ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५४- माताद्वारा युद्ध न करनेका अनुरोध किये जानेपर भी भार्गव परशुरामकी इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन करनेकी प्रतिज्ञा
| ३५८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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वस्तुहीन एवं निष्फल हो जाता है, जैसे दूध पीनेवाले बच्चोंको माताके बिना सुख नहीं मिलता। आप तो जगत्की माता हैं; अतः प्रसन्न हो जाइये और हम अत्यन्त भयभीतोंकी रक्षा कीजिये। हमलोग आपके चरणकमलका आश्रय लेकर शरणापन्न हुए हैं। आप शक्तिस्वरूपा जगज्जननीको बारंबार नमस्कार है। ज्ञान, बुद्धि तथा सर्वस्व प्रदान करनेवाली आपको पुनः-पुनः प्रणाम है। महालक्ष्मी! आप हरि-भक्ति प्रदान करनेवाली, मुक्तिदायिनी, सर्वज्ञा और सब कुछ देनेवाली हैं। आप बारंबार मेरा प्रणिपात स्वीकार करें। माँ! कुपुत्र तो कहीं-कहीं होते हैं, परंतु कुमाता कहीं नहीं होती। क्या कहीं पुत्रके दुष्ट होनेपर माता उसे छोड़कर चली जाती है? हे मातः! आप कृपासिन्धु श्रीहरिकी प्राणप्रिया हैं और भक्तोंपर अनुग्रह करना आपका स्वभाव है; अतः दुधमुँहे बालकोंकी तरह हमलोगोंपर कृपा करो, हमें दर्शन दो। वत्स! इस प्रकार लक्ष्मीका वह शुभकारक स्तोत्र, जो सुखदायक, मोक्षप्रद, साररूप, शुभद और सम्पत्तिका आश्रयस्थान है, तुम्हें बता दिया। जो मनुष्य पूजाके समय इस महान् पुण्यकारक स्तोत्रका पाठ करता है, उसके गृहका महालक्ष्मी कभी परित्याग नहीं करतीं। इन्द्रसे इतना कहकर श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये। तब उनकी आज्ञासे देवताओंके साथ देवराज क्षीरसागरपर गये*। (अध्याय २१)
देवताओंके स्तवन करनेपर महालक्ष्मीका प्रकट होकर देवों और मुनियोंके समक्ष अपने निवास-योग्य स्थानका वर्णन करना
**नारायण कहते हैं—**नारद! तदनन्तर इन्द्र गुरु बृहस्पति तथा अन्यान्य देवोंको साथ लेकर लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिये प्रसन्न-मनसे शीघ्र ही क्षीरसागरके तटपर गये। वहाँ उन्होंने अमूल्य रत्नकी गुटिकासे युक्त कवचको गलेमें बाँधकर पुनः-पुनः उस दिव्य स्तोत्रका मन-ही-मन स्मरण
* नारायण उवाच—
देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि न क्षमाः स्तोतुमीश्वराः। बुद्धेरगोचरां सूक्ष्मां तेजोरूपां सनातनीम्॥
अत्यनिर्वचनीयां च को वा निर्वक्तुमीश्वरः॥
स्वेच्छामयीं निराकारां भक्तानुग्रहविग्रहाम्। स्तौमि वाङ्मनसोः पारं किं वाहं जगदम्बिके॥
परां चतुर्णां वेदानां पारबीजं भवार्णवे। सर्वशस्याधिदेवीं च सर्वांसामपि सम्पदाम्॥
योगिनां चैव योगानां ज्ञानानां ज्ञानिनां तथा। वेदानां च वेदविदां जननीं वर्णयामि किम्॥
यया विना जगत् सर्वमवस्तु निष्फलं ध्रुवम्। यथा स्तानान्धबालानां विना मात्रासुखं भवेत्॥
प्रसीद जगतां माता रक्षामानतिकातारन्। वयं त्वच्चरणाम्भोजे प्रपन्नाः शरणं गताः॥
नमः शक्तिस्वरूपायै जगन्मात्रे नमो नमः। ज्ञानदायै बुद्धिदायै सर्वदायै नमो नमः॥
