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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

७५- भगवान् श्रीकृष्णका रक्तरञ्जित मुखवाले कालियनागके मस्तकपर चढ़ना तथा उनके भारसे आक्रान्त हो कालियनागका प्राण त्याग देनेको उद्यत होना; नागपत्नी सुरसा तथा दूसरी नागिनियोंका श्रीहरिके सामने आकर रोना और उन्हें प्रणामकर अपनी बात कहना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

५०७

वे सदा मुखचन्द्र तथा नखचन्द्रकी अवली (पंक्ति)-से युक्त हैं; इस कारण श्रीकृष्णने उन्हें 'चन्द्रावली' नाम दिया है। उनकी कान्ति दिन-रात सदा ही चन्द्रमाके तुल्य बनी रहती है; अतः श्रीहरि हर्षोल्लासके कारण उन्हें 'चन्द्रकान्ता' कहते हैं। उनके मुखपर दिन-रात शरत्कालके चन्द्रमाकी-सी प्रभा फैली रहती है; इसलिये मुनिमण्डलीने उन्हें 'शरच्चन्द्रप्रभानना' कहा है।

यह अर्थ और व्याख्याओंसहित षोडश-नामावली कही गयी; जिसे नारायणने अपने नाभिकमलपर विराजमान ब्रह्माको दिया था। फिर ब्रह्माजीने पूर्वकालमें मेरे पिता धर्मदेवको इन नामावलीका उपदेश दिया और श्रीधर्मदेवने महातीर्थ पुष्करमें सूर्य-ग्रहणके पुण्य पर्वपर देवसभाके बीच मुझे कृपापूर्वक इन सोलह नामोंका उपदेश दिया था। श्रीराधाके प्रभावकी प्रस्तावना होनेपर बड़े प्रसन्नचित्तसे उन्होंने इन नामोंकी व्याख्या की थी। मुने! यह राधाका परम पुण्यमय स्तोत्र है, जिसे मैंने तुमको दिया। महामुने! जो वैष्णव न हो तथा वैष्णवोंका निन्दक हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो मनुष्य जीवनभर तीनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसकी यहाँ राधा-माधवके चरणकमलोंमें भक्ति होती है। अन्तमें वह उन दोनोंका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है और दिव्य शरीर एवं अणिमा आदि सिद्धिको पाकर सदा उन प्रिया-प्रियतमके साथ विचरता है। नियमपूर्वक किये गये सम्पूर्ण व्रत, दान और उपवाससे, चारों वेदोंके अर्थसहित पाठसे, समस्त यज्ञों और तीर्थोंके विधिबोधित अनुष्ठान तथा सेवनसे, सम्पूर्ण भूमिकी सात बार की गयी परिक्रमासे, शरणागतकी रक्षासे, अज्ञानीको ज्ञान देनेसे तथा देवताओं और वैष्णवोंका दर्शन करनेसे भी जो फल प्राप्त होता है, वह इस स्तोत्रपाठकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है। इस स्तोत्रके प्रभावसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है*।


