ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५६- जिनके दर्शनसे पुण्यलाभ और जिनके अनुष्ठानसे पुनर्जन्मका निवारण होता है, उन वस्तुओं और सत्कर्मोंका वर्णन तथा विविध दानोंके पुण्यफलका कथन
६६८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
भक्तोंके तो वे जीवनबन्धु ही हैं। कृपानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक कंसको मञ्चसे खींच लिया और लीलासे ही उसको मार डाला। उस समय राजा कंसको सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दे रहा था। मृत्युके पश्चात् उसके निकट हीरेके हारोंसे विभूषित रत्नमय विमान आ पहुँचा और वह दिव्य रूप धारण करके समृद्धिशाली हो उस विमानसे विष्णुधाममें जा पहुँचा। मुने ! कंसका उत्कृष्ट तेज श्रीकृष्णके चरणारविन्दमें प्रविष्ट हो गया। उसका और्ध्वदैहिक संस्कार एवं सत्कार करके श्रीहरिने ब्राह्मणोंको धनका दान किया। इसके बाद राज्य एवं राजाका छत्र बुद्धिमान् उग्रसेनको सौंप दिया। चन्द्रवंशी उग्रसेन पुनः यादवोंके 'राजेन्द्र' हो गये।
कंसकी माता, पत्नियाँ, पिता, बन्धु-बान्धव, मातृवर्गकी स्त्रियाँ, बहिन तथा भाइयोंकी स्त्रियाँ भी विलाप करने लगीं। वे बोलीं—'राजेन्द्र ! उठो, राजसिंहासनपर बैठकर हमें दर्शन दो। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त चराचर प्राणियोंका आधारभूत जो असंख्य विश्व हैं, उन सबकी जो स्वयं ही लीलापूर्वक सृष्टि करते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, सूर्य तथा गणेश आदि देवता, मुनीन्द्रवर्ग और देवेन्द्रगण जिनका दिन-रात ध्यान करते हैं; वेद और सरस्वती भयभीत हो जिनका स्तवन करती हैं; प्रकृतिदेवी भी हर्षसे उल्लसित हो जिनके गुण गाती हैं; जो प्रकृतिसे परे, प्राकृतस्वरूप, स्वेच्छामय, निरीह, निर्गुण, निरञ्जन, परात्परतर ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, नित्यज्योतिःस्वरूप, भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य देह धारण करनेवाले, नित्यानन्दमय, नित्यरूप तथा नित्य अविनाशी शरीर धारण करनेवाले हैं; वे ही मायापति भगवान् गोविन्द भूतलका भार उतारनेके लिये मायासे गोपबालकके वेषमें अवतीर्ण हुए हैं। वे सर्वेश्वर प्रभु जिसे मारते हैं, उसकी रक्षा कौन पुरुष कर सकता है ? इसी प्रकार वे सर्वात्मा श्रीहरि जिसकी रक्षा करते हों उसे मारनेवाला भी कोई नहीं है*।'
महामुने ! ऐसा कहकर सब लोग चुप हो गये। परिवारके लोगोंने ब्राह्मणोंको भोजन कराया और उन्हें सब प्रकारका धन दिया। सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण भी पिताके निकट गये और उनकी बेड़ी-हथकड़ी काटकर उन्होंने माता और पिता दोनोंको बन्धनसे मुक्त किया। तत्पश्चात् उन देवेश्वरने दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर माता-पिताको साष्टाङ्ग प्रणाम किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर उनकी स्तुति की।
श्रीभगवान् बोले—जो पुरुष पिता और माताका तथा विद्यादाता एवं मन्त्रदाता गुरुका पोषण नहीं करता, वह जीवनभर पापसे शुद्ध नहीं होता। समस्त पूजनीयोंमें पिता वन्दनीय महान् गुरु हैं। परंतु माता गर्भमें धारण एवं पोषण करती है; इसलिये पितासे भी सौगुनी श्रेष्ठ है। माता पृथ्वीके समान क्षमाशीला और सबका समानरूपसे हित चाहनेवाली है; अतः भूतलपर सबके लिये मातासे बढ़कर बन्धु दूसरा कोई नहीं है। साथ ही यह भी सच है कि विद्यादाता और मन्त्रदाता गुरु मातासे भी बहुत बढ़-चढ़कर आदरके योग्य हैं। वेदके अनुसार गुरुसे बढ़कर वन्दनीय और पूजनीय दूसरा कोई नहीं है।
