चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३
अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६३
विकारा यस्य वर्धन्ते प्रकृतिः परिहीयते ।
सहसा सहसा तस्य मृत्युर्हरति जीवितम् ॥ २४ ॥
(१७) जिसके शरीर में विरोधी कारणों से रोग उत्पन्न हुए हों और
जिनकी चिकित्सा परस्पर विपरीत पड़े और रोग बड़े वेग से बढ़े वह शीघ्र ही
मर जाता है।
(१८) जिस रोगी का बल, ज्ञान, आरोग्य, ग्रहणी मास और रक्त क्षीण
हो गये हों, वह रोगी शीघ्र ही मर जाता है।
(१९) जिस रोगी का आरोग्य दिन पर दिन घट रहा हो, तथा प्रकृति
स्वभाव (अथवा जन्म की 'कफ प्रकृति' आदि प्रकृति) बदलती जा रही हो
उस रोगी के जीवन को मृत्यु एकाएक हर लेता है ॥ २२-२४ ॥
तत्र श्लोकः-इत्येतानि शरीराणि व्याधिमन्ति विवर्जयेत् ।
न ह्येषु धीराः पश्यन्ति सिद्धिं काञ्चिदुपक्रमात् ॥ २५ ॥
वर्णन किये हुए इन रोगी शरीरो का परित्याग करे, क्योंकि इनमें चिकित्सा
करने से विद्वान् लोग कुछ लाभ नहीं देखते ॥ २५ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने कतमानि
शरीरीयमिन्द्रियं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
सप्तमोऽध्यायः
अथातः पन्नरूपीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे छाया-प्रतिच्छाया के विनाश रूप अरिष्ट को बतलाने के लिये
'पन्नरूपीय इन्द्रिय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥ १-२ ॥
दृष्ट्वा यस्य विजानीयात्पन्नरूपां कुमारिकाम् ।
प्रतिच्छायामयीमक्ष्णोर्नैनमिच्छेच्चिकित्सितुम् ॥ ३ ॥
ज्योत्स्नायामातपे दीपे सलिलादर्शयोरपि ।
अङ्गेषु विकृता यस्य च्छाया प्रेतस्तथैव सः ॥ ४ ॥
छिन्ना भिन्नाकुला छाया हीना वाऽप्यधिकाऽपि वा ।
नष्टा तन्वी द्विधा छिन्ना विशिरा विकृता च या ॥ ५ ॥
१६४ चरकसंहिता [ अ० ७
एताश्चान्याश्च याः काश्चित्प्रतिच्छाया विगर्हिताः ।
सर्वा मुमूर्षतां ज्ञेया न चेल्लक्ष्यनिमित्तजाः ॥ ६ ॥
( १ ) जिस रोगी मनुष्य की प्रतिबिम्ब छाया दूसरे मनुष्य की आंख की
पुतली में अथवा अन्य की प्रतिबिम्ब रूप छाया जिस रोगी मनुष्य की पुतली में
पड़ना बन्द हो जाये वैद्य ऐसे पुरुष की चिकित्सा करने की इच्छा न करे। जिस
मनुष्य को चांदनी, धूप, दीपक के प्रकाश, पानी और शीशे (दर्पण) में अपनी
छाया और प्रतिबिम्ब में विकृति दिखाई दे, वह प्रेत के समान होता है। जिस
मनुष्य को अपनी छाया छिन्न-भिन्न, अनिश्चित प्रतिबिम्ब वाली, हीन, अथवा
अधिक, नष्ट, पतली दो भागों में विभक्त बिगड़ी हुई, बिना शिरोभाग के दीखने
वाली तथा अन्य निन्दित दूसरी सब प्रतिच्छाया मरने वालों की जाननी चाहिये
बशर्ते ये प्रतिच्छाया किसी कारण से उत्पन्न न हुई हों ॥ ३-६ ॥