हरिभक्तिप्रदायिन्यै मुक्तिदायै नमो नमः। सर्वज्ञायै सर्वदायै महालक्ष्म्यै नमो नमः॥
कुपुत्राः कुत्रचित् सन्ति न कुत्रचित् कुमातरः। कुत्र माता पुत्रदोषे तं विहाय च गच्छति॥
हे मातर्दर्शनं देहि स्तानान्थान् बालकानिव। कृपां कुरु कृपासिन्धुप्रियेऽस्मान् भक्तवत्सले॥
इत्येवं कथितं वत्स पद्मायाश्च शुभावहम्। सुखदं मोक्षदं सारं शुभदं सम्पदः पदम्॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं पूजाकाले च यः पठेत्। महालक्ष्मीर्गृहं तस्य न जहाति कदाचन॥
इत्युक्त्वा श्रीहरिस्तं च तत्रैवान्तरधीयत। देवो जगाम क्षीरोदं सुरैः सार्धं तदाज्ञया॥
(२२।२७—३९)
गणपतिखण्ड ३५९
किया। फिर सब लोगोंने भक्तिभावपूर्वक कमल-वासिनी लक्ष्मीका स्तवन किया। उस समय उनके सिर भक्तिके कारण झुके हुए थे और अत्यन्त दीनतावश नेत्रोंमें आँसू छलक आये थे। उनके द्वारा की गयी स्तुतिको सुनकर सहस्रदल-कमलपर वास करनेवाली तथा सैकड़ों चन्द्रमाओंके समान कान्तिमती महालक्ष्मी तुरंत ही वहाँ प्रकट हो गयीं। मुने! उन जगन्माताकी उत्तम प्रभासे सारा जगत् व्यास हो गया। तदनन्तर जगत्का धारण-पोषण करनेवाली लक्ष्मीने देवताओंसे यथोचित हितकारक एवं साररूप वचन कहा।
श्रीमहालक्ष्मी बोलीं— बच्चो! तुमलोग ब्रह्मशापके कारण भ्रष्ट हो गये हो, अतः मेरा तुमलोगोंके घर जानेका विचार नहीं है। इस समय मैं ऐसा करनेमें समर्थ नहीं हूँ; क्योंकि मैं ब्रह्मशापसे डर रही हूँ। ब्राह्मण मेरे प्राण हैं। वे सभी सदा मुझे पुत्रसे भी बढ़कर प्रिय हैं। वे ब्राह्मण जो कुछ देते हैं, वही मेरी जीविकाका साधन होता है। यदि वे विप्र प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहें तो मैं उनकी आज्ञासे चल सकूँगी। वे तपस्वी मेरी पूजा करनेमें समर्थ नहीं हैं। जब अभाग्यका समय आ जाता है, तभी वे गुरु, ब्राह्मण, देव, संन्यासी तथा वैष्णवोंद्वारा शापित होते हैं। जो सबके कारण, ऐश्वर्यशाली, सर्वेश्वर और सनातन हैं, वे भगवान् नारायण भी ब्रह्मशापसे भय मानते हैं।
ब्रह्मन्! इसी बीच अङ्गिरा, प्रचेता, क्रतु, भृगु, पुलह, पुलस्त्य, मरीचि, अत्रि, सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, साक्षात् नारायणस्वरूप भगवान् सनत्कुमार, कपिल, आसुरि, वोढु, पञ्चशिख, दुर्वासा, कश्यप, अगस्त्य, गौतम, कण्व, और्व, कात्यायन, कणाद, पाणिनि, मार्कण्डेय, लोमश और स्वयं भगवान् वसिष्ठ—ये सभी ब्राह्मण हर्षपूर्ण-चित्तसे वहाँ आये। वे सभी ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे और उनके मुखोंपर मुस्कराहट थी। उन्होंने अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्रीसे भगवती लक्ष्मीका पूजन किया और देवताओंने उन्हें वन्य पदार्थोंका नैवेद्य समर्पित किया। फिर उन मुनीश्वरोंने हर्षके साथ उनकी स्तुति करके भक्तिपूर्वक उनका आराधन किया और कहा—‘जगदम्बिके! आप देवलोक तथा मर्त्यलोकमें पधारिये।’ उनका वह वचन सुनकर जगज्जननी संतुष्ट हो गयीं और ब्राह्मणोंकी आज्ञासे निर्भय हो चलनेके लिये उद्यत होकर उनसे बोलीं।