मुने ! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण और बलरामने माताको प्रणाम किया। फिर माता-पिताने भी उन दोनोंको आदरपूर्वक गोदमें बिठा लिया और उन्हें उत्तम मिष्ठान्न भोजन कराया। नन्द और ग्वालबालोंको भी बड़े आदरसे खिलाया। बच्चोंका मङ्गल-कृत्य कराया और उसके उपलक्ष्यमें भी बहुत-से ब्राह्मणोंको जिमाया। उस समय वसुदेवने प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया। (अध्याय ७१-७२)
* स यं हन्ति च सर्वेशो रक्षिता तस्य कः पुमान्। स यं रक्षति सर्वात्मा तस्य हन्ता न कोऽपि च॥
(७२। १०५)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६६९
श्रीकृष्णका नन्दको अपना स्वरूप और प्रभाव बताना; गोलोक, रासमण्डल और राधा-सदनका वर्णन; श्रीराधाके महत्त्वका प्रतिपादन तथा उनके साथ अपने नित्य सम्बन्धका कथन और दिव्य विभूतियोंका वर्णन
श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर शोकसे आतुर और पुत्रवियोगसे कातर हो फूट-फूटकर रोते हुए चेष्टाशून्य पिता नन्दको श्रीकृष्ण और बलरामने आध्यात्मिक आदि दिव्य योगोंद्वारा सानन्द समझाना आरम्भ किया।
श्रीभगवान् बोले—बाबा! प्रसन्नतापूर्वक मेरी बात सुनो। शोक छोड़ो और हर्षको हृदयमें स्थान दो। मैं जो ज्ञान देता हूँ, इसे ग्रहण करो। यह वही ज्ञान है, जिसे पूर्वकालमें मैंने पुष्करमें ब्रह्मा, शेष, गणेश, महेश (शिव), दिनेश (सूर्य), मुनीश और योगीशको प्रदान किया था। यहाँ कौन किसका पुत्र, कौन किसका पिता और कौन किसकी माता है? यह पुत्र आदिका सम्बन्ध किस कारणसे है? जीव अपने पूर्वकृत कर्मसे प्रेरित हो इस संसारमें आते और परलोकमें जाते हैं। कर्मके अनुसार ही उनका विभिन्न स्थानोंमें जन्म होता है। कोई जीव अपने शुभकर्मसे प्रेरित हो योगीन्द्रोंके कुलमें जन्म लेता है और कोई राजरानियोंके पेटसे उत्पन्न होता है। कोई ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या अथवा शूद्राओंके गर्भसे जन्म ग्रहण करता है; किसी-किसीकी उत्पत्ति पशु, पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंमें होती है। सब लोग मेरी ही मायासे विषयोंमें आनन्द लेते हैं और देहत्यागकालमें विषाद करते हैं। बान्धवोंके साथ बिछोह होनेपर भी लोगोंको बड़ा कष्ट होता है। संतान, भूमि और धन आदिका विच्छेद मरणसे भी अधिक कष्टदायक प्रतीत होता है। मूढ़ मनुष्य ही सदा इस तरहके शोकसे ग्रस्त होता है; विद्वान् पुरुष नहीं। जो मेरा भक्त है, मेरे भजनमें लगा है, मेरा यजन करता है, इन्द्रियोंको वशमें रखता है, मेरे मन्त्रका उपासक है और निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न रहता है; वह परम पवित्र माना गया है। मेरे भयसे ही यह वायु चलती है, सूर्य और चन्द्रमा प्रतिदिन प्रकाशित होते हैं, इन्द्र भिन्न-भिन्न समयोंमें वर्षा करते हैं, आग जलाती है और मृत्यु सब जीवोंमें विचरती है। मेरा भय मानकर ही वृक्ष समयानुसार पुष्प और फल धारण करता है। वायु बिना किसी आधारके चलती है। वायुके आधारपर कच्छप, कच्छपके आधारपर शेष और शेषके आधारपर पर्वत टिके हुए हैं। पंक्तिबद्ध विद्यमान सात पाताल पर्वतोंके सहारे स्थित हैं। पातालोंसे जल सुस्थिर है और जलके ऊपर पृथ्वी टिकी हुई है। पृथ्वी सात स्वर्गोंकी आधारभूमि है। ज्योतिश्चक्र अथवा नक्षत्रमण्डल ग्रहोंके आधारपर स्थित हैं; परंतु वैकुण्ठ बिना किसी आधारके ही प्रतिष्ठित है। वह समस्त ब्रह्माण्डोंसे परे तथा श्रेष्ठ है। उससे भी परे गोलोकधाम है। वह वैकुण्ठधामसे पचास
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करोड़ योजन ऊपर बिना आधारके ही स्थित है।
उसका निर्माण दिव्य चिन्मय रत्नोंके सारतत्त्वसे
हुआ है। उसके सात दरवाजे हैं। सात सार हैं।
वह सात खाइयोंसे घिरा हुआ है। उसके चारों
