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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

६५- श्रीकृष्णका नन्दको दुर्गा-स्तोत्र सुनाना तथा ब्रज लौट जानेका आदेश देना, नन्दका श्रीकृष्णसे चारों युगोंके धर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करना

७०२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दान करके वह उस पापसे मुक्त होता है। जो अधम मानव मेरे जन्मदिन—भाद्रपदमासकी कृष्णाष्टमीको भोजन करता है, उसे निःसंदेह त्रिलोकीमें होनेवाले सभी पापोंको भोगना पड़ता है। इस प्रकार सभी नरकोंका भोग करनेके पश्चात् वह चाण्डाल होता है। इसी तरह शिवरात्रि और श्रीरामनवमीके दिन भी समझना चाहिये। जो शक्तिहीन होनेके कारण उपवास करनेमें असमर्थ हो, उसे हविष्यान्नका भोजन करना चाहिये और मेरा पुण्य महोत्सव सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको भी भोजन कराना चाहिये। इससे वह पापमुक्त होकर शुद्ध हो जाता है। इसके लिये यत्नपूर्वक मेरे नामोंका संकीर्तन करना चाहिये। जो देव-मूर्तियोंकी चोरी करता है, वह सात जन्मोंतक अंधा, दरिद्र, रोगग्रस्त, बहरा और कुबड़ा होता है। जो नराधम ब्राह्मण और देव-प्रतिमाको देखकर उन्हें नमस्कार नहीं करता; वह जबतक जीता है तबतक अपवित्र यवन होता है। जो ब्राह्मणको आया हुआ देखकर उठकर स्वागत नहीं करता; वह निश्चितरूपसे महापापी होता है। जो शिवका द्वेषी तथा देव-प्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका-निर्वाह करनेवाला है, वह सात जन्मतक मुर्गा होता है। जो अज्ञानी पितरों और देवताओंके वेदोक्त पूजनका विनाश करता है, वह पापी रौरव नरकमें जाता है। वहाँ एक हजार वर्षतक यातना भोगनेके पश्चात् तीन जन्मोंतक तीर्थकाक होता है। फिर तीन जन्मोंतक किसी तीर्थमें सियारकी योनिमें उत्पन्न होकर मुर्देकी लाश खाता है। ब्रजेश्वर ! वही पापी तीन जन्मोंतक तीर्थोंमें शवकी रक्षा तथा कर्मानुसार मुर्दोंकी कफनखसोटी करता है। जो मूर्ख नित्य दम्भपूर्वक देवताकी पूजा करके भक्तिपूर्वक गुरुका पूजन नहीं करता और न उन्हें अन्न प्रदान करता है; वह पापी देवताके शापसे दुःखी, देवल (देवप्रतिमापर चढ़े हुए द्रव्यसे जीविका चलानेवाला) और भयंकर देवद्रोही होता है; उसे पूजाका फल नहीं मिलता।

ब्रजेश्वर ! (हाथसे) दीपको बुझानेवाला सात जन्मोंतक जुगुनू होता है। जो इष्टदेवको निवेदन किये बिना ही खाता है तथा मछलीका अत्यन्त लोभी है; वह मछरंगा पक्षी होता है तथा सात जन्मोंतक बिलावकी योनिमें जन्म धारण करता है। बोरा चुरानेवाला कबूतर, माला हरण करनेवाला आकाशचारी पक्षी, धान्यकी चोरी करनेवाला गौरैया और मांसचोर हाथी होता है। विद्वानोंके कवित्वपर प्रहार करनेवाला सात जन्मतक मेढक होता है। जो झूठे ही अपनेको विद्वान् कहकर गाँवकी पुरोहिती करता है; वह सात जन्मोंतक नेवला, एक जन्ममें कोढ़ी और तीन जन्मोंतक गिरगिट होता है। फिर एक जन्ममें बर्र होनेके बाद वृक्षकी चींटी होता है। तत्पश्चात् क्रमशः शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण होता है। चारों