये कि इस स्त्री का
गर्भ मर गया है ॥ २८ ॥
तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म संशमनमित्याहुरेके । मन्त्रा-
दिकमथर्ववेदविहितमित्येके । परिदृष्टकर्मणा शल्यहर्त्राऽऽहरणमि-
त्येके ॥ २९ ॥
व्यपगतगर्भशल्यां तु स्त्रियममगर्भां सुराशीध्वरिष्ट मधु-मदिरासवा-
नामन्यतममग्रे सामर्थ्यतः पाययेद् गर्भकोष्ठाविशुद्ध्यर्थमार्त्तिविस्म-
रणार्थं प्रहर्षणार्थं च । अतः परं हृद्यैर्बलानुरक्षिभिरस्नेह-संप्रयुक्तै-
र्यवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहारैरुपचरेदाव-धातु-क्लेद-विशोषण-
मात्रं कालम् । अतः परं स्नेहपानैर्वस्तिभिराहारविधिभिश्च दीपनीय-
जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-समाख्यातैरुपचरेत् । परिपक्वगर्भशल्या-
याः पुनविमुक्तगर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात् ॥ ३० ॥
इस मृत गर्भ रूपी शल्य को बाहर करने के लिये जरायु को निकालने की
विधि बरतनी चाहिये ऐसा कईयों का मत है । अथर्ववेदोक्त मंत्रों से कार्य
करना चाहिये यह दूसरों का मत है । जिस वैद्य ने इस कर्म को देखा हुआ
हो शल्य निकालने वाले उस वैद्य द्वारा यह काम करवाना चाहिये यह तीसरो
का मत है । दोष, धातु, क्लेद इनकी समय पर शान्ति रहे, इसलिये कच्चे गर्भ
(शल्य) के निकल जाने पर स्त्री को प्रथम सुरा, शीधु, अरिष्ट, मधु, मदिरा,
आसव इनमें से कोई एक पदार्थ शक्ति अनुसार पिला देना चाहिये । जिससे
कि गर्भाशय की शुद्धि हो जाये तथा दर्द को भूल जाये और मन में प्रसन्नता
आ जाये । इसके पीछे बल की रक्षा करने वाली घी आदि स्नेह से रहित
यवागू, आदि तत्कालोचित आहार तब तक देवे जब तक दोषयुक्त धातु की
क्लिन्नता न सूख जाये । इसके पश्चात् स्नेह-पान स्नेह बस्तिया, तथा दीपनीय,

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११५

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११५
जीवनीय, बृंहणीय, मधुर और वातनाशक आहार देना चाहिये । जिस स्त्री का
गर्भ-शल्य पूर्ण परिपक्व होकर फिर निकले उस स्त्री को उसी दिन ( जिस दिन
मृत गर्भ बाहर आवे ) स्नेह क्रिया ( स्नेह पान, स्नेहयुक्त भोजन ) देनी
चाहिये ॥ २६-३० ॥
परमतोनिविकारमाप्यायमानस्य गर्भस्य मासे मासे कर्मोपदक्ष्यामः ।
प्रथमे मासे शङ्किता चेद् गर्भमापन्ना क्षीरमनुपस्कृतं मात्रावच्छीतं काले
काले पिबेदन्तर्वत्नी, सात्म्यमेव च पुनर्भोजनं सायं प्रातश्च भुञ्जीत ।
द्वितीये मासे क्षीरमेव च मधुरौषधसिद्धम् , तृतीये मासे क्षीरं मधुस-
र्पिर्भ्यामुपसंसृज्य । चतुर्थे मासे तु क्षीरनवनीतमक्षमात्रमश्नीयात् ।
पञ्चमे मासे क्षीरसर्पिः । षष्ठे मासे क्षीर-सर्पिर्मधुरौषध-सिद्धम् । तदेव
सप्तमे मासे । तत्र गर्भस्य केशा जायमाना मातुर्विदाहं जनयन्तीति
स्त्रियो भाषन्ते, तन्नेति भगवानात्रेयः । किंतु गर्भोत्पीडनाद्धि वातपित्त-
श्लेष्माण उरः प्राप्य विदहन्ति । ततः कण्डूरूपजायते, कण्डूमूला च किक्कि-
शावाविर्भवति । तत्र कोलोदकेन नवनीतस्य मधुरौषधसिद्धस्य पाणि-
तलमात्र काले कालेऽस्यै दद्यात् । चन्दन-मृणाल-कल्केश्चास्याः स्तनादर
विमृदनीयात् शिरीष धातकी-सर्षप-मधुक-चूर्णैःकुटजार्जक-बीज-मुस्त-
हरिद्रा-कल्कैर्वा निम्ब-कोल-सुर-मञ्जिष्ठा-कल्कैर्वा पृषत हरिण-शश-रुधिर-
युतया त्रिफलया वा । करवीरपत्रसिद्धेन वा तैलेनाभ्यङ्ग, परिषेकः पुन-
र्मालतीमधुकसिद्धेनाम्भसा । जातकण्डूश्च कण्डूयनं वर्जयेत्त्वग्भेद-वैरू-
प्य-परिहारार्थं, असह्यायां तु कण्ड्वामुन्मर्दनोद्धर्षणाभ्यां परिहारः स्यात् ।
मधुरमाहारजातं वातहरमल्पमस्नेहलवणमल्पोदकानुपानं च भुञ्जीत ।
अष्टमे मासे क्षीरयवागू सर्पिष्मतीं काले काले पिबेत् ।
इसके आगे स्वस्थ गर्भ के लिये प्रत्येक मास में करने योग्य कर्मों का उप-
देश करते है । यदि प्रथम मास में गर्भ रह जाने की शंका हो तो गर्भवती स्त्री
कच्चे दूध को मात्रा मे थोड़ा थोड़ा करके दिन मे कई बार पीये । प्रातः और
सायं काल सात्म्य भोजन करे । दूसरे महीने में मधुर ( मुलहट्टी आदि ) औष-
धियों से सिद्ध दूध का पान करे । तीसरे मास में दूध को मधु और घी के साथ
मिलाकर सेवन करे । चौथे मास में दूध को तोले भर मक्खन के साथ खाये ।
पाचवे मास मे घी और दूध को । छठे मास में मधुर औषधियों से सिद्ध घी,
दूध का सेवन करे । यही सातवें मास में खाये । गर्भ के उत्पन्न होते हुए केश
माता के देह में जलन उत्पन्न करते हैं—ऐसा स्त्रियां कहती हैं । भगवान् आत्रेय
का कहना है कि यह ठीक नहीं है,

११६ चरकसंहिता [ अ० ८
तीसरे मास में ही केश बनने आरम्भ हो जाते है, सातवें मे नही ] परन्तु गर्भ
के उत्साडन के कारण वात, पित्त, कफ छाती में आकर जलन उत्पन्न करते
है। इस जलन से खाज उत्पन्न होती है । खाज के कारण ही किक्किश अर्थात्
चर्म का फटना होता है। इसके लिये बेर के पत्तों के पानी से मधुर औषधियो
से सस्कृत मक्खन की पाणितल ( चुल्लू भर ) मात्रा को थोड़ी थोड़ी देर मे
देना चाहिये । चन्दन, और बिस इनके कल्क से स्तन और उदर के बीच में
लेप करना चाहिये । अथवा सिरस, धाय के फूल, सरसो, महुवा, इनके चूणो
से, या कुड़े, अर्जक बीज, मुस्ता, हल्दी इनके कल्क से, अथवा नीम, बेर,
तुलसी, मजोठ इनके कल्क से, या पृषत्-हरिण, खरगोश इनके रक्त में मिले
त्रिफला से स्तन और उदर पर लेप करना चाहिये । अथवा कनेर के पत्तों से
सिद्ध तैल की मालिश करनी चाहिये । चमेली, मुलहठी से सस्कृत पानी में
स्नान कराना चाहिये । खाज उठने पर स्त्री नहीं खुजावै जिससे कि त्वचा न
फटे या रंग परिवर्त्तित न हो। यदि खाज असह्य हो तो मर्दन या उद्घर्षण
( उबटन आदि ) से शान्त करनी चाहिये । खाने के लिये मधुर वातनाशक,
थोड़े स्नेहवाला, नमकीन आहार, थोड़े पानी के साथ खाना चाहिये । आठवे
मास में घी से युक्त दूध में बनी यवागू खावे ।
तन्नेति भद्रकाप्यः, पैङ्गल्याबाधो ह्यस्या गर्भमागच्छेदिति ।
अस्त्वत्र पैङ्गल्याबाध इत्याह भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः, नत्वेवैतन्न
कार्य, एवं कुर्वती ह्यरोगाऽऽरोग्य-बल-वर्ण-स्वर-सहनन-सपदुपेतं ज्ञातीना
श्रेष्ठमपत्य जनयति । नवमे तु खल्वेना मासे मधुरौषधसिद्धेन तैले-
नानुवासयेत्, अतश्चावास्यास्तलपिचु योनौ प्रणयेद्गर्भस्थानमार्गस्ने-
हनार्थम् । यदिदं कर्म प्रथम मासमुपादायोपदिष्टमानवमान्मासात्।
तेन गर्भिण्या गर्भसमये गर्भधारणे कुक्षिकटीपार्श्वपृष्ठ मृदु भवति ।
वातश्चानुलोमः संपद्यते, मूत्रपुरीषे च प्रकृतिभूते सुखेन मार्गावापद्येते,
चर्मनखानि च मार्दवमुपयान्ति, बलवर्णौ चोपचीयेते, पुत्रं चेष्ट सपदु-
पेत सुखिन सुखेनैषा काले प्रजायत इति ॥ ३१ ॥
भद्रकाप्य ऋषि का कहना है कि यह ठीक नही है। क्योंकि इस प्रकार
करने से गर्भ की आखें पीली हो जाएगी। भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का कथन
है कि भले ही गर्भ मे पिंगलता का दोष आजाये तथापि आठवे मास में घी
युक्त यवागू ही देनी चाहिये । क्योकि ऐसा करने से रोगरहित नीरोग, बल, वर्ण
स्वर, शरीर इनके उत्तम गुणों से युक्त, बान्धवों में श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होती

