ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४१- ब्राह्मणद्वारा राजा उत्कल(सुयज्ञ)-को शाप
| २६६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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देवी मनसाने अपने पुत्रके साथ पिता कश्यपजीके आश्रममें दीर्घकालतक वास किया। भ्रातृवर्ग सदा उनका पूजन, अभिवादन और सम्मान करता था। ब्रह्मन्! तदनन्तर एक बार गोलोकसे सुरभी गौ आयी और उसने अपने दूधसे आदरणीया मनसाको स्नान कराकर सादर उनका पूजन किया। साथ ही, उसने सर्वदुर्लभ गोप्य ज्ञानका भी उपदेश दिया। उस समय सुरभी देवताओंसे पूजित हो स्वर्गलोकमें चली गयी।
यह स्तोत्र पुण्यबीज कहलाता है। जो पुरुष मनसादेवीकी पूजा करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशके लिये भी नागसे भय नहीं हो सकता। यदि यह स्तोत्र सिद्ध हो जाय तो पुरुषके लिये विष भी अमृत-तुल्य हो जाता है। इस स्तोत्रका पाँच लाख जप करनेपर यह सिद्ध हो जाता है। फिर मन्त्रसिद्ध पुरुष सर्पशायी तथा सर्पवाहन हो सकता है अर्थात् उसपर सर्पका कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। (अध्याय ४४—४६)
आदिगौ सुरभीदेवीका उपाख्यान
नारदजीने पूछा— ब्रह्मन्! वह सुरभीदेवी कौन थी, जो गोलोकसे आयी थी? मैं उसके जन्म और चरित्र सुनना चाहता हूँ।
भगवान् नारायण बोले— नारद! देवी सुरभी गोलोकमें प्रकट हुई। वह गौओंकी अधिष्ठात्री देवी, गौओंकी आदि, गौओंकी जननी तथा सम्पूर्ण गौओंमें प्रमुख है। मुने! मैं सबसे पहली सृष्टिका प्रसङ्ग सुना रहा हूँ, जिसके अनुसार पूर्वकालमें वृन्दावनमें उस सुरभीका ही जन्म हुआ था।
एक समयकी बात है। गोपाङ्गनाओंसे घिरे हुए राधापति भगवान् श्रीकृष्ण कौतूहलवश श्रीराधाके साथ पुण्य-वृन्दावनमें गये। वहाँ वे विहार करने लगे। उस समय कौतुकवश उन
अहं करोमि त्वां पूज्यां प्रीतिश्च वर्धते मम। नित्यं यद्यपि त्वं पूज्या भवेऽत्र जगदम्बिके॥
तथापि तव पूजां च वर्धयामि च सर्वतः। ये त्वामाषाढसंक्रान्त्यां पूजयिष्यन्ति भक्तितः॥
पञ्चम्यां मनसाख्यायामिषान्तं वा दिने दिने। पुत्रपौत्रादयस्तेषां वर्धन्ते च धनानि वै॥
यशस्विनः कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विताः। ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जनाः।
लक्ष्मीहीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा। त्वं स्वर्गलक्ष्मीः स्वर्गे च वैकुण्ठे कमलाकला॥
नारायणांशो भगवान् जरत्कारुर्मुनीश्वरः। तपसा तेजसा त्वां च मनसा ससृजे पिता॥
अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिधा। मनसा देवितुं शक्ता स्वात्मना सिद्धयोगिनी॥
तेन त्वं मनसादेवी पूजिता वन्दिता भवे। ये भक्त्या मनसां देवाः पूजयन्त्यनिशं भृशम्॥
तेन त्वां मनसादेवीं प्रवदन्ति मनीषिणः। सत्यस्वरूपा देवी त्वं शश्वत्सत्त्वनिषेवया॥
यो हि यद् भावयेन्नित्यं शतं प्राप्नोति तत्समम्। इन्द्रश्च मनसां स्तुत्वा गृहीत्वा भगिनीं च ताम्॥
प्रजगाम स्वभवनं भूषावासपरिच्छदाम्। (प्रकृतिखण्ड ४६। १२८—१४१ १/२)
प्रकृतिखण्ड २६७
