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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३५- परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्राक्षका वध, कार्तवीर्य-परशुराम-युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवनदान, कार्तवीर्य-परशुराम-संवाद, आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना

गणपतिखण्ड ३९३

मत्स्यराजके वधके पश्चात् अनेकों राजाओंका आना और परशुरामद्वारा मारा जाना, पुनः राजा सुचन्द्र और परशुरामका युद्ध, परशुरामद्वारा कालीस्तवन, ब्रह्माका आकर परशुरामको युक्ति बताना, परशुरामका राजा सुचन्द्रसे मन्त्र और कवच माँगकर उसका वध करना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! युद्धमें मत्स्यराजके गिर जानेपर महाराज कार्तवीर्यके भेजे हुए बृहद्वल, सोमदत्त, विदर्भ, मिथिलेश्वर, निषधराज, मगधाधिपति एवं कान्यकुब्ज, सौराष्ट्र, राढीय, वारेन्द्र, सौम्य वंगीय, महाराष्ट्र, गुर्जरजातीय और कलिंग आदिके सैकड़ों-सैकड़ों राजा बारह अक्षौहिणी सेनाके साथ आये; परंतु परशुरामजीने सबको रणभूमिमें सुला दिया। यह देखकर एक लाख नरपतियोंके साथ बारह अक्षौहिणी सेना लेकर राजा सुचन्द्र रणस्थलमें आये। सुचन्द्रके साथ भयानक युद्ध हुआ, पर वे परास्त न हो सके। तब परशुरामने देखा कि मुण्डमाला धारण किये हुए विकटानना भयंकरी जगज्जननी भद्रकाली उनकी रक्षा कर रही हैं। यह देखकर परशुरामने शस्त्रास्त्रका त्याग करके महामायाकी स्तुति आरम्भ की।

परशुराम बोले—आप शंकरजीकी प्रियतमा पत्नी हैं, आपको नमस्कार है। सारस्वरूपा आपको बारंबार प्रणाम है। दुर्गतिनाशिनीको मेरा अभिवादन है। मायारूपा आपको मैं बारंबार सिर झुकाता हूँ। जगद्धात्रीको नमस्कार-नमस्कार। जगत्कर्त्रीको पुनः-पुनः प्रणाम। जगज्जननीको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। कारणरूपा आपको बारंबार अभिवादन है। सृष्टिका संहार करनेवाली जगन्माता! प्रसन्न होइये। मैं आपके चरणोंकी शरण ग्रहण करता हूँ, मेरी प्रतिज्ञा सफल कीजिये। मेरे प्रति आपके विमुख हो जानेपर कौन मेरी रक्षा कर सकता है? भक्तवत्सले! शुभे! आप मुझ भक्तपर कृपा कीजिये। सुमुखि! पहले शिवलोकमें आपलोगोंने मुझे जो वरदान दिया था, उस वरको आपको सफल करना चाहिये।

परशुरामद्वारा किये गये इस स्तवनको सुनकर

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं रुद्राय स्वाहा नाभिं सदाऽवतु। ॐ ह्रीं ऐं श्रीं ईश्वराय स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा भ्रूश्च सदाऽवतु। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईशानाय स्वाहा पार्श्वं सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं ईश्वराय स्वाहा उदरं पातु मे सदा। ॐ श्रीं क्लीं मृत्युञ्जयाय स्वाहा बाहू सदाऽवतु॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईश्वराय स्वाहा पातु करौ मम। ॐ महेश्वराय रुद्राय नितम्बं पातु मे सदा॥
ॐ ह्रीं श्रीं भूतनाथाय स्वाहा पादौ सदाऽवतु। ॐ सर्वेश्वराय सर्व्वाय स्वाहा सर्वं सदाऽवतु॥
प्राच्यां मां पातु भूतेश आग्नेय्यां पातु शंकरः। दक्षिणे पातु मां रुद्रो नैर्ऋत्यां स्थाणुरेव च॥
पश्चिमे खण्डपरशुर्वायव्यां चन्द्रशेखरः। उत्तरे गिरिशः पातु ऐशान्यामीश्वरः स्वयम्॥
ऊर्ध्वे मृडः सदा पातु अधो मृत्युञ्जयः स्वयम्। जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे सदा॥
पिनाकी पातु मां प्रीत्या भक्तं च भक्तवत्सलः॥
इति ते कथितं वत्स कवचं परमाद्भुतम्। दशलक्षजपेनैव सिद्धिर्भवति निश्चितम्॥
यदि स्यात् सिद्धकवचो रुद्रतुल्यो भवेद् ध्रुवम्। तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित्॥
कवचं काण्वशाखोक्तमतिगोप्यं सुदुर्लभम्। अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च॥
सर्वाणि कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्। कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः॥
सर्वज्ञः सर्वसिद्धीशो मनोयायी भवेद् ध्रुवम्। इदं कवचमज्ञात्वा भजेद् यः शङ्करं प्रभुम्॥
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः॥

