ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५९- दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन
| ६७६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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शौचके काममें त्याग देना चाहिये। कुम्हड़ा काटने या फोड़नेवाली स्त्री और दीपक बुझानेवाले पुरुष कई जन्मोंतक रोगी होते हैं और जन्म-जन्ममें दरिद्र रहते हैं। दीपक, शिवलिङ्ग, शालग्राम, मणि, देवप्रतिमा, यज्ञोपवीत, सोना और शङ्ख—इन सबको भूमिपर न रखे। दिनमें और दोनों संध्याओंके समय जो नींद लेता या स्त्री-सहवास करता है, वह कई जन्मोंतक रोगी और दरिद्र होता है। मिट्टी, राख, गोबर—इसके पिण्डसे या बालूसे भी शिवलिङ्गका निर्माण करके एक बार उसकी पूजा कर लेनेवाला पुरुष सौ कल्पोंतक स्वर्गमें निवास करता है। सहस्र शिवलिङ्गोंके पूजनसे मनुष्यको मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है और जिसने एक लाख शिवलिङ्गोंकी पूजा कर ली है, वह निश्चय ही शिवत्वको प्राप्त होता है। जो ब्राह्मण शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह जीवन्मुक्त होता है और जो शिवपूजासे रहित है, वह ब्राह्मण नरकगामी होता है। जो मनुष्य मेरे द्वारा पूजित प्रियतम शिवकी निन्दा करते हैं, वे सौ ब्रह्माओंकी आयुपर्यन्त नरककी यातना भोगते हैं। समस्त प्रियजनोंमें ब्राह्मण मुझे अधिक प्रिय हैं। ब्राह्मणसे अधिक शंकर प्रिय हैं। मेरे लिये शंकरसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। 'महादेव, महादेव, महादेव'—इस प्रकार बोलनेवाले पुरुषके पीछे-पीछे मैं नामश्रवणके लोभसे फिरता रहता हूँ। शिव नाम सुनकर मुझे बड़ी तृप्ति होती है। मेरा मन भक्तके पास रहता है। प्राण राधामय हैं, आत्मा शंकर हैं। शंकर मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, जो सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली आद्या नारायणी शक्ति है, जिसके द्वारा मैं सृष्टि करता हूँ, जिससे ब्रह्मा आदि देवता उत्पन्न होते हैं, जिसका आश्रय लेनेसे जगत् विजयी होता है, जिससे सृष्टि चलती है और जिसके बिना संसारका अस्तित्व ही नहीं रह सकता; वह शक्ति मैंने शिवको अर्पित की है।*
(अध्याय ७४-७५)
जिनके दर्शनसे पुण्यलाभ और जिनके अनुष्ठानसे पुनर्जन्मका निवारण होता है, उन वस्तुओं और सत्कर्मोंका वर्णन तथा विविध दानोंके पुण्यफलका कथन
श्रीनन्दने कहा—सर्वेश्वर! जिनके दर्शनसे पुण्य और जिन्हें देखनेसे पाप होता है, उन सबका परिचय दो। यह सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है।
