ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३५- नारद-नारायण-संवादमें पार्वतीजीके पूछनेपर महादेवजीके द्वारा श्रीराधाके प्रादुर्भाव एवं महत्त्व आदिका वर्णन
| २६० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
अक्षर हैं। इसका वर्णन वेदमें है। यह भक्तोंके मनोरथको पूर्ण करनेवाला है। मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं मनसादेव्यै स्वाहा।’ पाँच लाख मन्त्र जप करनेपर यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जिसे इस मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त हो गयी, वह धरातलपर सिद्ध है। उसके लिये विष भी अमृतके समान हो जाता है। उस पुरुषकी धन्वन्तरिसे तुलना की जा सकती है।
ब्रह्मन्! जो पुरुष आषाढ़की संक्रान्तिके दिन ‘गुडा’ (कपास या सेंहुड़) नामक वृक्षकी शाखापर यत्नपूर्वक इन भगवती मनसाका आवाहन करके भक्तिभावके साथ पूजा करता है तथा मनसापञ्चमीको उन देवीके लिये बलि अर्पण करता है, वह अवश्य ही धनवान्, पुत्रवान् और कीर्तिमान् होता है। महाभाग! पूजाका विधान कह चुका। अब धर्मदेवके मुखसे जैसा कुछ सुना है, वह उपाख्यान कहता हूँ, सुनो।
प्राचीन समयकी बात है। भूमण्डलके सभी मानव नागोंके भयसे आक्रान्त हो गये थे। नाग जिन्हें काट खाते, वे जीवित नहीं बचते थे। यह देख-सुनकर कश्यपजी भी भयभीत हो गये; अतः ब्रह्माजीके अनुरोधसे उन्होंने सर्पभयनिवारक मन्त्रोंकी रचना की। ब्रह्माजीके उपदेशसे वेदबीजके अनुसार मन्त्रोंकी रचना हुई। साथ ही ब्रह्माजीने अपने मनसे उत्पन्न करके इन देवीको इस मन्त्रकी अधिष्ठात्री देवी बना दिया। तपस्या तथा मनसे प्रकट होनेके कारण ये देवी ‘मनसा’ नामसे विख्यात हुईं। कुमारी अवस्थामें ही ये भगवान् शंकरके धाममें चली गयीं। कैलासमें पहुँचकर इन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान् चन्द्रशेखरकी पूजा करके उनकी स्तुति की। मुनिकुमारी मनसाने देवताओंके वर्षसे हजार वर्षोंतक भगवान् शंकरकी उपासना की। तदनन्तर भगवान् आशुतोष इनपर प्रसन्न हो गये। मुने! भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर इन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। सामवेदका अध्ययन कराया और भगवान् श्रीकृष्णके कल्पवृक्षरूप अष्टाक्षर-मन्त्रका उपदेश किया।
मन्त्रका रूप ऐसा है—लक्ष्मीबीज, मायाबीज और कामबीजका पूर्वमें प्रयोग करके कृष्ण शब्दके अन्तमें ‘ङे’ विभक्ति लगाकर ‘नमः’ पद जोड़ दिया जाता है (‘श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नमः’)। भगवान् शंकरकी कृपासे जब मुनिकुमारी मनसाको उक्त मन्त्रके साथ त्रैलोक्यमङ्गल नामक कवच, पूजनका क्रम, सर्वमान्य स्तवन, भुवनपावन ध्यान, सर्वसम्मत वेदोक्त पुरश्चरणका नियम तथा मृत्युञ्जय-ज्ञान प्राप्त हो गया, तब वह साध्वी उनसे आज्ञा ले पुष्करक्षेत्रमें तपस्या करनेके लिये चली गयी। वहाँ जाकर उसने परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी तीन युगोंतक उपासना की। इसके बाद उसे तपस्यामें सिद्धि प्राप्त हुई। भगवान् श्रीकृष्णने सामने प्रकट होकर उसे दर्शन दिये। उस समय कृपानिधि श्रीकृष्णने उस कृशाङ्गी बालापर अपनी कृपाकी दृष्टि डाली। उन्होंने उसका दूसरोंसे पूजन कराया और स्वयं भी उसकी पूजा की; साथ ही वर दिया कि ‘देवि! तुम जगत्में पूजा प्राप्त करो।’ इस प्रकार कल्याणी मनसाको वर प्रदान करके भगवान् अन्तर्धान हो गये।
इस तरह इस मनसादेवीकी सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्णने पूजा की। तत्पश्चात् शंकर, कश्यप, देवता, मुनि, मनु, नाग एवं मानव आदिसे त्रिलोकीमें श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाली यह देवी सुपूजित हुई। फिर कश्यपजीने जरत्कारु मुनिके साथ उसका विवाह कर दिया। वे मुनि महान् योगी थे। विवाह करनेके पश्चात् तपस्या करनेमें संलग्न हो गये। वे एक दिन पुष्करक्षेत्रमें उस वटवृक्षके नीचे देवी जरत्कारुकी जाँघपर लेट गये और उन्हें नींद आ गयी। इतनेमें सायंकाल होनेको आया। सूर्यनारायण अस्ताचलको जाने लगे। देवी मनसा परम साध्वी एवं पतिव्रता थी। उसने मनमें विचार किया—‘द्विजोंके लिये