(३५।११४-११६, ११९-१३९)

३९४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अम्बिकाका मन प्रसन्न हो गया और 'भय मत करो' यों कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गयीं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस परशुरामकृत स्तोत्रका पाठ करता है, वह अनायास ही महान् भयसे छूट जाता है। वह त्रिलोकीमें पूजित, त्रैलोक्यविजयी, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुपक्षका विमर्दन करनेवाला हो जाता है*। इसी बीच ब्रह्माजी धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भृगुवंशी परशुरामके पास आकर उनसे उस रहस्यका वर्णन करने लगे।

ब्रह्माजी बोले—महाभाग राम! अपनी प्रतिज्ञा सफल करनेके लिये पहले तुम सुचन्द्रकी विजयके हेतुभूत रहस्यका मुझसे श्रवण करो। पूर्वकालमें दुर्वासाने सुचन्द्रको दशाक्षरी महाविद्या तथा भद्रकालीका परम दुर्लभ कवच प्रदान किया था। भद्रकालीका कवच देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। वह कवच सम्पूर्ण शत्रुओंका विनाश करनेवाला, अत्यन्त पूजनीय, प्रशंसनीय और त्रिलोकीपर विजय पानेका कारण है। वह कवच जिसके गलेमें वर्तमान है, उसे जीतनेके लिये भूतलपर तुम कैसे समर्थ हो सकते हो? अतः भार्गव! तुम भिक्षाके लिये जाओ और राजासे प्रार्थना करो। सूर्यवंशमें उत्पन्न हुआ वह राजा परम धर्मात्मा एवं दानी है। माँगनेपर वह निश्चय ही प्राण, कवच, मन्त्र आदि सब कुछ दे डालेगा।

मुने! तब परशुराम संन्यासीका वेष धारण करके राजाके पास गये और उससे उन्होंने मन्त्र तथा परम अद्भुत कवचकी याचना की। तब राजाने अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें मन्त्र और कवच दे दिया। तदनन्तर परशुरामने शंकरजीके त्रिशूलसे उस राजाका काम तमाम कर दिया।

(अध्याय ३६)


दशाक्षरी महाविद्या तथा काली-कवचका वर्णन

नारदजीने कहा—सर्वज्ञ नाथ! अब मैं आपके मुखसे भद्रकाली-कवच तथा उस दशाक्षरी महाविद्याको सुनना चाहता हूँ।

श्रीनारायण बोले—नारद! मैं दशाक्षरी महाविद्या तथा तीनों लोकोंमें दुर्लभ उस गोपनीय कवचका वर्णन करता हूँ, सुनो। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा' यही दशाक्षरी महाविद्या है। इसे पुष्करतीर्थमें सूर्य-ग्रहणके अवसरपर दुर्वासाने राजाको दिया था। उस समय राजाने दस लाख जप करके मन्त्र सिद्ध किया और


* परशुराम उवाच—
नमः शङ्करकान्तायै सारायै ते नमो नमः। नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नमः॥
नमो नमो जगद्धात्र्यै जगत्कर्त्र्यै नमो नमः। नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः॥
प्रसीद जगतां मातः सृष्टिसंहारकारिणि। त्वत्पादे शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु॥
त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वरः। त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले॥
युष्माभिः शिवलोके च मह्यं दत्तो वरः पुरा। तं वरं सफलं कर्तुं त्वमर्हसि वरानने॥
जामदग्न्यस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाभवदम्बिका। मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत॥
एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च यः पठेत्। महाभयात् समुत्तीर्णः स भवेदवलीलया॥
स पूजितश्च त्रैलोक्ये त्रैलोक्यविजयी भवेत्। ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दकः॥
(गणपतिखण्ड ३६। २९—३६)

