सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३३- भगवती स्वाहाको श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन

२३८
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
समयोचित बात कहता हूँ, तुमलोग उसपर ध्यान
दो। मेरे वचन हितकर, सत्य, सारभूत एवं
परिणाममें सुखावह हैं। जैसे अखिल विश्वके
सम्पूर्ण प्राणी निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे
ही मैं भी अपने भक्तोंके अधीन हूँ। मैं अपनी इच्छासे
कभी कुछ नहीं कर सकता। सदा मेरे भजन-
चिन्तनमें लगे रहनेवाला निरङ्कुश भक्त जिसपर
रुष्ट हो जाता है, उसके घर लक्ष्मीसहित मैं नहीं
ठहर सकता-यह बिलकुल निश्चित है। मुनिवर
दुर्वासा महाभाग शंकरके अंश एवं वैष्णव पुरुष
हैं। उनके हृदयमें मेरे प्रति अटूट श्रद्धा भी है।
उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है। अतएव तुम्हारे
घरसे लक्ष्मीसहित मैं चला आया हूँ; क्योंकि जहाँ
शङ्खध्वनि नहीं होती, तुलसीका निवास नहीं
रहता, शंकरकी पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको
भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं
रहतीं। ब्रह्मन् तथा देवताओ ! जहाँ मेरे भक्तोंकी
निन्दा होती है, वहाँ रहनेवाली महालक्ष्मीके
मनमें अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है। अतः वे
उस स्थानको छोड़कर चल देती हैं। जो मेरी
उपासना नहीं करता तथा एकादशी और जन्माष्टमीके
दिन अन्न खाता है, उस मूर्ख व्यक्तिके घरसे भी
लक्ष्मी चली जाती हैं। जो मेरे नामका तथा
अपनी कन्याका विक्रय करता है एवं जहाँ
अतिथि भोजन नहीं पाता, उस घरको त्यागकर
मेरी प्रिया लक्ष्मी अन्यत्र चली जाती हैं। जो
ब्राह्मण पुंश्चलीके उदरसे उत्पन्न हुआ है अथवा
पुंश्चलीका पति है, उसे 'महापापी' कहा गया है।
उसके घर लक्ष्मी नहीं ठहर सकतीं।
जो ब्राह्मण बैल जोतता है, वह कमलालया
भगवती लक्ष्मीका प्रेमभाजन नहीं हो सकता।
अतः उसके यहाँसे वे चल देती हैं। जो
अशुद्धहृदय, क्रूर, हिंसक और निन्दक है, उस
ब्राह्मणके हाथका जल पीनेमें भगवती लक्ष्मी
डरती हैं, अतः उसके घरसे वे चल देती हैं।
जो शूद्रोंसे यज्ञ कराता है, कायर व्यक्तियोंका
अन्न खाता है, निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है, नखोंसे
पृथ्वीको कुरेदता रहता है; जो निराशावादी है,
सूर्योदयके समय भोजन करता है, दिनमें सोता
और मैथुन करता है और जो सदाचारहीन है, ऐसे
मूर्खोंके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं।
जो अल्पज्ञानी व्यक्ति भीगे पैर अथवा नंगा
होकर सोता है तथा निरन्तर बेसिर-पैरकी बातें
बकता रहता है, उसके घरसे साध्वी लक्ष्मी
चली जाती हैं। जो सिरपर तैल लगाकर उसीसे
दूसरेके अङ्गको स्पर्श करता है अर्थात् अपने
सिरका तैल दूसरेको लगाता है तथा अपनी
गोदमें बाजा लेकर उसे बजाता है, उसके घरसे
रुष्ट होकर लक्ष्मी चली जाती हैं। जो द्विज
व्रत, उपवास, संध्या और विष्णुभक्तिसे हीन
है, उस अपवित्र पुरुषके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी
चली जाती हैं। जो ब्राह्मणोंकी निन्दा तथा
उनसे द्वेष करता है, जीवोंकी सदा हिंसा करता
है और दयारहित है, उसके घरसे जगज्जननी
लक्ष्मी चली जाती हैं।
जिस स्थानपर भगवान् श्रीहरिकी चर्चा होती
है और उनके गुणोंका कीर्तन होता है, वहींपर
सम्पूर्ण मङ्गलोंको भी मङ्गल प्रदान करनेवाली
भगवती लक्ष्मी निवास करती हैं। पितामह ! जहाँ
भगवान् श्रीकृष्णका तथा उनके भक्तोंका यश
गाया जाता है, वहीं उनकी प्राणप्रिया भगवती
लक्ष्मी सदा विराजती हैं। जहाँ शङ्खध्वनि होती
है तथा शङ्ख, शालग्राम, तुलसी-इनका निवास
रहता है एवं उनकी सेवा, वन्दना और ध्यान
होता है, वहाँ लक्ष्मी सदा विद्यमान रहती हैं।
जहाँ शिवलिङ्गकी पूजा और पवित्र कीर्तन तथा
दुर्गापूजन एवं कीर्तन होता है, वहाँ कमलालया
लक्ष्मी निवास करती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंकी सेवा
होती है, उन्हें उत्तम पदार्थ भोजन कराये जाते हैं
तथा सम्पूर्ण देवताओंका अर्चन होता है, वहाँ