* राधा रासेश्वरी रासवासिनी रसिकेश्वरी । कृष्णप्राणाधिका कृष्णप्रिया कृष्णस्वरूपिणी ॥
कृष्णवामाङ्गसम्भूता परमानन्दरूपिणी । कृष्णा वृन्दावनी वृन्दा वृन्दावनविनोदिनी ॥
चन्द्रावली चन्द्रकान्ता शरच्चन्द्रप्रभानना । नामान्येतानि साराणि तेषामभ्यन्तराणि च ॥
राधेत्येवं च संसिद्धौ राकारो दानवाचकः । स्वयं निर्वाणदात्री या सा राधा परिकीर्तिता ॥
रासेश्वरस्य पत्नीयं तेन रासेश्वरी स्मृता । रासे च वासो यस्याश्च तेन सा रासवासिनी ॥
सर्वासां रसिकानां च देवीनामीश्वरी परा । प्रवदन्ति पुरा सन्तस्तेन तां रसिकेश्वरीम् ॥
प्राणाधिका प्रेयसी सा कृष्णस्य परमात्मनः । कृष्णप्राणाधिका सा च कृष्णेन परिकीर्तिता ॥
कृष्णस्यातिप्रिया कान्ता कृष्णो वास्याः प्रियः सदा । सर्वैर्देवगणैरुक्ता तेन कृष्णप्रिया स्मृता ॥
कृष्णरूपं संनिधातुं या शक्ता चावलीलया । सर्वांशैः कृष्णसदृशी तेन कृष्णस्वरूपिणी ॥
वामाङ्कार्द्धेन कृष्णस्य या सम्भूता परा सती । कृष्णवामाङ्गसम्भूता तेन कृष्णेन कीर्तिता ॥
परमानन्दराशिश्च स्वयं मूर्तिमती सती । श्रुतिभिः कीर्तिता तेन परमानन्दरूपिणी ॥
कृषिर्मोक्षार्थवचनो ण एवोत्कृष्टवाचकः । आकारो दातृवचनस्तेन कृष्णा प्रकीर्तिता ॥
अस्ति वृन्दावनं यस्यास्तेन वृन्दावनी स्मृता । वृन्दावनस्याधिदेवी तेन वाथ प्रकीर्तिता ॥
सङ्घः सखीनां वृन्दः स्यादकारोऽप्यस्तिवाचकः । सखिवृन्दोऽस्ति यस्याश्च सा वृन्दा परिकीर्तिता ॥
वृन्दावने विनोदश्च सोऽस्या ह्यस्ति च तत्र वै । वेदा वदन्ति तां तेन वृन्दावनविनोदिनीम् ॥
नखचन्द्रावलीवक्त्रचन्द्रोऽस्ति यत्र संततम् । तेन चन्द्रावली सा च कृष्णेन परिकीर्तिता ॥
कान्तिरस्ति चन्द्रतुल्या सदा यस्या दिवानिशम् । मुनिना कीर्तिता तेन शरच्चन्द्रप्रभानना ॥
इदं षोडशनामोक्तमर्थव्याख्यानसंयुतम् । नारायणेन यद्दत्तं ब्रह्मणे नाभिपङ्कजे ॥
ब्रह्मणा च पुरा दत्तं धर्माय जनकाय मे । धर्मेण कृपया दत्तं मह्यमादित्यपर्वणि ॥

५०८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

नारदजीने कहा— प्रभो! यह सर्वदुर्लभ परम आश्चर्यमय स्तोत्र मुझे प्राप्त हुआ। देवी श्रीराधाका 'संसारविजय' नामक कवच भी उपलब्ध हुआ। सुयज्ञने जिसका प्रयोग किया था, वह दुर्लभ स्तोत्र भी मुझे सुलभ हो गया। भगवान् श्रीकृष्णकी विचित्र कथा सुनकर आपके चरणकमलोंके प्रसादसे मैंने बहुत कुछ पा लिया। अब मैं जिस रहस्यको सुनना चाहता हूँ, उसका वर्णन कीजिये। मुने! वृन्दावनमें प्रातःकाल उस अद्भुत नगरको देखकर गोपोंने क्या कहा?

