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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 616 में से

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पृष्ठ 132

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११७
हैं। [ पिंगलता दोष की चिकित्सा उत्तर काल में सुगम है। ] नवम मास में
मधुर ओषधियों से सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । मधुर औषध
मे सिद्ध इसी तैल के फोये को योनि में रखे जिससे गर्भ के आने के मार्ग में
स्नेहन ( चिकनापन ) हो जाये । * जो गर्भिणी प्रथम मास से लेकर नवम
मास तक इस ऊपर कहे अनुसार कार्य करती रहती है उस स्त्री के कुक्षि, कटि,
पीठ और पार्श्व गर्भ समय मे और गर्भ धारण काल में कोमल रहते हैं। वायु
का अनुलोमन होता है। मल मूत्र स्वस्थ रूप में सुखपूर्वक बाहर आते हैं।
त्वचा और नख भी कोमल रहते हैं। बल वर्ण बढता है, वाञ्छित, ऐश्वर्य-
शाली, सुखी पुत्र सुखपूर्वक ठीक समय में उत्पन्न होता है ॥ ३१ ॥
प्राक्चैवास्या नवमान्मासात्सूतिकागारं कारयेदपहतास्थिशर्करा-
कपाले देशे प्रशस्त-रूप-रस-गन्धाया भूमौ प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा बैल्वानां
काष्ठानां तैन्दुकैङ्गुदकानां भल्लातकानां वारुणानां खादिराणां वा । यानि
चान्यान्यपि ब्राह्मणाः शंसेयुरथर्ववेदविदः, तद्वसनालेपनाच्छादना-पि-
धान-संपदुपेतं वास्तुविद्या-हृदय-योगाग्नि-सलिलोलूखल-वर्चः स्थान-
स्नान-भूमिमहानसमृतुसुखं च से नयेत् ॥ ३२ ॥
गर्भिणी के नवा मास लगने से पूर्व ही ऐसा सूतिकागार बनवावे जिस
स्थान में हड्डी, मट्टी या ठोकरे आदि न हो। श्रेष्ठ रूप, रस, गन्धवाली भूमि
में पूर्व या उत्तर की ओर घर का मुख हो और जिसके चारों ओर तिन्दुक या
इगुदी अथवा भिलावे या खैर की लकड़ी से या विल्व की लकड़ी से चारों ओर
का घेरा बनाया जाये। इनके अतिरिक्त अथर्ववेद को जानने वाला ब्राह्मण जो
जो बतावे वह करे । घर में गर्भिणी के वस्त्र, आलेपन, बिस्तर, किवाड़ आदि
होने चाहिये । मकान को बनाने की कला के अनुसार आग, जल, ऊखल और
मल त्याग के स्थान हों, स्नानगृह, रसोई आदि प्रत्येक ऋतु में सुखकारक बनावे
और उनका उपयोग करें ॥ ३२ ॥
तत्र सर्पिस्तैल-मधु-सैन्धव-सौवर्चल-काल-विड्-विडङ्ग-कुष्ठ-किलिम-
नागर-पिप्पली-पिप्पलीमूल-हस्ति-पिप्पली-मण्डूकपर्ण्येलालाङ्गली-वचा-
चव्यचित्रक-चिरबिल्व-हिङ्गु-सर्षप-लशुन-कनक-कण-कणिकानी-पातसी-
बल्वज-भूर्ज-कुलत्थ-मैरेय-सुरासवाः सन्निहिताः स्युः, तथाऽश्मानौ द्वौ,
द्वे च कुण्डमुसले, द्वे उलूखले, खरो वृषभश्च, द्वौ च तीक्ष्णौ सूचीपिप्पल्यौ
सौवर्णराजतौ, शस्त्राणि च तीक्ष्णायसानि, द्वौ च बिल्वमयौ पर्यङ्कौ,

  • जिससे वायु का शमन हो, प्रसव वेदना कम हो ।