वर्णोंमें कन्या बेचनेवाला मानव तामिस्र नरकमें जाता है और वहाँ तबतक निवास करता है, जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति रहती है। इसके बाद वह मांस बेचनेवाला व्याध होता है। तत्पश्चात् पूर्वजन्ममें जो जैसा होता है, उसीके अनुसार उसे व्याधि आ घेरती है। मेरे नामको बेचनेवाले ब्राह्मणकी मुक्ति नहीं होती—यह ध्रुव है। मृत्युलोकमें जिसके स्मरणमें मेरा नाम आता ही नहीं; वह अज्ञानी एक जन्ममें गौकी योनिमें उत्पन्न होता है। इसके बाद बकरा, फिर मेढ़ा और सात जन्मोंतक भैंसा होता है। जो मानव महान् षड्यन्त्री, कुटिल और धर्महीन होता है; वह एक जन्ममें तेली होकर फिर कुम्हार होता है। जो झूठा कलंक लगानेवाला और देवता एवं ब्राह्मणका निन्दक होता है, वह एक जन्ममें सोनार होकर सात जन्मोंतक धोबी होता है। जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र कुत्सित आचरणवाले तथा पवित्रतासे रहित होते हैं, उन्हें

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७०३
दस हजार वर्षोंतक म्लेच्छयोनिमें जन्म लेना
पड़ता है। जो पुरुष कामभावसे स्त्रियोंकी कटि,
स्तन और मुखकी ओर निहारता है, वह दूसरे
जन्ममें दृष्टिहीन और नपुंसक होता है। जो
ब्राह्मण ज्ञानहीन होते हुए आभिचारिक कर्म
करनेवाला तथा हिंसक होता है; वह इस प्रकार
दस हजार वर्षोंतक अन्धतामिस्र नरकमें वास
करता है। तत्पश्चात् कर्मके भोगके अनुसार
वह ब्राह्मण शूद्र होता है। जो शास्त्रज्ञ ज्योतिषी
लोभवश झूठ बोलता है; वह सात जन्मोंतक
वानरोंका सरदार होता है- यह ध्रुव है। तत्पश्चात्
वह धर्महीन पापी अनेक जन्मोंकी तपस्याके
फलस्वरूप भारतवर्षमें उत्तम बुद्धिसम्पन्न परम
धर्मात्मा ब्राह्मण होता है। अपने धर्ममें तत्पर
रहनेवाला ब्राह्मण अग्निसे भी बढ़कर पवित्र
और अत्यन्त तेजस्वी होता है, उससे देवगण सदा
डरते रहते हैं। जैसे नदियोंमें गङ्गा, तीर्थोंमें
पुष्कर, पुरियोंमें काशी, ज्ञानियोंमें शंकर, शास्त्रोंमें
वेद, वृक्षोंमें पीपल, तपस्याओंमें मेरी पूजा तथा
व्रतोंमें उपवास सर्वश्रेष्ठ है; उसी तरह समस्त
जातियोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ होता है। समस्त पुण्य,
तीर्थ और व्रत ब्राह्मणके चरणोंमें निवास करते
हैं। ब्राह्मणकी चरणरज शुद्ध तथा पाप और
रोगका विनाश करनेवाली होती है। उनका
शुभाशीर्वाद सारे कल्याणोंका कारण होता है।
तात! इस प्रकार मैंने अपनी जानकारी तथा
शास्त्रज्ञानके अनुसार आपसे कर्मविपाकका
वर्णन कर दिया। अब जो अवशिष्ट है, उसे श्रवण
करो। इस कर्मविपाकको सुनकर उस वाचकको
सोना, चाँदी, वस्त्र और पान देना चाहिये।
मनुष्यको चाहिये कि मेरी प्रसन्नताके लिये उस
ब्राह्मणको तुरंत सौ स्वर्णमुद्राएँ, बहुत-सी गायें,
चाँदी, वस्त्र और ताम्बूल दक्षिणारूपमें समर्पित
करे। (अध्याय ८५)
केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन
नन्दजीने पूछा - प्रभो! आपने स्त्रियोंके
प्रसङ्गसे केदार-कन्याका प्रस्ताव करके कर्मविपाकका
वर्णन किया। अब विस्तारपूर्वक केदार-कन्याका
चरित्र बतलाइये। वह केदार-कन्या कौन थी?
