चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] ७ शारीरस्थानम् ६७
इस संख्यात शरीर को जो वास्तव में अनेक अवयवों से युक्त है मोहवश
एक रूप में देख कर सग-बुद्धि ( आसक्ति ) उत्पन्न होती है। एक रूप में
शरीर को देख कर इसके उपकार में प्रवृत्ति नहीं होती है जिससे मनुष्य राग-
द्वेष मे फस जाता है। शरीर को पृथक् २ अग २ रूप में समझने से ममता
नहीं होती, इसी लिये प्रवृत्ति के शान्त होने पर धर्माधर्म के न होने से अपवर्ग
होता है। प्रधान आत्मा, राग द्वेष से रहित है। वह सब प्रकार के उपकारक
ओर अपकारक भावों से निवृत्त होकर ससार से भी निवृत्त-मुक्त हो जाता है॥२०॥
तत्र श्लोकौ—शरीरसंख्यां यो वेद सर्वावयवशो भिषक्।
तदज्ञाननिमित्तेन स मोहेन न युज्यते॥ २१॥
अमूढो मोहमूलैश्च न दोषैरभिभूयते।
निर्दोषो निःस्पृहः शान्तः प्रशाम्यत्यपुनर्भवः॥ २२॥
जो भिषक् ( वैद्य ) शरीर के सम्पूर्ण अवयवो की सख्या जानता है, वह
वैद्य मिथ्याज्ञान के कारण मोह में नही फँसता। ज्ञानी पुरुष मोह ( राग
द्वेष ) के कारण दोषो से कभी भी पराजित नहीं होता। इसलिये दोषरहित,
निःस्पृह होकर सब क्रियाओ के शान्त होने से शान्त हो जाता है फिर इसका
पुनर्जन्म नहीं होता ॥२१-२२॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने शरीरसंख्या-
शारीर नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
अष्टमोऽध्यायः।
अथातो जातिसूत्रीयं शारीरं व्याख्यास्यामः॥ १॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः॥ २॥
अब इसके आगे 'जाति-सूत्रीय' नामक शरीर का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था॥ १-२॥
स्त्रीपुंसयोरव्यापन्न-शुक्र शोणित-गर्भाशययो श्रेयसीं प्रजामिच्छ-
तोस्तदर्थामिनिर्वृत्तिकरं कर्मोपदेक्ष्यामः॥ ३॥
जिसके शुक्र में दूषण न हो ऐसा पुरुष और जिसके आर्त्तव और गभाशय
मे दोष न हो ऐसी स्त्री जो श्रेष्ठ सतान की कामना करनेवाले हों उन स्त्री-पुरुषो
के लिये गुणवती प्रजा के उत्पादक कर्मों का उपदेश करते हैं:—॥ ३ ॥