श्रीमहालक्ष्मीने कहा— विप्रवरो! मैं आपलोगोंकी आज्ञासे देवताओंके घर जाऊँगी, किंतु भारतवर्षमें जिन-जिनके घर नहीं जाऊँगी, उनका विवरण सुनिये। पुण्यात्मा गृहस्थों और उत्तम नीतिके जानकार नरेशोंके घरमें तो मैं स्थिररूपसे निवास करूँगी और पुत्रकी भाँति उनकी रक्षा करूँगी। जिस-जिसके प्रति उसके गुरु, देवता, माता, पिता, भाई-बन्धु, अतिथि और पितर लोग रुष्ट हो जायँगे, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मिथ्यावादी, पराक्रमहीन और दुष्ट स्वभाववाला है तथा ‘मेरे पास कुछ नहीं है’ यों सदा कहता रहता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो सत्यहीन, धरोहर हड़प लेनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, विश्वासघाती और कृतघ्न है, उसके गृह में नहीं जाऊँगी। जो चिन्ताग्रस्त, भयभीत, शत्रुके चंगुलमें फँसा हुआ, महान् पापी, कर्जदार और अत्यन्त कृपण है—ऐसे पापियोंके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो दीक्षाहीन, शोकार्त, मन्दबुद्धि और सदा स्त्रीके वशमें रहनेवाला है तथा जो कुलटा स्त्रीका पति अथवा पुत्र है, उसके घर मैं कभी नहीं जाऊँगी। जो दुष्ट वचन बोलनेवाला और झगड़ालू है, जिसके घरमें निरन्तर कलह होता रहता है तथा जिसके घरमें स्त्रीका स्वामित्व है—ऐसे लोगोंके घर मैं नहीं जाऊँगी। जहाँ श्रीहरिकी पूजा और उनके गुणोंका
३६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कीर्तन नहीं होता तथा उनकी प्रशंसामें उत्सुकता नहीं है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो कन्या, अन्न और वेदको बेचनेवाला, मनुष्यघाती और हिंसक है, उसका घर नरककुण्डके समान है; अतः मैं उसके घर नहीं जाऊँगी। जो कृपणतावश माता, पिता, भार्या, गुरुपत्नी, गुरु, पुत्र, अनाथ बहिन और आश्रयहीन बान्धवोंका पालन-पोषण नहीं करता; सदा धन-संग्रहमें ही लगा रहता है; उसके नरक-कुण्ड-सदृश घरमें मैं नहीं जाऊँगी। जिसके दाँत और वस्त्र मलिन, मस्तक रूखा और ग्रास तथा हास विकृत रहते हैं, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मन्दबुद्धि मल-मूत्रका परित्याग करके उसपर दृष्टि डालता है और गीले पैरों सोता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो बिना पैर धोये सोता है; गाढ़ निद्राके वशीभूत होकर सोते समय नंगा हो जाता है तथा संध्याकाल और दिनमें शयन करनेवाला है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो पहले मस्तकपर तेल लगाकर पीछे उस तेलसे अन्य अङ्गोंका स्पर्श करता है अथवा सारे शरीरमें लगाता है उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मस्तक और शरीरमें तेल लगाकर मल-मूत्रका त्याग करता है, नमस्कार करता है और पुष्प तोड़कर ले आता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो नखोंसे तृण तोड़ता और नखोंसे भूमि कुरेदता है तथा जिसके शरीर और पैरमें मैल जमी रहती है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो अपने द्वारा अथवा पराये द्वारा दी हुई ब्राह्मणकी और देवताकी वृत्तिका अपहरण करता है, वह ज्ञानशील ही क्यों न हो, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मूर्ख