श्रीभगवान् बोले—तात! उत्तम ब्राह्मण, तीर्थ, वैष्णव, देवप्रतिमा, सूर्यदेव, सती स्त्री, संन्यासी, यति, ब्रह्मचारी, गौ, अग्नि, गुरु, गजराज, सिंह, श्वेत अश्व, शुक, कोकिल, खञ्जरीट, हंस, मोर, नीलकण्ठ, शङ्खपक्षी, बछड़ेसहित गाय, पीपलवृक्ष, पति-पुत्रवाली नारी, तीर्थयात्री मनुष्य, प्रदीप, सुवर्ण, मणि, मोती, हीरा, माणिक्य, तुलसी, श्वेत पुष्प, फल, श्वेत धान्य, घी, दही, मधु, भरा हुआ घड़ा, लावा, दर्पण, जल, श्वेत पुष्पोंकी माला, गोरोचन, कपूर, चाँदी, तालाब, फूलोंसे भरी हुई वाटिका, शुक्लपक्षके चन्द्रमा, अमृत, चन्दन, कस्तूरी, कुङ्कुम, पताका, अक्षयवट,
*महादेव महादेव महादेवेति वादिनः। पश्चाद् यामि च संत्रस्तो नामश्रवणलोभतः॥
मनो मे भक्तमूले च प्राणा राधात्मिका ध्रुवम्। आत्मा मे शङ्करस्थानं शिवः प्राणाधिकश्च यः॥
आद्या नारायणी शक्तिः सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी। करोमि च यया सृष्टिं यया ब्रह्मादिदेवताः॥
यया जयति विश्वं च यया सृष्टिः प्रजायते। यया विना जगन्नास्ति मया दत्ता शिवाय सा॥
(७५। ९०-९३)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६७७
देववृक्ष, देवालय, देवसम्बन्धी जलाशय, देवताके
आश्रित भक्त, देवघट, सुगन्धित वायु, शङ्ख,
दुन्दुभि, सीपी, मूँगा, रजत, स्फटिक मणि, कुशकी
जड़, गङ्गाजीकी मिट्टी, कुशा, ताँबा, पुराणकी
पुस्तक, शुद्ध और बीजमन्त्रसहित विष्णुका यन्त्र,
चिकनी दूब, अक्षत, रत्न, तपस्वी, सिद्धमन्त्र,
समुद्र, कृष्णसार मृग, यज्ञ, महान् उत्सव, गोमूत्र,
गोबर, गोदुग्ध, गोधूलि, गोशाला, गोखुर, पकी
हुई खेतीसे भरा खेत, सुन्दर पद्मिनी, श्यामा,
सुन्दर वेष, वस्त्र एवं दिव्य आभूषणोंसे विभूषित
सौभाग्यवती स्त्री, क्षेमकरी, गन्ध, दूर्वा, अक्षत
और तण्डुल, सिद्धान्न एवं उत्तम अन्न- इन सबके
दर्शनसे पुण्यलाभ होता है।
कार्तिककी पूर्णिमाको राधिकाजीकी शुभ
प्रतिमाका पूजन, दर्शन और वन्दन करके मनुष्य
जन्मके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार
आश्विनमासके शुक्लपक्षकी अष्टमीको हिंगुलामें
श्रीदुर्गाजीकी प्रतिमाका तथा शिवरात्रिको काशीमें
विश्वनाथजीका दर्शन, उपवास और पूजन करनेसे
पुनर्जन्मके कष्टका निवारण हो जाता है। यदि
भक्त पुरुष जन्माष्टमीके दिन मुझ बिन्दुमाधवका
दर्शन, वन्दन और पूजन कर ले; पौषमासके
शुक्लपक्षकी रात्रिमें जहाँ कहीं भी पद्माकी
प्रतिमाका दर्शन प्राप्त कर ले; काशीमें एकादशीको
उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल स्नानकर
अन्नपूर्णाजीका दर्शन कर ले; चैत्रमासकी चतुर्दशीको
पुण्यदायक कामरूप देशमें भद्रकाली देवीका
दर्शन और वन्दन कर ले; अयोध्यामें श्रीरामनावमीके
दिन मुझ रामका पूजन, वन्दन और दर्शन कर ले
तथा गयाके विष्णुपदतीर्थमें जो पिण्ड-दान एवं
विष्णुका पूजन कर ले तो वह पुरुष अपने पुनर्जन्मके
कष्टका निवारण कर लेता है। साथ ही गयातीर्थके
श्राद्धसे वह पितरोंका भी उद्धार करता है। यदि
प्रयागमें मुण्डन करके और नैमिषारण्यमें उपवास