भगवान् श्रीनारायण बोले— नारद! जब वहाँ रात बीत गयी, विश्वकर्मा चले गये और अरुणोदयकी बेला आयी, तब सब लोग जाग उठे। उठते ही सबसे विलक्षण उस नगरको देख व्रजवासी आपसमें कहने लगे—'यह क्या आश्चर्य है? यह क्या आश्चर्य है?' किन्हीं गोपोंने कुछ अन्य गोपोंने पूछा—'यह कैसे सम्भव हुआ? न जाने भूतलपर किस रूपसे कौन प्रकट हो सकता है?' परंतु नन्दरायजी गर्गके वाक्योंका स्मरण करके मन-ही-मन सब कुछ जान गये। उन्होंने भीतर-ही-भीतर विचार किया—'यह समस्त चराचर जगत् श्रीहरिकी इच्छासे ही उत्पन्न हुआ है। जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् आविर्भूत और तिरोभूत होता रहता है, उनके लिये क्या और कैसे असाध्य है? अहो! जिनके रोमकूपोंमें ही सारे ब्रह्माण्ड स्थित हैं, उन परमेश्वर महाविष्णु श्रीहरिके लिये क्या असाध्य हो सकता है? ब्रह्मा, शेषनाग, शिव और धर्म जिनके चरणारविन्दोंका दर्शन करते रहते हैं, उन माया-मानव-रूपधारी परमेश्वरके लिये कौन-सा ऐसा कार्य है, जो असाध्य हो?' नन्दजीने उस नगरमें घूम-घूमकर, एक-एक घरको देख-देखकर और वहाँ लिखे हुए नामोंको पढ़कर सबके लिये घरोंका वितरण किया। नन्द और वृषभानुने शुभ मुहूर्त देखकर प्रवेशकालिक मङ्गलकृत्यका सम्पादन करके अपने सेवकगणोंके साथ अपने-अपने आश्रममें प्रवेश किया। वृन्दावनमें रहकर उन सबके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। उन सब गोपोंने बड़े आनन्दके साथ अपने-अपने उत्तम आश्रममें पदार्पण किया। अपने-अपने मनोहर स्थानपर सब गोपोंको बड़ा आनन्द मिला। वहाँके बालक और बालिकाएँ हर्षपूर्वक खेलने-कूदने लगीं। श्रीकृष्ण और बलदेव भी कौतूहलवश गोपशिशुओंके साथ वहाँ प्रत्येक मनोहर स्थानपर बालोचित क्रीड़ा करने लगे। नारद! इस प्रकार मैंने नगर-निर्माणका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वनमें गोपबालाओंके लिये जो रासमण्डल बना था, उसकी भी बात बतायी। (अध्याय १७)


पुष्करे च महातीर्थे पुण्याहे देवसंसदि॥
राधाप्रभावप्रस्तावे सुप्रसन्नेन चेतसा। इदं स्तोत्रं महापुण्यं तुभ्यं दत्तं मया मुने॥
निन्दकायावैष्णवाय न दातव्यं महामुने। यावज्जीवमिदं स्तोत्रं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः॥
राधामाधवयोः पादपद्मे भक्तिर्भवेदिह। अन्ते लभेत्तयोर्दास्यं शश्वत्सहचरो भवेत्॥
अणिमादिकसिद्धिं च संप्राप्य नित्यविग्रहम्। व्रतदानोपवासैश्च सर्वैर्नियमपूर्वकैः॥
चतुर्णां चैव वेदानां पाठः सर्वार्थसंयुतैः। सर्वेषां यज्ञतीर्थानां करणैर्विधिबोधितैः॥
प्रदक्षिणेन भूमेश्च कृत्स्नाया एव सप्तधा। शरणागतरक्षायामज्ञानां ज्ञानदानतः॥
देवानां वैष्णवानां च दर्शनेनापि यत् फलम्। तदेव स्तोत्रपाठस्य कलां नार्हति षोडशीम्॥
स्तोत्रस्यास्य प्रभावेण जीवन्मुक्तो भवेन्नरः। (१७। २२०—२४६)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५०९

श्रीवनके समीप यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका ग्वालबालोंसहित श्रीकृष्णको भोजन देना तथा उनकी कृपासे गोलोकधामको जाना, श्रीकृष्णकी मायासे निर्मित उनकी छायामयी स्त्रियोंका ब्राह्मणोंके घरोंमें जाना तथा विप्रपत्नियोंके पूर्वजन्मका परिचय

नारदजी बोले— मुनिश्रेष्ठ! ज्ञानसिन्धो! मैं आपका शरणागत शिष्य हूँ। आप मुझे श्रीकृष्ण-लीलामृतका पान कराइये।

भगवान् श्रीनारायणने कहा— एक दिन बलरामसहित श्रीकृष्ण ग्वालबालोंको साथ ले श्रीमधुवनमें गये, जहाँ यमुनाके किनारे कमल खिले हुए थे। उस समय सब बालक सहस्रों गौओंके साथ वहाँ विचरने और खेलने लगे। खेलते-खेलते वे थक गये और उन्हें भूख-प्यास सताने लगी। तब सब गोपशिशु बड़ी प्रसन्नताके साथ श्रीकृष्णके पास आये और बोले—'कन्हैया! हमें बड़ी भूख लगी है। हम सेवकोंको आज्ञा दो, क्या करें?' ग्वालबालोंकी बात सुनकर प्रसन्नमुख और नेत्रवाले दयानिधान श्रीहरिने उनसे यह हितकर तथा सच्ची बात कही।

