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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

८४- पार्वतीद्वारा दुर्वासाके प्रति अकारण पत्नी-त्यागके दोषका वर्णन, दुर्वासाका पुनः लौटकर द्वारका जाना, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें पधारना, शिशुपालका वध, उसके आत्माद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, श्रीकृष्ण-चरितका निरूपण

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
माता सुभद्रा कन्याको अपनी छातीसे लगाकर
उसकी सखियों तथा बान्धवोंके साथ उच्च स्वरसे
रोने लगीं और इस प्रकार बोलीं।
सुभद्राने कहा—वत्से ! तू मुझ अपनी
माताका परित्याग करके कहाँ जा रही है ? भला,
मैं तुझे छोड़कर कैसे जी सकूँगी ? और तू भी
मेरे बिना कैसे जीवन धारण करेगी ? रानी बेटी !
तू महालक्ष्मी है, तूने मायासे ही कन्याका रूप
धारण कर रखा है। अब तू वसुदेव-नन्दनकी
प्रिया होकर मेरे घरसे वसुदेवजीके भवनको जा
रही है। यों कहकर रानीने शोकवश नेत्रोंके
जलसे अपनी कन्याको भिगो दिया। भीष्मकने
भी आँखोंमें आँसू भरकर अपनी कन्या श्रीकृष्णको
समर्पित कर दी। इस प्रकार उसका परिहार
करके वे फूट-फूटकर रोने लगे। तब रुक्मिणीदेवी
तथा श्रीकृष्ण भी लीलासे आँसू टपकाने लगे।
तत्पश्चात् वसुदेवजीने पुत्र और पुत्रवधूको रथपर
चढ़ाया। इस अवसरपर राजा भीष्मक अपने जामाताको
दहेज देने लगे। उन्होंने हर्षपूर्ण हृदयसे एक हजार
गजराज, छः हजार घोड़े, एक सहस्र दासियाँ,
सैकड़ों नौकर, अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण,
एक हजार रत्न, पाँच लाख शुद्ध सुवर्णकी मोहरें,
विश्वकर्माद्वारा निर्मित सोनेके सुन्दर-सुन्दर जलपात्र
तथा भोजनपात्र, बहुत-सी गायें, एक हजार
दूधवाली सवत्सा धेनुएँ और बहुत-से बहुमूल्य
रमणीय अग्निशुद्ध वस्त्र प्रदान किये। तब वसुदेव
और उग्रसेन देवताओं और मुनियोंके साथ
प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र ही द्वारकाकी ओर चले। वहाँ
अपनी रमणीय पुरीमें प्रवेश करके उन्होंने मङ्गल-
कृत्य कराये, सुन्दर एवं अत्यन्त मनोहर बाजे
बजवाये। तदनन्तर देवकी, सुन्दरी रोहिणी, नन्दपत्नी
यशोदा, अदिति, दिति तथा अन्यान्य सौभाग्यवती
नारियाँ श्रीकृष्ण और सुन्दरी रुक्मिणीकी ओर
बारंबार निहारकर उन्हें घरके भीतर लिवा ले
गयीं और उन्होंने उनसे मङ्गल-कृत्य करवाये।
फिर देवताओं, मुनिवरों, नरेशों और भाई-
बन्धुओंको चतुर्विध (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य)
भोजन कराकर उन्हें बिदा किया। पुनः हर्षमग्न
हो भृष्ट ब्राह्मणोंको इतने रत्न आदि दान किये,
जिससे वे प्रसन्न और संतुष्ट हो गये। उन्हें भोजन
भी कराया। इस प्रकार भोजन करके और धन
लेकर वे सभी खुशी-खुशी अपने घरोंको गये।
यों वसुदेव-पत्नीने सारा मङ्गल-कार्य सम्पन्न
कराया।
(अध्याय १०८-१०९)
श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधिकाके पास
जाना, वहाँ अचेतनावस्थामें पड़ी हुई राधाको श्रीकृष्णके संदेशद्वारा चैतन्य
करना और राधाका उपदेश देनेके लिये उद्यत होना
श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! इस प्रकार
उस साङ्गोपाङ्ग मङ्गल-कार्यके अवसरपर पधारे
हुए लोगोंके चले जानेपर नन्दजी यशोदाके साथ
अपने प्रिय पुत्र (श्रीकृष्ण)-के निकट गये।
वहाँ जाकर यशोदाने कहा—माधव ! तुमने
अपने पिता नन्दजीको तो ज्ञान प्रदान कर ही