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११७
हैं। [ पिंगलता दोष की चिकित्सा उत्तर काल में सुगम है। ] नवम मास में
मधुर ओषधियों से सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । मधुर औषध
मे सिद्ध इसी तैल के फोये को योनि में रखे जिससे गर्भ के आने के मार्ग में
स्नेहन ( चिकनापन ) हो जाये । * जो गर्भिणी प्रथम मास से लेकर नवम
मास तक इस ऊपर कहे अनुसार कार्य करती रहती है उस स्त्री के कुक्षि, कटि,
पीठ और पार्श्व गर्भ समय मे और गर्भ धारण काल में कोमल रहते हैं। वायु
का अनुलोमन होता है। मल मूत्र स्वस्थ रूप में सुखपूर्वक बाहर आते हैं।
त्वचा और नख भी कोमल रहते हैं। बल वर्ण बढता है, वाञ्छित, ऐश्वर्य-
शाली, सुखी पुत्र सुखपूर्वक ठीक समय में उत्पन्न होता है ॥ ३१ ॥
प्राक्चैवास्या नवमान्मासात्सूतिकागारं कारयेदपहतास्थिशर्करा-
कपाले देशे प्रशस्त-रूप-रस-गन्धाया भूमौ प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा बैल्वानां
काष्ठानां तैन्दुकैङ्गुदकानां भल्लातकानां वारुणानां खादिराणां वा । यानि
चान्यान्यपि ब्राह्मणाः शंसेयुरथर्ववेदविदः, तद्वसनालेपनाच्छादना-पि-
धान-संपदुपेतं वास्तुविद्या-हृदय-योगाग्नि-सलिलोलूखल-वर्चः स्थान-
स्नान-भूमिमहानसमृतुसुखं च से नयेत् ॥ ३२ ॥
गर्भिणी के नवा मास लगने से पूर्व ही ऐसा सूतिकागार बनवावे जिस
स्थान में हड्डी, मट्टी या ठोकरे आदि न हो। श्रेष्ठ रूप, रस, गन्धवाली भूमि
में पूर्व या उत्तर की ओर घर का मुख हो और जिसके चारों ओर तिन्दुक या
इगुदी अथवा भिलावे या खैर की लकड़ी से या विल्व की लकड़ी से चारों ओर
का घेरा बनाया जाये। इनके अतिरिक्त अथर्ववेद को जानने वाला ब्राह्मण जो
जो बतावे वह करे । घर में गर्भिणी के वस्त्र, आलेपन, बिस्तर, किवाड़ आदि
होने चाहिये । मकान को बनाने की कला के अनुसार आग, जल, ऊखल और
मल त्याग के स्थान हों, स्नानगृह, रसोई आदि प्रत्येक ऋतु में सुखकारक बनावे
और उनका उपयोग करें ॥ ३२ ॥
तत्र सर्पिस्तैल-मधु-सैन्धव-सौवर्चल-काल-विड्-विडङ्ग-कुष्ठ-किलिम-
नागर-पिप्पली-पिप्पलीमूल-हस्ति-पिप्पली-मण्डूकपर्ण्येलालाङ्गली-वचा-
चव्यचित्रक-चिरबिल्व-हिङ्गु-सर्षप-लशुन-कनक-कण-कणिकानी-पातसी-
बल्वज-भूर्ज-कुलत्थ-मैरेय-सुरासवाः सन्निहिताः स्युः, तथाऽश्मानौ द्वौ,
द्वे च कुण्डमुसले, द्वे उलूखले, खरो वृषभश्च, द्वौ च तीक्ष्णौ सूचीपिप्पल्यौ
सौवर्णराजतौ, शस्त्राणि च तीक्ष्णायसानि, द्वौ च बिल्वमयौ पर्यङ्कौ,

  • जिससे वायु का शमन हो, प्रसव वेदना कम हो ।

११८ चरकसंहिता [ अ० ८
तैन्दुकैङ्गुदानि च काष्ठान्यग्निसंधुक्षणानि, स्त्रियश्च बह्वयो बहुशः प्रजाताः
सौहार्दयुक्ताः सततमनुरक्ताः प्रदक्षिणाचाराः प्रतिपत्तिकुशला प्रकृति-
वत्सलास्त्यक्तविषादा क्लेशसहिष्ण्योऽभिमताः, ब्राह्मणाश्चाथर्ववेदविदो
यच्चान्यदपि तत्र समर्थं मन्येत, यच्चान्यच्च ब्राह्मणा ब्रूयुः स्त्रियश्च वृद्धाः,
तत् तत् कार्यम् ॥ ३३ ॥
इस सूतिकागार में घी, तैल, शहद, सैन्धा नमक, सौवर्चल, काला नमक विडूर-
नमक बिडंग, कूठ, देवदारु, सोंठ, पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, मण्डूक-
पर्णी, एला, लागली, वच, चव्य, चित्रक, करज, हींग, सरसों, लहसुन, निर्मली
कण, कणिका (मोटे चावल, चावलों की कणिया), कदम्ब, अलसी, बल्वज,
भोजपत्र, कुलत्थी, मैरेय, सुरा आसव ये वस्तुए पास में होनी चाहियें। द
पत्थर, दो छोटे मूसल, दो ऊखल, चण्ड वृषभ, दो तीक्ष्ण सूई रखने के पात्र
(सूई समेत), सोना चांदी से बने शस्त्र, तीक्ष्ण लोहे से बने औज़ार, बेल
की लकड़ी से बने दो पलंग, अग्नि में जलाने के लिये तिन्दुक और हिंगोट
की लकड़िया । जिन्होंने बहुत सी संतान उत्पन्न की हो, स्नेह करने वाली,
सौहार्द युक्त, न घबराने वाली, कर्म में कुशल उत्तम सूझ वाली, स्वभाव
से प्रेम रखने वाली, आलस्य रहित, क्लेश को सहन करने वाली ऐसी अनेक
स्त्रिया रहनी चाहियें। अथर्ववेद को जानने वाले ब्राह्मण और अन्य ब्राह्मण और
वृद्ध स्त्रिया जो २ बतायें वह २ करना चाहिये ॥३३॥
ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्रयोगमुपगते प्रशस्ते
भगवति शशिनि कल्याणे करणे मैत्रे मुहूर्ते शान्तिं कृत्वा गोब्राह्मणम-
ग्निमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यस्तृणोदकं मधुलाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणेभ्यो-
ऽक्षतान्सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानीष्टानि दत्त्वा, उदकपूर्वमास-
नस्थेभ्योऽभिवाद्य पुनराचम्य स्वस्ति वाचयेत्, ततः पुण्याहशब्देन
गोब्राह्मणमनुवर्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत्सूतिकागारं, तत्रस्था च प्रसव-
काल प्रतीक्षेत ॥ ३४ ॥
नवम मास आरम्भ होने पर पवित्र दिन में, प्रशस्त नक्षत्र के साथ भग-
वान् चन्द्रमा का योग होने पर, कल्याणकारो मित्र मुहूर्त्त में, शान्ति होम करके
गाय, ब्राह्मण, अग्नि और पानी का प्रथम प्रवेश करावे । गायो को घास, पानी
और शहद तथा लाजा देनी चाहिये । ब्राह्मणों को आसन पर बैठा कर अक्षत,
फल, नान्दीमुख श्राद्ध मे उपयोगी फल (खजूर आदि) जल सहित प्रदान
करके आचमन करके स्वस्तिवाचन करावे । इसके पीछे मांगलिक शब्दों के