श्रीकृष्ण बोले— बालको! जहाँ ब्राह्मणोंका सुखदायक यज्ञस्थान है, वहाँ जाओ। जाकर उन यज्ञतत्पर ब्राह्मणोंसे शीघ्र ही भोजनके लिये अन्न माँगो। वे सभी आङ्गिरस गोत्रवाले ब्राह्मण हैं और श्रीवनके निकट अपने आश्रममें यज्ञ करते हैं। उन्होंने श्रुतियों और स्मृतियोंका विशेष ज्ञान प्राप्त किया है। वे सब निःस्पृह वैष्णव हैं और मोक्षकी कामनासे मेरा ही यजन कर रहे हैं। परंतु मायासे आच्छादित होनेके कारण उन्हें इस बातका पता नहीं है कि योगमायासे मनुष्यरूप धारण करके प्रकट हुआ मैं ही उनका आराध्य देव हूँ। केवल यज्ञकी ओर ही उन्मुख रहनेवाले वे ब्राह्मण यदि तुम्हें अन्न न दें तो शीघ्र ही जाकर उनकी पत्नियोंसे माँगना; क्योंकि वे बालकोंके प्रति दयासे भरी हुई हैं।

श्रीकृष्णकी बात सुनकर वे श्रेष्ठ गोपबालक ब्राह्मणोंके सामने जा मस्तक झुकाकर खड़े हो गये और बोले—'विप्रवरो! हमें शीघ्र भोजन दीजिये।' परंतु उनमेंसे कुछ द्विजोंने तो उनकी बात सुनी ही नहीं और कुछ लोग सुनकर भी ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये। तब वे पाकशालामें गये, जहाँ ब्राह्मणियाँ भोजन बना रही थीं। उन बालकोंने ब्राह्मणपत्नियोंको सिर झुकाकर प्रणाम किया। प्रणाम करके वे सब बालक उन पतिव्रता ब्राह्मणियोंसे बोले—'माताओ! हम सब बालक भूखसे पीड़ित हैं। हमें भोजन दो।'

उन बालकोंकी बात सुनकर और उनकी मनोहर आकृति देखकर उन सती-साध्वी ब्राह्मणियोंने मुस्कराते हुए मुखारविन्दसे आदरपूर्वक पूछा।

ब्राह्मणपत्नियां बोलीं— समझदार बालको! तुमलोग कौन हो? किसने तुम्हें भेजा है? और तुम्हारे नाम क्या हैं? हम तुम्हें व्यञ्जनसहित नाना प्रकारका श्रेष्ठ भोजन प्रदान करेंगी।

ब्राह्मणियोंकी बात सुनकर वे सभी स्निग्ध एवं हृष्ट-पुष्ट गोपबालक प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए बोले।

बालकोंने कहा— माताओ! हमें बलराम और श्रीकृष्णने भेजा है। हमलोग भूखसे बहुत पीड़ित हैं। हमें भोजन दो। हम शीघ्र ही उनके पास लौट जायँगे। यहाँसे थोड़ी दूरपर वनके भीतर भाण्डीर-वटके निकट मधुवनमें बलराम और केशव बैठे हैं। वे दोनों भाई भी थके-माँदे और भूखे हैं तथा भोजन माँग रहे हैं।