कर्म करके दक्षिणा नहीं देता, वह शठ पापी और पुण्यहीन है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो मन्त्रविद्या (झाड़-फूँक)-से जीविका चलानेवाला, ग्रामयाजी (पुरोहित), वैद्य, रसोइया और देवल (वेतन लेकर मूर्ति-पूजा करनेवाला) है; उसके घर मैं नहीं जाऊँगी। जो क्रोधवश विवाह अथवा धर्मकार्यको काट देता है तथा जो दिनमें स्त्री-प्रसङ्ग करता है, उसके घर मैं नहीं जाऊँगी।
नारद! इतना कहकर महालक्ष्मी अन्तर्धान हो गयीं। फिर उन्होंने देवताओंके गृह तथा मृत्युलोककी ओर देखा। तब सभी देवता और मुनिगण आनन्दपूर्वक महालक्ष्मीको प्रणाम करके शीघ्र ही अपने-अपने वासस्थानको चले गये। उस समय उनके गृहोंको शत्रुओंने छोड़ दिया था और वे सुहृदोंसे परिपूर्ण थे। मुने! फिर तो स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं और फूलोंकी वर्षा होने लगी। इस प्रकार देवताओंने अपना राज्य और स्थिरा लक्ष्मीको प्राप्त किया। वत्स! इस प्रकार मैंने लक्ष्मीके उत्तम चरितका, जो सुखदायक, मोक्षप्रद और साररूप है, वर्णन कर दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय २३)
गणेशके एकदन्त-वर्णन-प्रसङ्गमें जमदग्निके आश्रमपर कार्तवीर्यका स्वागत-सत्कार, कार्तवीर्यका बलपूर्वक कामधेनुको हरण करनेकी इच्छा प्रकट करना, कामधेनुद्वारा उत्पन्न की हुई सेनाके साथ कार्तवीर्यकी सेनाका युद्ध
नारदजीने पूछा— हरिके अंशसे उत्पन्न हुए महाभाग नारायण! आपकी कृपासे मैंने गणेशका सारा शुभ चरित सुन लिया। किंतु ब्रह्मन्! विष्णुने उस बालकके धड़पर गजराजके दो दाँतोंवाले मुखको जोड़ा था; फिर वह शिशु एकदन्त कैसे हो गया? उसका वह दूसरा दाँत कहाँ चला गया? वह प्रसङ्ग बतलानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि आप सर्वेश्वर, सर्वज्ञ, कृपालु और भक्तवत्सल हैं।
गणपतिखण्ड | ३६१
नारायणने कहा—नारद! एकदन्तका चरित सम्पूर्ण मङ्गलोंका मङ्गल करनेवाला है। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ, सुनो। मुने! एक समयकी बात है, राजा कार्तवीर्य शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ वह बहुत-से वन्य पशुओंका वध करके थक गया। इतनेमें सूर्यास्त हो चला, तब उस राजाने सायंकालमें सेनासहित वहीं वनमें जमदग्नि ऋषिके आश्रमके निकट पड़ाव डाल दिया और बिना कुछ खाये-पीये रात्रि व्यतीत की। प्रातःकाल राजा सरोवरमें स्नान करके पवित्र हुआ और अपने शरीरको अलंकृत करके दत्तात्रेयद्वारा दिये गये मन्त्रका भक्तिपूर्वक जप करने लगा। मुनिवर जमदग्निने देखा कि राजाके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये हैं; तब उन्होंने प्रेमके साथ आदरपूर्वक कोमल वाणीसे राजाका कुशल-समाचार पूछा। तदनन्तर राजाने बड़ी उतावलीके साथ सूर्यके समान तेजस्वी मुनिको प्रणाम किया और मुनिने चरणोंमें पड़े हुए राजाको स्नेहपूर्वक शुभाशीर्वाद दिया। राजाने अपने उपवास आदिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया; तब मुनिने तुरंत ही डरते-डरते राजाको निमन्त्रण दे दिया। इसके बाद