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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 616 में से

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पृष्ठ 117

१०२ चरकसंहिता [अ० ८
इसके पश्चात् यज्ञ कराने वाला ऋत्विग् घर के पूर्व या उत्तर दिशा में
अथवा पूर्व या उत्तर की ओर को ढाल लिये देश को देख कर उसे गोबर से
लेप कर स्थान तैयार करे । इस स्थान को पानी छिड़क कर यहा पर बेदी का
स्थापन करे । वेदी की पश्चिम दिशा में नूतन वस्त्रो की बनी गद्दी पर अथवा
श्वेत बैल के चर्म पर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण बैठे । यदि पुत्रेष्टि के लिये
क्षत्रिय यज्ञ करा रहा हो तो वह व्याघ्र के या वैल के चर्म पर बैठे, वैश्य द्वारा
प्रयुक्त हो तो रुरु (मृग) के या बकरे के चर्म पर बैठे । वहा बैठकर ढाक,
इगुदी (हिंगोट), गूलर और महुवा की समिधाओं से अग्नि को प्रज्वलित
करके, चारों ओर कुशाओं को बिछा कर परिविधा (केले के चार खम्बे) लगा
कर, लाजा डाल कर, सफेद लाजा और गन्ध वाले फूलो को वेदी के चारो
ओर बिखेर देवे । इसके पीछे मन्त्र से पवित्र जल पात्र को रख कर
पवित्र, उपसस्कृत मन्त्र आदि से संस्कृत घी को यज्ञ के लिये रक्खे और उत्तम
वर्ण के उत्तम तथा नस्ल के बैलो आदि को भी चारों ओर बैठवादे ॥ ७ ॥
ततः पुत्रकामा पश्चिमोऽग्नि दक्षिणतो ब्राह्मणमुपविश्यानुलभेत
सह भर्त्रा यथेष्टं पुत्रमाशासाना, ततस्तस्या आशामानाया ऋत्विक्
प्रजापतिमभिनिर्दिश्य योनौ तस्या कामपरिपूरणार्थं काम्यामिष्टिं निर्व-
पेत् 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु' इत्यनया ऋचा, ततश्चैवाऽऽज्येन स्थालीपा
कमभिघार्य त्रिर्जुहुयात्, यथाम्नाय चोपमंत्रितमुदकपात्र तस्यै दद्या-
त्सर्वोदकार्थान् कुरुष्वेति ।
इसके पीछे पुत्र की कामनावाली स्त्री अग्नि के पश्चिम में और ब्राह्मण के
दक्षिण में बैठ कर पति के साथ यथेष्ट पुत्र की कामना करती हुई समस्त विधि
करे। स्त्री के यथेष्ट पुत्र की कामना करते हुए ऋत्विक् प्रजापति को लक्ष्य करके,
स्त्री के गर्भ मे उसकी इच्छा परिपूर्ण होने के अर्थ और गर्भ स्थिर रहने के
लिये पुत्र काम्येष्टि करे । वह 'विष्णुर्योनिं कल्पयतु'०*इस मन्त्र से आहुति करे।
इसके पीछे घी से स्थालीपाक का सचन कर शास्त्रानुसार तीन आहुति देवे ।
उपमन्त्रित जलपात्र उस स्त्री को देवे और आदेश कर दे कि सब जल के कार्य
तू इसी पानी से कर ।
ततः समाप्ते कर्मणि पूर्वं दक्षिणपादमभिहरन्ती प्रदक्षिणमग्निमनु-
परिक्रामेत्, ततो ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा सह भर्त्राऽऽज्यशेषं प्राश्नी-
यात् । पूर्वं पुमान् पश्चात्स्त्री। न चाऽच्छिष्टमवशेषयेत् । ततस्तौ सह संव-
सेतामष्टरात्र तथाविधपरिच्छदावेव च स्यातां, तथेष्टपुत्र जनयेताम् ॥८॥

  • विष्णुर्योनिं कल्पयतु० ऋग्वेद मण्डल १० । सू० १८४ । १ ॥