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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ७ ] शारीरस्थानम् ६५

अ० ७ ] शारीरस्थानम् ६५
चैव केश-श्मश्रु-लोमानीत्येतद्यथावत्संसंख्यात त्वक्प्रभृति दृश्यं, अतः पर
तर्क्यम् । एतदुभयमपि न विकल्प्यते प्रकृतिभावाच्छरीरस्य ॥ १६ ॥
इसके आगे जो देखी नहीं जा सकतीं, वा दिखलाई नहीं देतीं वे सब अनि
र्देश्य हैं। अतः उनको अनुमान द्वारा ही जाना जाता है। जैसे—९०० स्नायु,
७०० सिराये, २०० धमनियां, ४०० पेशिया, १०७ मर्म, २०० सन्धिया, २६-
६५६ सिरा-धमनियों के मुखो के अग्रभाग और इतने ही २६६५६ केश, श्मश्रु
और शरीर के बाल हैं। ये यहा ठीक २ प्रकार से गिना दिये गये। इनमे त्वचा
आदि दृश्य है। इसमे आगे सब अनुमान गम्य हैं। यह दृश्य और तर्क्य दोनों
प्रकार का मान शरीर के अविकृत होने से विकल्पित नहीं होता। शरीर के
विकृत होने पर त्वचा आदि का मान भी विकृत हो जाता है ॥ १६ ॥
यत्त्वञ्जलिमख्येयं तदुपदेक्ष्यामः, तत्पर प्रमाणमभिज्ञेयं, तच्च
वृद्धि ह्रास-योगि, तर्क्यमेव । तद्यथा—दशोदकस्याञ्जलयः शरीरे स्वेना-
ञ्जलिप्रमाणे न यत्तत् प्रच्यावमानं पुरीषमनुबध्नात्यतियोगेन तथा मूत्रं
रुधिरमन्यांश्च शरीरधातून, यत्तत् सर्वशरीरचरं बाह्याऽत्वग्बिभर्ति,
यत्तु त्वगन्तरे व्रणगतं लसीकाशब्द लभते, यच्चोष्मणाऽनुबद्ध लोमकू-
पेभ्यो निष्पतत्स्वेदशब्दमवाप्नोति, तदुदकं दशाञ्जलिप्रमाणम् । नवाञ्ज-
लयः पूर्वस्याऽऽहार-परिणाम-धातोर्यं त रस इत्याचक्षते, अष्टौ शोणि-
तस्य, सप्त पुरीषस्य, षट् श्लेष्मणः, पञ्च पित्तस्य, चत्वारो मूत्रस्य, त्रयो
वसायाः, द्वौ मेदसः, एको मज्ज्ञः, मस्तिष्कस्यार्धाञ्जलिः, शुक्रस्य ताव-
देव प्रमाणं, तावदेव श्लेष्मणश्चौजस इत्येतच्छरीरतत्त्वमुक्तम् ॥ १७ ॥
शरीर में जो वस्तु अञ्जलि से मापने योग्य है उसका वर्णन करते हैं।
इस परिणाम की वृद्धि या ह्रास भी अनुमान द्वारा ही जाना जाता है।
प्रत्येक मनुष्य की अपनी अञ्जलि की अपेक्षा से शरीर के अन्दर
उदक की मात्रा दस अञ्जलियां है। यह जल अधिक होने पर पुरीष के
साथ, मूत्र, रक्त और शरीर के अन्य धातुओं के साथ मिल कर बाहर आता
है और जो जल त्वचा के अन्दर व्रण मे पहुचाता है, उसे 'लसीका' कहते है
और जो जल शरीर की गरमी के साथ मिल कर लोम कूपों से निकलता है, उसे
'स्वेद' कहते हैं। यह सब जल दस अंजलि परिमाण है। आहार के प्रथम
परिणाम धातु रस की नौ अजलिया हैं। रक्त की आठ अजलियां हैं। मल की
सात, कफ की छः, पित्त की पाच, मूत्र की चार, वसा की तीन, मेद की दो
मज्जा की एक, मस्तिष्क की आधी अंजलि, शुक्र की भी आधी अंजलि और

९६ चरकसंहिता [ अ० ७
कफ और ओज की भी आधी २ अञ्जलि है। इस प्रकार से शरीर के
तत्त्व कह दिये ॥ १७ ॥
तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद् गुरु-खर-कठिनमङ्गं नखास्थि-
दन्तवेष्ट-मांस-चर्म-वर्चः-केश-श्मश्रु-लोम-कण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो
घ्राणं च, यद्-द्रव-सर-मन्द स्निग्ध-मृदु-पिच्छिलं रस-रुधिर-वसा-कफ-
पित्त-मूत्र स्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च । यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः
शरीरे, तत्सर्वमाग्नेय रूपं दर्शनं च, यदुच्छ्वास-प्रश्वासोन्मेष-निमेषा-
कुञ्चन-प्रसारण-गमन-प्रेरण-धारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च, यद्वि-
विक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि, तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च ।
यत्प्रयोक्तृ तत्प्रधानं बुद्धिर्मनश्चेति शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनाव-
यवानां निर्दिष्टा ॥ १८ ॥
शरीर में जो अंग विशेषत स्थूल, स्थिर, कठिन, गुरु, खर, कठोर हैं,
नख, अस्थि, दन्तवेष्ट मास, चर्म, वर्चस्, केश, श्मश्रु, लोम, कण्डरा आदि
यह तथा गन्ध और नासिका यह सब पार्थिव अग हैं। जो भाग द्रव, सर,
मन्द, स्निग्ध, मृदु, पिच्छिल, रस, रुधिर, बसा, कफ, पित्त, मूत्र, स्वेद आदि
तथा रस और जिह्वा यह सब जलीय अश हैं। जो पित्त, गरमी, शरीर में जो
कान्ति रूप और आख है वह अग्न के अश हैं। जो उच्छ्वास, प्रश्वास,
उन्मेष निमेष, आकुञ्चन, प्रसारण, गमन, प्रेरण, धारण आदि कर्म तथा स्पर्श और
त्वचा हैं, यह सब वायु के अश है। शरीर में जो छेद महान् या सूक्ष्म हैं, ये
सब प्रकार के स्रोतस्; शब्द और कान हैं यह आकाश के अश हैं। जो इनका
प्रयोग करता है, वह प्रधान बुद्धि और मन हैं यह शरीर के अवयवों की सख्या
स्थूल दृष्टि भेद में अवयवों की सख्या कह दी गई है ॥ १८ ॥
शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेनापरिसंख्येया भवन्त्यतिबहुत्वाद्-
तिसौक्ष्म्यादतीन्द्रियत्वाच्च । तेषां सयोगविभागे परमाणूनां कारणं
वायु. कर्म स्वभावश्च ॥ १९ ॥
शरीर के अवयव परमाणु भेद से असख्य हैं। क्योकि बहुत अधिक हैं,
वे अति सूक्ष्म होने से वा अतीन्द्रिय होने से असख्य हैं। शरीर के इन परमा-
णुओं के संयोग और विभाग में कारण वायु, कर्म और स्वभाव है ॥ १९ ॥
तदेतच्छरीरं संख्यातमनेकावयवं दृष्टमेकत्वेन सङ्गः, पृथक्त्वेनाप-
वर्गः। तत्र प्रधानमसक्तं सर्वसन्ताननिवृत्तौ निवर्त्तत इति ॥ २० ॥

अ० ८ ] ७ शारीरस्थानम् ६७

अ० ८ ] ७ शारीरस्थानम् ६७
इस संख्यात शरीर को जो वास्तव में अनेक अवयवों से युक्त है मोहवश
एक रूप में देख कर सग-बुद्धि ( आसक्ति ) उत्पन्न होती है। एक रूप में
शरीर को देख कर इसके उपकार में प्रवृत्ति नहीं होती है जिससे मनुष्य राग-
द्वेष मे फस जाता है। शरीर को पृथक् २ अग २ रूप में समझने से ममता
नहीं होती, इसी लिये प्रवृत्ति के शान्त होने पर धर्माधर्म के न होने से अपवर्ग
होता है। प्रधान आत्मा, राग द्वेष से रहित है। वह सब प्रकार के उपकारक
ओर अपकारक भावों से निवृत्त होकर ससार से भी निवृत्त-मुक्त हो जाता है॥२०॥
तत्र श्लोकौ—शरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक्।
तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते॥ २१॥
अमूढो मोहमूलैश्च न दोषैरभिभूयते।
निर्दोषो निःस्पृहः शान्तः प्रशाम्यत्यपुनर्भवः॥ २२॥
जो भिषक् ( वैद्य ) शरीर के सम्पूर्ण अवयवो की सख्या जानता है, वह
वैद्य मिथ्याज्ञान के कारण मोह में नही फँसता। ज्ञानी पुरुष मोह ( राग
द्वेष ) के कारण दोषो से कभी भी पराजित नहीं होता। इसलिये दोषरहित,
निःस्पृह होकर सब क्रियाओ के शान्त होने से शान्त हो जाता है फिर इसका
पुनर्जन्म नहीं होता ॥२१-२२॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरसंख्या-
शारीर नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥

अष्टमोऽध्यायः।

अथातो जातिसूत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः॥ १॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः॥ २॥
अब इसके आगे 'जाति-सूत्रीय' नामक शरीर का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था॥ १-२॥
स्त्रीपुंसयोरव्यापन्न-शुक्र शोणित-गर्भाशययो श्रेयसीं प्रजामिच्छ-
तोस्तदर्थामिनिर्वृत्तिकरं कर्मोपदेक्ष्यामः॥ ३॥
जिसके शुक्र में दूषण न हो ऐसा पुरुष और जिसके आर्त्तव और गभाशय
मे दोष न हो ऐसी स्त्री जो श्रेष्ठ सतान की कामना करनेवाले हों उन स्त्री-पुरुषो
के लिये गुणवती प्रजा के उत्पादक कर्मों का उपदेश करते हैं:—॥ ३ ॥

६८ चरकसंहिता [ अ० ८
अथाप्येतौ स्त्रीपुंसौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां
संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत्, संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुप-
चरेत्, उपचरेच्च मधुरौषधसंसृष्टाभ्यां घृतक्षीराभ्यां पुरुषं, स्त्रियं तु
तैलमाषाभ्याम्¹ ॥ ४ ॥
उक्त गुणोंवाले पुरुष और स्त्री को वैद्य स्नेहन और स्वेदन कर्म कराके पीछे
से वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध करे। पीछे पेया आदि देकर क्रमश प्रकृति में
लाये। इस प्रकार शुद्ध होने पर आस्थापन और अनुवासन कर्म करावे। मधुर
औषधियों से संस्कृत या जीवनीय गण की औषधियों से घृत, दूध से पुरुष का,
तथा तैल और माप ( उड़द की दाल ) से स्त्री को पुष्ट करे। [ पुरुष को
सौम्य औषधियों से संस्कृत अन्न दे, क्योंकि पुरुष की प्रकृति सौम्य है, इसलिये
शुक्र की वृद्धि होगी। स्त्री की प्रकृति उष्ण है, इसलिये उसको उष्ण पदार्थो
से संस्कृत अन्न दे ] ॥ ४ ॥
रजस्वला के कर्त्तव्य—
ततः पुष्पादप्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी पाणि-
भ्यामन्नमजर्जरपात्रे² भुञ्जाना न च काञ्चिन्मृजामापद्येत, ततश्चतुर्थेऽ-
हन्येनामुन्मद्य सशिरस्कं स्नापयित्वा शुक्लानि वासांस्याच्छादयेत्पुरुषं
च ततः शुक्लवाससौ स्रग्विणौ सुमनसावन्योन्यमभिकामौ संवसेता-
मिति ब्रूयात् ॥ ५ ॥
पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर तीन रात तक स्त्री ( रजोधर्म के दिनों
में ) ब्रह्मचर्य्य-व्रत का पालन करे ! जमीन पर सोये, न फूटे हुए बर्तनो में
हाथों से भोजन करे, [ चम्मच आदि से भोजन न करे ] किसी भी प्रकार का
शरीर पर भूषण या सजावट, स्नान-लेपन आदि नहीं करे। चौथे दिन ऋतु
समाप्त होने पर भली प्रकार स्नान करे, शिर को भी साफ करे, श्वेत वस्त्र
पहिने। पुरुष भी स्नान करके श्वेत वस्त्र ही पहिने। इसके अनन्तर स्त्री और
पुरुष दोनों श्वेत वस्त्रों को पहिने हुए, मालाओं को धारण किये हुए, प्रसन्न
मन, परस्पर की कामना करते हुए मथुन करे, वैद्य ऐसा उपदेश दे ॥ ५ ॥
स्नान के उपरान्त कर्त्तव्य—
स्नानात्प्रभृति युग्मेष्वहःसु संवसेतां पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृ-
कामौ ॥ ६ ॥
१. 'तैलमाषाभ्याम्' इति क्वचित् पाठः ।
२ 'अजर्जरात् पात्राद्' इति च पाठः ।

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ६६

अ० ८ ] शारीरस्थानम् ६६
स्नान करने के उपरान्त पुत्र की कामना से युग्म (दूसरे, चौथ, छठे
आदि) दिनो मे और कन्या की कामना से अयुग्म (पहले, तीसरे, पाचवे
सातवें आदि) दिनो में मैथुन करे ॥ ६ ॥
गर्भाधान काल मे स्त्री की उचित स्थिति—
न च न्युब्जां पार्श्वगता वा संसेवेत । न्युब्जाया वातो बलवान्
स योनि पीडयति, पार्श्वगताया दक्षिणे पार्श्वे श्लेष्मा संच्युतोऽपिद्-
धाति गर्भाशयं १, वामे पित्तं पार्श्वे । तस्याः पीडितं विदहति रक्त शुक्रम् ।
तस्मादुत्ताना सती बीजं गृह्णीयात् । तस्या हि यथास्थानमवतिष्ठन्ते
दोषाः । पर्याप्ते चैनां शीतोदकेन परिषिञ्चेत् ।
नीचे मुख की हुई, औंधी या पार्श्व में लेटी स्त्री के साथ सम्भोग नहीं करे
क्योंकि अधोमुख स्थिति मे वायु बलवान् होता है, यह वायु योनि का पीड़न
करता है । दक्षिण पार्श्व मे लेटने से श्लेष्मा (कफ) स्रवित होकर गर्भाशय
को ढाप लेता है । वाम पार्श्व में लेटने से पित्त कुपित होकर रक्त और शुक्र को
दूषित कर देता तथा उष्ण कर देता है । इसलिये स्त्री उत्तान पीठ के बल
चित्त लेटकर बीज का योनि मे ग्रहण करे । इस स्थिति में दोष वात आदि
अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहते हैं । मैथुन की समाप्ति पर स्त्री को शीतल
जल से स्नान करावे ।
तत्रात्यशिता क्षुधिता पिपासिता भीता विमनाः शोकार्ता क्रुद्धाऽन्य
च पुमांसमिच्छन्ती मैथुने चातिकामा वा नारी न गर्भं धत्ते । विगुणां
वा प्रजा जनयति । अतिबालामतिवृद्धां दीर्घरोगिणीमन्येन वा विकारे
णोपसृष्टा वर्जयेत् । पुरुषेऽप्येत एव दोषाः ।
गर्भाधान के अयोग्य स्त्री-पुरुष—बहुत भोजन करने पर, भूखे होने पर,
प्यास लगी होने पर, डरी होने पर, मन प्रसन्न न होने पर या अन्य वस्तु में
मन लगे होने पर, शोकयुक्त, क्रुद्ध, अन्य पुरुष को चाहने वाली, अधिक
सम्भोग को चाहने वाली स्त्री गर्भ धारण नही करती । यदि भाग्य से गर्भ रह
भी जाये तो गुणरहित सन्तान उत्पन्न होती है । इसी प्रकार बहुत छोटी आयु
वाली, अति वृद्ध, चिरकाल से रोगिणी, अथवा अन्य किसी रोग से
आक्रान्त स्त्री को भी गर्भाधान क्रिया मे अयोग्य जानना चाहिये । इसी प्रकार
के पुरुष भी गर्भाधान क्रिया में अयोग्य होते हैं ।
१. 'गर्भं' इति च पाठः ।