मुनिश्रेष्ठ जमदग्नि हर्षपूर्वक अपने आश्रमको लौट आये और वहाँ उन्होंने लक्ष्मीसदृशी माता कामधेनुसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब कामधेनु भयभीत हुए मुनिसे बोली—'मुने! मेरे रहते आपको भय कैसा? आप तो मेरे द्वारा सारे जगत्को भोजन करानेमें समर्थ हैं; फिर राजाकी क्या बात है? आप राजाओंके भोजन-योग्य त्रिलोकीमें दुर्लभ जिन-जिन पदार्थोंकी याचना करेंगे, वह सब मैं आपको प्रदान करूँगी।' तदनन्तर कामधेनुने अनेक प्रकारके भोजन करनेके योग्य सोने और चाँदीके बर्तन, असंख्यों भोजन बनानेके पात्र और बहुत-से स्वादिष्ट पदार्थोंसे परिपूर्ण बर्तन मुनिको दिये। फिर नाना प्रकारके स्वादिष्ट और पके हुए कटहल, आम, नारियल और बेलके फल प्रदान किये। नारद! स्वादिष्ट लड्डुओंकी तो असंख्य ढेरियाँ लग गयीं। जौ और गेहूँके आटेकी बनी हुई पूड़ियों और भाँति-भाँतिके पकवानोंका पर्वत तथा उत्तम-उत्तम अन्नोंका ढेर लग गया। दूध, दही और घीकी नदियाँ बह चलीं। शकरका ढेर तथा मोदकोंका पहाड़ लग गया। उत्तम धानके चिउड़ोंका पर्वत-सा ढेर लगा दिया। फिर कौतुकवश राजाओंके योग्य पूर्णतया कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल और सुन्दर वस्त्राभूषण प्रदान किया। इस प्रकार सामग्रीसे सम्पन्न हो मुनिने खेल-ही-खेलमें सेनासहित राजाको मनोहर पदार्थ देकर भोजन कराया। तब जो-जो वस्तुएँ परम दुर्लभ थीं, उन्हें भरीपूरी देखकर राजाधिराज कार्तवीर्यको महान् विस्मय हुआ। फिर उन बर्तनोंको देखकर वह कहने लगा।
राजाने कहा—सचिव! जरा पता तो लगाओ कि ये दुर्लभ पदार्थ सहसा कहाँसे आ गये? ये मेरे लिये असाध्य हैं और बहुतोंका तो मैंने नाम भी नहीं सुना है।
मन्त्री बोला—महाराज! मैंने मुनिके आश्रममें सब कुछ देख लिया है, सुनिये। वहाँ तो अग्निकुण्ड, समिधा, कुश, पुष्प, फल, कृष्णमृगचर्म, स्रुवा, स्रुक्, शिष्यसमुदाय और सूर्यके तेजके आधारपर पकनेवाले अन्न आदि ही हैं। वह सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे रहित है। वहाँ मैंने यह भी देखा है कि सभी लोग जटाधारी हैं और वृक्षोंकी छाल ही उनका वस्त्र है। परंतु आश्रमके एक भागमें मैंने एक मनोहर कपिला गौको देखा है। उसके अङ्ग बड़े सुन्दर हैं। चाँदनीकी-सी उसकी कान्ति है और लाल कमलके समान उसके नेत्र हैं। पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी कान्तिमती वह गौ वहाँ तेजसे उद्दीप्त हो रही थी। वही साक्षात् लक्ष्मीकी तरह सम्पूर्ण सम्पत्तियों और गुणोंकी आधार है।
| ३६२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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तदनन्तर मन्त्रीके कहनेपर वह दुर्बुद्धि राजा मुनिसे उस गौकी याचना करनेके लिये उद्यत हो गया; क्योंकि वह उस समय सर्वथा कालपाशसे बँधा हुआ था। भला, पुण्य अथवा उत्तम बुद्धि क्या कर सकती है; क्योंकि होनहार ही सब तरहसे बली होता है। इसी कारण पुण्यवान् एवं बुद्धिमान् होकर भी राजेन्द्र कार्तवीर्य दैववश ब्राह्मणसे याचना करना चाहता है। पुण्यसे भारतवर्षमें पुण्यरूप