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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 616 में से

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पृष्ठ 145

१३० • चरकसंहिता [ अ० ८
स्वभाव, नीरोग, सुन्दर अंगों वाली, सब प्रकार के व्यसनों से रहित, सुन्दर-
रूपवती, घृणायोग्यरूप से रहित, जो मैली कुचैली न रहती हो, समान देश
वाली, उदार चित्त वाली, घिनौने कमीने विचारों और कर्मों से रहित, नीच
कर्म न करने वाली, उत्तम कुल मे उत्पन्न, बच्चे से प्यार करने वाली, प्रमाद से
रहित, न सोनेवाली, बालक को मलमूत्रादि में न लेटाने वाली, नीच, चण्डाल
कुलों से भिन्न कुल की, सेवा मे कुशल, पवित्र, स्वच्छ, अपवित्रता से द्वेष करने
वाली, स्तन और दूध के उत्तम गुणों से युक्त, स्त्री को धात्री के रूप मे नियुक्त
करें। [धात्री को तभी नियुक्त करना चाहिये जब बच्चे की माता अति निर्बल
हो, दूध काफी न उतरता हो, या दूध बालक के अनुकूल न पड़ता हो।]॥५३॥
तत्रेयं स्तनसंपत्-नात्यूर्ध्वौ नातिलम्बावनतिकृशावनतिपीनौ
युक्तपिप्पलको सुखप्रपानौ चेति स्तनसंपत् ॥ ५४ ॥
स्तन के उत्तम लक्षण-स्तन न बहुत ऊचे, न बहुत लटकने वाले, न
बहुत कृश, न बहुत मोटे, उत्तम चूचुक (घुण्डियो) वाले, ऐसे हों जिन से
बच्चा सुख से दूध पी सके, ये स्तन के उत्तम लक्षण हैं ॥ ५४ ॥
स्तन्यसंपत्तु—प्रकृत वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शमुदपात्रे दुह्यमानमुदक
व्येति प्रकृतिभूतत्वात्, तत्पुष्टिकदमारोग्यकर चेति स्तन्यसंपत् ॥५५॥
दूध के उत्तम लक्षण-दूध का स्वाभाविक वर्ण हो, स्वाभाविक गन्ध हो,
स्वाभाविक रस हो और स्वाभाविक स्पर्श ह', यदि दूध को जल के पात्र मे दुहा
जाय तो वह सारे जल में फैल जावे। क्योकि यह दूध का स्वाभाविक गुण है।
इसके अतिरिक्त दूध पुष्टिकारक और आरोग्यकारक होना आवश्यक है, ये दूध
के उत्तम लक्षण हैं ॥५५॥
अतोऽन्यथा व्यापन्नं ज्ञेयम् । तस्य विशेषाः - श्यावारुणवर्णं
कषायानुरसं विशदमनतिलक्ष्यगन्धं रूक्षं द्रवं फेनिल लघ्वतृप्तिकर
कर्षणं, वातविकाराणां कर्तृ वातोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् । कृष्ण-नील-
पीत-ताम्रावभासं तिक्ताम्लकद्वकानुरस कुणपरुधिरगन्धि भृशोष्णं पित्त-
विकाराणा कर्तृ पित्तोपसृष्ट क्षीरमभिज्ञेयम् । अत्यर्थशुक्लमहिमाधु-
यपपन्न लवणानुरसं घृत-तैल-वसा-मज्ज-गन्धि पिच्छिल तन्तुमदुदपा-
त्रेडवसीदच्छ्लेष्म विकाराणां कर्तृ श्लेष्मोपसृष्टं क्षीरमभिज्ञेयम् ॥५६॥
इन लक्षणों से विपरीत दूध दूषित समझना चाहिये। इसके विशेष लक्षण
ये हैं-वात विकार वाली स्त्रियों का वात से दूषित दूध, श्याव (लाल-काले)
रंग का, कषाय अनुरस वाला, विशद (फुटकी वाला), स्पष्ट गन्ध से रहित,