साथ, गौ, ब्राह्मण के पीछे चलती हुई स्त्री भली प्रकार से सूतिकागार में प्रवेश
करे, वहा पर प्रसव काल की प्रतीक्षा करे ॥ ३४ ॥
तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति ।
तद्यथा—क्लमो गात्राणा, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्त-
बन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्स्रंसनं, अधो गुरुत्व, वङ्क्षण-बस्ति-कटी-
कुक्षि-पार्श्व-पृष्ठ-निस्तोदो, योनेः प्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषश्चेति । ततोऽन-
न्तरमावीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य ॥ ३५ ॥
प्रमव काल उपस्थित होने पर निम्न लक्षण उपस्थित होते हैं। जैसे—
शरीर में श्रान्ति, चेहरे और आखों में ग्लानि (विवर्णता), बन्धन मुक्त होता
प्रतीत होता है, गर्भाशय का नीचे को आना, निचले अगो में भारीपन वंक्षण,
बस्ति, कटि, कुक्षि, पार्श्व और पीठ में वेदना, योनि मे स्राव और भोजन में
अनिच्छा होती है। इसके अनन्तर प्रसव काल की वेदना आरम्भ हो जाती है
और गर्भ का जल बहने लगता है ॥ ३५ ॥
आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम् । तद-
ध्यासीत सा । तां ता समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रिय पर्युपा-
सीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीभिः सान्त्वनीयाभिः ॥ ३६ ॥
प्रसव काल की वेदनाओं के आरम्भ होने पर भूमि पर कोमल बिस्तर
लगा देना चाहिये । इस बिस्तर पर वह बैठ कर जाये । इसको चारों ओर से
स्त्रिया (पूर्वोक्त गुणोवाली) घेर ले और शान्ति और आश्वासन देनेवाले
वचनों से सान्त्वना देती रहे ॥ ३६ ॥
सा चेदावाभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैन ब्रूयात्—उत्तिष्ठ
मुसलमन्यतरत् गृहीष्व, अनेनतदुदूखलं धान्यपूर्ण मुहुर्मुहुरभिर्जाह मुहु-
र्मुहुरवजृम्भस्व चङ्क्रमस्व चान्तरन्तरा, इत्येवमुपदिशन्त्येके ॥ ३७ ॥
वेदनाओ के कारण पीड़ित होने पर भी यदि बच्चा पैदा न हो तो इसको
आदेश करे कि उठ, दोनों में से किसी एक मूसल को लेकर धान्य से परिपूर्ण
ऊखल को बार बार कूट, बार बार अगडाई और जभाई ले, बार बार बीच मे
चल फिर । ऐसा कई आचार्य कहते हैं ॥ ३७ ॥
तन्नेत्याह भगवानात्रेयः—दारुण व्यायाम-वर्जनं हि गर्भिण्याः
सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलित-सर्वधातु-दोषाया-
सुकुमार्या नार्या मुसल-व्यायाम समीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा प्राणान्
हिस्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मा-

१२० चरकसंहिता [ अ० ८
~~ ~~~ ~~ ~~~ ~ ~~~ ~
न्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनु-
ज्ञेयमिति ॥ ३८॥
भगवान् आत्रेय का कहना है कि यह ठीक नहीं है । क्योंकि गर्भिणी स्त्री
के लिये कठोर व्यायाम करना सब अवस्थाओं में निषिद्ध है। खास कर प्रसव
के समय जब कि शरीर के सब धातु, दोष अस्थिर होते हैं, उस समय सुकुमार
शरीर वाली स्त्री का मूसल लेकर धान कूटने से वायु कारण को पा कर प्राणों
का नाश कर दे और उस समय गर्भिणी विशेष रूप से चिकित्सा के लिये
कृच्छ्रसाध्य होती है । इसलिये ऋषियों का मत है कि मूसल ग्रहण नहीं करना
चाहिये । अगड़ाई या चलना फिरना अवश्य करना चाहिये ॥ ३८ ॥
अथास्यै दद्यात्कुष्ठैला लाङ्गलीकी-वचा-चित्रक-चिरबिल्व-चूर्णमुपा-
घ्रातुं सा तन्मुहुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिशपाधूमं वा, तस्या-
श्चान्तरान्तरा कटी-पार्श्व-पृष्ठ-सक्थि-देशानीषदूष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसु-
खमवमृद्नीयान्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते ॥३६॥
इसको सूंघने के लिये कूट, इलायची, कलिहारी, वच, चित्रक, करज और
चविका इनका चूर्ण देना चाहिये । इस चूर्ण को स्त्री बार बार सूँघे । इसी
प्रकार भोज पत्र के या शीशम के पत्तों का धुवा देना चाहिये । बीच बीच में
गर्भिणी की कटि, पार्श्व, पीठ, टांगो को गुनगुने तैल से धीरे धीरे मलना
चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ नीचे की ओर आ जाता है ॥ ३६ ॥
स यदा जानीयाद्विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति, बस्तिशिरोऽ-
वगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामाव्यः, परिवर्तते अधो गर्भ इति, अस्यामव-
स्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहितुमुपक्रामयेत्, कर्णे चास्या मन्त्रमिम-
मनुकूला स्त्री जपेत् ॥ ४० ॥
जिस समय यह पता लगे कि गर्भ उदर से पृथक् हो गया, गर्भ का शिर
बस्ति में घुस रहा है, प्रसवकाल की वेदनाये जल्दी जल्दी होने लगी हैं, गर्भ
नीचे की ओर घूम रहा है तब इस अवस्था में स्त्री को पलंग पर लेटा कर
प्रवाहण ( बलपूर्वक मूत्र करने का सा जोर लगाने ) के लिये कहे । इस स्त्री
के कानों में एक परिचित हितैषिणी स्त्री निम्नलिखित मंत्र का जप करे ॥४०॥
'क्षितिर्जलं वियत्तेजो वायुर्विष्णुः प्रजापतिः ।
सगर्भां त्वां सदा पान्तु वैशल्यं च दिशन्तु ते ॥४१॥
प्रसुव त्वमविक्षिष्टमविक्षिष्टा शुभानने ।
कार्तिकेयद्युति पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम्' ॥४२॥ इति

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२१

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२१
पृथ्वी, जल आकाश, अग्नि, वायु, विष्णु और प्रजापति तुझ सगर्भा का
सदा पालन करे और तुझे शल्यरहित करें । हे शुभ सुन्दर मुख वाली ! तू बिना
किसी कठिनाई के क्लेशरहित गर्भ का प्रसव कर । तू स्कन्द से अभिरक्षित,
स्कन्द के समान तेजवाले पुत्र को उत्पन्न कर ॥ ४१ ४२ ॥
ताश्चैना यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः—अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः,
या ह्यनागतावीः प्रवाहयते व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्म भवति । प्रजा चास्या
अविकृता विकृतिमापन्ना वा श्वास-कास-शोष-प्लीह-प्रसक्ता वा भवति ।
यथा हि क्षवथूद्गार-वात-मूत्र-पुरीष-वेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालान्न
लभते कृच्छ्रेण वाप्यवाप्नोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा,
तथा चैषामेव क्षवथ्वादीनां संधारणमुपघातायोपपद्यते तथा प्राप्तका-
लस्य गर्भस्याप्रवाहणं, सा यथानिर्देशं कुरुष्वेति वक्तव्या, तथा च
कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत ततोऽनन्तर बलवत्तरं, तस्या च प्रवाह-
माणायां स्त्रियः शब्दं कुर्युः 'प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्र'-मिति,
तथाऽस्या हर्षेणाऽऽप्यायन्ते प्राणाः ॥ ४३ ॥
पूर्वोक्त गुणो वाली स्त्रिया इस स्त्री को शिक्षा देवे कि बिना वेदनाओं के
उत्पन्न हुए प्रवाहण ( जोर ) मत करना । जो स्त्री वेदनाओं के उत्पन्न हुए बिना
प्रवाहणकरती (जोर लगाती) है उसका श्रम व्यर्थ जाता है । इस स्त्री की स्वस्थ
प्रजा विकृत हो जाती है अथवा इस संतान को श्वास, कास, शोष, प्लीहा आदि
रोग लग जाते है । जिस प्रकार कि न उपस्थित हुए छींक, उद्गार, वायु,
मूत्र और मल के वेगों को बलपूर्वक बाहर नहीं कर सकते अथवा कठिनाई से
थोड़ा बाहर करते हैं, उसी प्रकार बिना समय के गर्भ को प्रवाहण करने से बाहर
नहीं निकाल सकते । जिस प्रकार कि छींक आदि के उपस्थित वेग को रोकने से
पीड़ा होती है, उसी प्रकार बाहर आते हुए गर्भ को रोकने में भी कष्ट होता है ।
इसलिये उसे निर्देशानुसार करने के लिए कहना चाहिये । इस प्रकार विधि
अनुसार करने मे प्रथम धीरे धीरे बल लगावे । इसके पीछे अधिक बल लगावे ।
बल लगाते ( प्रवाहण के ) समय स्त्रिया शब्द करें, “पैदा हुआ, पैदा हुआ
भाग्यशाली पुत्र, भाग्यशाली पुत्र पैदा हुआ ।” इस प्रकार प्रसन्नता के द्वारा
प्राणों को बल प्राप्त होता है, उसका उत्साह बना रहता है ॥ ४३ ॥
यदा च प्रजाता स्यात्तदैनामवेक्षेत काचिदस्या अपरा प्रपन्ना अप्र-
पन्ना वेति । तस्याश्चेदपरा न प्रपन्ना स्यादथैनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन
पाणिना नाभेरूपरिष्टाद्बलवनिष्पीड्य सव्येन पृष्ठत उपसंगृह्य सुनिर्धूतं

