ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८७- बाण और अनिरुद्धके संवाद-प्रसङ्गमें अनिरुद्धद्वारा द्रौपदीके पाँच पति होनेका वर्णन, बाणसेनापति सुभद्रका अनिरुद्धके साथ युद्ध और अनिरुद्धद्वारा उसका वध
| ७५८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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उसपर अमूल्य रत्नोंके कलश चमक रहे थे और वह श्वेत चँवरों, दर्पणों तथा अग्निशुद्ध पवित्र वस्त्रोंद्वारा सब ओरसे सुशोभित था। तदनन्तर रुक्मिणीदेवीसे पूर्वकालमें शिवके द्वारा भस्मीभूत कामदेव प्रकट हुए। उन्होंने शम्बरासुरका वध करके अपनी पतिव्रता पत्नी रतिको प्राप्त किया। उस समय रति देवताके संकेतसे 'मायावती' नाम धारण करके शम्बरासुरके महलमें उसकी गृहिणी बनकर रहती थी; परंतु उसकी शय्यापर स्वयं न जाकर अपनी छायाको भेजती थी।
नारदने पूछा— महाभाग ! कामदेव (प्रद्युम्न)-ने किस प्रकार दैत्यराज शम्बरका वध किया था ? वह शुभ कथा विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
श्रीनारायणने कहा— नारद ! एक सप्ताहके व्यतीत होनेपर दैत्यराज शम्बर रुक्मिणीके सूतिकागृहसे बालकको लेकर वेगपूर्वक अपने वासस्थानको चला गया। वह दैत्यराज पुत्रहीन था; अतः उस पुत्रको पाकर उसे महान् हर्ष हुआ। फिर उसने प्रसन्नतासे वह बालक मायावतीको दे दिया। उसे पाकर सती मायावतीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर सरस्वतीदेवीने आकर मायावती (रति)-को और श्रीकृष्ण-पुत्र (कामदेव)-को समझाया कि तुम दोनों पत्नी-पति हो। शिवके कोपसे भस्म हुए कामदेवने ही श्रीकृष्णके पुत्ररूपसे जन्म लिया है; अतएव तुम दोनों पति-पत्नीकी भाँति रहो।
तब वे पति-पत्नीकी भाँति रहने लगे। इस बातका शम्बरासुरको पता लग गया। तब वह दोनोंकी भर्त्सना करके उन्हें मारने दौड़ा। उसने शिवजीका दिया हुआ शूल चलाया। इसी बीच पवनदेवने चुपके-से दुर्गाका स्मरण करनेको कहा। दुर्गाका स्मरण करते ही शिव-शूल रमणीय और मनोहर मालाके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर कामदेवने हर्षपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा उस दैत्यको मार डाला और रतिको लेकर वे विमानद्वारा द्वारकापुरीको चले गये। उनके पीछे समस्त देवगण स्वयं पार्वतीकी स्तुति करके चले। रुक्मिणीने मङ्गल-कार्य सम्पन्न करके रतिको और अपने पुत्रको ग्रहण किया। श्रीहरिने स्वस्त्ययनपूर्वक परम उत्सव कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और पार्वतीकी पूजा की।
तदनन्तर श्रीकृष्णने वेदोक्त शुभ दिन आनेपर
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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क्रमशः सात रमणियोंका पाणिग्रहण किया। उनके नाम हैं—कालिन्दी, सत्यभामा, सत्या, सती, नाग्नजिती, जाम्बवती और लक्ष्मणा। उन्होंने क्रमशः इनके साथ विवाह किये और पुत्र उत्पन्न किये। उनमें एक-एकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्या उत्पन्न हुई। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने राजाधिराज नरकासुरको पुत्रसहित मारकर रणके मुहानेपर महाबली मुर दैत्यको भी यमलोकका पथिक बना दिया। वहाँ उसके महलमें श्रीकृष्णको सोलह हजार कन्याएँ दीख पड़ीं, जिनकी अवस्था सौ वर्षसे ऊपर हो चुकी थी; परंतु उनका यौवन सदा स्थिर रहनेवाला था। वे सब-की-सब रत्नाभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके मुख प्रफुल्लित थे। माधवने शुभ मुहूर्तमें उन सबका पाणिग्रहण किया और शुभकालमें क्रमशः उन सबके साथ रमण किया उनमें भी प्रत्येकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्याका जन्म हुआ। इस प्रकार श्रीहरिके पृथक्-पृथक् इतनी संतानें उत्पन्न हुईं।
नारद ! एक समयकी बात है। मुनिवर दुर्वासा अनायास घूमते-घूमते रमणीय द्वारकापुरीमें आये। उस समय उनके साथ तीन करोड़ शिष्य भी थे। उन्हें आया देखकर पुत्र और पुरोहितके साथ महाराज उग्रसेन, वसुदेव, श्रीकृष्ण, अक्रूर तथा उद्धवने षोडशोपचारद्वारा मुनिवरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मन् ! तब मुनिवरने उन्हें पृथक्-पृथक् शुभाशीर्वाद दिये। तदनन्तर वसुदेवजीने अपनी कन्या एकानंशाको शुभ मुहूर्तमें महर्षि दुर्वासाको दान कर दिया और बहुत-से मोती, माणिक्य, हीरे तथा रत्न दहेजमें दिये। उन्होंने दुर्वासाको बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित एक सुन्दर आश्रम भी दिया।
एक बार मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने अपने मनमें विचारकर देखा कि कहीं तो श्रीकृष्ण रत्ननिर्मित मनोहर पलंगपर शयन कर रहे हैं, कहीं वे सर्वव्यापी प्रभु श्रद्धापूर्वक पुराणकी कथा सुन रहे हैं, कहीं सुन्दर आँगनमें महोत्सव मनानेमें संलग्न हैं, कहीं सत्याद्वारा भक्तिपूर्वक दिया गया ताम्बूल चबा रहे हैं, कहीं शय्यापर पौढ़े हैं और रुक्मिणी श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रही हैं, कहीं आनन्दपूर्वक शयन कर रहे हैं और कालिन्दी उनके चरण दबा रही हैं; फिर सुधर्मा-सभामें सुन्दर रूप धारण करके सत्समाजके मध्य विराज रहे हैं। ऐश्वर्यशाली मुनिने सर्वत्र उनके साथ समान रूपसे सम्भाषण किया। इस परम अद्भुत दृश्यको देखकर विप्रवर दुर्वासाको महान् विस्मय हुआ। तब वे पुनः रुक्मिणीके महलमें उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे।
दुर्वासा बोले—जगदीश्वर ! आप सबपर विजय पानेवाले, जनार्दन, सबके आत्मस्वरूप, सर्वेश्वर, सबके कारण, पुरातन, गुणरहित, इच्छासे परे, निर्लिप्त, निष्कलङ्क, निराकार, भक्तानुग्रह-मूर्ति, सत्यस्वरूप, सनातन, रूपरहित, नित्य नूतन और ब्रह्मा, शिव, शेष तथा कुबेरद्वारा वन्दित हैं। लक्ष्मी आपके चरणकमलोंकी सेवा करती रहती हैं। आप ब्रह्मज्योति और अनिर्वचनीय हैं,