ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७३- ब्राह्मणपत्नियोंद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति
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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
व्रजराज ! आप व्रजको पधारिये।' ऐसा उत्तर
देकर लोग चले गये। नन्दके मनमें बड़ा हर्ष
हुआ। वे राजभवनको गये। रथसे उतरकर उन्होंने
तत्काल ही राजसभामें प्रवेश किया। राजा उठकर
खड़े हो गये। उन्होंने नन्दरायजीसे बातचीत की
और उन्हें बैठनेके लिये सोनेका सिंहासन दिया।
उन दोनोंमें परस्पर बहुत प्रेमालाप हुआ।
फिर नन्दने विनीत होकर राजासे सम्बन्धकी
बात चलायी।
नन्दजीने कहा - राजेन्द्र ! सुनिये। मैं एक
शुभ एवं विशेष बात कह रहा हूँ। आप इस
समय अपनी कन्याका सम्बन्ध एक विशिष्ट
पुरुषके साथ स्थापित कीजिये। व्रजमें सुरभानुके
पुत्र श्रीमान् वृषभानु निवास करते हैं, जो व्रजके
राजा हैं। वे भगवान् नारायणके अंशसे उत्पन्न
हुए हैं और उत्तम गुणोंके भण्डार, सुन्दर,
सुविद्वान्, सुस्थिर यौवनसे युक्त, योगी, पूर्वजन्मकी
बातोंको स्मरण करनेवाले और नवयुवक हैं।
आपकी कन्या भी यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है; अतः
अयोनिजा है। त्रिभुवनमोहिनी कन्या कलावती
भगवती कमलाकी अंश है और स्वभावतः शान्त
जान पड़ती है। वृषभानु आपकी पुत्रीके योग्य
हैं तथा आपकी पुत्री भी उन्हींके योग्य है।
मुने ! राजसभामें ऐसा कहकर नन्दजी चुप
हो गये। तब नृपश्रेष्ठ भनन्दनने विनयसे नम्र हो
उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया।
भनन्दन बोले - व्रजेश्वर ! सम्बन्ध तो विधाताके
वशकी बात है। वह मेरे द्वारा साध्य नहीं है।
ब्रह्माजी ही सम्बन्ध करनेवाले हैं। मैं तो केवल
जन्मदाता हूँ। कौन किसकी पत्नी या कन्या है
तथा कौन किसका साधन-सम्पन्न पति है? इसे
विधाताके सिवा और कौन जानता है? कर्मोंके
अनुरूप फल देनेवाले विधाता ही सबके कारण
हैं। किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता,
उसका फल मिलकर ही रहेगा - ऐसा श्रुतिमें सुना
गया है। अन्यथा असमर्थ पुरुषके उद्यमकी भाँति
सारा कर्म निष्फल हो जाता है। यदि विधाताने
मेरी पुत्रीको ही वृषभानुकी पत्नी होनेकी बात
लिखी है तो वह पहलेसे ही उनकी पत्नी है। मैं
फिर कौन हूँ, जो उसमें बाधा डाल सकूँ तथा
दूसरा भी कौन उस सम्बन्धका निवारण कर
सकता है?