प्रकृतिखण्ड २३९

पद्ममुखी साध्वी लक्ष्मी विराजती हैं।

नारद! रमापति भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण देवताओंसे यों कहकर श्रीलक्ष्मीसे कहा—'देवि! तुम अपनी कलासे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करना स्वीकार कर लो।' इस प्रकार लक्ष्मीसे कहनेके पश्चात् उन जगत्प्रभुने पुनः ब्रह्मासे कहा—'पद्मज! तुम समुद्रका मन्थन करो, उससे लक्ष्मी प्रकट होंगी। तब उन्हें देवताओंको सौंप देना।' मुने! यों अपना प्रवचन समाप्त करके कमलाकान्त भगवान् श्रीहरि अन्तःपुरमें चले गये। देवता उसी क्षण क्षीरसागरकी ओर चल पड़े। वहाँ सभी देवता और दानव एकत्रित हुए। मन्दराचल पर्वतको मन्थनकाष्ठ, कच्छपको पात्र तथा शेषनागको मन्थनकी रस्सी बनाकर वे क्षीरसमुद्रको मथने लगे। फलस्वरूप धन्वन्तरि वैद्य, अमृत, उच्चैःश्रवा घोड़ा, विविध रत्न, हाथियोंमें रत्न ऐरावत, लक्ष्मी, सुदर्शनचक्र तथा वनमाला—ये अमूल्य पदार्थ उन्हें प्राप्त हुए। मुने! उस समय भगवान् विष्णुमें अपार श्रद्धा रखनेवाली साध्वी श्रीलक्ष्मीने क्षीरशायी सर्वेश्वर श्रीहरिके गलेमें वनमाला पहना दी। फिर देवता, ब्रह्मा और शंकरके पूजन एवं स्तवन करनेपर उन्होंने देवताओंके भवनपर केवल दृष्टि फैला दी। इतनेमें ही देवताओंने दुर्वासामु निके शापसे मुक्त होकर दैत्योंके हाथमें गये हुए अपने राज्यको प्राप्त कर लिया। नारद! यों महालक्ष्मीकी कृपासे वर पाकर वे परम सुखी हो गये।

इस प्रकार महालक्ष्मीका सम्पूर्ण श्रेष्ठ उपाख्यान मैंने बतला दिया। इस सारभूत उपाख्यानके प्रभावसे समस्त सुख प्राप्त हो जाता है। अब पुनः तुम क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने कहा— प्रभो! मैं भगवान् श्रीहरिका मङ्गलमय गुणानुवर्णन, उत्तम ज्ञान तथा भगवती लक्ष्मीका अभीष्ट उपाख्यान सुन चुका। अब आप ध्यान और स्तोत्रका प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! प्राचीन समयकी बात है, देवराज इन्द्रने क्षीर-समुद्रके तटपर तीर्थमें स्नान किया, दो स्वच्छ वस्त्र पहने, एक कलश स्थापित किया और छः देवताओंकी पूजा की। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा। इन देवताओंकी गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे भक्तिपूर्वक भलीभाँति पूजा करनेके पश्चात् इन्द्रने परम ऐश्वर्यस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीका आवाहन किया। अपने पुरोहित बृहस्पति तथा ब्रह्माजीके बताये अनुसार पूजा सम्पन्न की। मुने! उस समय उस पवित्र देशमें अनेक मुनिगण, ब्राह्मण-समाज, गुरुदेव, श्रीहरि, देववृन्द तथा आनन्दमय ज्ञानस्वरूप भगवान् शंकर विराजमान थे। नारद! देवराजने पारिजातका चन्दन-चर्चित पुष्प लेकर भगवती महालक्ष्मीका ध्यान किया और उनकी पूजा की। पूर्वकालमें भगवान् श्रीहरिने ब्रह्माजीको जो ध्यान बतलाया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानसे इन्द्रने भगवतीका चिन्तन किया। मैं वह ध्यान तुम्हें बताता हूँ, सुनो—'परम-पूज्या भगवती महालक्ष्मी सहस्र दलवाले कमलकी कर्णिकाओंपर विराजमान हैं। इनकी सुन्दर साड़ी शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न है। ये परम साध्वी