कर्म और पापसे भयदायक पापरूप कर्म प्रकट होता है। पुण्यकर्मसे स्वर्गका भोग करके मनुष्य पुण्यस्थलमें जन्म लेते हैं और पापकर्मसे नरकका भोग करनेके पश्चात् प्राणियोंकी निन्दित योनिमें उत्पत्ति होती है। नारद! कर्मके वर्तमान रहते प्राणियोंका उद्धार नहीं होता; इसलिये संतलोग निरन्तर कर्मका क्षय ही करते रहते हैं। वही विद्या, वही तप, वही ज्ञान, वही गुरु, वही भाई-बन्धु, वही माता, वही पिता और वही पुत्र सार्थक है, जो कर्मक्षयमें सहायता करता है*। प्राणियोंके कर्मोंका शुभ-अशुभ भोग दारुण रोगके समान है, जिसे भक्तरूपी वैद्य श्रीकृष्ण-भक्तिरूपी रसायनके द्वारा नष्ट करते हैं। जगत्का धारण-पोषण करनेवाली बुद्धिदायिनी माया प्रत्येक जन्ममें सेवा किये जानेपर संतुष्ट होकर भक्तको वह भक्ति प्रदान करती है। तदनन्तर मायासे विमुग्ध हुए राजा कार्तवीर्यने यत्नपूर्वक मुनिको अपने पास बुलाया और हर्षके साथ अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उनसे विनयपूर्ण वचन कहा।
**राजा बोला—**भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाले भक्तेश! आप तो कल्पतरुके समान हैं; अतः मुझ भक्तको कामनापूर्ण करने-वाली इस कामधेनुको भिक्षारूपमें प्रदान कीजिये। तपोधन! आप-जैसे दाताओंके लिये भारतमें कोई वस्तु अदेय नहीं है। मैंने सुना भी है कि पूर्वकालमें दधीचिने देवताओंको अपनी हड्डी दे डाली थी। तपोराशे! आप तो भारतवर्षमें लीलापूर्वक भ्रूभङ्गमात्रसे समूह-की-समूह कामधेनुओंकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं।
**मुनिने कहा—**राजन्! आश्चर्य है, तुम तो उलटी बात कह रहे हो। अरे मूर्ख एवं छली नरेश! मैं ब्राह्मण होकर क्षत्रियको दान कैसे दूँगो? इस कामधेनुको परमात्मा श्रीकृष्णने गोलोकमें यज्ञके अवसरपर ब्रह्माको दिया था, अतः प्राणोंसे बढ़कर प्यारी यह गौ देने योग्य नहीं है। भूमिपाल! फिर ब्रह्माने इसे अपने प्रिय पुत्र भृगुको दिया और भृगुने मुझे दिया। इस प्रकार यह कपिला मेरी पैतृक सम्पत्ति है। यह कामधेनु गोलोकमें उत्पन्न हुई है; अतः त्रिलोकीमें दुर्लभ है। तब भला मैं लीलापूर्वक ऐसी कपिलाकी सृष्टि करनेमें कैसे समर्थ हो सकता हूँ। न तो मैं हलवाहा हूँ और न तुम्हारी सहायतासे बुद्धिमान् हुआ हूँ। मैं अतिथिको छोड़कर शेष सबको क्षणमात्रमें भस्मसात् करनेकी शक्ति रखता हूँ। अतः अपने घर जाओ और स्त्री-पुत्रोंको देखो।
मुनिके इस वचनको सुनकर राजाको क्रोध आ गया। तब वह मुनिको नमस्कार करके सेनाके मध्यमें चला गया। उस समय भाग्यने उसे बाधित कर दिया था; अतः क्रोधके कारण उसके होंठ फड़क रहे थे। उसने सेनाके निकट जाकर बलपूर्वक गौको लानेके लिये नौकरोंको भेजा। इधर शोकके कारण, जिनका विवेक नष्ट हो गया था, वे मुनिवर जमदग्नि कपिलाके संनिकट जाकर रोने लगे और उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। तब भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये उद्यत रहनेवाली वह गौ, जो साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा थी, ब्राह्मणको रोते देखकर बोली।