स्वेच्छामय प्रभुके मनमें सहसा दूध पीनेकी इच्छा जाग उठी। तब भगवान्ने अपने वामपार्श्वसे लीलापूर्वक सुरभी गौको प्रकट किया। उसके साथ बछड़ा भी था। वह दुग्धवती थी। उस सवत्सा गौको सामने देख सुदामाने एक रत्नमय पात्रमें उसका दूध दुहा। वह दूध सुधासे भी अधिक मधुर तथा जन्म और मृत्युको दूर करनेवाला था। स्वयं गोपीपति भगवान् श्रीकृष्णने उस गरम-गरम स्वादिष्ट दूधको पीया। फिर हाथसे छूटकर वह पात्र गिर पड़ा और दूध धरतीपर फैल गया। उस दूधसे वहाँ एक सरोवर बन गया। उसकी लंबाई और चौड़ाई सब ओरसे सौ-सौ योजन थी। गोलोकमें वह सरोवर ‘क्षीरसरोवर’ नामसे प्रसिद्ध हुआ है। गोपिकाओं और श्रीराधाके लिये वह क्रीड़ा-सरोवर बन गया। भगवान्की इच्छासे उस क्रीड़ावापीके घाट तत्काल अमूल्य दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित हो गये। उसी समय अकस्मात् असंख्य कामधेनु प्रकट हो गयीं। जितनी वे गौएँ थीं, उतने ही बछड़े भी उस सुरभी गौके रोमकूपसे निकल आये। फिर उन गौओंके बहुत-से पुत्र-पौत्र भी हुए, जिनकी संख्या नहीं की जा सकती। यों उस सुरभी देवीसे गौओंकी सृष्टि कही गयी, जिससे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है।
मुने! पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णने देवी सुरभीकी पूजा की थी। तत्पश्चात् त्रिलोकीमें उस देवीकी दुर्लभ पूजाका प्रचार हो गया। दीपावलीके दूसरे दिन भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे देवी सुरभीकी पूजा सम्पन्न हुई थी। यह प्रसङ्ग मैं अपने पिता धर्मके मुखसे सुन चुका हूँ। महाभाग! देवी सुरभीका ध्यान, स्तोत्र, मूलमन्त्र तथा पूजाकी विधिका वेदोक्त क्रम मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। ‘ॐ सुरभ्यै नमः’ सुरभीदेवीका यह षडक्षर-मन्त्र है। एक लाख जप करनेपर मन्त्र सिद्ध होकर भक्तोंके लिये कल्पवृक्षका काम करता है। ध्यान और पूजन यजुर्वेदमें सम्यक् प्रकारसे वर्णित हैं। जो ऋद्धि, वृद्धि, मुक्ति और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली हैं; जो लक्ष्मीस्वरूपा, श्रीराधाकी सहचरी, गौओंकी अधिष्ठात्री, गौओंकी आदिजननी, पवित्ररूपा, पूजनीया, भक्तोंके अखिल मनोरथ सिद्ध करनेवाली हैं तथा जिनसे यह सारा विश्व पावन बना है, उन भगवती सुरभीकी मैं उपासना करता हूँ। कलश, गायके मस्तक, गौओंके बाँधनेके खंभे, शालग्रामकी मूर्ति, जल अथवा अग्निमें देवी सुरभीकी भावना करके द्विज इनकी पूजा करें। जो दीपमालिकाके दूसरे दिन पूर्वाह्नकालमें भक्तिपूर्वक भगवती सुरभीकी पूजा करेगा, वह जगत्में पूज्य हो जायगा।
एक बार वाराहकल्पमें देवी सुरभीने दूध देना बंद कर दिया। उस समय त्रिलोकीमें दूधका अभाव हो गया था। तब देवता अत्यन्त चिन्तित होकर ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रने देवी सुरभीकी स्तुति आरम्भ की।