१०० चरकसंहिता [ अ० ८

अतः सर्वदोषवर्जितौ स्त्री पुरुषौ संसृज्येयाताम् । संजातहर्षों मैथुने
चानुकूलाविष्टगन्धं स्वास्तीर्णं सुखं शयनमुपकल्प्य मनोज्ञं हितमशन-
मश्शित्वा नात्यशितौ । दक्षिणपादेन पुमान् वामपादेन स्त्री चारोहेत् ।
तत्र मंत्रं प्रयुञ्जीत—
गर्भाधान के नियम—इसलिये सब प्रकार के दोषों से रहित स्त्री और पुरुष
ही गर्भाधान करे । मैथुन की इच्छा उत्पन्न होने पर प्रसन्न चित्त, अनुकूल
सुगन्धि से युक्त, मन के अनुकूल, स्वच्छ, बिछे बिस्तर पर, हितकारी भोजन
खा कर, दक्षिण पाव को पुरुष और वाम पाव को स्त्री प्रथम रख कर शय्या
पर चढे । वे दोनों भोजन बहुत अधिक न खावें । इस समय निम्नलिखित
मन्त्र बोले ।
अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि ।
धाता त्वा दधातु विधाता त्वा दधातु
ब्रह्मवर्चसा भवेदिति ॥ १ ॥
ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ ।
भगोऽथ मित्रावरुणौ पुत्र वीरं दधातु मे ॥ २ ॥
मन्त्रार्थ—तू अहि है, तू आयु है, तू सब स्थान मे प्रतिष्ठित है, धाता,
तुझे धारण करे, विधाता तुझको धारण करे, तू ब्रह्म तेज से युक्त हो ॥ १ ॥
ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, दोनों अश्वी, भग, मित्र और वरुण
मुझको वीर पुत्र धारण करावें ॥ २ ॥
इत्युक्त्वा संवसेताम् ॥ ३ ॥
यह मन्त्र पढ़ कर वे दोनों मैथुन कर्म करे ॥ ३ ॥
सा चेदेवमाशासीत बृहन्तमवदातं हर्यक्षमोजस्विन शुचि सत्त्वसंपन्नं
पुत्रमिच्छेयमिति शुद्धस्नानात्प्रभृत्यस्यै मन्थमवदातयवानां मधुसर्पिर्भ्यां
संसृज्य श्वेताया गोः सरूपवत्सायाः पयसाऽऽलोड्य राजते कांस्ये वा
पात्रे काले काले सप्ताहं सतत प्रयच्छेत्पानाय, प्रातश्च शालियवान्नवि-
कारान् दधि-मधु सर्पिर्भिः पयोभिर्वा संसृज्य भुञ्जीत, तथा सायमाव-
दात-शरण-शयनासन यान-वसन-भूषणा च स्यात्, साय प्रातश्च शश्व-
च्छुश्वेतं महान्तमृषभमाजानेयं हरिचन्दनाङ्गदं पश्येत्, सौम्याभिश्चैनां
कथाभिर्मनोऽनुकूलाभिरुपासीत, सौम्याकृति-वचनोपचार-चेष्टांश्च स्त्री-
पुरुषानितरानपि चेन्द्रियार्थानवदातान् पश्येत्, सहचर्यश्चैनां प्रियहि-
ताभ्यां सततमुपचरेयुः तथा भर्ता । न च मिश्रीभावमापद्येयाताम् ।

अ० ८] शारीरस्थानम् १०१

अ० ८] शारीरस्थानम् १०१
पुत्रेष्टि—यदि स्त्री चाहे कि मेरा पुत्र बड़ा शुद्ध चरित्र, प्रतिभाशाली, सिंह
के समान पराक्रमी, पवित्र और बलसम्पन्न हो तो—ऋतुकाल के उपरान्त स्नान
करने पर लगातार सातदिनों तक समय २ पर [ प्रातः सायं दोनों समय ] स्त्री
शुद्ध साफ ( तुषों से रहित ) किये जौ के मन्थ को मधु और घी में मिला कर
श्वेत सुन्दर बछड़े वाली श्वेत गाय के दूध में घोल कर चांदी या कांसे के पात्र
में खावे और प्रातःकाल हेमन्त-धान्य ( चावल ) तथा जौ से बने खाद्य पदार्थों
को दही, मधु और घी के साथ अथवा दूध के साथ मिलाकर खाना चाहिये ।
और सायंकाल निर्मल घर, बिस्तर, आसन, वस्त्र और भूषणों का उपयोग करे ।
सायं प्रातः निरन्तर, श्वेत, बड़े, अच्छी नस्ल के, श्वेत चन्दन से लिप्त अंगों
वाले बैल का दर्शन करे, सौम्य एव मनोहर अनुकूल कथाओं द्वारा पुरुष स्त्री
को प्रसन्न करे । वह स्त्री सौम्य आकृति वाली, सौम्य वचन, सौम्य आचार और
सौम्य चेष्टा वाले स्त्री पुरुषों को तथा अन्य इन्द्रियों के निर्मल ग्राह्य पदर्थों को
देखे । इस स्त्री की प्रिय और हितकारी बातों से सहेलियां सदा सेवा करती रहें ।
इसी प्रकार पति भी अपना आहार-विहार करे । वे दोनो इस अवसर में
सम्भोग न करें ॥
इत्यनेन विधिना सप्तरात्रं स्थित्वाऽष्टमेऽहन्याप्लुत्याद्भिः सशिरस्कं
भर्त्रा सह चाहनानि वस्त्राण्याच्छादयेदवदातानि । अवदाताश्च स्रजो
भूषणानि बिभृयात् ॥ ७ ॥
इस प्रकार उपरोक्त विधि से सात रात तक रह कर आठवें दिन पति के
साथ शिर आदि सब अंगों सहित स्नान करके पवित्र, नये निर्मल वस्त्रों को धारण
करे । वे सुन्दर माला और आभूषणों को धारण करें ॥ ७ ॥
तत ऋत्विक्प्रागुत्तरस्या दिश्यागारस्य प्राक्प्रवणमुदक्प्रवणं वा
प्रदेशमभिसमीक्ष्य गोमयोदकाभ्यां स्थण्डिलमुपसलिप्य, प्रोक्ष्य चोदकेन
वेदिमस्मिन् स्थापयेत् । तां पश्चिमेनानाहतवस्त्रसंचये श्वेतार्षभे वाऽप्य-
जिन उपविशेत् ब्राह्मणप्रयुक्तः, राजन्यप्रयुक्तस्तु वैयाघ्रे चर्मण्यानुडुहे
वा, वैश्यप्रयुक्तस्तु रौरवे बास्ते वा । तत्रोपविष्टः पालाशीभिरैङ्गुदीभिरौ-
दुम्बरीभिर्माधूकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय, कुशैः परिस्तीर्य,
परिधिश्च परिधाय, लाजैः शुक्लाभिश्च गन्धवतीभि सुमनोभिरुपा-
किरेत् । तत्र प्रणीतोदपात्रं पवित्रं पूतमुपसंस्कृत्य सर्पिराज्यार्थं यथोक्त-
वर्णोनाजानेयादीन् समन्ततः स्थापयेत् ।

१०२ चरकसंहिता [अ० ८
इसके पश्चात् यज्ञ कराने वाला ऋत्विग् घर के पूर्व या उत्तर दिशा में
अथवा पूर्व या उत्तर की ओर को ढाल लिये देश को देख कर उसे गोबर से
लेप कर स्थान तैयार करे । इस स्थान को पानी छिड़क कर यहा पर बेदी का
स्थापन करे । वेदी की पश्चिम दिशा में नूतन वस्त्रो की बनी गद्दी पर अथवा
श्वेत बैल के चर्म पर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण बैठे । यदि पुत्रेष्टि के लिये
क्षत्रिय यज्ञ करा रहा हो तो वह व्याघ्र के या वैल के चर्म पर बैठे, वैश्य द्वारा
प्रयुक्त हो तो रुरु (मृग) के या बकरे के चर्म पर बैठे । वहा बैठकर ढाक,
इगुदी (हिंगोट), गूलर और महुवा की समिधाओं से अग्नि को प्रज्वलित
करके, चारों ओर कुशाओं को बिछा कर परिविधा (केले के चार खम्बे) लगा
कर, लाजा डाल कर, सफेद लाजा और गन्ध वाले फूलो को वेदी के चारो
ओर बिखेर देवे । इसके पीछे मन्त्र से पवित्र जल पात्र को रख कर
पवित्र, उपसस्कृत मन्त्र आदि से संस्कृत घी को यज्ञ के लिये रक्खे और उत्तम
वर्ण के उत्तम तथा नस्ल के बैलो आदि को भी चारों ओर बैठवादे ॥ ७ ॥
ततः पुत्रकामा पश्चिमोऽग्नि दक्षिणतो ब्राह्मणमुपविश्यानुलभेत
सह भर्त्रा यथेष्टं पुत्रमाशासाना, ततस्तस्या आशामानाया ऋत्विक्
प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्या कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टिं निर्व-
पेत् 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु' इत्यनया ऋचा, ततश्चैवाऽऽज्येन स्थालीपा
कमभिघार्य त्रिर्जुहुयात्, यथाम्नाय चोपमंत्रितमुदकपात्र तस्यै दद्या-
त्सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति ।
इसके पीछे पुत्र की कामनावाली स्त्री अग्नि के पश्चिम में और ब्राह्मण के
दक्षिण में बैठ कर पति के साथ यथेष्ट पुत्र की कामना करती हुई समस्त विधि
करे। स्त्री के यथेष्ट पुत्र की कामना करते हुए ऋत्विक् प्रजापति को लक्ष्य करके,
स्त्री के गर्भ मे उसकी इच्छा परिपूर्ण होने के अर्थ और गर्भ स्थिर रहने के
लिये पुत्र काम्येष्टि करे । वह 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु'०*इस मन्त्र से आहुति करे।
इसके पीछे घी से स्थालीपाक का सचन कर शास्त्रानुसार तीन आहुति देवे ।
उपमन्त्रित जलपात्र उस स्त्री को देवे और आदेश कर दे कि सब जल के कार्य
तू इसी पानी से कर ।
ततः समाप्ते कर्मणि पूर्वं दक्षिणपादमभिहरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनु-
परिक्रामेत्, ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा सह भर्त्राऽऽज्यशेषं प्राश्नी-
यात् । पूर्वं पुमान् पश्चात्स्त्री। न चाऽच्छिष्टमवशेषयेत् । ततस्तौ सह संव-
सेतामष्टरात्र तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां, तथेष्टपुत्र जनयेताम् ॥८॥