५१०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

माताओ! आपको अन्न देना है या नहीं देना है, यह शीघ्र हमें इसी समय बता दो।

गोपोंकी बात सुनकर ब्राह्मणियाँ हर्षसे खिल उठीं। उनके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। उनके मनमें बड़ी इच्छा थी कि हमें श्रीकृष्ण-चरणोंके दर्शन हों। उन्होंने सोने, चाँदी और फूलकी थालियोंमें प्रसन्नतापूर्वक भाँति-भाँतिके व्यञ्जनोंसे युक्त अत्यन्त मनोहर अगहनीके चावलका भात, खीर, स्वादिष्ट पीठा, दही, दूध, घी और मधु रखकर श्रीकृष्णके निकट प्रस्थान किया। वे मन-ही-मन नाना प्रकारके मनोरथ लेकर जानेको उत्सुक हुईं। ब्राह्मणपत्नियां धन्य और पतिव्रतपरायणा थीं। इसलिये उनके मनमें श्रीकृष्णदर्शनकी उत्कण्ठा जाग उठी। उन्होंने वहाँ पहुँचकर बालकोंसहित श्रीकृष्ण और बलरामके दर्शन किये। श्रीकृष्ण वटके मूलभागके निकट बालकोंके बीचमें बैठे थे; अतः तारोंके बीच विराजमान चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे। श्याम अङ्ग, किशोर अवस्था और शरीरपर रेशमी पीताम्बरसे वे बड़े सुन्दर लगते थे। मुखपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। शान्तस्वरूप राधाकान्त बड़े मनोहर प्रतीत होते थे। उनका मुख शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। वे रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थे तथा रत्ननिर्मित दो कुण्डलोंसे उनके गण्डस्थलकी बड़ी शोभा हो रही थी। हाथोंमें रत्नमय केयूर और कङ्कन तथा पैरोंमें रत्ननिर्मित नूपुर उनके आभूषण थे। उन्होंने गलेमें आजानुलम्बिनी शुभ्र रत्नमाला धारण कर रखी थीं। मालतीकी मालासे उनके कण्ठ और वक्षःस्थल दोनों सुशोभित थे। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे उनके श्रीअङ्ग चर्चित थे। नखों और कपोलोंका सौन्दर्य देखने ही योग्य था। सुन्दर लाल रंगके ओठ पके बिम्बफलको लज्जित कर रहे थे। वे परिपक्व अनारके दानोंकी भाँति सुन्दर दन्तपङ्क्ति धारण किये थे। सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा दे रहा था। कानोंके मूलभागमें दो कदम्बके फूल उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे परात्पर परमात्मा योगियोंके भी ध्यानमें नहीं आनेवाले हैं। तथापि भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहते हैं। ब्रह्मा, शिव, धर्म, शेषनाग तथा बड़े-बड़े मुनीश्वर उनकी स्तुति करते हैं। ऐसे परमेश्वरके दर्शन करके ब्राह्मणपत्नियोंने भक्तिभावसे उन्हें प्रणाम किया और अपने ज्ञानके अनुरूप उन मधुसूदनकी स्तुति की।

विप्रपत्नियां बोलीं— भगवन्! आप स्वयं ही परब्रह्म, परमधाम, निरीह, अहङ्काररहित, निर्गुण-निराकार तथा सगुण-साकार हैं। आप ही सबके साक्षी, निर्लेप एवं आकाररहित परमात्मा हैं। आप ही प्रकृति-पुरुष तथा उन दोनोंके परम कारण हैं। सृष्टि, पालन और संहारके विषयमें नियुक्त जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव—ये तीन देवता कहे गये हैं, वे भी आपके ही सर्वबीजमयं अंश हैं। परमेश्वर! जिनके रोमकूपमें सम्पूर्ण विश्व निवास करता है, वे महाविराट् महाविष्णु हैं और प्रभो! आप उनके जनक हैं। आप ही तेज और

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५११

तेजस्वी हैं, ज्ञान और ज्ञानी हैं तथा इन सबसे परे हैं। वेदमें आपको अनिर्वचनीय कहा गया है; फिर कौन आपकी स्तुति करनेमें समर्थ है? सृष्टिके सूत्रभूत जो महत्तत्त्व आदि एवं पञ्च-तन्मात्राएँ हैं, वे भी आपसे भिन्न नहीं हैं। आप सम्पूर्ण शक्तियोंके बीज तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं। समस्त शक्तियोंके ईश्वर हैं, सर्वरूप हैं तथा सब शक्तियोंके आश्रय हैं। आप निरीह, स्वयंप्रकाश, सर्वानन्दमय तथा सनातन हैं। अहो! आकारहीन होते हुए भी आप सम्पूर्ण आकारोंसे युक्त हैं—सब आकार आपके ही हैं। आप सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तो भी इन्द्रियवान् नहीं हैं। जिनकी स्तुति करने तथा जिनके तत्त्वका निरूपण करनेमें सरस्वती जडवत् हो जाती हैं; महेश्वर, शेषनाग, धर्म और स्वयं विधाता भी जडतुल्य हो जाते हैं; पार्वती, लक्ष्मी, राधा एवं वेदजननी सावित्री भी जडताको प्राप्त हो जाती हैं; फिर दूसरे कौन विद्वान् आपकी स्तुति कर सकते हैं? प्राणेश्वरेश्वर! हम स्त्रियाँ आपकी क्या स्तुति कर सकती हैं? देव! हमपर प्रसन्न होइये। दीनबन्धो! कृपा कीजिये।