नारद ! यों कहकर राजेन्द्र भनन्दनने विनयसे
सिर झुकाकर नन्दरायजीको आदरपूर्वक मिष्टान्न
भोजन कराया। तत्पश्चात् राजाकी अनुमति ले
व्रजराज व्रजको लौट गये। जाकर उन्होंने
सुरभानुकी सभामें सब बातें बतायीं। सुरभानुने
भी यत्नपूर्वक नन्द और गर्गजीके सहयोगसे
सादर इस सम्बन्धको जोड़ा। विवाहकालमें महाराज
भनन्दनने गजरत्न, अश्वरत्न, अन्यान्य रत्न तथा
मणियोंके आभूषण आदि बहुत दहेज दिये।
वृषभानु कलावतीको पाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ
निर्जन एवं रमणीय स्थानमें उसके साथ विहार
करने लगे। कलावती एक पलका भी विरह
होनेपर स्वामीके बिना व्याकुल हो उठती थी
और वृषभानु भी एक क्षणके लिये भी कलावतीके
दूर होनेपर उसके बिना विकल हो जाते थे।
वह राजकन्या पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली
देवी थी। मायासे मनुष्यरूपमें प्रकट हुई थी।
वृषभानु भी श्रीहरिके अंश और जातिस्मर थे तथा
कलावतीको पाकर बड़े प्रसन्न थे। उन दोनोंका
प्रेम प्रतिदिन नया-नया होकर बढ़ने लगा।
लीलावश पूर्वकालमें सुदामाके शाप और
श्रीकृष्णकी आज्ञासे श्रीकृष्णप्राणाधिका सती
राधिका उन दोनोंकी अयोनिजा पुत्री हुईं। उसके
दर्शनमात्रसे वे दोनों दम्पति भवबन्धनसे मुक्त हो
गये। नारद ! इस प्रकार इतिहास कहा गया। अब
जिसका प्रकरण चल रहा है, वह प्रसङ्ग सुनो।
उक्त इतिहास पापरूपी ईंधनको जलानेके लिये
प्रज्वलित अग्निकी शिखाके समान है।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
५०३
शिल्पिशिरोमणि विश्वकर्मा वृषभानुके आश्रमपर
जाकर वहाँसे अपने सेवकगणोंके साथ दूसरे
स्थानपर गये। वे तत्त्वज्ञ थे। उन्होंने मन-ही-मन
एक कोस लंबे-चौड़े एक मनोहर स्थानका
विचार करके वहाँ महात्मा नन्दके लिये आश्रम
बनाना आरम्भ किया। बुद्धिसे अनुमान करके
उनके लिये सबसे विलक्षण भवन बनाया। वह
श्रेष्ठ भवन चार गहरी खाइयोंसे घिरा हुआ था,
शत्रुओंके लिये उन्हें लाँघना बहुत कठिन था। उन
चारों खाइयोंमें प्रस्तर जुड़े हुए थे। उन खाइयोंके
दोनों तटोंपर फूलोंके उद्यान थे, जिनके कारण वे
पुष्पोंसे सजी हुई-सी जान पड़ती थीं और सुन्दर
एवं मनोहर चम्पाके वृक्ष तटोंपर खिले हुए थे।
उन्हें छूकर बहनेवाली सुगन्धित वायु उन परिखाओंको
सब ओरसे सुवासित कर रही थी। तटवर्ती आम,
सुपारी, कटहल, नारियल, अनार, श्रीफल (बेल),
भृङ्ग (इलायची), नीबू, नारंगी, ऊँचे आम्रातक
(आमड़ा), जामुन, केले, केवड़े और कदम्बसमूह
आदि फूले-फले वृक्षोंसे उन खाइयोंकी सब
ओरसे शोभा हो रही थी। वे सारी परिखाएँ सदा
वृक्षोंसे ढकी होनेके कारण जल-क्रीड़ाके योग्य
थीं। अतएव सबको प्रिय थीं। परिखाओंके एकान्त
स्थानमें जानेके लिये विश्वकर्माने उत्तम मार्ग
बनाया, जो स्वजनोंके लिये सुगम और शत्रुवर्गके