ओर लाखों परकोटे हैं। वहाँ विरजा नदी बहती
है। वह लोक मनोहर रत्नमय पर्वत शतशृङ्गसे
आवेष्टित है। शतशृङ्गका एक-एक उज्ज्वल शिखर
दस-दस हजार योजन लंबा-चौड़ा है। वह पर्वत
करोड़ों योजन ऊँचा है। उसकी लंबाई उससे
सौगुनी है और चौड़ाई एक लाख योजन है। उसी
धाममें बहुमूल्य दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित चन्द्रमण्डलके
समान गोलाकार रासमण्डल है; जिसका विस्तार
दस हजार योजन है। वह फूलोंसे लदे हुए
पारिजात-वनसे, एक सहस्र कल्पवृक्षोंसे और
सैकड़ों पुष्पोद्यानोंसे घिरा हुआ है। वे पुष्पोद्यान
नाना प्रकारके पुष्पसम्बन्धी वृक्षोंसे युक्त होनेके
कारण फूलोंसे भरे रहते हैं; अतएव अत्यन्त
मनोहर प्रतीत होते हैं। उस रासमण्डलमें तीन
करोड़ रत्ननिर्मित भवन हैं, जिनकी रक्षामें कई
लाख गोपियाँ नियुक्त हैं। वहाँ रत्नमय प्रदीप
प्रकाश देते हैं। प्रत्येक भवनमें रत्ननिर्मित शय्या
बिछी हुई है। नाना प्रकारकी भोगसामग्री संचित
है। रासमण्डलके सब ओर मधुकी सैकड़ों
बावलियाँ हैं। वहाँ अमृतकी भी बावलियाँ हैं
और इच्छानुसार भोगके सभी साधन उपलब्ध हैं।
गोलोकमें कितने गृह हैं, यह कौन बता सकता
है? वहाँ केवल राधाका जो सुन्दर, रमणीय एवं
उत्तम निवास-मन्दिर है, वह बहुमूल्य रत्ननिर्मित
तीन करोड़ भव्य भवनोंसे शोभित है। जिनकी
कीमत नहीं आँकी जा सकती, ऐसे रत्नोंद्वारा
निर्मित चमकीले खम्भोंकी पंक्तियाँ उस राधाभवनको
प्रकाशित करती हैं। वह भवन नाना प्रकारके
विचित्र चित्रोंद्वारा चित्रित है। अनेक श्वेत चामर
उनकी शोभा बढ़ाते हैं। माणिक्य और मोतियोंसे
जटित, हीरेके हारोंसे अलंकृत तथा रत्नमय
प्रदीपोंसे प्रकाशित राधामन्दिर रत्नोंकी बनी हुई
सीढ़ियोंसे अत्यन्त सुन्दर जान पड़ता है। बहुमूल्य
रत्नोंके पात्र और शय्याओंकी श्रेणियाँ उस भवनकी
शोभा बढ़ाती हैं। तीन खाइयों, तीन दुर्गम द्वारों
और सोलह कक्षाओंसे युक्त राधाभवनके प्रत्येक
द्वारपर और भीतर नियुक्त हुई सोलह लाख
गोपियाँ इधर-उधर घूमती रहती हैं। उन सबके
शरीरपर अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं। वे
रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत हैं। उनकी अङ्गकान्ति
तपाये हुए सुवर्णके समान उद्भासित होती है। वे
शत-शत चन्द्रमाओंकी मनोरम आभासे सम्पन्न
हैं। राधिकाके किंकर भी ऐसे ही और इतने ही
हैं। इन सबसे भरा हुआ उस भवनका अन्तःपुर
बड़ा सुन्दर लगता है। उस भवनका आँगन
बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित है। वह राधाभवन
अत्यन्त मनोहर, अमूल्य रत्नमय खम्भोंके समुदायसे
सुशोभित, फल-पल्लवसंयुक्त, रत्ननिर्मित मङ्गल-
कलशोंसे अलंकृत और रत्नमयी वेदिकाओंसे
विभूषित है। सुन्दर एवं बहुमूल्य रत्नमय दर्पण
उसकी शोभा बढ़ाते हैं। अमूल्य रत्नोंसे निर्मित
वह सुन्दर सदन सब भवनोंमें श्रेष्ठ है।
वहाँ श्रीराधारानी रत्नमय सिंहासनपर विराजमान
होती हैं। लाखों गोपियाँ उनकी सेवामें रहती हैं।
वे करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न हैं।
श्वेत चम्पाके समान उनकी गौर कान्ति है। वे
बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित आभूषणोंसे विभूषित हैं।
अमूल्य रत्नजटित वस्त्र पहने, बायें हाथमें रत्नमय
दर्पण तथा दाहिनेमें सुन्दर रत्नमय कमल धारण
करती हैं। उनके ललाटमें अनारके फूलकी भाँति
लाल और अत्यन्त मनोहर सिन्दूर शोभित होता
है। उसके साथ ही कस्तूरी और चन्दनके सुन्दर बिन्दु
भी भालदेशका सौन्दर्य बढ़ाते हैं। वे सिरपर बालोंका
चूड़ा धारण करती हैं, जो मालतीकी मालासे अलंकृत
होता है। ऐसी राधा गोलोकमें गोपियोंद्वारा सेवित
होती हैं। उनकी सेवामें रहनेवाली गोपियाँ भी