  • विष्णुर्योनिं कल्पयतु० ऋग्वेद मण्डल १० । सू० १८४ । १ ॥

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०३

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०३
पुत्रेष्टि यज्ञ की विधि समाप्त होने पर प्रथम दक्षिण पाव को आगे रख कर
स्त्री अग्नि की प्रदक्षिणा करे। इसके पीछे ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराके पति
के साथ अवशिष्ट आज्यशेष (बचा हुआ घी) खावे। इसमे भी पहिले पुरुष खाये
और पीछे स्त्री। अवशिष्ट कुछ भी शेष न रक्खे। दोनो परस्पर अगले आठ
रात्रि शयन करे। जिस प्रकार के पुत्र को कामना हो उसी प्रकार के ( वर्ण )
के वस्त्र पहिने। इससे मनोवाञ्छित सतान उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥
या तु स्त्री श्यामं लोहिताक्षं व्यूढोरस्कं महाबाहु च पुत्रमाशासीत,
या वा कृष्णं कृष्ण-मृदु-दीर्घ-केशं शुक्लाक्षं शुक्लदन्तं तेजस्विनमात्मव-
न्तम्। एष एवानयोरपि होमविधिः। किंतु परिवर्हवर्ज्यं स्यात्, पुत्रव-
र्णानुरूपस्तु यथाशीः परिवर्होऽन्यः कार्यः स्यात् ॥ ६ ॥
जो स्त्री काले, लाल आखों वाले, चौड़ा छाती और विशाल बाहु वाले पुत्र
की कामना करे, अथवा काले रग के, काले, कोमल लम्बे २ बालों वाले, सफेद
आख के, सफेद दातों वाले, तेजस्वी और जितेन्द्रिय पुत्र को चाहे तो इन दोनों
के लिये भी यही विधि है। किन्तु शयन, आसन, पुष्प आदि परिच्छद भिन्न
हैं। जैसे वर्ण के पुत्र की चाह हो वैसा ही परिच्छद पोशाक और बिछावन
करे। इष्ट पुत्र के वर्ण के अनुरूप सब वस्त्रादि होना चाहिये ॥ ६ ॥
शूद्रा तु नमस्कारमेव कुर्याद्देवाग्नि द्विज गुरु-तपस्वि-सिद्धेभ्यः ॥१०॥
शूद्रा स्त्री मन्त्र-विधि से होम न करके देवता, अग्नि, ब्राह्मण, गुरु, सिद्ध
और तपस्वियों को नमस्कार मात्र ही करे [ क्योंकि शूद्रा मूर्ख होने से यज्ञादि
ठीक प्रकार से करने मे असमर्थ होती है ] ॥ १० ॥
या या च यथाविधं पुत्रमाशासीत तस्यास्तस्यास्तां तां पुत्राशिष-
मनुनिशम्य तान्तान् जनपदान् मनसाऽनुपरिक्रामयेत् । ताननुपरिक्रम्य
या या येषां येषा जनपदाना मनुष्याणामनुरूप पुत्रमाशासीत सा सा
तेषा तेषां जनपदानामाहार-विहारोपचार-परिच्छदाननुविधत्स्वेति वाच्या
स्यात्। इत्येतत्सर्वं पुत्राशिषा समृद्धिकर कर्म व्याख्यातं भवति ॥११॥
जो जो स्त्री जिस जिस प्रकार के पुत्र की इच्छा करे उस उस की
उस उस प्रकार के पुत्र की इच्छा को सुन कर उन नाना जनपदों में
उस स्त्री को मन द्वारा भ्रमण करावे, उनका अनेक बार चिन्तन कराये।
जो जो स्त्री जिन २ जनपदों के राष्ट्रनिवासियोँ के सदृश पुत्र को चाहे वह इन
देशवासियों जैसा जैसा आहार-विहार, उपचार, परिच्छद आदि करते हैं वैसा

१०४ चरकसंहिता [ अ० ८
करने को कहे । यह सब पुत्र को चाहने वाली स्त्रियों के आशानुरूप समृद्धि
करने वाले पुत्र के अनुकूल कर्म का उपदेश कर दिया है ॥ ११ ॥
न तु खलु केवलमेतदेव कर्म वर्णवैशेष्यकरं भवति, अपि खलु
तेजोधातुरप्युदकान्तरिक्ष-धातु-प्रायोऽवदात-वर्णकरो भवति । पृथिवी-
वायु-धातु-प्रायः कृष्णवर्णकरः सम-सर्व धातु-प्रायः श्यामवर्णकरः ॥१२॥
केवल इतना ही कर्म वर्ण की विशेषता को उत्पन्न नहीं करता । बल्कि
तेजो धातु, जल और अन्तरिक्ष धातु अधिक मात्रा में वर्ण को चमकीला, स्वच्छ
कान्तिमान् बनाते हैं। यही तेजो धातु पृथ्बी, वायु की अधिकता के कारण वर्ण
को काला कर देता है । सब धातुओं की समान मात्रा वर्ण को श्याम (सावला)
करती है ॥ १२ ॥
सत्त्ववैशेष्यकराणि पुनस्तेषां तेषां प्राणिनां मातापितृसत्त्वान्यन्तर्व-
ल्न्याः श्रुतयश्चाभीक्ष्णं स्वोचितं च कर्म सत्त्वविशेषाभ्यासश्चेति ॥१३॥
उन उन प्राणियों के माता पिता के सत्त्व, गर्भिणी का सत्त्व, बार बार
बातों का सुनना, गर्भ के पूर्व जन्म के सचित कर्म, जन्मान्तर में जिस प्रकार
के सत्त्व का पुरुष अभ्यास करता है यह बातें सत्त्व (मन) की विशेषता को
उत्पन्न करती हैं ॥ १३ ॥
यथोक्तेन विधिनोपसंस्कृतशरीरयोः स्त्रीपुरुषयोर्मिश्रीभावमापन्नयो
शुक्रं शोणितेन सह समेत्याव्यापन्नमव्यापन्नेन योनावानुपहतायामप्रदुष्टे-
गर्भाशये गर्भमभिनिर्वर्तयत्येकान्तेन । तद्यथा निर्मले वाससि सुपरि-
कल्पिते रञ्जनं समुदितगुणमुपनिपातादेव रागमभिनिर्वर्तयति, तद्वत् ।
यथा वा क्षीरं दध्नाऽभिषुतमभिषवणाद्विहाय स्वभावमापद्यते दधि-
भावं शुक्रं तद्वत् ॥ १४ ॥
उपरोक्त विधि के अनुसार संस्कृत शरीर वाले स्त्री पुरुषों के परस्पर सयुक्त
होने पर शुक्र आर्तव के साथ मिल कर निर्दोष शुक्र निर्दोष आर्तव से, नीरोग-
स्वस्थ योनि में मिल कर, निर्दोष गर्भाशय में-सम्पूर्ण रूप में गर्भ को बनाता है।
जिस प्रकार निर्मल, स्वच्छ, अच्छी प्रकार से धोये वस्त्र पर थोड़ा सा भी उत्तम
रंग गिरने पर रंग चढ़ा देता है, उसी प्रकार शुद्ध निर्मल गर्भाशय में निर्दोष
शुक्र आर्तव से मिल कर गर्भ को उत्पन्न कर देता है। जिस प्रकार थोड़ी सी
दही, बहुत से दूध के साथ मिल कर उसको भी दही रूप में कर देती है, उसी
प्रकार थोड़ा सा शुक्र भी गर्भ को स्वभावतः उत्पन्न कर देता है ॥ १४ ॥
एवमभिनिर्वर्त्तमानस्य गर्भस्य स्त्रीपुरुषत्वे हेतुः पूर्वमुक्तः ॥ १५ ॥