भूपाल केदार कौन थे? किसके वंशमें उनका
जन्म हुआ था? यह विवरणसहित मुझे बतलानेकी
कृपा कीजिये।
श्रीभगवान्ने कहा- नन्दजी ! सृष्टिके आदिमें
ब्रह्माके पुत्र स्वायम्भुव मनु हुए। उनकी स्त्रीका
नाम शतरूपा था, जो स्त्रियोंमें धन्या और
माननीया थी। उन दोनोंके प्रियव्रत और उत्तानपाद
नामके दो पुत्र हुए। उत्तानपादके पुत्र महायशस्वी
ध्रुव हुए। ध्रुवके पुत्र नन्दसावर्णि और नन्दसावर्णिके
पुत्र केदार हुए। स्वयं श्रीमान् केदार विष्णु-भक्त
तथा सातों द्वीपोंके अधिपति थे। उनकी रक्षाके
लिये वे प्रतिदिन राजदरबारमें सुन्दर रूप-
रंगवाली, सीधी, नौजवान गायें, जिनके सींगोंमें
सोना मढ़ा गया था, ब्राह्मणोंको दान करते थे।
प्रातःकालसे लेकर सायंकालतक ब्राह्मणोंको भोजन
कराते थे; दुःखियों और भिक्षुकोंको यथोचित धन
देते थे और स्वयं राजा विष्णु-भक्तिपरायण हो
इन्द्रियोंको काबूमें करके फल-मूलका आहार
करते हुए सब कुछ मुझे समर्पित करके रात-
दिन मेरा जप करते थे। तदनन्तर लक्ष्मी अपनी
कलासे कामिनियोंमें श्रेष्ठ कमलनयनी कन्याके
रूपमें उनके यज्ञकुण्डसे प्रकट हुईं। उनके
शरीरपर अग्निमें तपाकर शुद्ध किया हुआ
वस्त्र था और वे रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित
थीं। उन्होंने राजासे यों कहा- 'महाराज! मैं
आपकी कन्या हूँ।' तब राजाने भक्तिपूर्वक उसकी

७०४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
भलीभाँति पूजा की और उसे अपनी पत्नीको
समर्पित करके वे चुपचाप खड़े हो गये। तदनन्तर
वह कन्या हर्षपूर्वक विनती करके और माता-
पिताकी आज्ञा ले तपस्या करनेके लिये यमुना-
तटपर स्थित रमणीय पुण्यवनको चली गयी। वह
वृन्दाका तपोवन था; इसीलिये उसे 'वृन्दावन'
कहते हैं। वहाँ तपस्या करके उसने वरोंमें श्रेष्ठ
मुझको वररूपसे वरण किया। तब ब्रह्माने उसे
वरदान दिया कि 'कुछ कालके पश्चात् तू
कृष्णको प्राप्त करेगी'। फिर ब्रह्माजीने उसकी
परीक्षाके लिये धर्मको एक परम सुन्दर तरुण
ब्राह्मणके रूपमें उसके पास भेजा।
वहाँ जाकर धर्मने कहा- मनोहरे ! तुम
किसकी कन्या हो ? तुम्हारा क्या नाम है? यहाँ
एकान्तमें तुम क्या कर रही हो? यह मुझे
बतलाओ। सुन्दरि ! तुम क्या चाहती हो और
किसलिये यह तपस्या कर रही हो? तुम्हारा
कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, वह
वरदान माँगो।
वृन्दा बोली - विप्रवर! मैं केदारराजकी
कन्या हूँ, मेरा नाम वृन्दा है। मैं इस वृन्दावनमें
वास करती हुई एकान्तमें तपस्या कर रही हूँ
और श्रीहरिको अपना पति बनानेकी चिन्तामें हूँ।
अतः ब्राह्मण ! यदि तुम्हारेमें ऐसा वरदान देनेकी
शक्ति हो तो मेरा अभीष्ट वर मुझे प्रदान करो;
अन्यथा यदि तुम असमर्थ हो तो अपने रास्ते
जाओ। तुम्हें यह सब पूछनेसे क्या लाभ ?