दिया, परंतु बेटा ! मैं तुम्हारी माता हूँ; अतः
कृपानिधे ! मुझपर भी कृपा करो। महाभाग ! तुम
पृथ्वीका उद्धार करनेवाले और भक्तोंको उबारनेवाले
हो। मैं भयभीत हो इस भयंकर भवसागरमें पड़ी
हुई हूँ। मायामयी प्रकृति ही इस भवसागरसे
तरनेके लिये नौका है और तुम्हीं उसके कर्णधार
हो; अतः कृपामय ! मेरा उद्धार करो। यशोदाकी
बात सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जो ज्ञानियोंके
गुरुके भी गुरु हैं, हँस पड़े और भक्तिपूर्वक
मातासे बोले।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५३
श्रीभगवान्ने कहा—माँ! जो भक्त्यात्मक
ज्ञान है, वह तुम्हें राधा बतलायेगी। यदि तुम
राधाके प्रति मानवभावका त्याग करके उसकी
आज्ञाका पालन करोगी तो जो ज्ञान मैंने नन्दजीको
दिया है; वही ज्ञान वह तुम्हें प्रदान करेगी। अतः
अब नन्दजीके साथ आदरपूर्वक नन्द-ब्रजको
लौट जाओ। इतना कहकर और विनय प्रदर्शित
करके श्रीहरि महलके भीतर चले गये।
तब नन्दजी यशोदाके साथ कदलीवनको
गये। वहाँ उन्होंने राधाको देखा, जो पङ्कस्थ
चन्दनचर्चित जलयुक्त कमल-दलकी शय्यापर
अचेत हो शयन कर रही थीं। राधाने अपने
अङ्गोंसे भूषणोंको उतार फेंका था, उनके शरीरपर
श्वेत वस्त्र शोभा पा रहा था, आहारका त्याग
कर देनेसे उनका उदर कृश हो गया था,
मूर्च्छितावस्थामें उनके ओष्ठ सूख गये थे और
नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे। वे परमात्मा श्रीकृष्णके
चरणकमलका ध्यान कर रही थीं, उनका चित्त
एकमात्र उन्हींमें निविष्ट था और बाह्यज्ञान लुप्त
हो गया था। वे बीच-बीचमें मुखकमलको ऊपर
उठाकर मन्द मुस्कानयुक्त प्रियतम श्रीकृष्णका
मार्ग जोहती रहती थीं। स्वप्नमें प्रियतमके समीप
पहुँचकर कभी हँसती और कभी रोती थीं।
सखियाँ चारों ओरसे श्वेत चँवरद्वारा निरन्तर
उनकी सेवा कर रही थीं। राधाकी यह दशा
देखकर भार्यासहित नन्दको महान् विस्मय हुआ।
उन्होंने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर परम
भक्तिके साथ राधाको नमस्कार किया। उसी
समय ईश्वरेच्छासे सहसा राधाकी नींद उचट गयी।
वे जाग पड़ीं और क्षणभरमें ही उन्हें विषयज्ञानरहित
चेतना प्राप्त हो गयी। तब वे उस सखी-समाजमें
सामने पति-पत्नी नन्द-यशोदाको देखकर उनसे
आदरपूर्वक पूछते हुए मधुर वचन बोलीं।
राधिकाने पूछा—बतलाओ, तुम कौन हो
और यहाँ किस प्रयोजनसे आये हो? सुनो; मुझे
विषयज्ञान नहीं है। मैं यह भी नहीं जान पाती
कि कौन मनुष्य है कौन पशु; कौन जल है
कौन स्थल; और कौन रात है कौन दिन?
यहाँतक कि मुझे स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसकका
भी भेद नहीं ज्ञात होता।
राधिकाकी बात सुनकर नन्दको महान्
विस्मय हुआ। तब गोपी यशोदा सम्भाषण करनेके
लिये डरते-डरते राधाके निकट गयीं और उनके
पास ही बैठकर प्रिय वचन बोलीं। नन्द भी
वहीं यशोदाद्वारा दिये गये आसनपर बैठ गये।
तब यशोदाने कहा—राधे! चेत करो; तुम
यत्नपूर्वक अपनी रक्षा करो; क्योंकि मङ्गल दिन
आनेपर तुम अपने प्राणनाथके दर्शन करोगी।
सुरेश्वरि ! तुमने अपने कुल तथा विश्वको पवित्र
कर दिया है। तुम्हारे चरणकमलकी सेवासे ये
गोपियाँ पुण्यवती हो गयी हैं। जनसमूह, संतगण,
चारों वेद और पुरातन पुराण तुम्हारी तीर्थोंको
पावन बनानेवाली सुमङ्गल कीर्तिका गान करेंगे।
बुद्धिरूपे ! मैं यशोदा हूँ, ये नन्द हैं और तुम
वृषभानुनन्दिनी राधा हो। सुव्रते ! मेरी बात सुनो।
भद्रे ! मैं द्वारका नगरसे श्रीकृष्णके पाससे तुम्हारे