१२२ चरकसंहिता [ अ० ८
निर्धूनुयात्, अथास्याः पादपाष्र्ण्या श्रोणीमाकोटयेत्, तस्याः स्फिचा-
वुपसंगृह्य सुपीडितं पीडयेत् । अथास्या बालवेण्या कण्ठतालु परिमृ-
शेत् । भूर्जपत्र-काचमणि-सर्पनिर्मोकैश्चास्या योनिं धूपयेत् । कुष्ठताली-
शल्कं बलवजमूपे मैरेयसुरामण्डे तीक्ष्णे कोलत्थे वा मण्डूकपिप्पली-
संपाके वा समालोड्य पाययेदेना, तथा सूक्ष्मैला-किलिम-कुष्ठ-नागर विड-
ङ्ग-कालागुरु-चव्य-पिप्पली-चित्रकोपकुञ्चिका कल्कं खरवृषभस्य वा
जीवतो दक्षिणं कर्णमुत्कृत्य दृषदि जर्जरीकृत्य बल्वजयूषादीनामासा-
वनानामन्यतममस्मिन् प्रक्षिप्याऽऽलोड्य मुहूर्तस्थितमुद्धृत्य तदासावनं
पाययेदेनां शतपुष्पा-कुष्ठ-मदन-हिङ्गु-सिद्धस्य चैनां तैलस्य पिचु ग्राह-
येत् । अतश्चैवानुवासयेत्, एतैरेव चाऽऽसाधनैः फल जीमूत केक्ष्वाकु-धा-
मार्गव कुटज-कृतवेधन-हस्ति-पिप्पल्युपहितैरास्थापयेत्, तदास्थापनम-
स्या हि सह वात-मूत्र-पुरीषैर्निहृत्यपरामासक्ता वायोरनुलोमगमनात् ।
अन्यान्यपि हि वात-मूत्र-पुरीषाणि बहिर्गमनशीलानि सज्जन्ति ॥ ४४॥
जिस समय गर्भ उत्पन्न हो जाये उस समय देखे कि उसकी अपरा अर्थात्
( आवल नावल, जेर ) बाहर आ गई वा नहीं ? यदि अपरा बाहर न आई हो
तो कोई एक स्त्री दायें हाथ से नाभि के ऊपर जोर से दबाये और बायें हाथ से
पीठ को पकड़ कर खूब अच्छी प्रकार झटके देवे, कपाव । पाव की एड़ी से इस
गर्भिणी की कमर पर दबाव दे । बालो से बनी वेणी द्वारा इसके कण्ठ और
तालु को स्पर्श करे ( जिससे कि खाज होकर अपान वायु प्रबल होवे ) । भोज-
पत्र, काचमणि, साप को कैचुली का धुवा यानि में देना चाहिये । कूठ, तालीस-
पत्र के कल्क को, बल्वज के काथ मे या मैरेय, सुरा, मण्ड मे या कुलत्था के तीक्ष्ण
काथ मे, या मण्डूकपर्णी तथा पिप्पला के सम्मिलित कषाय मे घालकर पिलावे ।
इसी प्रकार छोटी इलायची, देवदारु, कूठ, सोंठ, विडंग, पिप्पली, काला अगरु,
चविका, चित्रक, काला जीरा इनके कल्क को अथवा जोते हुए तीक्ष्ण वृषभ
के दक्षिण कान को काट कर पत्थर पर पीस कर बल्वज काथ आदि में से
किसी एक क्वाथ में घोल कर कुछ देर रख कर फिर छान कर पिलावे । सौंफ,
कूठ, मैनफल, हींग इनमे सिद्ध तेल के कषाय के फाये को योनि मे रखे । इसके
उपरान्त अनुवासन बस्ति देवे । बल्वजादि क्वाथों के साथ मदनफल, जीमूत
इक्ष्वाकु, धामार्गव, कुटज, कृतवेधन, हस्तिपिप्पली के ( कल्पस्थान मे कहे )
कल्पों से आस्थापन करना चाहिये । इस आस्थापन क्रिया करने से फँसी हुई
अपरा, वायु, मूत्र, मल के साथ बाहर आ जाती है । वायु के प्रतिलोम होने

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२३

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२३
से अन्य बाहर निकलने वाले वायु, मूत्र, मल भी अन्दर रुक जाते हैं। वे
आस्थापन से बाहर आ जाते हैं ॥ ४४ ॥
तस्यास्तु खल्वपरायाः प्रपतनार्थं कर्मणि क्रियमाणे जातमात्रे-
ऽस्यैव कुमारस्य कार्याण्येतानि कर्माणि भवन्ति । तद्यथा—अश्मनोः
संघट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतादकेनोष्णोदकेन वा मुखेन परिषेकः, तथा
संक्लेशविहतान् प्राणान् पुनर्लभेत, कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनि-
ष्पुनीयुर्यद्यचेष्टः स्याद्यावत्प्राणानां प्रत्यागमनं ततः प्रत्यागतप्राणं
प्रकृतिभूतमभिसमीक्ष्य स्नानोदकग्रहणाभ्यामुपपादयेत् ।
अपरा को गिराने के लिये उपयुक्त कर्म करते हुए उत्पन्न हुए बच्चे के
निम्न कार्य करने योग्य होते हैं यथा—कानों के पास म [ श्रवण शक्ति को
जागृत करने के लिये ] पत्थरों को बजाना । ऋतु भेद से गरमियों मे शीतल
जल से, सरदियों मे गरम जल से स्नान कराना चाहिये । इस प्रकार करने से
योनिच्छिद्र में से आने के कारण पीड़ित क्लेश अनुभव करने वाले प्राणों को
पुनः सुख प्राप्त कराता है। यदि शिशु चेष्टारहित हो तो इस को सींक से बने
छाज से हवा करनी चाहिये, जब तक कि श्वास न आजाये। श्वास आने पर
तथा स्वस्थ अवस्था मे देख कर उसको स्नान कराना तथा उसके मलमार्ग
स्वच्छ करने चाहिये ।
अथास्य ताल्वोष्ठ-कण्ठ-जिह्वा-प्रमार्जनमारभेताङ्गुल्या सुपरिलि-
खितनखया सुप्राक्षालितोपधान-कार्पास-पिचुमत्या, प्रथमं प्रमार्जितस्य
चास्य शिरस्तालु कार्पासपिचुना स्नेहगर्भेण प्रतिच्छादयेत्, ततोऽस्या-
नन्तरं कार्यं सैन्धवोपहितेन सर्पिषा प्रच्छर्द्दनम् ॥ ४५ ॥
इस बच्चे के तालु, आठ, कण्ठ, जिह्वा को साफ करना प्रारम्भ करे, इसके
लिये जिसके नख कटे हो वह उस से अगुंली धोई हुई स्वच्छ रुई क फाये
द्वारा उसे साफ करे, नहाये बच्चे के प्रथम मुख को साफ़ करे और शिरतालु
के ऊपर तैल मे भीगे रुई के फाये को रखे। इसके पीछे सैन्धव मे मिले घी
के द्वारा वमन करावे जिससे कफ निकल जाये ॥ ४५ ॥
अथ नाड्यास्तस्य कल्पनविधिमुपदेक्ष्यामः—नाभिबन्धनात्प्रभृ-
त्यष्टाङ्गुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्गृहीत्वा
तीक्ष्णेन रौक्मराजतायसानां छेदनानामन्यतमेनार्धधारेण छेदयेत्ताम् ।
अग्रे सूत्रेणोपनिबध्य कण्ठेऽस्य शिथिलमवसृजेत् । तस्य चेन्नाभिः
पच्येत, तां लोध्र-मधुक-प्रियङ्गु-देवदारु-हरिद्रा-कल्क-सिद्धेन तैलेनाभ्य-