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०५

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०५
यथा हि बीजमनुपतप्तमृत्तं स्वा स्वां प्रकृतिमनुविधीयते व्रीहिर्वा
व्रीहित्वं यवो वा यवत्वं तथा स्त्रीपुरुषावपि यथोक्तं हेतुविभागमनु-
विधीयेते ॥ १६ ॥
इस प्रकार से बनते हुए गर्भ में कन्या या पुत्र की उत्पत्ति का कारण हमने
प्रथम ही कह दिया है । [ रक्त की अधिकता से कन्या और शुक्र की अधिकता
से पुत्र उत्पन्न होता है । ] जिस प्रकार निर्दोष अथवा दूषित बीज अपनी अपनी
प्रकृति का अनुसरण करके धान्य से धान्य और जौ के बीजों से जौ को उत्पन्न
करते हैं, उसी प्रकार कन्या और पुत्र की उत्पत्ति मे भी स्त्री और पुरुष अपने २
कारणानुसार कार्य करते हैं ॥ १५-१६ ॥
तयोः कर्मणा वेदोक्तेन विवर्तनमुपदिश्यते प्राग्व्यक्तीभावात् प्रयु-
ञ्जीत सम्यक् । कर्मणां हि देशकालसंपदुपैताना नियतमिष्टफलत्वं,
तथेतरेषामितरत्वम् । तस्मादापन्नगर्भा स्त्रियमभिसमीक्ष्य प्राग्व्यक्ती-
भावाद् गर्भस्य पुसवनमस्यै दद्यान्—गोष्ठे जातस्य न्यग्रोधस्य प्रागु-
त्तराभ्या शाखाभ्यां शुङ्गे अनुपहते आदाय द्वाभ्या धान्यमाषाभ्यां
सपदुपैताभ्या वा सह दधिन प्रक्षिप्य पुष्ये पिबेत्, तथैवापराज्जी
वकर्षभकापामार्ग-सहचर-कल्काश्च युगपदेकैकशो यथेष्ट वाप्यु-
पसस्कृत्य पयसा, कुड्यकीटकं मत्स्यकोद्र चोदकाञ्जलौ प्रक्षिप्य पुष्ये
पिबेत्, तथा कनकभयान् राजतानायसांश्च पुरुषकानग्निवर्णानणुप्रमाणान्
दध्रि पयस्युदकाञ्जलौ वा प्रक्षिप्य पिबेदनवशेषतः पुष्येण, पुष्येणैव च शा-
लिपिष्टस्य पच्यमानस्योष्माणमुपाघ्राय तस्यैव च पिष्टस्योदकसंसृष्टस्य
रस देहलीमपनिधाय दक्षिणे नासापुटे स्वयमासिञ्चेत्पिचुना । इति पुस-
वनानि। यच्चान्यदपि ब्राह्मणा ब्रूयुराप्ता वा पुसवनमिष्ट तच्चानुष्ठेयम्॥१७॥
पुंसवन विधि—वेदोक्त कर्म के अनुसार ठीक प्रकार से कार्य अनुष्ठान करने
या भेदक लक्षणो के उत्पन्न होने से पूर्व ही लिंगादि मे परिवर्त्तन करना सम्भव
है । उत्तम गुणयुक्त देश, काल में किये कर्मों मे इष्ट फल अवश्य प्राप्त होता
है । उत्तम देश काल के गुणों से रहित कर्मों मे इष्ट फल नहीं मिलता । इस
लिये स्त्री में गर्भ रहने पर गर्भ के लक्षणों के स्पष्ट होने से पूर्व ही गर्भ में
पुसवन करने का प्रयोग करना चाहिये । [गर्भ के लिंग विभेदकलक्षण दूसरे महीने
मे स्पष्ट होते हैं । अतः दूसरे मास से पूर्व पुंसवन कर्म का प्रयोग करे ] (१)
गौओं के बैठने के स्थान में लगे बड़ वृक्ष की उत्तर और पूर्व की दिशा की
ओर लगी दो शाखाओं से दो शुंग (फुनगो) तोड़ कर उत्तम गुण वाले उड़द

१०६ चरकसंहिता [ अ० ८
या श्वेत सरसों के दो दो दानों के साथ दही में मिलाकर पुष्य नक्षत्र में पान
करे १। (२) दूसरी विधि—जीवक, ऋषभक, अपामार्ग, सहचर इनके
कल्क को सब के साथ अथवा अलग अलग दूब के साथ इच्छानुसार सस्कृत
कर लेना चाहिये । फिर कुड्य कीट ( भित्तिमत्स्य )२, मत्स्यकोड्र ( मत्स्यक ),
इनको चुल्लू भर पानी में मिला कर पुष्य नक्षत्र में पीना चाहिये । ( ३ ) तीसरी
विधि—स्वर्ण, चांदी या लोहे से बहुत सूक्ष्म मनुष्य की आकृति बना कर आग
में लाल करके, दही दूब या चुल्लू भर पानी में बुझाना चाहिये । फिर पुष्य
नक्षत्र मे इसका सम्पूर्ण रूप में पा लेना चाहिये । ( ४ ) चतुर्थ विधि—पुष्य
नक्षत्र में ही पकते हुए शाली के आटे की गरमी को सूघ कर और उसी चून
को जल में मिला कर उसके रस को देहली पर शिर रख कर अपने दक्षिण
नासापुट में रुई के फाये द्वारा सिंचन करे ( जिससे कि मुख म आ जाये ) ।
यह पुसवन के अनेक प्रकार हैं । इनके अतिरिक्त और भा जिस २ पुसवन या
इष्ट कर्म का ब्राह्मण या वृद्ध विद्वान् उपदेश करे उनको भी करे ३ ( जसे—
लक्ष्मणा ओषधि के रस को दक्षिण नासा पुट में डालना आदि ) ॥ १७ ॥
अत ऊर्ध्वं गर्भास्थापनानि व्याख्यास्यामः—ऐन्द्री-ब्राह्मी-शतवीर्या-
सहस्रवीर्याऽमोघाऽव्यथा शिवा-बलाऽरिष्टा-वात्यपुष्पी-विष्वक्सेनका-
न्ता च । आसामोषधीनां शिरसा दक्षिणेन पाणिना धारण, एताभिश्चैव
सिद्धस्य पयसः सर्पिषो वा पानं, एताभिश्चैव पुष्ये पुष्ये स्नान, सदा
समालभेत च ताः, तथा सर्वासां जीवनीयाक्तानामोषधीनां सदोपयो-
गस्तैस्तैरुपयोगविविभिः । इति गर्भास्थापनानि व्याख्यातानि भवन्ति १८
इसके आगे गर्भास्थापन विधियों का उपदेश करते हे--ऐन्द्री, ब्राह्मी, शत-
वीर्या, सहस्रवीर्या ( दूब के भेद ), अमोघा ( पाटला ), अव्यथा ( गिलोय )
शिवा ( हरीतकी ), अरिष्टा ( कटुरोहिणी ), वात्यपुष्पा ( पीतवला ), विष्व-
क्सेनकान्ता ( प्रियंगु ), इन ओषधियों को शिरमें तथा दक्षिण हाथ में धारण
करना चाहिये । इन ओषधियो से सस्कृत दूध वा घी का पान करना चाहिये ।
इन ओषधियों के क्वाथ से प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में स्नान करना चाहिये । इन
१ धान्यमाष शब्देन—ब्रीहि माष ग्राह्यन्ति, स्वर्णमाष च व्यावर्त-
यन्ति । चक्रपाणि ।
२ कुड्यकीट—दिवार में मिट्टी से जो कीड़ा घर बनाता है,
३ गर्भाधान और पुसवन विधि के लिये सस्कारविधि तथा बृहदारण्यकोप-
निषद में पुत्रेष्टि-प्रकरण ( बृहद्० उप० अ० ६ । ब्रा० ४ ।)

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०७

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०७
औषधियों को सदा पास में रखे। इस प्रकार जीवनीय गण में कही हुई सम्पूर्ण
औषधियो का नाना प्रकारों से सदा उपयोग करते रहना चाहिये। यह गर्भ
स्थापन विधिया कह दी हे ॥ १८ ॥
गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—उत्कटुक-विषम-
कठिनासन-सेविन्या वात-मूत्र-पुरीष-वेगानुपरुन्धत्या दारुणानुचित-व्या-
याम-सेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेविन्याश्च गर्भो म्रियतेऽन्त कुक्षेरे-
काले वा स्रसते शुष्यी वा भवति, यथाऽभिघातप्रपीडनै. श्वभ्र-कूप-प्रपा-
तोदेशावलोकनैर्वाऽभीक्ष्ण मातुः प्रपतत्यकाले, तथाऽतिमात्रसंक्षोभि-
भिर्यानैरप्रियातिमात्रश्रवणैर्वा । प्रततोत्तानशायिन्याः पुनर्गर्भस्य नाभ्या-
श्रया नाडी कण्ठमनुवेष्टयति विवृतशायिनी नक्तचारिणी चोन्मत्तं
जनयति, अपस्मारिण पुनः कलिकलहशीला । व्यवायशीला दुर्वपुष-
मह्रीकं स्त्रैणं वा । शोकनित्या भीतमपचितमल्पायुष वा। अभिध्यात्री
परोपतापिनमीर्ष्युं स्त्रैणं वा । स्तेनात्यायासबहुमलमतिद्रोहिणमकर्मशील
वा। अमर्षिणी चण्डमौपधिकमसूतकं वा। स्वप्ननित्या तन्द्रालुमबुध-
मल्पाग्नि वा। मद्यनित्या पिपासालुमल्पस्मृतिमत्तवस्थितचित्त वा।
गोधा-मास-प्रिया शार्कंरिणमश्मरिण शनैर्मेहिन वा । वराहमांसप्रिया
रक्ताक्षं क्रथनमतिपरुषरोमाण वा। मत्स्यमासनित्या चिरनिमेष
स्तब्धाक्षं वा । मधुरनित्या प्रमेहिनं मूकमतिस्थूल वा । अम्लनित्या
रक्तपित्तिनं त्वगक्षिरोगिणं वा। लवणनित्या शीघ्रवलीपलितं खालित्य-
रोगिण वा । कटुकनित्या दुर्बलमल्पशुक्रमनपत्य वा । तिक्तनित्या शो-
षिणमबलमपचितं वा । कषायनित्या श्यावमानाहिनमुदावर्तिनं वा,
यद्यच्च यस्य यस्य व्याधेर्निदानमुक्तं तत्तदासेवमानाऽन्तर्वत्नी तद्विकार-
बहुलमपत्यं जनयति । पितृजास्तु शुक्रदोषा मातृजैरुपचारैर्व्याख्याताः ।
इति गर्भोपघातकरा भावा भवन्त्युक्ताः ॥ १६ ॥
निम्नलिखित बाते गर्भ का नाश करनेवाली हैं। यथा—उकडू ( घुटनों
के बल) अथवा विषम, टेढे मेड़े, ऊचे नीचे या कठिन आसन या स्थिति में
बैठने, वात, मूत्र और मल के वेग को रोकने, दारुण या अनुचित व्यायाम का
करने, अति तीक्ष्ण या अति उष्ण पदार्थों का सेवन, और भूख से कम (प्रमित)
भोजन करने से गर्भ गर्भाशय में मर जाता है, अथवा विना समय के बह जाता
है, या अन्दर ही सूख जाता है। इसी प्रकार चोट लगने से, दबने से, माता
के गहरे गड़्ढे में, कुए में, जल-प्रपात के स्थान को बार बार देखने से अकाल