सस्थानेन प्रमाणेन वर्णेन प्रभया तथा ।
छाया विवर्तते यस्य स्वस्थोऽपि प्रेत एव सः ॥ ७ ॥
जिस स्वस्थ पुरुष की छाया, संस्थान (आकृति) प्रमाण (लम्बाई चौड़ाई)
वर्ण (रंग) और प्रभा (कान्ति) में अन्य प्रकार की हो जाती है, वह पुरुष
प्रेत के समान है ॥ ७ ॥
संस्थानमाकृतिर्ज्ञेया सुषमा विषमा च या ।
संस्थान—संस्थान का अर्थ है आकृति। वह आकृति दो प्रकार की होती
है। (१) सुषमा और (२) विषमा।
मध्यसल्पं महच्चोक्तं प्रमाणं त्रिविधं नृणाम् ॥ ८ ॥
प्रमाण तीन प्रकार का है। (१) मध्य, (२) अल्प और (३) महान् ॥८॥
प्रतिप्रमाणसस्थाना जलादर्शातपादिषु ।
छाया या सा प्रतिच्छाया-
प्रतिच्छाया—प्रमाण और संस्थान के अनुकूल जो छाया जल, दर्पण या
धूप आदि में दीखती है, उसको 'प्रतिच्छाया' कहते हैं।
छाया वर्णप्रभाश्रया ॥ ९ ॥
खादीना पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः ।
नाभसी निर्मला नीला सस्नेहा सप्रभेव च ॥ १० ॥
रूक्षा श्यावाऽरुणा या तु वायवी सा हतप्रभा ।
विशुद्धरक्ता त्वाग्नेयी दीप्ताभा दर्शनप्रिया ॥ ११ ॥
अ० ७ ] इन्द्रियस्थानम् १६५
शुद्धवैदूर्यविमला सुस्निग्धा चाम्भसी मता ।
स्थिरा स्निग्धा घना श्लक्ष्णा श्यामा श्वेता च पार्थिवी ॥१२॥
वायवी गर्हिता त्वासा चतस्रः स्युः शुभोदयाः ।
वायवी तु विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ १३ ॥
छाया—वर्ण प्रभा के साथ रहती है । आकाश आदि पाच महाभूतों के
अनुसार छाया भी पाच प्रकार की होती है, क्योंकि शरीर भी पाच महाभूतों से
मिल कर बना है । इसलिये इन महाभूतों की छाया भी पाच प्रकार की पड़ती
है । इनमें आकाश की छाया निर्मल, नीली, स्नेह और प्रभा (कान्ति) से युक्त
होती है । वायु की छाया रूक्ष, श्याम, लाल और कान्तिहीन होती है । अग्नि की
छाया शुद्ध लाल, दीप्त कान्ति, देखने मे आखों को प्रिय और जल की छाया
शुद्ध वैदूर्य के समान साफ, निर्मल, स्निग्ध होती है । पृथिवी की छाया स्थिर,
स्निग्ध, घन, श्लक्ष्ण, श्याम ( सावली ) काली और श्वेत होती है । इनमें
वायवी छाया निन्दित, नाशकारक और अत्यन्त कष्टदायक होती है । शेष चार
छायाए सुखदायक होती हैं ॥ ६-१३ ॥
स्यात्तैजसी प्रभा सर्वा सा तु सप्तविधा स्मृता ।
रक्ता पीता सिता श्यावा हरिता पाण्डुराऽसिता ॥ १४ ॥
तासा याः स्युर्विकासिन्यः स्निग्धाश्च विपुलाश्च याः ।
ताः शुभा रूक्षमलिनाः संक्षिप्ताश्चाशुभोदयाः ॥ १५ ॥
वर्णमाक्रामति च्छाया भास्तु वर्णप्रकाशिनी ।
आसन्ना लक्ष्यते छाया भाः प्रकृष्टा प्रकाशते ॥ ॥ १६ ॥
नाच्छायो नाप्रभः कश्चिद्विशेषाञ्चिह्वयन्ति तु ।
नॄणां शुभाशुभोत्पत्ति काले छायाः प्रभाश्रयाः ॥ १७ ॥
प्रभा के सात प्रकार—सब प्रकार की प्रभाए तैजस हैं । यह प्रभा सात