लिये दुर्गम था। थोड़े-थोड़े जलसे ढके हुए
मणिमय खम्भोंद्वारा संकेतसे उस मार्गपर खम्भोंकी
सीमा बनायी गयी थी। वह मार्ग न तो अधिक
संकीर्ण था और न अधिक विस्तृत ही था।
परिखाके ऊपरी भागमें देवशिल्पीने मनोहर परकोटा
बनाया था, जिसकी ऊँचाई बहुत अधिक थी। वह
सौ धनुषके बराबर ऊँचा था। उसमें लगा हुआ
एक-एक पत्थर पचीस-पचीस हाथ लंबा था।
सिन्दूरी रंगकी मणियोंसे निर्मित वह प्राकार बड़ा
ही सुन्दर दिखायी देता था। उसमें बाहरसे दो
और भीतरसे सात दरवाजे थे। दरवाजे मणिसारनिर्मित
किवाड़ोंसे बंद रहते थे। वह नन्दभवन इन्द्रनीलमणिके
चित्रित कलशोंद्वारा विशेष शोभा पा रहा था।
मणिसाररचित कपाट भी उसकी शोभा बढ़ा रहे
थे। स्वर्णसारनिर्मित कलशोंसे उसका शिखरभाग
बहुत ही उद्दीप्त जान पड़ता था। नन्दभवनका
निर्माण करके विश्वकर्मा नगरमें घूमने लगे।
उन्होंने नाना प्रकारके मनोहर राजमार्ग बनाये।
रक्तभानुमणिकी बनी हुई वेदियों तथा सुन्दर
पत्तनोंसे वे मार्ग सुशोभित होते थे। उन्हें आर-पार
दोनों ओरसे बाँधकर पक्का बनाया गया था,
जिससे वे बड़े मनोहर लगते थे। राजमार्गके दोनों
ओर मणिमय मण्डप बने हुए थे, जो वैश्योंके
वाणिज्य-व्यवसायके उपयोगमें आने योग्य थे। वे
मण्डप दायें-बायें सब ओरसे प्रकाशित हो उन
राजमार्गोंको भी प्रकाश पहुँचाते थे।
तदनन्तर वृन्दावनमें जाकर विश्वकर्माने सुन्दर,
गोलाकार और मणिमय परकोटोंसे युक्त रासमण्डलका
निर्माण किया, जो सब ओरसे एक-एक योजन
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विस्तृत था। उसमें स्थान-स्थानपर मणिमय वेदिकाएँ बनी हुई थीं। मणिसाररचित नौ करोड़ मण्डप उस रासमण्डलकी शोभा बढ़ाते थे। वे शृङ्गारके योग्य, चित्रोंसे सुसज्जित और शय्याओंसे सम्पन्न थे। नाना जातिके फूलोंकी सुगन्ध लेकर बहती हुई वायु उन मण्डपोंको सुवासित करती थी। उनमें रत्नमय प्रदीप जलते थे। सुवर्णमय कलश उनकी उज्ज्वलता बढ़ा रहे थे। पुष्पोंसे भरे हुए उद्यानों तथा सरोवरोंसे सुशोभित रासस्थलका निर्माण करके विश्वकर्मा दूसरे स्थानको गये। वे उस रमणीय वृन्दावनको देखकर बहुत संतुष्ट हुए। वनके भीतर जगह-जगह एकान्त स्थानमें मन-बुद्धिसे विचार और निश्चय करके उन्होंने वहाँ तीस रमणीय एवं विलक्षण वनोंका निर्माण किया। वे केवल श्रीराधा-माधवकी ही क्रीड़ाके लिये बनाये गये थे।
तदनन्तर मधुवनके निकट अत्यन्त मनोहर निर्जन स्थानमें वटवृक्षके मूलभागके निकट सरोवरके पश्चिम किनारे केतकीवनके बीच और चम्पाके उद्यानके पूर्व विश्वकर्माने राधा-माधवकी क्रीड़ाके लिये पुनः एक रत्नमय मण्डपका निर्माण किया, जो चार वेदिकाओंसे घिरा हुआ और अत्यन्त सुन्दर था। रत्नसाररचित सौ तूलिकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती थीं। अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित नौ जोड़े कपाटों और नौ मनोहर द्वारोंसे उस रत्नमण्डपकी बड़ी शोभा हो रही थी। उस मण्डपकी दीवारोंके दोनों बगलमें और ऊपर भी श्रेष्ठ रत्नोंद्वारा रचित कृत्रिम चित्रमय कलश उसकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। उन कलशोंकी तीन कोटियाँ थीं। उक्त रत्नमण्डपमें महामूल्यवान् श्रेष्ठ मणिरत्नोंद्वारा निर्मित नौ सोपान शोभा दे रहे थे। उत्तम रत्नोंके सारभागसे बने हुए कलशोंसे मण्डपका शिखर-भाग जगमगा रहा था। पताका, तोरण तथा श्वेत चामर उस भवनको शोभा बढ़ा रहे थे। उसमें सब ओर अमूल्य रत्नमय दर्पण लगे थे, जिनके कारण सबको अपने सामनेकी ओरसे ही वह मण्डप दीप्तिमान् दिखायी देता था। वह सौ धनुष ऊपरतक अग्नि-शिखाके समान प्रकाशपुञ्ज फैला रहा था। उसका विस्तार सौ हाथका था। वह रत्नमण्डप गोलाकार बना था। उसके भीतर रत्ननिर्मित शय्याएँ बिछी थीं, जिनसे उस उत्तम भवनके भीतरी भागकी बड़ी शोभा हो रही थी। उक्त शय्याओंपर अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र बिछे थे। मालाओंके समूहसे सुसज्जित होकर वे विचित्र शोभा धारण करते थे। पारिजातके फूलोंकी मालाओंके बने हुए तकिये उनपर यथास्थान रखे गये थे। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे वह सारा भवन सुवासित हो रहा था। उसमें मालती और चम्पाके फूलोंकी मालाएँ रखी थीं। नूतन शृङ्गारके योग्य तथा पारस्परिक प्रेमकी वृद्धि करनेवाले कपूरयुक्त ताम्बूलके बीड़े उत्तम रत्नमय पात्रोंमें सजाकर रखे गये थे। उस भवनमें रत्नोंकी बनी हुई बहुत-सी चौकियाँ थीं, जिनमें हीरे जड़े थे और मोतियोंकी झालरें लटक रही थीं। रत्नसारजटित कितने ही घट यथास्थान रखे हुए थे। रत्नमय चित्रोंसे चित्रित अनेक रत्नसिंहासन उस मण्डपकी शोभा बढ़ाते थे, जिनमें जड़ी हुई चन्द्रकान्त मणियाँ पिघलकर जलकी बूँदोंसे उस भवनको सींच रही थीं। शीतल एवं सुवासित जल तथा भोग्य वस्तुओंसे युक्त उस रमणीय मिलन-मन्दिर (रत्नमण्डप)-का निर्माण करके विश्वकर्मा फिर नगरमें गये।
जिनके लिये जो भवन बने थे, उनपर उनके नाम उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक लिखे। इस कार्यमें उनके शिष्य तथा यक्षगण उनकी सहायता करते थे। मुने! निद्राके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण उस समय निद्राके वशीभूत थे। उनको नमस्कार करके विश्वकर्मा अपने घरको चले गये। परमेश्वर श्रीकृष्णकी
श्रीकृष्णजन्मखण्ड
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इच्छासे ही भूतलपर ऐसा आश्चर्यमय नगर निर्मित हुआ। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, जो सुखद और पापहारी है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?