धर्मने कहा- वृन्दे ! जो इच्छारहित, तर्कणा
करनेके अयोग्य, ऐश्वर्यशाली, निर्गुण, निराकार
और भक्तानुग्रहमूर्ति हैं; उन परमात्माको पति
बनानेके लिये लक्ष्मी और सरस्वतीके अतिरिक्त
दूसरी कौन स्त्री समर्थ हो सकती है? वैकुण्ठशायी
चतुर्भुज भगवान्‌की ये ही दो भार्याएँ हैं। गोलोकमें
भी जो द्विभुज, वंशी बजानेवाले, किशोर गोप-
वेषधारी, परिपूर्णतम श्रीकृष्ण हैं; उनकी पत्नी
स्वयं परात्परा महालक्ष्मी राधा हैं। वे परमब्रह्म-
स्वरूपिणी राधा उन श्यामसुन्दरकी, जो परम
आत्मबलसे सम्पन्न, ऐश्वर्यशाली, शमपरायण और
परम सौन्दर्यशाली हैं, जिनका सुन्दर शरीर
करोड़ों कामदेवोंके सौन्दर्यकी निन्दा करनेवाला,
अमूल्य रत्नाभरणोंसे विभूषित, सत्यस्वरूप और
अविनाशी है तथा जो रमणीय पीताम्बर धारण
करनेवाले और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता हैं; सदा
सेवा करती रहती हैं। वे श्रीकृष्ण द्विभुज और
चतुर्भुज-रूपसे दो रूपोंमें विभक्त हैं। वे स्वयं
चतुर्भुज-रूपसे वैकुण्ठमें और द्विभुज-रूपसे गोलोकमें
वास करते हैं। पचीस हजार युग बीतनेके बाद
इन्द्रका पतन होता है, ऐसे चौदह इन्द्रोंका
शासनकाल लोकोंके विधाता ब्रह्माका एक दिन
होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है।
ऐसे तीस दिनका एक मास और बारह मासका
एक वर्ष होता है। ऐसे सौ वर्षतक ब्रह्माकी आयु
समझनी चाहिये। उन ब्रह्माकी आयुसमाप्ति,
जिनका एक निमेष होता है, सनक आदि महर्षि
जिनकी जीवनपर्यन्त सेवा करते रहते हैं, परंतु
करोड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी जो विभु साध्य नहीं
होते। सहस्रमुखधारी शेषनाग अरबों-खरबों कल्पोंतक
जिनकी भक्तिपूर्वक रात-दिन सेवा तथा नाम-
जप करते रहते हैं; परंतु वे परात्पर, दुराराध्य,
हितकारी भगवान् साध्य नहीं होते। जो ब्रह्मा
वेदोंके उत्पादक, विधाता, फलदाता और सम्पूर्ण
सम्पत्तियोंके दाता हैं; वे प्रत्येक जन्ममें उन
ब्रह्मस्वरूप अविनाशी सनातनदेवका सदा अपने
चारों मुखोंद्वारा स्तवन करते रहते हैं; परंतु
वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, कालके काल तथा अन्तकके
अन्तक उन भगवान्‌को सिद्ध नहीं कर पाते।
वृन्दे! जो अपनी कलासे रुद्ररूप धारण
करके जगत्‌का संहार करते हैं, पाँचों मुखोंसे
उनकी स्तुति करते हैं, जिनसे बढ़कर भगवान्‌को
दूसरा कोई प्रिय नहीं है; उनके द्वारा जब भगवान्