यों कह सब ब्राह्मणपत्नियाँ उनके चरणारविन्दोंमें पड़ गयीं। तब श्रीकृष्णने प्रसन्नमुख एवं नेत्रोंसे उन सबको अभयदान दिया।

जो पूजाकालमें विप्रपत्नियोंद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह ब्राह्मणपत्नियोंको मिली हुई गतिको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है।

भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद! उन ब्राह्मणपत्नियोंको अपने चरणारविन्दोंमें पड़ी देख श्रीमधुसूदनने कहा—'देवियो! वर माँगो। तुम्हारा कल्याण होगा।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर विप्रपत्नियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई, श्रद्धासे उनका मस्तक झुक गया और वे भक्तिभावसे इस प्रकार बोलीं।

**द्विजपत्नियोंने कहा—**श्रीकृष्ण! हम आपसे वर नहीं लेंगी। हमारी अभिलाषा यह है कि आपके चरणकमलोंकी सेवा प्राप्त हो; अतः आप हमें अपना दास्यभाव तथा परम दुर्लभ सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें। केशव! हम प्रतिक्षण आपके मुखारविन्दको देखती रहें, यही कृपा कीजिये। प्रभो! अब हम पुनः घरको नहीं जायेंगी।

द्विजपत्नियोंकी यह बात सुनकर करुणानिधान त्रिलोकीनाथ श्रीकृष्णने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। फिर वे बालकोंकी मण्डलीमें बैठ गये। तदनन्तर ब्राह्मणपत्नियोंने उन्हें सुधाके समान मधुर अन्न प्रदान किया। भगवान्ने उस अन्नको लेकर गोप-बालकोंको भोजन कराया और स्वयं भी भोजन किया। इसी समय विप्रपत्नियोंने देखा कि आकाशसे एक सोनेका बना हुआ श्रेष्ठ विमान उतर रहा है। उसमें रत्नमय दर्पण लगे हैं। उसके सभी उपकरण रत्नोंके सारतत्त्वसे बने हुए हैं। वह रत्नोंके ही खम्भोंसे आबद्ध है तथा उत्तम रत्नमय कलशोंसे वह और भी उज्ज्वल जान पड़ता है। उसमें श्वेत चँवर लगे हुए हैं। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र उसकी शोभा बढ़ाते हैं। उस विमानको पारिजातके फूलोंकी मालाओंके जालसे सजाया गया है। उसमें सौ पहिये हैं। मनके समान वेगसे चलनेवाला वह विमान बड़ा मनोहर है। वनमालासे विभूषित दिव्य पार्षद उसे सब ओरसे घेरे खड़े हैं। उन पार्षदोंने पीताम्बर पहन रखा है। वे रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत, नूतन यौवनसे सम्पन्न, श्यामकान्तिवाले, परम मनोहर, दो भुजाओंसे युक्त तथा गोपवेशधारी थे। उनके हाथोंमें मुरली थी। उन्होंने मोरपङ्ख और गुञ्जाकी

५१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मालासे आबद्ध टेढ़े मुकुट धारण कर रखे थे।

वे रथसे तुरंत ही उतरकर श्रीहरिके चरणोंमें प्रणाम करके ब्राह्मणपत्नियोंसे बोले—'आपलोग इस विमानपर चढ़ जायँ।' ब्राह्मणपत्नियाँ श्रीहरिको नमस्कार करके मनोवाञ्छित गोलोकमें जा पहुँचीं। वे मानव-देहका त्याग करके तत्काल दिव्य गोपी हो गयीं। तत्पश्चात् श्रीहरिने वैष्णवी मायाके द्वारा उनकी छायाका निर्माण करके स्वयं ही उन्हें ब्राह्मणोंके घरोंमें भेज दिया। ब्राह्मण-लोग अपनी पत्नियोंके लिये मन-ही-मन बहुत उद्विग्न थे और सब ओर उनकी खोज कर रहे थे। इसी समय रास्तेमें उन्हें अपनी पत्नियाँ दिखायी दीं। उन्हें देखकर सब ब्राह्मणोंके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। सम्पूर्ण अङ्ग पुलकित हो गये और वे विनयपूर्वक उनसे बोले।