नारदजीने पूछा— भगवन्! भारतवर्षमें इस काननका नाम 'वृन्दावन' क्यों हुआ ? इसकी व्युत्पत्ति अथवा संज्ञा क्या है ? आप उत्तम तत्त्वज्ञ हैं, अतः इस तत्त्वको बताइये।
सूतजी कहते हैं— नारदजीका प्रश्न सुनकर नारायण ऋषिने सानन्द हँसकर सारा ही पुरातन तत्त्व कहना आरम्भ किया।
भगवान् नारायण बोले— नारद! पहले सत्ययुगकी बात है। राजा केदार सातों द्वीपोंके अधिपति थे। ब्रह्मन्! वे सदा सत्य धर्ममें तत्पर रहते थे और अपनी स्त्रियों तथा पुत्र-पौत्रवर्गके साथ सानन्द जीवन बिताते थे। उन धार्मिक नरेशने समस्त प्रजाओंका पुत्रोंकी भाँति पालन किया। सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा केदारने इन्द्रपद पानेकी इच्छा नहीं की। वे नाना प्रकारके पुण्यकर्म करके भी स्वयं उनका फल नहीं चाहते थे। उनका सारा नित्यनैमित्तिक कर्म श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये ही होता था। केदारके समान राजाधिराज न तो कोई पहले हुआ है और न पुनः होगा ही। उन्होंने अपनी त्रिभुवनमोहिनी पत्नी तथा राज्यकी रक्षाका भार पुत्रोंपर रखकर जैगीषव्य मुनिके उपदेशसे तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। वे श्रीहरिके अनन्य भक्त थे और निरन्तर उन्हींका चिन्तन करते थे। मुने! भगवान्का सुदर्शनचक्र राजाकी रक्षाके लिये सदा उन्हींके पास रहता था। वे मुनिश्रेष्ठ नरेश चिरकालतक तपस्या करके अन्तमें गोलोकको चले गये। उनके नामसे केदारतीर्थ प्रसिद्ध हुआ। अवश्य ही आज भी वहाँ मरे हुए प्राणीको तत्काल मुक्तिलाभ होता है।
उनकी कन्याका नाम वृन्दा था, जो लक्ष्मीकी अंश थी। उसने योगशास्त्रमें निपुण होनेके कारण किसीको अपना पुरुष नहीं बनाया। दुर्वासाने उसे परम दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र दिया। वह घर छोड़कर तपस्याके लिये वनमें चली गयी। उसने साठ हजार वर्षोंतक निर्जन वनमें तपस्या की। तब उसके सामने भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उन्होंने प्रसन्नमुखसे कहा—'देवि! तुम कोई वर माँगो।' वह सुन्दर विग्रहवाले शान्तस्वरूप राधिका-कान्तको देखकर सहसा बोल उठी—'तुम मेरे पति हो जाओ।' उन्होंने 'तथास्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। वह कौतूहलवश श्रीकृष्णके साथ गोलोकमें गयी और वहाँ राधाके समान श्रेष्ठ सौभाग्यशालिनी गोपी हुई। वृन्दाने जहाँ तप किया था, उस स्थानका नाम 'वृन्दावन' हुआ अथवा वृन्दाने जहाँ क्रीड़ा की थी, इसलिये वह स्थान 'वृन्दावन' कहलाया।
वत्स! अब दूसरा पुण्यदायक इतिहास सुनो—जिससे इस काननका नाम 'वृन्दावन' पड़ा। वह प्रसङ्ग मैं तुमसे कहता हूँ, ध्यान दो। राजा कुशध्वजके दो कन्याएँ थीं। दोनों ही धर्मशास्त्रके ज्ञानमें निपुण थीं। उनके नाम थे—तुलसी और वेदवती। संसार चलानेका जो कार्य है, उससे उन दोनों बहिनोंको वैराग्य था। उनमेंसे वेदवतीने तपस्या करके परम पुरुष नारायणको प्राप्त किया। वह जनककन्या सीताके नामसे सर्वत्र विख्यात है। तुलसीने तपस्या करके श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, किंतु दैववश दुर्वासाके शापसे उसने शङ्खचूड़को प्राप्त किया। फिर परम मनोहर कमलाकान्त भगवान् नारायण उसे प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त हुए। भगवान् श्रीहरिके शापसे देवेश्वरी तुलसी वृक्षरूपमें प्रकट हुई और तुलसीके शापसे श्रीहरि शालग्रामशिला हो गये। उस शिलाके वक्षः-