* सा विद्या तत्तपो ज्ञानं स गुरुः स च बान्धवः। सा माता स पिता पुत्रस्तत् क्षयं कारयेत् तु यः॥
( २४। ३५)
गणपतिखण्ड ३६३
सुरभिने कहा—मुने! जो निरन्तर अपनी वस्तुओंका शासक, पालक और दाता है, चाहे वह इन्द्र हो अथवा हलवाहा, वही अपनी वस्तुका दान कर सकता है। तपोधन! यदि आप स्वेच्छानुसार मुझे राजाको देंगे, तभी मैं स्वेच्छासे अथवा आपकी आज्ञासे उसके साथ जाऊँगी। यदि आप नहीं देंगे तो मैं आपके घरसे नहीं जाऊँगी। आप मेरे द्वारा दी गयी सेनाके सहारे राजाको भगा दीजिये। सर्वज्ञ! मायासे विमुग्ध-चित्त होकर आप क्यों रो रहे हैं? अरे! ये संयोग-वियोग तो कालकृत हैं, आत्मकृत नहीं हैं। आप मेरे कौन हैं और मैं आपकी कौन हूँ—यह सम्बन्ध तो कालद्वारा नियोजित है। जबतक यह सम्बन्ध है तभीतक आप मेरे हैं। मन जबतक जिस वस्तुको केवल अपना मानता है और उसपर अपना अधिकार समझता है, तभीतक उसके वियोगसे दुःख होता है।
इतना कहकर कामधेनुने सूर्यके सदृश कान्तिमान् नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र और सेनाएँ उत्पन्न कीं। उस कपिलाके मुख आदि अङ्गोंसे करोड़ों-करोड़ों खड्गधारी, शूलधारी, धनुर्धारी, दण्ड, शक्ति और गदाधारी शूरवीर निकल आये। करोड़ों वीर राजकुमार और म्लेच्छ निकले। इस प्रकार कपिलाने मुनिको सेनाएँ देकर उन्हें निर्भय कर दिया और कहा—'ये सेनाएँ युद्ध करेंगी; आप वहाँ मत जाइये।' उस सामग्रीसे सम्पन्न होनेके कारण मुनिको महान् हर्ष प्राप्त हुआ। इधर राजाद्वारा भेजे गये भृत्यने लौटकर राजाको सारा वृत्तान्त बतलाया। कपिलाकी सेनाका वृत्तान्त और अपने पक्षकी पराजय सुनकर नृपश्रेष्ठ कार्तवीर्य भयभीत हो गया। उसके मनमें कातरता छा गयी। तब उसने दूत भेजकर अपने देशसे और सेनाएँ मँगवायीं।
(अध्याय २४)
जमदग्नि और कार्तवीर्यका युद्ध तथा ब्रह्माद्वारा उसका निवारण
नारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर कार्तवीर्यने दुःखी हृदयसे श्रीहरिका स्मरण किया और कुपित हो मुनिके पास दूत भेजकर कहलवाया—'मुनिश्रेष्ठ! युद्ध कीजिये अथवा मुझ अतिथि एवं भृत्यको मेरी वाञ्छित गौ दीजिये। भलीभाँति विचार करके जो उचित समझिये वही कीजिये।' दूतकी यह बात सुनकर मुनिवर जमदग्नि ठहाका मारकर हँस पड़े और जो हितकारक, सत्य, नीतिका सार-तत्त्व था, वह सब दूतसे कहने लगे।
मुनि बोले—दूत! राजाको आहाररहित देखकर मैं उसे अपने घर ले आया और यथोचितरूपसे शक्तिके अनुसार अनेक प्रकारके व्यञ्जन भोजन कराये। अब वह राजा मेरी प्राणोंसे प्यारी कपिलाको बलपूर्वक माँग रहा है। मैं उसे देनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ; अतः युद्ध-दान दूँगा—
यह निश्चित है। मुनिका वह वचन सुनकर दूत लौट गया और सभाके मध्यभागमें भयके कारण कवच धारण करके बैठे हुए नरेशसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया।