१२४ चरकसंहिता [ अ० ८

ज्यात्, एषामेव तैलौषधानां चूर्णेनावचूर्णयेत्, एष नाडीकल्पनविधि-
रुक्तः सम्यक् ॥ ४६ ॥
इसके पश्चात् नाड़ी के काटने की विधि का उपदेश करते हैं । नाभिबन्ध
से लेकर आठ अगुल ऊपर एक, और उससे जरा ऊपर दूसरा बन्धन लगा
कर उन दोनों बन्धनों के बीच के अन्तर में मध्यभाग को धीरे से पकड़ कर
स्वर्ण, चांदी या लोहे के बने किसी एक तेज अर्धधार शस्त्र से नाड़ी काट दे ।
नाल के अग्रभाग मे धागा बांधकर धीरे से (ढीली) गले म बाँध देनी चाहिये ।
यदि बच्चे की नाभि पक जाए तो—लोध, मुलहठी, फूलप्रियंगु, देवदार हल्दी
इनके कल्क द्वारा संस्कृत तैल को लगाकर इन्हीं ओषधियो के चूर्ण को ऊपर से
छिड़क देना चाहिये । यह नाड़ी कल्पन करने की विधि कह दी है ॥ ४६ ॥
असम्यक्कल्पने हि नाड्या आयाम-व्यायामोत्तुण्डिका-पिण्डलिका-
विनामिका-विजृम्भिका-संज्ञेभ्यो भयम् । तत्राविदाहिभिर्वात-पित्त-प्रश-
मनैरभ्यङ्गोत्सादन-परिषेके सर्पिर्भिश्चोपक्रमेत गुरुलाघवमभिस-
मीक्ष्य ॥ ४७ ॥
नाड़ी के भली प्रकार न काटने से नाड़ी की आयाम ( लम्बाई ), व्यायाम
चौड़ाई ( विस्तार ), हुण्डिका, [ लम्बा और मोटापन ], पिण्डलिका [ गोल
चक्कर के आकार की ], विनामिका [ किनारों से ऊची, बीच में दबी ], विजृ-
म्भिका [ बार बार बढ़ने घटने वालो ] आदि रोग हो जाते हैं । दोषों की
गुरुता लघुता देख कर दाह उत्पन्न न करने वाले वात पित्त को शान्त करने
वाले घृतो से तैलमर्दन, उबटन और स्नान आदि करावे ॥ ४७ ॥
ततोऽनन्तर जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा—मधुसर्पिषी
मन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथम प्राशितुमस्मै दद्यात्, स्तनमत ऊर्ध्व-
मेतेनैव विधिना दक्षिणं पातु पुरस्तात्प्रयच्छत्, अथातः शीर्षतः
स्थापयेदुदकुम्भं मन्त्रोपमन्त्रितम् । अथास्य रक्षा विदध्यात्—आदनी-
खदिर कर्कन्धु-पीलु-परूषक-शाखाभिरस्य गृह भिषक्समन्ततः परि-
वारयेत्, सर्वतश्च सूतिकागारस्य सर्पपातसी-तण्डुल-कण-कणिकाः प्रकि-
रेयुः, तथा तण्डुल-बलि-होमः सततमुभयतः काल क्रियेताऽऽनामकर्मणः।
द्वारे च मुसल देहलीमनुतिरश्चीनं न्यस्तं कुर्यात्, वचा-कुष्ठक्षौमक-हिङ्गु-
सर्षपातसी-लशुन-कण-कणिकानां रक्षोघ्नसमाख्यातानां चौषधीना
पोट्टलिकां बद्ध्वा सूतिकागारस्थोत्तरदेहल्यामवसृजेत्तथा सूतिकायाः
कण्ठे सपुत्रायाः स्थाल्युदक-कुम्भ-पर्यङ्केष्वपि तथैव च, द्वयोर्द्वारपक्षयोः

द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्‌। )
द्द्द्द्द्द्द्द्दद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्

१२६ चरकसंहिता [ अ० ८
सर्पिस्तैलाभ्यामभ्यज्य वेष्टयेदुदरं महता वाससा, तथा 'तस्या न वायु-
रुदरे विकृतिमुत्पादयत्यनवकाशत्वात् । जीर्णे तु स्नेहे पिप्पल्यादिभिरेव
सिद्धा यवागू सुस्निग्धा द्रवा मात्रशः पाययेत्, उभयतः कालमच्छेन
चोष्णोदकेन परिषेचयेत्प्राक्स्नेहयवागूरानाभ्याम् । एव पञ्चरात्रं सप्तरात्रं
वानुपाल्य ततः क्रमेणाप्याययेत् । स्वस्थवृत्तमेतावत्सूतिकायाः ॥ ४९ ॥
जच्चा स्त्री को भूख लगने पर शक्ति के अनुसार खूब यत्न से स्नेहपान
कराना चाहिये । घी, तैल, वसा या मज्जा ५ जो स्नेह जच्चा के प्रकृति के
अनुकूल हो, उसके साथ पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक और सोंठ का चूर्ण मिला
कर देना चाहिये । स्नेहपान करते समय पेट पर घी या तैल मल कर भारी
वस्त्र लपेट देना चाहिये । इस प्रकार करने से उदर में वायु विकार उत्पन्न
नहीं होते, क्योंकि वायु को अवकाश नहीं मिलता । स्नेह के जीर्ण होने पर
पिप्पलीमूल आदि से सिद्ध की हुई, घृत युक्त, पतली यवागू को थोड़ी मात्रा में
प्रातः और सायं दोनो समय देना चाहिये । स्नेह और यवागू पिलाने से पूर्व
निर्मल गरम पानी से स्नान करवा देना चाहिये । इस प्रकार पांच या सात
रात्रि तक इस विधि को बरत कर पीछे क्रम से [ साधारण आहार-विहार ]
बढ़ाना चाहिये । यह सूतिका स्त्री का स्वस्थवृत्त है ॥ ४९ ॥
तस्यास्तु खलु यो व्याधिरुत्पद्यते स कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वा
गर्भवृद्धि क्षयित-शिथिल-सर्वशरीर-धातुत्वात्प्रवाहण-वेदना-क्लेदन-रक्त-
निःस्रुति-विशेष-शून्य-शरीरत्वाच्च, तस्मात्ता यथोक्तेन विधिनोपचरत् ।
भौतिक जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धैरभ्यङ्गोत्सादन-परिषेका-
वगाहनान्नपान-विधिभिर्विशेषतश्चोपचरेत् । विशेषतो हि शून्यशरीराः
स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥ ५० ॥
प्रसूता स्त्री को विपरीत आहार विहार के कारण जो रोग उत्पन्न हो जाता
है, वह कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है । क्योंकि गर्भ की वृद्धि के कारण
अन्य धातुओं का पोषण न होने से सब धातु क्षीण और शिथिल हो जाते हैं ।
इसी प्रकार गर्भ के प्रवाहण के कारण उत्पन्न वेदना, क्लेदन ( स्राव ), तथा
रक्त के विशेष रूप में निकलने से सम्पूर्ण शरीर शून्य, नि सज्ञ बना होता है ।
भूतहर गुग्गुलु, महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर
ओषधियों से सिद्ध स्नेह-पान, अभ्यग, उत्सादन, परिषेक, अवगाहन, खान-
पान विधि विशेष रूप से बरतनी चाहिये । इस विधि के सेवन से अचेत हुई
स्त्रियों में भी चेतना आ जाती है ॥ ५० ॥