प्रकृतिखण्ड
२६१
नित्य सायंकाल संध्या करनेका विधान है। यदि
मेरे पति सोये ही रह जाते हैं तो इन्हें पाप लग
जायगा; क्योंकि ऐसा नियम है कि जो प्रातः
और सायंकालकी संध्या ठीक समयपर नहीं
करता, वह अपवित्र होकर पापका भागी होता
है।' यों विचार करके उस परम सुन्दरी मनसाने
पतिदेवको जगा दिया। मुने! मुनिवर जरत्कारु
जगनेपर क्रोधसे भर गये।
मुनिने कहा- साध्वि ! मैं सुखपूर्वक सो
रहा था; तुमने मेरी निद्रा क्यों भङ्ग कर दी ? जो
स्त्री अपने स्वामीका अपकार करती है, उसके
व्रत, तपस्या, उपवास और दान आदि सभी
सत्कर्म व्यर्थ हो जाते हैं। स्वामीका अप्रिय
करनेवाली स्त्री किसी भी सत्कर्मका फल नहीं
प्राप्त कर सकती। जिसने अपने पतिकी पूजा की,
उससे मानो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण सुपूजित हो
गये। पतिव्रताओंके व्रतके लिये स्वयं भगवान्
श्रीहरि पतिके रूपमें विराजमान रहते हैं। सम्पूर्ण
दान, यज्ञ, तीर्थसेवन, व्रत, तप, उपवास, धर्म,
सत्य और देवपूजन - ये सब-के-सब स्वामीकी
सेवाकी सोलहवीं कलाकी भी तुलना नहीं कर
सकते। जो स्त्री भारतवर्ष-जैसे पुण्यक्षेत्रमें पतिकी
सेवा करती है, वह अपने स्वामीके साथ
वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिके चरणोंमें शरण पाती है।
साध्वि ! जो असत्कुलमें उत्पन्न स्त्री अपने स्वामीके
प्रतिकूल आचरण करती तथा उसके प्रति कटु वचन
बोलती है, वह कुम्भीपाक नरकमें सूर्य और
चन्द्रमाकी आयुपर्यन्त वास करती है। तदनन्तर
चाण्डालके घरमें उसका जन्म होता है और पति
एवं पुत्रके सुखसे वह वञ्चित रहती है। यों
कहकर वे चुप हो गये। तब साध्वी मनसा भयसे
काँपने लगी। उसने पतिदेवसे कहा।
साध्वी मनसाने कहा- उत्तम व्रतका पालन
करनेवाले महाभाग ! आपकी संध्योपासनाका लोप
न हो जाय, इसी भयसे मैंने आपको जगा दिया
है- यह मेरा दोष अवश्य है।
इस प्रकार कहकर देवी मनसा भक्तिपूर्वक
अपने स्वामी जरत्कारु मुनिके चरण-कमलोंमें
पड़ गयी। उस समय रोषके आवेशमें आकर
मुनि सूर्यको भी शाप देनेके लिये उद्यत हो गये।
नारद ! उन्हें देखकर स्वयं भगवान् सूर्य संध्यादेवीको
साथ लेकर वहाँ आये और भयभीत होकर
विनयपूर्वक मुनिवर जरत्कारुसे सम्यक् प्रकारसे
यथार्थ बात कहने लगे।
भगवान् सूर्यने कहा - भगवन् ! आप परम
शक्तिशाली ब्राह्मण हैं। संध्याका समय देखकर
धर्मलोप हो जानेके भयसे इस साध्वीने आपको
जगा दिया। मुने ! विप्रवर! मैं आपकी शरणमें
उपस्थित हूँ। मुझे शाप देना आपके लिये उचित
नहीं है। ब्राह्मणोंका हृदय सदा नवनीतके समान
कोमल होता है। ब्राह्मण चाहें तो पुनः सृष्टि कर
सकते हैं; इनसे बढ़कर तेजस्वी दूसरा कोई है ही
नहीं। ब्रह्मज्योति ब्राह्मणके द्वारा निरन्तर सनातन
भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना होती है।
सूर्यके उपर्युक्त वचन सुनकर विप्रवर जरत्कारु
प्रसन्न हो गये। उनसे आशीर्वाद लेकर सूर्य अपने
स्थानको चले गये। प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये उन
ब्राह्मणदेवताने देवी मनसाका त्याग कर दिया।
उस समय देवीके शोककी सीमा नहीं रही।
दुःखके कारण उनका हृदय क्षुब्ध हो उठा था।
वे रो रही थीं। उस विपत्तिके अवसरपर भयसे
व्याकुल होकर उस देवीने अपने गुरुदेव शंकर,
इष्टदेवता ब्रह्मा और श्रीहरि तथा जन्मदाता
कश्यपजीका स्मरण किया। देवी मनसाके चिन्तन
करनेपर तुरंत गोपीश भगवान् श्रीकृष्ण, शंकर,
ब्रह्मा और कश्यप मुनि वहाँ आ गये। प्रकृतिसे
परे निर्गुण परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण मुनिवर
जरत्कारुके अभीष्ट देवता थे। उनके दर्शन पाकर
परम भक्तिके साथ मुनि बार-बार प्रणाम करके
उनकी स्तुति करने लगे। फिर भगवान् शंकर,
| २६२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
ब्रह्मा और कश्यपको भी नमस्कार किया। यों पूछा—‘महाभाग देवताओ! आपलोगोंका यहाँ कैसे पधारना हुआ है?'