१०८ चरकसंहिता [अ० ८

में गर्भ गिर जाता है। बहुत अधिक हिलने डुलनेवाली सवारी पर चलने से,
अप्रिय बातों के बहुत सुनने से, निरन्तर उत्तान (चित) सोने से, गर्भ की
नाभि में लगी नाड़ी गर्भ के गले में लिपट जाती है। खुले स्थान में, मैदान में
सोनेवाली या रात में घूमनेवाली स्त्री के नित्य पागल संतान उत्पन्न होती है,
झगड़ालु स्त्री अपस्मार रोगवाली संतान उत्पन्न करती है। मैथुनशील स्त्री बुरे
शरीर वाले, निर्लज्ज या स्त्री-प्रकृति के संतान को उत्पन्न करती है। नित्य शोका-
तुर रहनेवाली स्त्री भीत, निर्बल अथवा थोड़ी उमरवाले संतान को जन्म देती
है, मन से द्रोह करनेवाली, दूसरे को पीड़ित करनेवाले, ईर्ष्यालु या स्त्री-प्रकृति
के संतान को जन्माती है, चोरी के स्वभाववाली स्त्री बहुत मेहनत करनेवाले,
अतिद्रोही अथवा कर्म न करनेवाले संतान को पैदा करती है। क्रोधशील स्त्री
चण्ड, शठ या निन्दा करने वाले संतान को उत्पन्न करती है। नित्य सोने
वाली माता आलसी, मूढ अथवा मन्दाग्नि संतान को उत्पन्न करती है।
मद्यपान करने वाली स्त्री पिपासा वाले, थोड़ी स्मृति और चंचल मन वाले
संतान को उत्पन्न करती है ऴ। गोधा (गोह) के मांस को खाने वाली स्त्री
शर्करामोही, पथरी के रोगी या शनै.मेही को जन्म देती है, सूअर के मांस में
रुचि करने वाली स्त्री लाल आंखों वाले वा अकस्मात् जिसका श्वास बन्द हो
जाये, ऐसे, कठोर बालों वाले संतान को जन्म देती है। मछलियों के मांस में
रुचि करने वाली स्त्री देर में पलक गिराने वाले, अथवा बे झपक आंख वाले
संतान को पैदा करती है। मधुर रस (दूध को छोड़कर शेष मधुर) को खाने
वाली स्त्री प्रमेही, गूंगी या बहुत मोटे संतान को जन्म देती है। अम्ल रस का
सेवन करने वाली रक्तपित्त के रोगी वा त्वचा और आंख के रोगी को जन्म देती
है। लवण रस को सेवन करने वाली स्त्री शीघ्र वलि (झुरिया) या पलित (सफेद
बाल वाले) तथा गंजे संतान को जन्म देती है। कटु रस को सेवन करने वाली
स्त्री दुर्बल अल्पशुक्रवाली या संतान रहित संतति को उत्पन्न करती है। तिक्त रस
को सेवन करने वाली स्त्री शोषरोगी, निर्बल या छोटी संतति को उत्पन्न करती है।
कषाय रस को सेवन करने वाली स्त्री श्याव (काले) आनाह वा उदावर्त्त रोगी


ऴ रौटेण्डा अस्पताल में एक नव जात बच्चा लगातार चार पाच दिन तक
रोता रहा। इसको चुप कराने क लिये सब उपायें किये गये। प्यास के लिये
पानी भी दिया, दूध भी दिया, पर चुप न हुआ। अन्त मे मद्य देन पर ही
चुप हुआ। इस कारण को ढूढने पर पता चला कि इसकी माता शराब
पीती थी।

अ० ८] शारीरस्थानम् १०६

अ० ८] शारीरस्थानम् १०६
संतान को उत्पन्न करती है। जिस जिस रोग के जो जो कारण कहे हैं, उन २
कारणों को सेवन करने वाली माता उसी उसी रोग से ग्रस्त संतान को उत्पन्न
करती है गर्भ का नाश करने वाले पिता के शुक्र दोषों की व्याख्या माता के किये
अपचारों से कर दी है ॥ १६ ॥
तस्मादहितानाहारविहारान् प्रजासंपदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेण वर्ज-
येत्। साध्वाचारा चाऽऽत्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहारविहाराभ्याम् ॥२०॥
इसलिये जो स्त्री यह चाहे कि उसकी संतान गुणवती हो वह अहितकारी
आहार-विहार का विशेष रूप से त्याग कर दे। वह साधु आचार से रह कर
हितकारी आहार-विहार का सेवन करे ॥ २० ॥
व्याधींश्चास्या मृदु-मधुर-शिशिर-सुख सुकुमार-प्रायैरौषधाहारोपचारै-
रुपचरेत् । न चास्या वमन-विरेचन-शिरोविरेचनानि प्रयोजयेत्, न रक्त-
मवसेचयेत्, सर्वकालं च नास्थापनमनुवासनं वा कुर्यादन्यत्रात्ययिका-
द्वयाधेः। अष्टमं मासमुपादाय वमनादिसाध्येषु पुनर्विकारेष्वात्ययिकेषु
मृदुभिर्वमनादिभिस्तदर्थकारिभिर्वोपचारः स्यात्, पूर्णमिव तैलपात्रम-
सङ्क्षोभयताऽन्तर्वत्नी भवत्युपचर्या ॥ २१ ॥
गर्भिणी के रोगों की चिकित्सा मृदु, मधुर, शीतल, सुख और सुकुमारप्राय
औषधियों और ऐसे ही आहार विहारों से करनी चाहिये। गर्भिणी को वमन,
विरेचन अथवा शिरोविरेचन नही देने चाहिये। रक्तमोक्षण भी नहीं करना
चाहिये। कोई खास रोग को छोड़ कर हर समय आस्थापन या अनुवासन क्रिया
भी नहीं बरतनी चाहिये । आठवा मास लग जाने पर यदि कोई ऐसा रोग आ
पड़े जिसमें कि वमन आदि क्रिया आवश्यक ही हो, तब कोमल रूप में वमन आदि
क्रियाओं को करावे, अथवा ऐसी ही क्रिया करने वाले अन्य उपाय करने चाहियें ।
गर्भ को तैल से भरे पात्र के समान जान कर क्षोभ आदि उत्पन्न न करते हुए
गर्भिणी का उपचार करना चाहिये ॥ २१ ॥
सा चेदपचाराद् द्वयोस्त्रिषु वा मासेषु पुष्पं पश्येन्नास्या गर्भः स्था-
स्यतीति विद्यात् । अजातसारा हि तस्मिन् काले भवन्ति गर्भाः ॥२२॥
यदि अपचार के कारण दूसरे या तीसरे मास में गर्भिणी को रजोदर्शन हो
जाय तो समझना चाहिये कि इसको गर्भ नहीं रहेगा, क्योंकि इस समय तक गर्भ
मे सार उत्पन्न नही होता ॥ २२ ॥
सा चेच्चतुष्प्रभृतिषु मासेषु क्रोध-शोकासूयेर्ष्या-भय-त्रास-व्यवाय-व्या-
याम-सङ्क्षोभ-संधारण-विषमासन-शयन-स्थान-क्षुत्पिपासाद्यतियोगात्क-
दाहाराद्वा पुष्प पश्येत्तस्या गर्भ-स्थापन-विधिमुपदेक्ष्यामः।