अ० ८] शारीरस्थानम १२७

अ० ८] शारीरस्थानम १२७
दशम्यां निश्यतीताया सपुत्रा स्त्री सर्वगन्धोषधैर्गौरसर्षपैश्च स्नाता
लघ्वहतशुचिवस्त्रं परिधाय पवित्रेट्ट लघु-विचित्र-भूषणवती च संस्पृश्य
मङ्गलान्युचितामर्चयित्वा च देवता शिखिनः शुक्लवाससोऽव्यङ्गांश्च
ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा, कुमारमहतेन शुचिवाससाऽऽच्छादयेत्
प्राक्शिरसमुदक्शिरसं वा सवेश्य, 'देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमती'-
त्युक्त्वा, कुमारस्य पिता द्वे नामनी कारयेन्नाक्षत्रिकं नामाभिप्रायिकं
च । तत्राभिप्रायिकं नाम घोषवदाद्यन्तस्थान्तमूष्मान्तं वा वृद्धत्रिपु-
रुषानुकमनवप्रतिष्ठितं, नाक्षत्रिकं तु नक्षत्र-देवतासमानाख्यं द्व्यक्षरं
चतुरक्षरं वा ॥ ५१ ॥
दसवें दिन स्त्री पुत्र के साथ सम्पूर्ण गन्ध युक्त ओषधियों से तथा श्वेत
सरसों के उबटन से स्नान करके लघु (हल्के), नवीन और पवित्र वस्त्र को
धारण करे । पवित्र, मन चाहे लघु, विचित्र आभूषणों को धारण करे । मङ्गल
जनक (घी, दही आदि) वस्तुओं को स्पर्श करके, इष्ट देव की पूजा करके
शिखा वाले, शुक्ल वस्त्र पहिने, व्यङ्गरहित, शोभन आकृतिवाले ब्राह्मणों से स्व-
स्ति पाठ करावे, कुमार के लिये नवीन वस्त्रों का सङ्ग्रह करे । शिशु का सिर
पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा की ओर करके, कहे कि बालक देवा और
विद्वानों को नमस्कार करता ह ऐसा कह कर शिशु का पिता नक्षत्र देवता वाला
[ जिस नक्षत्र में कुमार उत्पन्न हुआ है उस नक्षत्र के सकेत वाला ] शिशु
का नाम करे । बच्चे के दो प्रकार के नाम करे, एक नक्षत्र-देवता के नाम पर
और दूसरा अभिप्राय अर्थात् अर्थयुक्त । इनमें अभिप्राय वाला नाम घोषवर
(वर्ग का चौथा अक्षर-घ, झ, ढ, ध, भ,), अन्तस्थ (य र ल व ) और
उष्मान्त (श, ष, स, ह,), और कुल के वृद्ध तीन पुरुषों के नामों में से किसी
एक के समान, निन्दारहित नाम करना चाहिये । नक्षत्र देवतावाला नाम
नक्षत्र देवता के समान होना चाहिये । नाम दो अक्षर वाला अथवा चार
अक्षरों वाला रखना चाहिये ॥ ५१ ॥
कृते च नामकर्मणि कुमारं परीक्षितुमुपक्रमेतायुषः प्रमाणज्ञान-
हेतोः। तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति । तद्यथा एके-
कजा मृद्वोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा
बहला त्वक् प्रकृत्या, प्रकृतिसुसम्पन्नमीषत्प्रमाणातिवृत्तमनुरूपमात-
पत्रोपमं शिरः, व्यूढं दृढं समं सुश्लिष्ट-शङ्ख-सन्ध्यूर्ध्व-व्यञ्जनमुपचितं
बिलनमर्धचन्द्राकृति ललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽ-

१२८ चरकसंहिता [अ० ८
वनतौ सुश्लिष्ट-कर्ण पुत्रकौ महाच्छिद्रौ कर्णौ, ईषत्प्रलम्बिन्यावसद्भगते
समे संहते महत्यौ भ्रुवौ, समे समाहितदर्शने व्यक्तभागविभागे बल-
वती तेजसोपपन्ने स्वङ्ग-पाङ्गे चक्षुषी, ऋज्वी महोच्छ्वासा वंशसंपन्ने-
षदनवताग्रा नासिका, महदृजु-सुनिषिष्टदन्तमास्य, आयामविस्तारोप-
पन्ना श्लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, श्लक्ष्ण युक्तोपचयमूष्मोपपन्नं
रक्तं तालु, महानदीनः स्निग्धोऽनुनादी गम्भीरसमुत्था धारः स्वरः,
नातिस्थूला नातिकृशावास्यप्रच्छादनो रक्तावोष्ठौ, महत्यौ हनू, वृत्ता
नातिमहती ग्रीवा व्यूढमुपचितमुरः, गूढ जत्रु पृष्ठवशश्च, विप्रकृष्टा-
न्तरो स्तनौ, असपातिनी स्थिरे पार्श्वे, वृत्तपारेपूर्णापतो बाहू, सक्थिनी
अङ्गुलयश्च, महदुपचित पाणिपाद, स्थिरा वृत्ताः स्निग्धास्ताम्रास्तुङ्गा
कूर्माकारा करजाः, प्रदक्षिणावर्ती सोत्सङ्गा च नाभिः, उरस्त्रिभागाह्वाना
समा समुपचिनमांसा कटी, वृत्तौ स्थिरोपचितमासौ नात्युन्नतौ स्फिचौ,
अनुपूर्ववृत्तावुपचययुक्तावूरू, नात्युपचिते नात्यपचिते एणांपदे प्रगूढ-
सिरास्थि सन्धी जङ्घे, नात्युपचितौ नात्यपचितौ गुल्फौ, पूर्वोपदिष्ट-
गुणौ पादौ कूर्माकारौ, प्रकृतियुक्तानि वातमूत्रपुरीषाणि तथा स्वप्न-
जागरणायास-स्मित-रुदित-स्तनग्रहणानि । यच्च किंचिदन्यदप्यनुक्तमस्ति
तदपि सर्व प्रकृतिमुक्तमिष्टम्, विपरीत पुनरनिष्टम्। इति दीर्घायु-
र्लक्षणानि ॥ ५२ ॥
नामकरण सस्कार हो चुकने पर आयु के प्रमाण ज्ञान के लिये कुमार की
परीक्षा करना चाहिये । आयुष्य वाले कुमारो के निम्न लक्षण होते ह। यथा—
एक एक पृथक्, कोमल, छोटे, स्निग्ध, दृढमूल वाले काले बाल उत्तम हैं।
स्थिर, स्वाभाविक त्वचा प्रशस्त है। प्रकृति (छ अगुल ऊंचा, ३२ अगुल
चौड़ा ) सम्पन्न, शरीर के अनुरूप, छाते के समान गोल शिर प्रशस्त है। चाड़ा
दृढ, समान शंख सधि से भली प्रकार जुड़ा, ऊपर को उठा, बलवान्, अर्द्धच-
न्द्राकार ललाट प्रशस्त है । बड़े, विशाल, समान पीठ वाले, नीचे की ओर बड़े,
पीछे से नीचे, खूब मिले कर्णपुत्रक, प्रशस्त है । बहुत बड़े छिद्रों वाले, थोड़े
लटकते हुए कान (जैसे कि कान भगवान् बुद्ध की मूर्त्तियों मे बने होते हैं)
प्रशस्त है। परस्पर न मिलीं परन्तु परस्पर समान एक दूसरे के तुल्य बड़ी भोंहे
प्रशस्त हैं। समान तुल्य, उत्तम दृष्टि युक्त, काला और श्वेत भाग स्पष्ट दीखता
हो, बलवान्, तेज से युक्त, अपने अग और उपाग युक्त आखें प्रशस्त हैं।
सीधी, बड़े उच्छ्वास से युक्त, उन्नत वश वाली आगे से थोड़ी, झुकती नासिका
प्रशस्त है। महान्, सरल, खूब एक समान जुड़े हुए दान्तों वाला मुख उत्तम है।