गणपतिखण्ड ३९५

इस उत्तम कवचके पाँच लाख जपसे ही वे सिद्धकवच हो गये। तत्पश्चात् वे अयोध्यामें लौट आये और इसी कवचकी कृपासे उन्होंने सारी पृथ्वीको जीत लिया।

नारदजीने कहा—प्रभो! जो तीनों लोकोंमें दुर्लभ है, उस दशाक्षरी महाविद्याको तो मैंने सुन लिया। अब मैं कवच सुनना चाहता हूँ, वह मुझसे वर्णन कीजिये।

श्रीनारायण बोले—विप्रेन्द्र! पूर्वकालमें त्रिपुर-वधके भयंकर अवसरपर शिवकी विजयके लिये नारायणने कृपा करके शिवको जो परम अद्भुत कवच प्रदान किया था, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। मुने! वह कवच अत्यन्त गोपनीयोसे भी गोपनीय, तत्त्वस्वरूप तथा सम्पूर्ण मन्त्रसमुदायका मूर्तिमान् स्वरूप है। उसीको पूर्वकालमें शिवजीने दुर्वासाको दिया था और दुर्वासाने महामनस्वी राजा सुचन्द्रको प्रदान किया था।

‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा’ मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘क्लीं’ कपालकी तथा ‘ह्रीं ह्रीं ह्रीं’ नेत्रोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं त्रिलोचने स्वाहा’ सदा मेरी नासिकाकी रक्षा करे। ‘क्रीं कालिके रक्ष रक्ष स्वाहा’ सदा दाँतोंकी रक्षा करे। ‘ह्रीं भद्रकालिके स्वाहा’ मेरे दोनों ओठोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं ह्रीं क्लीं कालिकायै स्वाहा’ सदा कण्ठकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा दोनों कानोंकी रक्षा करें। ‘ॐ क्रीं क्रीं क्लीं काल्यै स्वाहा’ सदा मेरे कंधोंकी रक्षा करे। ‘ॐ क्रीं भद्रकाल्यै स्वाहा’ सदा मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। ‘ॐ क्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा मेरी नाभिकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं कालिकायै स्वाहा’ सदा मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करे। ‘रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा’ सदा हाथोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं क्लीं मुण्डमालिन्यै स्वाहा’ सदा पैरोंकी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं चामुण्डायै स्वाहा’ सदा मेरे सर्वाङ्गकी रक्षा करे। पूर्वमें ‘महाकाली’ और अग्निकोणमें ‘रक्तदन्तिका’ रक्षा करें। दक्षिणमें चामुण्डा रक्षा करें। नैर्ऋत्यकोणमें ‘कालिका’ रक्षा करें। पश्चिममें ‘श्यामा’ रक्षा करें। वायव्यकोणमें ‘चण्डिका’, उत्तरमें ‘विकटास्या’ और ईशानकोणमें ‘अट्टहासिनी’ रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें ‘लोलजिह्वा’ रक्षा करें। अधोभागमें सदा ‘आद्यामाया’ रक्षा करें। जल, स्थल और अन्तरिक्षमें सदा ‘विश्वप्रसू’ रक्षा करें।

वत्स! यह कवच समस्त मन्त्रसमूहका मूर्तरूप, सम्पूर्ण कवचोंका सारभूत और उत्कृष्टसे भी उत्कृष्टतर है; इसे मैंने तुम्हें बतला दिया। इसी कवचकी कृपासे राजा सुचन्द्र सातों द्वीपोंके अधिपति हो गये थे। इसी कवचके प्रभावसे पृथ्वीपति मान्धाता सप्तद्वीपवती पृथ्वीके अधिपति हुए थे। इसीके बलसे प्रचेता और लोमश सिद्ध हुए थे तथा इसीके बलसे सौभरि और पिप्पलायन योगियोंमें श्रेष्ठ कहलाये। जिसे यह कवच सिद्ध हो जाता है, वह समस्त सिद्धियोंका स्वामी बन जाता है। सभी महादान, तपस्या और व्रत इस कवचकी सोलहवीं कलाकी भी बराबरी नहीं कर सकते, यह निश्चित है। जो इस कवचको जाने बिना जगज्जननी कालीका भजन करता है, उसके लिये एक करोड़ जप करनेपर भी यह मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता।

(अध्याय ३७)