मुनिवर जरत्कारुकी बात सुनकर ब्रह्माजीने समयोचित बातें कहीं। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलको प्रणाम करके उन्होंने मुनिको उत्तर दिया—‘मुने! तुम्हारी यह धर्मपत्नी मनसा परम साध्वी एवं धर्ममें आस्था रखनेवाली है। यदि तुम इसे त्यागना चाहते हो तो पहले इसको किसी संतानकी जननी बना दो, जिससे यह अपने धर्मका पालन कर सके। संतान हो जानेके पश्चात् स्त्रीको त्यागा जा सकता है। जो पुरुष पुत्रोत्पत्ति कराये बिना ही प्रिय पत्नीका त्याग कर देता है, उसका पुण्य चलनीसे बह जानेवाले जलकी भाँति साथ छोड़ देता है।'
नारद! ब्रह्माजीकी बात सुनकर मुनिवर जरत्कारुने मन्त्र पढ़कर योगबलका सहारा ले देवी मनसाकी नाभिका स्पर्श कर दिया और उससे कहा।
**मुनिवर जरत्कारुने कहा—**मनसे! इस गर्भसे तुम्हें पुत्र होगा। वह पुत्र जितेन्द्रिय पुरुषोंमें श्रेष्ठ, धार्मिक, ब्रह्मज्ञानी, तेजस्वी, तपस्वी, यशस्वी, गुणी, वेदवेत्ताओं, ज्ञानियों और योगियोंमें प्रमुख, विष्णुभक्त तथा अपने कुलका उद्धारक होगा। ऐसे सुयोग्य पुत्रके उत्पन्न होनेमात्रसे पितर आनन्दमें भरकर नाचने लगते हैं। जो पातिव्रतधर्मका पालन करती है, प्रिय बोलती है और सुशीला है, वह 'प्रिया' है। जो धर्ममें श्रद्धा रखती है, पुत्र उत्पन्न करती है तथा कुलकी रक्षा करती है, उसीको 'कुलीन स्त्री' कहते हैं। जो भगवान् श्रीहरिके प्रति भक्ति उत्पन्न करता एवं अभीष्ट सुख देनेमें तत्पर रहता है, वही 'बन्धु' है। यदि भगवान् श्रीहरिके मार्गका प्रदर्शक हो तो उस बन्धुको पिता भी कह सकते हैं। वही 'गर्भधारिणी स्त्री' कहलाती है, जो ज्ञानोपदेशद्वारा संतानको गर्भवाससे मुक्त कर दे। 'दयारूपा भगिनी' उसको कहते हैं, जिसकी कृपासे प्राणी यमराजके भयसे मुक्त हो जाय। भगवान् विष्णुके मन्त्रको प्रदान करनेवाला गुरु वही है, जो भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न करा दे। ज्ञानदाता गुरु उसीको कहते हैं, जिसकी कृपासे भगवान् श्रीकृष्णके चिन्तनकी योग्यता प्राप्त हो जाय; क्योंकि ब्रह्मपर्यन्त चराचर सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता और नष्ट हो जाता है।
वेद अथवा यज्ञसे जो कुछ सारतत्त्व निकलता है, वह यही है कि भगवान् श्रीहरिका सेवन किया जाय। यही तत्त्वोंका भी तत्त्व है। भगवान् श्रीहरिकी उपासनाके अतिरिक्त सब कुछ केवल विडम्बनामात्र है। मैंने तुम्हें यथार्थ ज्ञानोपदेश कर दिया; क्योंकि स्वामी भी वही कहलाता है, जो ज्ञान प्रदान कर दे। ज्ञानके द्वारा बन्धनसे मुक्त करनेवाला 'स्वामी' माना जाता है और वही यदि बन्धनमें डालता है तो 'शत्रु' है। जो गुरु भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न करनेवाला ज्ञान नहीं देता, उसे 'शिष्यघाती' कहते हैं; क्योंकि वह शिष्यको बन्धनमुक्त नहीं कर सका। जो जननीके गर्भमें रहनेके क्लेशसे तथा यमयातनासे मुक्त नहीं कर सकता, उसे गुरु, तात और बान्धव कैसे कहा जाय? भगवान्