करके मनुष्य दान करे; पुष्कर अथवा बदरिकाश्रम-
तीर्थमें उपवास, स्नान, पूजन एवं विग्रहका दर्शन
कर ले; बदरिकाश्रममें सिद्धि प्राप्त करके बेरका
फल खाय और मेरी प्रतिमाका दर्शन करे; पवित्र
वृन्दावनमें झूलते हुए मुझ गोविन्दका दर्शन एवं
पूजन करे; भाद्रपदमासमें मञ्चपर आसीन हुए मुझ
मधुसूदनका जो भक्त दर्शन, पूजन एवं नमस्कार
करे; कलियुगमें यदि मनुष्य रथयात्राके समय
भक्तिभावसे रथारूढ़ जगन्नाथका दर्शन, पूजन एवं
प्रणाम करे; उत्तरायणकी संक्रान्तिको प्रयागमें
स्नान कर ले और वहीं मुझ वेणीमाधवका पूजन
एवं नमन करे; कार्तिककी पूर्णिमाको उपवासपूर्वक
मेरी शुभ प्रतिमाका दर्शन एवं पूजन कर ले;
चन्द्रभागाके निकट माघकी अमावास्या एवं पूर्णिमाको
राधासहित मुझ श्रीकृष्णका दर्शन और वन्दन कर
ले तथा सेतुबन्धतीर्थमें आषाढ़की पूर्णिमाके दिन
यदि कोई उपवासपूर्वक रामेश्वरके दर्शन एवं
पूजनका सौभाग्य प्राप्त कर ले तो वह अपने
पुनर्जन्मका खण्डन कर लेता है। रामेश्वरमें रातके
समय गन्धर्व और किन्नर मनोहर गान करते हैं।
साक्षात् माधव रामेश्वरको प्रणाम करनेके लिये
वहाँ आते हैं। वहाँ साक्षात् रूपसे निवास
करनेवाले सर्वेश्वर चन्द्रशेखरका दर्शन करके
मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और अन्तमें
श्रीहरिके धामको जाता है। जो उत्तरायणमें
कोणार्कतीर्थके भीतर दीनानाथ भगवान् सूर्यका
दर्शन एवं उपवासपूर्वक पूजन करता है; वह
पुनर्जन्मके कष्टको नष्ट कर देता है। ऋषिगोष्ठ,
सुवसन, कलविङ्क, युगन्धर, विस्यन्दक, राजकोष्ठ,
नन्दक तथा पुष्पभद्रकतीर्थमें पार्वतीकी प्रतिमा
तथा कार्तिकेय, गणेश, नन्दी एवं शंकरका दर्शन
करके मनुष्य अपने जन्मको सफल बना लेता है।
वहाँ उपवासपूर्वक पार्वती और शिवका दर्शन,
पूजन तथा स्तवन करके जो दही खाकर पारणा
करता है; उसका जन्म सफल हो जाता है।
त्रिकूटपर, मणिभद्रतीर्थमें तथा पश्चिम समुद्रके
समीप जो उपवासपूर्वक मेरा दर्शन करके दही
खाता है; वह मोक्षका भागी होता है। जो मेरी
६७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तथा पार्वतीकी प्रतिमाओंमें जीव-चैतन्यका न्यास
करके उनका पूजन करता है, जो शिव और
दुर्गाके तथा विशेषतः मेरे लिये मन्दिरका निर्माण
करता और उन मन्दिरोंमें शिव आदिकी प्रतिमाको
स्थापित करता है; वह अपने जन्मको सफल बना
लेता है। जो पुष्पोद्यान, शंकु, सेतु, खात (कुआँ
आदि) और सरोवरका निर्माण तथा ब्राह्मणको
स्थान एवं वृत्ति देकर उसकी स्थापना करता है;
उसका जन्म सफल हो जाता है।
पिताजी ! ब्राह्मणकी स्थापना करनेसे जो
फल होता है; उसे वेद, पुराण, संत, मुनि और
देवता भी नहीं जानते। धरतीपर जो धूलिके कण
हैं, वे गिने जा सकते हैं; वर्षाकी बूँदें भी गिनी
जा सकती हैं; परंतु ब्राह्मणको वृत्ति और स्थान