अ० ८ ] ६ शरीरस्थानम् १२६

अ० ८ ] ६ शरीरस्थानम् १२६
लम्बाई और विस्तार से युक्त, चिकनी, पतली, स्वाभाविक वर्ण से युक्त
जीभ प्रशस्त है । चिकना, ठीक प्रमाण में बढ़ा, गरमी से युक्त, लाल तालु
प्रशस्त है। नदी के आवाज के समान महान्, स्निग्ध, प्रतिध्वनि युक्त, गम्भीर
और धीर स्वर प्रशस्त है। न तो बहुत मोटे और न बहुत पतले, मुख को
ढापने वाले लाल ओठ प्रशस्त है। बड़ी हनु (जबाड़े) गाल बहुत बड़े न हों,
छोटी ग्रीवा प्रशस्त है। चौड़ी उन्नत छाती प्रशस्त है। गूढ छिपे हुए जत्रु
(अश सन्धि) पृष्ठ वश, उत्तम है—जत्रु और पृष्ठ वंश की अस्थिया छूने
पर प्रतीत न हो। दूर दूर अन्तरवाले स्तन प्रशस्त हैं। कक्षा से बाहर निकले
स्थिर पार्श्व प्रशस्त है। गोल, परिपूर्ण, लम्बे बाहू, टागे और अगुलिया प्रशस्त
हैं। बड़े २ भरे हुए हाथ और पाव प्रशस्त है । स्थिर गोल, स्निग्ध ताम्र रग
के उन्नत, कछुए के समान उठे हुए नख प्रशस्त हैं। दक्षिण आवर्त्त वाली
और उन्नत नाभि प्रशस्त है। छाती से एक तिहाई कम, समान, उपचित मास
वाली कटि प्रशस्त है। गोल, स्थिर, उन्नत मास वाले न तो बहुत उन्नत
और न बहुत नीचे कूल्हे प्रशस्त है। गोल, स्थिर, मास से भरी टागें प्रशम्त हैं।
न तो बहुत बढे हुए और न बहुत घटे हुए, हरिणी की जंघा के समान
छिपी सिग, अस्थि, और सन्धि वाली जघाए प्रशस्त है न तो बहुत मोटे,
और न बहुत दवे हुए गुल्फ प्रशस्त हैं। पूर्वोक्त गुणो से युक्त, कछुवे
के आकार के (मेहराबदार) पाव प्रशस्त हैं। स्वाभाविक रूप में वायु,
मूत्र, मल का आना और नींद, जागरण, आयास, हास्य, रोदन, स्तनपान
आदि बातों का प्रकृतिसिद्ध, स्वाभाविक रूप मे होना उत्तम है। इनके अति-
रिक्त और जो बातें यहा पर नहीं कही, वे भी स्वाभाविक रूप मे होनी चाहियें
यही इष्ट है। प्राकृतिक बातों से विपरीत होना बुरा, अनिष्टकारक है। ये
दीर्घायु कुमारों के लक्षण हैं ॥ ५२ ॥
अतो धात्रीपरीक्षामुपदेक्ष्यामः—अथ ब्रूयात् धात्रीमानयतेति,
समानवर्णां यौवनस्थां निभृतामनातुरामव्यङ्गामव्यसनामविरूपामजु-
गुप्सितां देशजातीयामक्षुद्रामक्षुद्रकर्मिणीं कुलेजातां वत्सलां जीवद्वत्सां
पुंवत्सा दोग्ध्रीमप्रमत्ता१मशायिनीमनुच्चारशायिनीमनन्त्यावशायिनी
कुशलोपचारां शुचिमशुचिद्वेषिणीं स्तनस्तन्यसंपदुपेतामिति ॥ ५३ ॥
इसके अनन्तर धात्री की परीक्षा का उपदेश करते हैं। अब आज्ञा देवे
कि धात्री (धाई) को लाओ धात्री माता की समान जाति वाली, युवती, नम्र-
१. 'अप्रमत्तामनन्त्यावशायिनीं' इतिपाठः ।

१३० • चरकसंहिता [ अ० ८
स्वभाव, नीरोग, सुन्दर अंगों वाली, सब प्रकार के व्यसनों से रहित, सुन्दर-
रूपवती, घृणायोग्यरूप से रहित, जो मैली कुचैली न रहती हो, समान देश
वाली, उदार चित्त वाली, घिनौने कमीने विचारों और कर्मों से रहित, नीच
कर्म न करने वाली, उत्तम कुल मे उत्पन्न, बच्चे से प्यार करने वाली, प्रमाद से
रहित, न सोनेवाली, बालक को मलमूत्रादि में न लेटाने वाली, नीच, चण्डाल
कुलों से भिन्न कुल की, सेवा मे कुशल, पवित्र, स्वच्छ, अपवित्रता से द्वेष करने
वाली, स्तन और दूध के उत्तम गुणों से युक्त, स्त्री को धात्री के रूप मे नियुक्त
करें। [धात्री को तभी नियुक्त करना चाहिये जब बच्चे की माता अति निर्बल
हो, दूध काफी न उतरता हो, या दूध बालक के अनुकूल न पड़ता हो।]॥५३॥
तत्रेयं स्तनसंपत्-नात्यूर्ध्वौ नातिलम्बावनतिकृशावनतिपीनौ
युक्तपिप्पलको सुखप्रपानौ चेति स्तनसंपत् ॥ ५४ ॥
स्तन के उत्तम लक्षण-स्तन न बहुत ऊचे, न बहुत लटकने वाले, न
बहुत कृश, न बहुत मोटे, उत्तम चूचुक (घुण्डियो) वाले, ऐसे हों जिन से
बच्चा सुख से दूध पी सके, ये स्तन के उत्तम लक्षण हैं ॥ ५४ ॥
स्तन्यसंपत्तु—प्रकृत वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शमुदपात्रे दुह्यमानमुदक
व्येति प्रकृतिभूतत्वात्, तत्पुष्टिकदमारोग्यकर चेति स्तन्यसंपत् ॥५५॥
दूध के उत्तम लक्षण-दूध का स्वाभाविक वर्ण हो, स्वाभाविक गन्ध हो,
स्वाभाविक रस हो और स्वाभाविक स्पर्श ह', यदि दूध को जल के पात्र मे दुहा
जाय तो वह सारे जल में फैल जावे। क्योकि यह दूध का स्वाभाविक गुण है।
इसके अतिरिक्त दूध पुष्टिकारक और आरोग्यकारक होना आवश्यक है, ये दूध
के उत्तम लक्षण हैं ॥५५॥
अतोऽन्यथा व्यापन्नं ज्ञेयम् । तस्य विशेषाः - श्यावारुणवर्णं
कषायानुरसं विशदमनतिलक्ष्यगन्धं रूक्षं द्रवं फेनिल लघ्वतृप्तिकर
कर्षणं, वातविकाराणां कर्तृ वातोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् । कृष्ण-नील-
पीत-ताम्रावभासं तिक्ताम्लकद्वकानुरस कुणपरुधिरगन्धि भृशोष्णं पित्त-
विकाराणा कर्तृ पित्तोपसृष्ट क्षीरमभिज्ञेयम् । अत्यर्थशुक्लमहिमाधु-
यपपन्न लवणानुरसं घृत-तैल-वसा-मज्ज-गन्धि पिच्छिल तन्तुमदुदपा-
त्रेडवसीदच्छ्लेष्म विकाराणां कर्तृ श्लेष्मोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् ॥५६॥
इन लक्षणों से विपरीत दूध दूषित समझना चाहिये। इसके विशेष लक्षण
ये हैं-वात विकार वाली स्त्रियों का वात से दूषित दूध, श्याव (लाल-काले)
रंग का, कषाय अनुरस वाला, विशद (फुटकी वाला), स्पष्ट गन्ध से रहित,

अ० ८] शारीरस्थानम् १३१

अ० ८] शारीरस्थानम् १३१
रूक्ष, द्रव, झाग वाला, हलका, पीने पर पूर्ण तृप्ति नहीं करने तथा
शिशु को सुखाने वाला होता है। ऐसा दूध वात के विकारों को उत्पन्न करता
है। वह वात से दूषित दूध होता है। पित्त से दूषित दूध—काला, नीला, पीला,
ताम्बे के रंग का, तिक्त, अम्ल, कटु अनुरस वाला, दुर्गन्ध या रक्त की गन्ध
वाला, बहुत गरम होता है। कफ विकार वाला वा कफ से दूषित दूध—बहुत
सफेद, बहुत मधुर, पीने पर पिछे मे नमकीन स्वाद वाला, घी, तैल, वसा,
मज्जा की गन्ध से युक्त, पिच्छिल, धागे या सूत्रों वाला, जो पानी के पात्र में
नीचे बैठ जाता है, ऐसे दूध को कफ के विकारों को उत्पन्न करनेवाला, कफ
से दूषित जानना चाहिये ॥५६॥
तेषां त्रयाणामपि क्षीरदोषाणां प्रति प्रतिविशेषमभिसमीक्ष्य यथास्वं
यथादोषं च वमनविरेचनास्थापनानुवासनानि विभज्य कृतानि प्रश-
मनाय।
इन तीनों प्रकार के दूध के दोषों में वात, पित्त, कफ प्रत्येक दोष के अनुसार
अपने अपने दोष के लक्षणों को देख कर वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन
आदि का विभाग करके उचित रूप में शान्ति के लिये व्यवहार करना चाहिये।
पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यव-गोधूम-शालि षष्टिक-मुद्ग-हरे-
णुक-कुलत्थ सुरा सावीरक-तुषोदक मैरेय-मेदक-लशुन-करञ्ज-प्राय.स्यात्,
क्षीरदोष-विशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात्, पाठा-महौषध-
सुरदारु-मुस्त-मूर्वा-गुडूची-वत्सक-फलकिरात - तिक्त - कटुक - रोहिणी-
सारिबा-कषायाणा च पानं प्रशस्यते । तथाऽन्येषा तिक्त-कषाय-कटुक-
मधुराणा द्रव्याणां प्रयोग इति क्षीर-विकार-विशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां
काल चेति क्षीरविशोधनानि ॥ ५७ ॥
दूषित दूध वाला स्त्री के दूध के शोधने लिये खान पान विधि—जिस स्त्री
का दूध दूषित हो उसे जौ, गेहूँ, हेमन्त धान्य, साठी चावल, मूग, हरेणु,
कुलत्थी, सुरा, सौवीरक, धान्याम्ल, तुषोदक, मैरेय, मेदक, लशुन, करंज आदि
का सेवन करना चाहिये । दूषित क्षीर के विशेष २ लक्षणों को (वात आदि को)
देख २ कर उनकी यथायोग्य चिकित्सा करनी चाहिये। पाठा, सोंठ, देवदारु,
नागरमोथा, मूर्वा, गिलोय, इन्द्रजौ, चिरायता, कुटकी, सारिवा इन पदार्थों के
कषायों का पान उत्तम है । इसी प्रकार अन्य तिक्त, कषाय, कटु और मधुर रस
वाले द्रव्यों का प्रयोग दूध के विकारों के कारणों को जान कर मात्रा में समय
पर करना चाहिये। यह दूधको साफ़ करने वाले उपायोंका वर्णन कर दिये हैं।