७५४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

निकट आयी हूँ। सति! श्रीहरिने ही मुझे तुम्हारे पास भेजा है। अब तुम उन गदाधरका मङ्गल-समाचार एवं मङ्गल-संदेश सुनो। तुम्हें शीघ्र ही उन श्रीकृष्णके दर्शन होंगे। हे देवि! होशमें आ जाओ और इस समय मुझे भक्त्यात्मक ज्ञानका उपदेश दो। हम दोनों तुम्हारे पतिके उपदेशसे तुम्हारे पास आये हैं। वरानने! इसके बाद श्रीहरि तुम्हारे पास आयेंगे और तुम शीघ्र ही श्रीदामाके शापसे मुक्त हो जाओगी। इस प्रकार यशोदाके वचन सुनकर और गदाधरका समाचार पाकर श्रीकृष्णके नामस्मरणसे राधाका अमङ्गल दूर हो गया। वे भीतर-ही-भीतर श्रीकृष्णकी सम्भावना करके चेतनामें आ गयीं और शान्त होकर मधुर वाणीसे परमोत्तम लौकिकी भक्तिका वर्णन करने लगीं।

(अध्याय ११०)


राधिकाद्वारा 'राम' आदि भगवन्नामोंकी व्युत्पत्ति और उनकी प्रशंसा तथा यशोदाके पूछनेपर अपने 'राधा' नामकी व्याख्या करना

राधिकाने कहा—यशोदे! स्त्रीजाति तो वस्तुतः यों ही अबला, मूढ़ और अज्ञानमें तत्पर रहनेवाली होती है; तिसपर भी श्रीकृष्णके विरहसे मेरी चेतना निरन्तर नष्ट हुई रहती है। ऐसी दशामें पाँच प्रकारके ज्ञानोंमें, जो सर्वोत्तम भक्त्यात्मक ज्ञान है, उसके विषयमें मैं क्या कह सकती हूँ? तथापि जो कुछ तुमसे कहती हूँ, उसे सुनो। यशोदे! तुम इन सारे नश्वर पदार्थोंका परित्याग करके पुण्यक्षेत्र भारतमें स्थित रमणीय वृन्दावनमें जाओ। वहाँ निर्मल यमुनाजलमें त्रिकाल स्नान करके सुकोमल चन्दनसे अष्टदल कमल बनाकर शुद्ध मनसे गर्ग-प्रदत्त ध्यानद्वारा परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णका भलीभाँति पूजन करो और आनन्दपूर्वक उनके परमपदमें लीन हो जाओ। सति! सौ पूर्व पुरुषोंके साथ अपने कर्मका उच्छेद करके सदा वैष्णवोंके ही साथ वार्तालाप करो। भक्त अग्निकी ज्वाला, पिंजरेमें बंद होना, काँटोंमें रहना और विष खाना स्वीकार करता है, परंतु हरिभक्तिरहित लोगोंका सङ्ग ठीक नहीं समझता; क्योंकि वह नाशका कारण होता है। भक्तिहीन पुरुष स्वयं तो नष्ट होता ही है, साथ ही दूसरेकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न कर देता है। भक्तके सङ्गसे तथा हरिकथालापरूपी अमृतके सिञ्चनसे भक्तिरूपी वृक्षका अङ्कुर बढ़ता है; किंतु भक्तिहीनोंके साथ वार्तालापरूपी प्रदीप्ताग्निकी ज्वालाकी एक कलाके स्पर्शसे भी वह अङ्कुर सूख जाता है; फिर सींचनेसे ही उसकी वृद्धि होती है। इसलिये सावधान होकर भक्तिहीनोंके सङ्गका उसी प्रकार परित्याग कर देना चाहिये, जैसे मनुष्य कालसर्पको देखकर डरके मारे दूर भाग जाते हैं। यशोदे! अपने ऐश्वर्यशाली पुत्रका, जो साक्षात् परमात्मा और ईश्वर हैं, उत्तम भक्तिके साथ भजन करो। उनके राम, नारायण, अनन्त, मुकुन्द, मधुसूदन, कृष्ण, केशव, कंसारे, हरे, वैकुण्ठ, वामन—इन ग्यारह नामोंको जो पढ़ता अथवा कहलाता है, वह सहस्रों कोटि जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है*।

'रा' शब्द विश्ववाची और 'म' ईश्वरवाचक है, इसलिये जो लोकोंका ईश्वर है उसी कारण वह 'राम' कहा जाता है। वह रमाके साथ रमण


* वरं हुतवहज्वालां भक्तोवाञ्छति पञ्जरम्। वरं च कण्टके वासं वरं च विषभक्षणम्॥
हरिभक्तिविहीनानां न सङ्गं नाशकारणम्। स्वयं नष्टो भक्तिहीनो बुद्धिभेदं करोति च॥