देकर बसा देनेमें जो पुण्यफल होता है; उसकी
गणना विधाता भी नहीं कर सकते। ब्राह्मणको
जीविका देकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है,
सुस्थिर सम्पत्ति पाता है और परलोकमें चारों
प्रकारकी मुक्तियोंका भागी होता है। वह मेरी
दास्य-भक्तिको पा लेता और वैकुण्ठमें चिरकालतक
आनन्द भोगता है। मुझ परमात्माकी तरह उसका
भी कभी वहाँसे पतन नहीं होता। जो उत्तम,
अनाथ, दरिद्र और पूर्णतः पण्डित ब्राह्मणको
सुपात्र देख उसका विवाह कर देता है; उसे
निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति होती है। छत्र, चरणपादुका,
शालग्राम तथा कन्याके दानका फल पृथ्वीदानके
समान माना गया है। हाथीका दान करनेपर उसके
रोएँके बराबर वर्षोंतक स्वर्गकी प्राप्ति होती है;
यह शास्त्रमें प्रसिद्ध है। गजराजके दानका फल इससे
चौगुना माना गया है। श्वेत घोड़ेके दानका पुण्य
गजदानसे आधा बताया गया है और अन्य
घोड़ोंके दानका फल श्वेत घोड़ेके दानकी अपेक्षा
आधा कहा गया है। काली गौके दानका फल
गजदानके ही तुल्य है। धेनुदानका फल भी वैसा
ही है। सामान्य गोदानका फल उससे आधा कहा
गया है। बछड़ा व्यायी हुई गौके दानसे भूमिदानका
फल प्राप्त होता है। ब्राह्मणको भोजन कराया जाय
तो उससे सम्पूर्ण दानोंका फल प्राप्त हो जाता है।
अन्नदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है
और न होगा। उसमें पात्रकी परीक्षा आवश्यक
नहीं है - अन्नदान पानेके सभी अधिकारी हैं।
अन्नदानके लिये कहीं किसी कालका भी नियम
नहीं है - भूखेको सदा ही अन्न दिया जा सकता
है। अन्नदानसे दाताको सतत पुण्यफलकी प्राप्ति
होती है और उसे लेनेवाले पात्र (व्यक्ति)-को
भी प्रतिग्रहका दोष नहीं लगता। भूतलपर अन्नदान
धन्य है, जो वैकुण्ठकी प्राप्तिका हेतु होता है*।
जो दरिद्र एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको वस्त्र देता है,
उसे शुभ फलकी प्राप्ति होती है। लोहेके दीपमें
सोनेकी बत्ती रखकर जो परमात्मा श्रीहरिके लिये
घृतसहित उस दीपका दान करता है; वह मेरे
धाममें जाता है। फूलकी माला, फल, शय्या, गृह
और अन्नके दानसे शुभ फलकी प्राप्ति होती है।
इन सभी दानोंसे दीर्घकालतकके लिये श्रेष्ठ लोक
प्राप्त होते हैं। यदि इन दानोंका निष्काम भावसे
अनुष्ठान हो तो इनसे भगवत्प्राप्ति भी हो सकती
है। ब्रजराज ! तुम व्रजभूमिमें जाकर प्रत्येक व्रजमें
ब्राह्मणोंको भोजन कराओ। यह मैंने तुम्हें पुण्यवर्धक
दानका परिचय दिया है। नीच पुरुषोंके प्रति
इसका वर्णन नहीं करना चाहिये। (अध्याय ७६)
- अन्नदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति ।
नात्र पात्रपरीक्षा सा न कालनियमः क्वचित् । अन्नदाने शुभं पुण्यं धातुः पात्रं त्वपातकी ॥
अन्नदानं च धन्यं स्याद्भूभौ वैकुण्ठहेतुकम् ।
(७६ । ६४-६५१/२)