१३२ चरकसंहिता [ अ० ८
क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि ग्राम्यानूपौदकानि च
शाक-धान्य मांसानि द्रव-मधुराम्ल-भूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्चौषधयः
क्षीरपान चानायासश्चेति, वीरण-शालि-षष्टिकेश्रुवालिका-दर्भ-कुश-काश-
गुन्द्रेत्कट-मूल कषायाणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि ॥ ५८ ॥
दूध-वर्धक पदार्थ-सीधु नामक मद्य को छोड़ कर शेष सब मद्य, ग्राम्य और
आनूप देशों मे उत्पन्न शाक, धान्य या मांस, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, बहुत
भोजन, दूध-वर्धक ओषधिया, दूध का पान और मेहनत न करना । वीरण,
साठी, हेमन्त धान्य, गन्ना, दाभ, कुश, काश गुन्द्रा, इत्कट इनकी जड़ों के
कषायों को पिलाना दूध-वर्धक है ॥५८॥
धात्री तु यदा स्वादु-बहुल-शुद्ध-दुग्धा स्यात्तदा स्नातानुलिप्ता शुक्ल
वस्त्रं परिधायैन्द्री ब्राह्मी शतवीर्याममोघामव्यथा शिवामरिष्टा वाट्यपुष्पी
विष्वक्सेनकान्ता वा बिभ्रत्योषधि कुमारं प्राङ्मुख प्रथम दक्षिण स्तनं
पाययेदिति धात्रीकर्म ॥ ५६ ॥
धात्री की नियुक्ति-जिस समय धात्री का दूध बहुत स्वाद, बहुत शुद्ध हो,
उस दिन स्नान कराके, चन्दन लगाकर सफेद बस्त्रों को पहिनाकर ऐन्द्री, ब्राह्मी,
शतवीर्या, सहस्रवीर्या, अमोघा, गिलोय, शिरा, वाट्यपुष्पी, अरिष्टा, विष्वक्सेन-
कान्ता आदि ओषधियो को धारण कराके, शिशु का शिर पूर्व की ओर करके
प्रथम दक्षिण स्तन पीने के लिये देना चाहिये । यह धात्री-कर्म का उपदेश
कर दिया है ॥५६॥
अतोऽनन्तरं कुमारागारविधिमनुव्याख्यास्यामः--वास्तु-विद्या-
कुशलः प्रशस्तं रम्यमत्तमस्क निवातं प्रवातैकदेश दृढमपगत-श्वापद-पशु
दंष्ट्रि-मूषिक पतङ्ग सुसंविभक्त-सलिलोदूखल-मूत्र-वर्चः-स्थान-स्नान-
भूमि-महानसमृतुसुख यथर्तुशयनासनास्तरणसंपन्न कुर्यात्तथा सुविहित-
रक्षा-विधान-बलि-मङ्गल-होम प्रायश्चित्तं शुचि-वृद्ध-वैद्यानुरक्त-जन-सपू-
र्णमिति कुमारागारविधिः ॥ ६० ॥
कुमारागार विधि-इसके आगे कुमारागार विधि का वर्णन करते हैं।
मकान की रचना को जानने वाला वास्तुविद्या में कुशल पुरुष उत्तम, सुन्दर,
प्रकाशयुक्त, वायुदार ( परन्तु जोर से चारों ओर की वायु न आये ), मजबूत,
गाय, बकरी, पशु आदि और बिछी आदि दाढ़ वाले पशु, चूहे, पतंग आदि
से रहित, पानी, उलूखल, मूत्रस्थान, मलस्थान, स्नानगृह, रसोई आदि पृथक्
पृथक् ऋतु के अनुकूल, ऋतु के अनुसार, बिस्तर आसन, बिछौने से युक्त घर

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १३३

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को सजावे । इस घर मे भली प्रकार से रक्षा का प्रबन्ध करे । बलि, मगल, होम,
प्रायश्चित्त आदि क्रिया करे । पवित्र, वृद्ध, वैद्य, स्नेही मित्रों से भरा रहे ।
यह कुमारागार विधि है ॥ ६० ॥
शयनासनास्तरण-प्रावरणानि कुमारस्य मृदु लघु शुचि-सुगन्धीनि
स्युः । स्वेदमलजन्तुमन्ति मूत्रपुरीषोपसृष्टानि च वर्ज्यानि स्युः ॥६१॥
असति संभवेऽन्येषा तान्येव च सुप्रक्षालितोपधूपितानि सुशुद्ध-
शुष्काण्युपयोगं गच्छेयुः॥ ६२ ॥
कुमार के बिस्तर, आसन, विछौने आदि कोमल, हल्के, पवित्र और सुग-
न्धियुक्त हों, वे पसीने, जू आदि वाले तथा मूत्र मल वाले न हों। यदि अन्य
दूसरे वस्त्र न हों तो इन्हीं वस्त्रो को भली प्रकार धोकर सुगन्धा कर (धुवा देकर )
साफ और शुष्क करके काम में लाया जावे ॥ ६२ ॥
धूपनानि पुनर्वाससां शयनास्तरणप्रावरणानां च यव-सर्षपातसी-
हिङ्गु गुग्गुलु-वचा चोरक-वयःस्था-गोलोमी-जटिला पलङ्कषाशोक-रोहि-
णीसर्पनिर्मोकाणि घृतसक्तानि स्युः॥ ६३ ॥
वस्त्रों के रोगनाशक धूम—बिस्तर, आसन, बिछौने चादर आदि कपड़े
को धुवा देने के लिये जौ, सरसों अलसी, हींग, गुग्गुल, वच, चोरक, ब्राह्मी,
श्वेत दूब, जटामासी, गुग्गुलु, अशोक, कुटकी और साप की केंचली इनको घी
में मिला कर इनसे धुवा देना चाहिये ॥ ६३ ॥
मणयश्च धारणीयाः कुमारस्य खड्ग-रुरु-गवय-वृषभाणा जीवतामेव
दक्षिणेभ्यो विषाणेभ्यस्त्वग्राणि गृहीतानि स्युः । मत्राद्याश्चौषधयो जीव-
कर्षभकौ यानि चान्यान्यपि ब्राह्मणाः प्रशंसेयुरथर्ववेदविदः॥ ६४॥
बालक के आभूषण—शिशु को नाना प्रकार की मणिया, जीवित गैडा
रुरु (मृग ), गवय (नीलगाय ) और साड के दक्षिण सीग के अगले भागों
को लेकर धारण कराने चाहिये । मंत्र आदि, जीवक, ऋषभक आदि ओषधियों
को तथा अन्य जिन २ वस्तुओ को अथर्व वेद के जानने वाले विद्वान् ब्राह्मण
बतावे वे २ पदार्थ धारण करावे ॥ ६४ ॥
क्रीडनकानि खल्वस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाण्यगुरूष्यतीक्ष्णा-
ग्राण्यनास्यप्रवेशीन्यप्राणहराण्यवित्रासनानि च स्युः ॥ ६५ ॥
बच्चे के खिलौने—कुमार के खिलौने विचित्र रूप के, शब्द करने वाले,
सुन्दर, हलके, जिनके अग्रभाग तीखे न हो, जो बच्चे के मुख में न जा सकें,