इधर मुनिने कपिलासे कहा—'इस समय मैं क्या करूँ; क्योंकि जैसे कर्णधारके बिना नौका अनियन्त्रित रहती है, वही दशा मेरे बिना इस सेनाकी हो रही है।' तब कपिलाने मुनिको अनेक प्रकारके शस्त्र, युद्धशास्त्रकी शिक्षा और उसके उपयोगमें आनेवाले संधान आदिका ज्ञान प्रदान करते हुए कहा—'विप्रवर! आपकी जय हो। आप युद्धमें निश्चय ही शत्रुको जीत लेंगे तथा यह भी ध्रुव है कि अमोघ दिव्यास्त्रके बिना आपकी मृत्यु नहीं होगी। आप ब्राह्मण हैं; अतः आपका दत्तात्रेयके शिष्य एवं अमोघ शक्तिधारी
३६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
राजाके साथ युद्ध होना युक्त नहीं है।' ब्रह्मन्! इतना कहकर मनस्विनी कपिला चुप हो गयी। तब मनस्वी मुनिने सेनाको सुसज्जित किया और उस सारी सेनाको साथ लेकर वे युद्धस्थलको प्रस्थित हुए। उधर राजा भी युद्धके लिये आ डटा। उसने मुनिवर जमदग्निको प्रणाम किया। फिर दोनों सेनाओंमें अत्यन्त दुष्कर युद्ध होने लगा। उस युद्धमें कपिलाकी सेनाने बलपूर्वक राजाकी सारी सेनाको जीत लिया और खेल-ही-खेलमें राजाके विचित्र रथको चूर-चूर कर दिया। फिर हँसते-हँसते राजाके कवच और धनुषको भी छिन्न-भिन्न कर डाला। इस प्रकार राजा कार्तवीर्य कपिलाकी सेनाको जीतनेमें असमर्थ हो गया। उन सेनाओंने शस्त्रोंकी वर्षासे राजाको हथियार रख देनेके लिये विवश कर दिया। तत्पश्चात् बाणों तथा शस्त्रोंकी वर्षासे राजा मूर्च्छित हो गया। उस समय राजाकी कुछ सेना तो मर चुकी थी और कुछ भाग खड़ी हुई। मुने! जब कृपासागर मुनिवर जमदग्निने देखा कि मेरा अतिथि बना हुआ राजराजेश्वर कार्तवीर्य मूर्च्छित हो गया है, तब कृपापरवश हो उन्होंने उस सेनाको लौटा लिया। फिर तो वह कृत्रिम सेना जाकर कपिलाके शरीरमें विलीन हो गयी। तदनन्तर कृपालु मुनिने शीघ्र ही राजाको अपनी चरण-धूलि देकर 'तुम्हारी जय हो' ऐसा शुभाशीर्वाद प्रदान किया और अपने कमण्डलुके जलके छींटे देकर उसे चैतन्य कराया। होशमें आनेपर वह राजा युद्धभूमिमें उठकर खड़ा हो गया और भक्तिपूर्वक हाथ जोड़े हुए उसने मुनिवरको सिर झुकाकर प्रणाम किया। तब मुनिने राजाको शुभाशीष देकर हृदयसे लगा लिया और पुनः उसे स्नान कराकर यत्नपूर्वक भोजन कराया; क्योंकि ब्राह्मणोंका हृदय सदा मक्खनके समान कोमल होता है; परंतु दूसरोंका हृदय सदा छुरेकी धारके सदृश तेज, असाध्य और दारुण होता है।
तत्पश्चात् मुनिवरने राजासे कहा—'नरेश! अब तुम अपने घर लौट जाओ।'
तब राजाने कहा—महाबाहो! युद्ध कीजिये अथवा मेरी अभीष्ट गौ मुझे समर्पित कीजिये।
नारायण कहते हैं—नारद! भूपालके वचनको सुनकर मुनिवरने श्रीहरिका स्मरण करके जो हितकर, सत्य और नीतिका साररूप था, ऐसा वचन कहना आरम्भ किया।
मुनिने कहा—महाभाग! अपने घर जाओ और सनातनधर्मकी रक्षा करो; क्योंकि धर्मके सुरक्षित रहनेपर सारी सम्पत्तियाँ सदा स्थिररूपसे निवास करती हैं—यह पूर्णतया निश्चित है। राजन्! तुम्हें भोजनसे वञ्चित देखकर मैं अपने घर लाया और विधिपूर्वक यथाशक्ति तुम्हारा आदर-सत्कार किया। इस समय तुम्हें मूर्च्छित देखकर मैंने चरणधूलि और शुभाशीर्वाद दिया, जिससे तुम्हारी मूर्च्छा दूर हुई; अतः तुम्हारा ऐसा कहना उचित नहीं है।
उस वचनको सुनकर राजाने मुनिवरको प्रणाम किया और एक-दूसरे रथपर सवार हो 'युद्ध कीजिये'—ऐसे ललकारा। तब मुनि भी