११० चरकसंहिता [ अ० ८
यदि गर्भिणी को चौथे आदि मासों मे क्रोध, शोक, ईर्ष्या, भय, त्रास, मैथुन,
व्यायाम, विक्षोभ, वेगों के रोकने, विषम आसन, विषम शयन, विषम स्थान,
भूख, प्यास के अति वेग से अथवा कुत्सित आहार के कारण पुष्प दर्शन होने
लगे उसके लिये गर्भ स्थापन विधि का उपदेश करते हैं ॥
पुष्पदर्शनादेवैना ब्रूयात् शयनं तावन्मृदु-सुख-शिशिरास्तरणं संस्ती-
र्णमीषदवनतशिरस्कं प्रतिपद्यस्वेति, ततो यष्टी-मधुक-सर्पिर्भ्यां परम-
शिशिर वारिणि संस्थिताभ्यां पिचुनासाव्योपस्थसमीपे स्थापयेत्तस्या ।
तथा शतधौत-सहस्रधौताभ्यां सर्पिर्भ्यामधो नाभेः सर्वतः प्रदिह्यात् ।
गव्येन चैनां पयसा सुशीतेन मधुकाम्बुना वा न्यग्रोधादिकषायेण
वा परिषेचयेदधो नाभेः । उदके वा सुशीतमवगाहयेत्, क्षीरिणां
कषायद्रुमाणां च स्वरसपरिपोतानि चेलानि ग्राहयेत् । न्यग्रोधादिसिद्ध-
योर्वा क्षीरसर्पिषोः पिचुं ग्राहयेत्, अतश्चैवाक्षमात्रं प्राशयेत् । प्राशयेद्वा
केवलं च क्षीरसर्पिः । पद्मोत्पल-कुमुद-किञ्जल्काश्चास्य समधुशर्करान्
लेहार्थं दद्यान् । शृङ्गाटक-पुष्करबीज-कशेरुकांश्च भक्षणार्थं, गन्ध-प्रियङ्गु
सितोत्पल-शालकोडुम्बर-शलाडु-न्यग्रोध शुङ्गानि वा पाययेदेनामाजेन
पयसा। पयसा चैनां बलातिबला-शालि-षष्टिकेशुमूल-काकोली-श्रुतेन
समधुशर्करं रक्तशालीनामादनं मृदु-सुरभि-शीतं भोजयेत् । लाव-कपि-
ञ्जल-कुरङ्ग-शम्बर-शश-हरिणैण कालपुच्छक-रसेन वा घृत-सलिल-सिद्धेन
सुख-शिशिरोपवात-देशस्था भोजयेत्, तथा क्रोध-शोकायासं-व्यवाय-व्या-
यामतश्चाभिरक्षेत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोऽनुकूलाभिरुपासीत,
तथाऽस्या गर्भस्तिष्ठति ॥ २३ ॥
पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर वैद्य इस गर्भिणी को आदेश देवे—
बिस्तर कोमल, सुखकारक, शीतल गद्देदार बनावे । इसका शिरोभाग पायते
से जरा नीचे रखे । फिर मुलहठी और घी को मिला कर बहुत ठण्डे पानी में
रख कर ठण्डा होने पर इससे फाया भिगो कर योनि में रखे । शतधौत या
सहस्रधौत ( पानी मे सौ बार या हजार बार धोये ) घी को नाभि के नीचे के
प्रदेश में चारों ओर लगा देना चाहिये । नाभि के निचले भाग पर गाय के
दूध से अथवा मुलहठी के ठण्डे क्वाथ से या वट आदि के शीतल कषाय से
परिसेचन करना चाहिये । अथवा खूब शीतल जल मे बिठावे। दूध वाले (बड़-
पीपल, गूलर आदि ) वृक्षों के या कषाय वृक्ष ( जामुन, पिलखन आदि ) के
स्वरस मे भीगे हुए कपड़ों को रखवावे । बड़, पीपल, गूलर आदि के कोमल
शुंगों ( फुनगियों ) से सिद्ध घी और दूध के फाया को रखवावे । इसी सिद्ध घी

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १११

अ० ८ ] शारीरस्थानम् १११
की चार तोला मात्रा चाहिये । अथवा केवल दूध से निकाले घी का सेवन
करावे । पद्म (कमल) उत्पल, कुमुद इनका पराग मधु और शर्करा के साथ
मिला कर चाटने के लिये देना चाहिये । सिंघाड़ा, कमलगट्टा, कसेरू ये पदार्थ
खाने के लिये देना चाहिये । गन्ध प्रियंगु, मिश्री, शालूक कन्द, गूलर के कच्चे
फल और वट के शुंग (फुनगी) इनको पीसकर बकरी के दूध के साथ पिलाना
चाहिये । बला, अतिबला, शालि, साठी धान्य, गन्ने की जड़ और काकोली द्वारा
सस्कार कर दूध के साथ लाल चावलों के मृदु मधुर और शीतल भात को मधु
और शर्करा के साथ खिलाना चाहिये । बटेर, कपिञ्जल, करज, शम्बर (हरिण
भेद), खरगोश, हरिण, ऐणक, कालपुच्छ इनके मास-रस के साथ अथवा पानी
में सिद्ध किये घी के साथ, सुखदायक, शीतल वायु वाले स्थान मे बिठा कर
भोजन करना चाहिये । क्रोध, शोक, मेहनत, मैथुन और व्यायाम आदि से
बचाना चाहिये । मन के अनुकूल प्रिय कथाओं से इसका मन बहलाना
चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ स्थिर हो जाता है ॥ २३ ॥
यस्याः पुनरामान्वयात्पुष्पदर्शनं स्यात्, प्रायस्तत्तस्या गर्भबाधकं
भवति, विरुद्धोपक्रमत्वात्तयोः । यस्याः पुनरुष्णतीक्ष्णोपयोगाद् गर्भि-
ण्या महति सजातसारे गर्भे पुष्पदर्शनं स्यादन्यो वा योनिस्रावः,
तस्या गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति निःस्रुतत्वात् । स कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं,
तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपवास-व्रत-कर्म-परायाः पुनः कदाहा-
रायाः स्नेहद्वेषिण्याः वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानाया गर्भो न वृद्धिं
प्राप्नोति परिशुष्कत्वात्। स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं, अस्पन्दनश्च १
भवति, तं तु नागोदरमित्याचक्षते ॥ २४ ॥
जिस गर्भिणी मे आम को उत्पन्न करने वाले कारण से पुष्प दर्शन होता है
उसका गर्भ नष्ट ही हो जाता है। क्योकि इनकी चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ती
है। गर्भस्राव मे स्तम्भन औषध बरती जाती है। स्तम्भन औषध शीत, मृदु
और मधुर होती है और इधर शीत, मृदु और मधुर औषध आम दोष को
उत्पन्न करती है। इसलिये असाध्य है। जिस गर्भिणी मे उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं
के सेवन से, गर्भ के अन्दर सार उत्पन्न होने पर पुष्पदर्शन अथवा आर्तव के
अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का योनि-स्राव होने लगे, तब गर्भ की वृद्धि रुक
जाती है। क्योंकि बहने से पोषक पदार्थ के बाहर आ जाने से यह गर्भ बहुत
१ अतिमात्रस्पन्दश्च भवति, यह भी पाठ है, परन्तु सुश्रुत मे मन्द स्पन्दते
दिया है, इसलिये अस्पन्दनश्च भवति ठीक है ।

११२ चरकसंहिता [ अ० ८
समय तक रुक जाता है। इसको 'उपविष्टक' कहते हैं। और जो गर्भिणी
प्राय. उपवास करती है या कुत्सित आहार का सेवन करती है, घी आदि
स्नेह से द्वेष करती है, वात-प्रकोपक कारणो का सेवन करती है, उसका भी
गर्भ वृद्धि को प्राप्त नही होता, क्योंकि वह गर्भ शुष्क हो जाता है ! वह गर्भ
बहुत समय तक गर्भाशय में रुका रहता है। इसके अन्दर हरकते नहीं होती।
इसको 'नागोदर' कहते है ॥ २४ ॥
नार्‍योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सितविशेषमुपदेक्ष्यामः-भौतिक-जीवनी-
य-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धाना सर्पिषामुपयोगः, नागोदरे तु योनिव्या-
पन्निद्दिष्टपयसामामगर्भाणा गर्भद्वद्धिकराणा च, सम्भोजनमेतैरेव सिद्धैश्च
घृतादिभिः सुभिक्षायाः, अभीक्ष्ण यान-वाहनावमार्जनावजृम्भणैरुपपा-
दनमिति ॥ २५ ॥
उपरोक्त दोनों प्रकार की स्त्रियो की विशेष चिकित्सा का उपदेश करते है -
भूतों (सूक्ष्म जन्तुओं को दूर करन) के लिये उपयोगी गुग्गुलु सरसों आदि
अथवा महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से
सिद्ध घृत का उपयोग करना चाहिये। नागोदर गर्भ को अवस्था मे योनि व्यापत्
अधिकार में कहे घृता का तथा आम-गर्भ और गर्भ को वृद्धि करने वाले भोजनों
का उपयोग और इनसे ही सिद्ध वृतों का उपयोग करना चाहिये । यान, वाहन,
शरीर शुद्धि, जृम्भण आदि कर्मों को बार बार करना चाहिये ॥ २५ ॥
यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते ता श्येन-मत्स्य-गवय तित्तिर-ताम्र-
चूड-शिखिनामन्पतमस्य सर्पिष्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा
मूलकयूषेण वा रक्तशालीनामोदन मृदु-मधुर-शीतल भोजयेत्, तैलाभ्य-
क्तेन चास्या अभीक्ष्णमुदरवक्षणोरु-कटी-पार्श्व-पृष्ठ-प्रदेशानीषदुष्णे
नोपाचरेत् ॥ २६ ॥
जिस गर्भिणी मे सोया हुआ गर्भ गति न करे उस स्त्री को श्येन, मछली,
गवय, मोर कुक्कुट या तीतर इनके मास रस के साथ घी अथवा माषयूष के
साथ पर्याप्त घी, मूली के यूष के साथ लाल चावलो का मधुर, मृदु, शीतल
भात खिलाना चाहिये । इस स्त्री के शरीर पर तैल की मालिश करके हलके गरम
पानी से उदर, पेट, जाघ, कटी, पीठ और पार्श्व का बार बार स्नान कराना
चाहिये ॥ २६ ॥
यस्याः पुनरुदावर्त्त-विवन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं
मन्येत, ततस्तस्यास्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम् । उदावर्तो ह्युपे-