प्रकार की हैं । यथा-लाल, पीली, श्वेत, काली, हरी, पाण्डुर ( धूसर ) और
असित ( एकदम काली ) । इनमें जो प्रभा विकासिनी ( फैलने वाली ),
स्निग्ध, और बड़ी हो, वे सब शुभ फलदायक हैं। जो रूक्ष मलिन और सक्षिप्त
( सकुचित ) हैं ये सब अशुभ फल दायक है ।
छाया—छाया से अक्रान्त होने पर वर्ण उपलब्ध नहीं होता । प्रभा वर्ण
को प्रकाशित करती है । छाया समीप से देखी जाती है [ यथा चित्र की छाया
समीप से दीखती है ], प्रभा दूर से खूब चमकती है [ यथा, मणि, मुक्ता
आदि की प्रभा दूर से दीखती है ] । कोई भी मनुष्य एकाएक छायाहीन या
१६६ चरकसंहिता [ अ० ७
प्रभाहीन नहीं हो सकता । मृत्यु के समीप आने पर प्रभा पर आश्रित छाया
मनुष्य के शुभाशुभ को प्रकाशित कर देती है ॥ १४-१७ ॥
कामलाक्ष्णोर्मुखं पूर्णं गण्डयोर्युक्तमासता ।
संत्रासश्चोष्णगात्रं च यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ १८ ॥
उत्थाप्यमानः शयनात्प्रमोहं याति यो नरः।
मुहुर्मुहुर्न सप्ताहं स जीवति विकुत्थन ॥ १६ ॥
( १ ) जिस रोगी की आंखे कामला रोगी के समान पीली, मुख से लार
गिरना, गण्डस्थल गालों पर मास की वृद्धि ( गालों पर मास की अधिकता )
हो जिसको देखकर डर लगे, और शरीर में उष्णता हो, ऐसे रोगी को त्याग दे,
उसकी चिकित्सा स्वीकार न करे । ( २ ) जो रोगी प्रातःकाल विस्तरे से उठते
समय मूर्च्छित हो जाता हो, और बार बार अपना शोखो मारता रहे या निरन्तर
गालिया बोले वा बड़बड़ावे वह सात दिन में मर जाता है ॥ १८-१६ ॥
संसृष्टा व्याधयो यस्य प्रतिलोमानुलोमगाः ।
व्यापन्ना ग्रहणी प्रायः सोऽर्धमास न जीवति ॥ २० ॥
उपरुद्धस्य रोगेण कर्षितस्याल्पमश्नतः ।
बहुमूत्रपुरीषं स्याद्यस्य तं परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
दुर्बलो बहु भुक्ते यः प्राग्भुक्तादन्नमातुरः ।
अल्पमूत्रपुरीषश्च यथा प्रेतस्तथैव सः॥ २२॥
इष्टं च गुणसंपन्नमन्नमश्नाति यो नरः ।
शश्वच्च बलवर्णाभ्यां हीयते न स जीवति ॥ २३ ॥
( ३ ) जिस रोगी में प्रतिलोमगामी और अनुलोमगामी दोनों प्रकार के
रोग मिले हुए हों, और जिस की ग्रहणी दूषित हो, ( अन्नपाक होना बन्द हो
जाये ) वह पन्द्रह दिन से अधिक नहीं जीता । (४) रोग से पीडित दुर्बल व्यक्ति
तथा थोड़ा खाने पर जिसको मल ओर मूत्र अधिक परिमाण में आये, वह रोगी
त्याज्य है । ( ५ ) जो रोगी निर्बल होकर पहिले की अपेक्षा अधिक भोजन
करे, जिसको मल और मूत्र कम परिमाण में आता हो, वह प्रेत के समान है ।
(६) जो रोगी मन चाहा और गुणकारी अन्न को खाये, तो भी, बल और वर्ण
निरन्तर क्षीण होता जाये, वह नहीं बचता ॥ २०-२३ ॥
प्रकूजति प्रश्वसिति शिथिलं चातिसार्यते ।
बलहीनः पिपासार्तः शुष्कास्यो न स जीवति ॥ २४ ॥