**ब्राह्मणोंने कहा—**अहो! तुम सब लोग परम धन्य हो; क्योंकि तुमने साक्षात् परमेश्वरके दर्शन किये हैं। हमारा जीवन व्यर्थ है। हम-लोगोंका वेदपाठ भी निरर्थक है। वेद और पुराणमें सर्वत्र विद्वानोंद्वारा श्रीहरिकी ही समस्त विभूतियोंका वर्णन किया गया है। सबके जनक श्रीहरि ही हैं। तप, जप, व्रत, ज्ञान, वेदाध्ययन, पूजन, तीर्थ-स्नान और उपवास—सबके फलदाता श्रीकृष्ण ही हैं। जिसने श्रीकृष्णकी सेवा कर ली, उसे तपस्याओंके फलोंसे क्या प्रयोजन है? जिसे कल्पवृक्षकी प्राप्ति हो गयी, वह दूसरे किसी वृक्षको लेकर क्या करेगा? जिसके हृदयमें श्रीकृष्ण विराजमान हैं, उसे यज्ञादि कर्मोंके अनुष्ठानकी क्या आवश्यकता है? जिसने समुद्रको पी लिया, उसके लिये कुआँ लाँघनेमें क्या पुरुषार्थ है?*

ऐसा कहकर ब्राह्मणलोग उन श्रेष्ठ कामिनियोंको साथ ले हर्षपूर्वक अपने घरको लौटे और उनके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे। उन सबका क्रीड़ामें तथा अन्य सब कर्मोंमें पहलेवाली स्त्रियोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम तथा उदारभाव प्रकट होता था; परंतु मायाशक्तिसे प्रभावित होनेके कारण ब्राह्मणलोग उसका अनुमान नहीं कर पाते थे। उधर सनातन पूर्णब्रह्म नारायणस्वरूप श्रीकृष्ण बलराम तथा ग्वालबालोंके साथ शीघ्र ही अपने घरको चले गये। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य कह सुनाया। इसे मैंने पूर्वकालमें अपने पिता धर्मके मुखसे सुना था। नारद! अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?

**नारदजीने पूछा—**ऋषीन्द्र! किस पुण्यके प्रभावसे उन ब्राह्मणपत्नियोंको ऐसी गति प्राप्त हुई, जो बड़े-बड़े मुनीश्वरों तथा योगसिद्ध पुरुषोंके लिये भी दुर्लभ है। पूर्वकालमें ये पुण्यवती स्त्रियाँ कौन थीं और किस दोषसे इस भूतलपर आयी थीं। मेरे इस संदेहका निवारण करनेवाली बात कहिये।

**भगवान् श्रीनारायण बोले—**नारद! ये देवियाँ सप्तर्षियोंकी सुन्दर रूप-गुण-सम्पन्ना पतिव्रता पत्नियाँ थीं। एक बार अनलदेवने इनका अङ्ग


*अहोऽतिधन्या यूयं च दृष्टो युष्माभिरीश्वरः। अस्माकं जीवनं व्यर्थं वेदपाठोऽप्यनर्थकः॥
वेदे पुराणे सर्वत्र विद्वद्भिः परिकीर्तितम्। हरेर्विभूतयः सर्वाः सर्वेषां जनको हरिः॥
तपो जपो व्रतं ज्ञानं वेदाध्ययनमर्चनम्। तीर्थस्नानमनशनं सर्वेषां फलदो हरिः॥
श्रीकृष्णः सेवितो येन किं तस्य तपसां फलैः। प्राप्तः कल्पतरुर्येन किं तस्यान्येन शाखिना॥
श्रीकृष्णो हृदये यस्य किं तस्य कर्मभिः कृतैः। किं पीतसागरस्यैव पौरुषं कूपलङ्घने॥
(१८। ६६–७०)