अ० ८] ८ शारीरस्थानम् ११३

अ० ८] ८ शारीरस्थानम् ११३
क्षितः सहसा सगर्भा गर्भिणीं गर्भमथवाऽतिपातयेत् । तत्र वीरण-शालि
षष्टिक-कुश-काशेक्षुवालिका-वेतस-परिव्याध-मूलानां भूतीकानन्ता-
काश्मर्य-परूषक-मधुक-मृद्वीकाना च पयसाऽर्धोदकेनोद्गमय्य रस
प्रियाळ-विभीतक-मज्ज-तिलकल्क- संप्रयुक्तमीषल्लवणमनत्युष्णं निरूहं
दद्यात् । व्यपगतविवन्धां चेना सुख-सालल-परिषिक्ताङ्गी स्थैर्यकरमवि-
दाहिनमाहार भुक्तवती साय मधुकसिद्धेन तैलेनानुवासयेत् । न्युब्जां
त्वेनामास्थापनानु वासनाभ्यामुपचरेत् ॥ २७ ॥
जिस स्त्री का आठवे मास में उदावर्त्त रोग आ पड़े और अनुवासन बस्ति
का प्रयोग उचित न हो, तो इस रोग का मिटाने क लिये उचित निरूह बस्ति
का प्रयोग करना चाहिये । उपेक्षा किया हुआ यह उदावर्त्त रोग अचानक ही
गर्भ के साथ गर्भिणी का अथवा गर्भ को ही नष्ट कर देता है। उदावर्त्त रोग
की शान्ति के लिये वीरण, शालिधान्य, कुश, काश, गन्ना, वेतस, परिव्याध
(वेतस का भेद) इनकी जड़, भूतीक, सारिवा, गम्भारी, फालसा, मुलैहठी,
किशमिश इनके पानी से अधवे दूध मे क्वाथ तैयार करना चाहिये । इस क्वाथ
में पियाल, बहेड़ा की मज्जा और तिल इनका कल्क डाल कर सिद्ध किये तथा
कुछ नमकीन बना कर अल्प गरम बस्ति (निरूह) देनी चाहिये । रुका-
वट हट जाने पर थोड़े गरम पानी से स्नान कराके, स्थिरता करने वाला,
अविदाही भोजन खिलाना चाहिये । सायंकाल (मधुक) मुलैहठी सिद्ध तैल
से अनुवासन बस्ति देना चाहिये । औंधी लेटी गर्भिणी को आस्थापन तथा
अनुवासन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । [उदर शूल के कारण गर्भिणी की
यह स्थिति स्वयं हो जाती है ] ॥२७॥
यस्याः पुनरतिमात्रदोषोपचयाद्वा तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेवनाद्वा वात-
मूत्र पुरीष-वेग-धारणैर्वा विषमासन-शयन-स्थान-सपीडनाभिघातैर्वा
क्रोध-शोकेर्ष्या सूया-भय-त्रासादिभिर्वा साहसेर्वाऽपरैः कर्मभिरन्तः कुक्षे-
र्गर्भो म्रियते, तस्याः स्तिमित स्तब्धमुदरमाततं शीतमश्मान्तर्गतमिव भव-
त्य स्पन्दनो गर्भः शूलमधिकमुपजायते । न चाव्यः प्रादुर्भवन्ति । योनिनै
प्रस्रवत्यक्षिणी चास्याः स्रस्ते भवतस्ताम्यति व्यथते भ्रमते श्वसित्यर-
तिबहुला च भवति । न चास्या वेगप्रादुर्भावो यथावदुपलभ्यत इत्येव-
लक्षणां स्त्रियं मृतगर्भेयमिति विद्यात् ॥ २८ ॥
जिस गर्भिणी में दोषों के अधिक संचय होने से अथवा अति तीक्ष्ण या
अति उष्ण पदार्थों के सेवन से, वायु, मूत्र, मल के वेगों को रोकने से, विषम

११४ चरकसंहिता [ अ० ८
आसन, विषम शयन, विषम स्थान, पीड़न या चोट आदि से, क्रोध, शोक, भय,
ईर्षा, त्रास आदि से अथवा अन्य साहसिक कार्यों के कारण गर्भ गर्भाशय के
भीतर ही मर जाता है, उसमें इसके कारण पेट, चमडे मे ढपा, जैसा निश्चल,
फैला, शीतल हो जाता है । उदर में पत्थर सा पडा हुआ प्रतीत होता है ।
गर्भ में स्पन्दन नहीं होता, दर्द बहुत बढ़ जाती है । प्रसवकालिक दर्दें उत्पन्न
नहीं होतीं । योनि से किसी प्रकार का स्राव नहीं आता । आखे अपने आप
बाहर निकलती है, स्त्री भय से कातर हो जाती है । अन्धकार सा दीखता है,
पीड़ा होती है, चक्कर आते हैं, श्वास बहुत जोर से चलता है । ठीक प्रकार से
वेगों की उत्पत्ति नहीं होती । इन लक्षणों से समझ लेना चाहिये कि इस स्त्री का
गर्भ मर गया है ॥ २८ ॥
तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म संशमनमित्याहुरेके । मन्त्रा-
दिकमथर्ववेदविहितमित्येके । परिदृष्टकर्मणा शल्यहर्त्राऽऽहरणमि-
त्येके ॥ २९ ॥
व्यपगतगर्भशल्यां तु स्त्रियममगर्भां सुराशीध्वरिष्ट मधु-मदिरासवा-
नामन्यतममग्रे सामर्थ्यतः पाययेद् गर्भकोष्ठाविशुद्ध्यर्थमार्त्तिविस्म-
रणार्थं प्रहर्षणार्थं च । अतः परं हृद्यैर्बलानुरक्षिभिरस्नेह-संप्रयुक्तै-
र्यवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहारैरुपचरेदाव-धातु-क्लेद-विशोषण-
मात्रं कालम् । अतः परं स्नेहपानैर्वस्तिभिराहारविधिभिश्च दीपनीय-
जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-समाख्यातैरुपचरेत् । परिपक्वगर्भशल्या-
याः पुनविमुक्तगर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात् ॥ ३० ॥
इस मृत गर्भ रूपी शल्य को बाहर करने के लिये जरायु को निकालने की
विधि बरतनी चाहिये ऐसा कईयों का मत है । अथर्ववेदोक्त मंत्रों से कार्य
करना चाहिये यह दूसरों का मत है । जिस वैद्य ने इस कर्म को देखा हुआ
हो शल्य निकालने वाले उस वैद्य द्वारा यह काम करवाना चाहिये यह तीसरो
का मत है । दोष, धातु, क्लेद इनकी समय पर शान्ति रहे, इसलिये कच्चे गर्भ
(शल्य) के निकल जाने पर स्त्री को प्रथम सुरा, शीधु, अरिष्ट, मधु, मदिरा,
आसव इनमें से कोई एक पदार्थ शक्ति अनुसार पिला देना चाहिये । जिससे
कि गर्भाशय की शुद्धि हो जाये तथा दर्द को भूल जाये और मन में प्रसन्नता
आ जाये । इसके पीछे बल की रक्षा करने वाली घी आदि स्नेह से रहित
यवागू, आदि तत्कालोचित आहार तब तक देवे जब तक दोषयुक्त धातु की
क्लिन्नता न सूख जाये । इसके पश्चात् स्नेह-पान स्नेह बस्तिया, तथा दीपनीय,