इन्द्रने कहा—देवी एवं महादेवी सुरभीको बार-बार नमस्कार है। जगदम्बिके! तुम गौओंकी बीजस्वरूपा हो; तुम्हें नमस्कार है। तुम श्रीराधाको प्रिय हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम लक्ष्मीकी अंशभूता हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है। श्रीकृष्ण-प्रियाको नमस्कार है। गौओंकी माताको बार-बार नमस्कार है। जो सबके लिये कल्पवृक्षस्वरूपा तथा श्री, धन और वृद्धि प्रदान करनेवाली हैं, उन भगवती सुरभीको बार-बार नमस्कार है। शुभदा, प्रसन्ना और गोप्रदायिनी सुरभी देवीको बार-बार नमस्कार है। यश और कीर्ति प्रदान करनेवाली धर्मज्ञा देवीको बार-बार नमस्कार है।*
* पुरन्दर उवाच —
नमो देव्यै महादेव्यै सुरभ्यै च नमो नमः। गवां बीजस्वरूपायै नमस्ते जगदम्बिके॥
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इस प्रकार स्तुति सुनते ही सनातनी जगज्जननी भगवती सुरभी संतुष्ट और प्रसन्न हो उस ब्रह्मलोकमें ही प्रकट हो गयीं। देवराज इन्द्रको परम दुर्लभ मनोवाञ्छित वर देकर वे पुनः गोलोकको चली गयीं। देवता भी अपने-अपने स्थानोंको चले गये। नारद! फिर तो सारा विश्व सहसा दूधसे परिपूर्ण हो गया। दूधसे घृत बना और घृतसे यज्ञ सम्पन्न होने लगे तथा उनसे देवता संतुष्ट हुए।
जो मानव इस महान् पवित्र स्तोत्रका भक्तिपूर्वक पाठ करेगा, वह गोधनसे सम्पन्न, प्रचुर सम्पत्तिवाला, परम यशस्वी और पुत्रवान् हो जायगा। उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने तथा अखिल यज्ञोंमें दीक्षित होनेका फल सुलभ होगा। ऐसा पुरुष इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके धाममें चला जाता है। चिरकालतक वहाँ रहकर भगवान्की सेवा करता रहता है। नारद! उसे पुनः इस संसारमें नहीं आना पड़ता। (अध्याय ४७)
नारद-नारायण-संवादमें पार्वतीजीके पूछनेपर महादेवजीके द्वारा श्रीराधाके प्रादुर्भाव एवं महत्त्व आदिका वर्णन
नारदजी बोले— भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले महाभाग मुनिवर नारायण! आप नारायणके ही अंश हैं। अतः भगवन्! आप नारायणसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कहिये। सुरभीका उपाख्यान अत्यन्त मनोहर है, उसे मैंने सुन लिया। वह समस्त पुराणोंमें गोपनीय कहा गया है। पुराणवेत्ताओंने उसकी बड़ी प्रशंसा की है। अब मैं श्रीराधाका परम उत्तम आख्यान सुनना चाहता हूँ। उनके प्रादुर्भावके प्रसङ्ग तथा उनके ध्यान, स्तोत्र और उत्तम कवचको भी सुननेकी मेरी प्रबल इच्छा है; अतः आप इन सबका वर्णन कीजिये।
मुनिवर श्रीनारायणने कहा— नारद! पूर्वकालकी बात है, कैलास-शिखरपर सनातन भगवान् शंकर, जो सर्वस्वरूप, सबसे श्रेष्ठ, सिद्धोंके स्वामी तथा सिद्धिदाता हैं, बैठे हुए थे। मुनिलोग भी उनकी स्तुति करके उनके पास ही बैठे थे। भगवान् शिवका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ था। उनके अधरोंपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे कुमारको परमात्मा श्रीकृष्णके रासोत्सवका सरस आख्यान सुना रहे थे। उस प्रसङ्गके श्रवणमें कुमारकी बड़ी रुचि थी। रासमण्डलका वर्णन चल रहा था। जब इस
नमो राधाप्रियायै च पद्मांशायै नमो नमः। नमः कृष्णप्रियायै च गवां मात्रे नमो नमः॥
कल्पवृक्षस्वरूपायै सर्वेषां सततं परम्। श्रीदायै धनदायै च वृद्धिदायै नमो नमः॥
शुभदायै प्रसन्नायै गोप्रदायै नमो नमः। यशोदायै कीर्तिदायै धर्मज्ञायै नमो नमः॥
(प्रकृतिखण्ड ४७। २४-२७)